VastuGuruji सही वास्तु · खुशहाल जीवन
विषय-संग्रह

📚 विद्या

शिक्षा, ज्ञान, गुरु-शिष्य

106श्लोक
17 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 विद्या विषय पर चाणक्य नीति

विद्या — चाणक्य के अनुसार सर्व-सम्पत्तियों में श्रेष्ठ। 102 श्लोक — किसी एक विषय पर इतनी संख्या स्वयं उसके महत्त्व का प्रमाण। उनका मूल सिद्धान्त — "विद्या ददाति विनयम्" — विद्या से विनय आता है, और विनय से योग्यता।

चाणक्य ने धन और विद्या में तुलना करते हुए विद्या की पाँच अद्वितीय विशेषताएँ बताईं — (1) चोर नहीं ले सकता (2) बँटवारे में नहीं घटती (3) देने से बढ़ती है (4) विदेश में भी काम आती (5) अन्तकाल तक साथ रहती। उनका प्रसिद्ध सूत्र — "विद्वान् सर्वत्र पूज्यते" — विद्वान् सब जगह पूज्य; राजा केवल अपने राज्य में। विद्या-अर्जन के लिए उन्होंने आठ बाधाएँ बताईं (आलस्य, क्रोध, लोभ, मद, अति-निद्रा, अति-भोग, अति-स्नेह, अति-वार्ता) और गुरु-सेवा को प्रथम सोपान माना। आज के knowledge economy में चाणक्य की यह दृष्टि और प्रासंगिक हो गयी है। हर श्लोक के साथ — 1905 ख़ेमराज मूल + विस्तृत अर्थ + आधुनिक career-learning उदाहरण + cognitive science research।

विद्या विषय से सम्बंधित 106 श्लोक चाणक्य नीति के 17 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

11 श्लोक
1
अ. 1 · श्लोक 1
प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।

नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ॥

विष्णु को नमन

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2
अ. 1 · श्लोक 2
अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः ।

धर्मोपदेशविख्यातं कार्याकार्यं शुभाशुभम् ॥

सही-गलत का विवेक

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3
अ. 1 · श्लोक 3
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।

येन विज्ञातमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥

सर्वज्ञता का मार्ग

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4
अ. 1 · श्लोक 4
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।

दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥

विद्वान् भी कब हारता है

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6
अ. 1 · श्लोक 6
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि ।

आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥

तीन प्राथमिकताएँ

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7
अ. 1 · श्लोक 7
आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।

कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति ॥

लक्ष्मी की चंचलता

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8
अ. 1 · श्लोक 8
यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः ।

न च विद्यागमः कश्चित् न तं देशं समाश्रयेत् ॥

चार आवश्यक तत्त्व

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9
अ. 1 · श्लोक 9
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः ।

पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत् ॥

पाँच आवश्यक संस्थाएँ

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11
अ. 1 · श्लोक 11
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे ।

मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥

चार सम्बन्धों की पहचान

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16
अ. 1 · श्लोक 16
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।

अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि काञ्चनम् ॥

चार स्रोतों से ग्रहण

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17
अ. 1 · श्लोक 17
स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा ।

साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥

चार प्राकृतिक गुणांक

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अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

12 श्लोक
1
अ. 2 · श्लोक 1
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभिता।
अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥

असत्य, अविचारी साहस, छल, मूर्खता, लोभ, अपवित्रता और निर्दयता — ये सात दोष स्वभाव-जन्य हैं।

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4
अ. 2 · श्लोक 4
ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः।
तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥

पुत्र-पिता-मित्र-पत्नी — चारों की कसौटी कर्तव्य और भाव से मापी जाती है, सम्बन्ध-नाम से नहीं।

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7
अ. 2 · श्लोक 7
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्।
मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चापि नियोजयेत्॥

मन में सोचे काम को वाणी से प्रकट न करो — मन्त्र की भाँति गुप्त रखो, गुप्त रूप से ही कार्य में लगाओ।

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8
अ. 2 · श्लोक 8
कथं चखलु मूर्खत्वं कथं चखलु यौवनम्।
कथात्कष्टतरं चैव परगेहनिवासनम्॥

मूर्खता दुखद है, युवापन भी दुखद है — पर पराये घर का वास इन दोनों से भी कठिन है।

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10
अ. 2 · श्लोक 10
पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥

पुत्रों को अनेक प्रकार के शीलों में निरन्तर लगाओ — नीतिज्ञ और शीलवान् पुत्र ही कुल में पूजे जाते हैं।

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11
अ. 2 · श्लोक 11
माता रिपुः पिता शत्रुर्बालो याभ्यां न पाठ्यते।
सभा मध्ये न शोभन्ते हंसमध्ये बको यथा॥

जिस माता-पिता ने बालक को नहीं पढ़ाया, वे माता-शत्रु, पिता-वैरी हैं — बालक हंसों के बीच बगुले-सा अशोभ रहेगा।

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12
अ. 2 · श्लोक 12
लालनाद् बहवो दोषाः ताडनाद् बहवो गुणाः।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत्॥

अति-दुलार से दोष, दण्ड से गुण उत्पन्न होते हैं — पुत्र और शिष्य को दण्ड दो, लाड़ नहीं।

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13
अ. 2 · श्लोक 13
श्लोकेन वा तदर्धेन तदर्धार्धाक्षरेण वा।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्यात् दानाध्ययनकर्मभिः॥

चाहे पूरा श्लोक, चाहे आधा, चाहे आधे का आधा भी — हर दिन को दान और अध्ययन से सार्थक बनाओ।

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16
अ. 2 · श्लोक 16
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा।
बलं वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां च कनिष्ठिका॥

ब्राह्मण का बल विद्या, राजा का सेना, वैश्य का धन, शूद्र का सेवा — हर वर्ण का अपना विशिष्ट बल है।

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18
अ. 2 · श्लोक 18
गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं शिष्या दग्धारण्यं मृगास्तथा॥

दक्षिणा लेकर ब्राह्मण यजमान को, विद्या लेकर शिष्य गुरु को, और जलते वन को मृग — तीनों तुरन्त त्याग देते हैं।

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19
अ. 2 · श्लोक 19
दुराचारी दुष्टदृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुंसां स तु शीघ्रं विनश्यति॥

बुरे आचरण, बुरी दृष्टि, बुरे स्थान वाले दुर्जन से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट होता है।

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20
अ. 2 · श्लोक 20
समाने शोभते प्रीतीः राज्ञि सेवा च शोभते।
वाणिज्यं व्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे॥

समान जनों में प्रीति, राजा के यहाँ सेवा, व्यवहार में व्यापार, और घर में सद्गुणी साथी — ये चारों अपने सही स्थान में शोभते हैं।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

10 श्लोक
2
अ. 3 · श्लोक 2
आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्।
संभ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥

आचरण कुल बताता, भाषा देश बताती, संभ्रम स्नेह बताता, शरीर भोजन की कथा कहता है।

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3
अ. 3 · श्लोक 3
सत्कुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत्।
व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मेण योजयेत्॥

कन्या को सत्कुल में, पुत्र को विद्या में, शत्रु को व्यसन में, मित्र को धर्म में लगाओ।

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8
अ. 3 · श्लोक 8
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

रूप, यौवन और बड़े कुल वाले भी विद्या-हीन हों तो गन्ध-हीन पलाश-पुष्प की तरह अशोभ हैं।

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9
अ. 3 · श्लोक 9
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥

कोयल का रूप उसका स्वर, स्त्री का रूप पतिव्रता, कुरूप का रूप विद्या, और तपस्वी का रूप क्षमा है।

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12
अ. 3 · श्लोक 12
अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यतिसर्वत्र वर्जयेत्॥

अति-सुन्दरता से सीता हरण, अति-गर्व से रावण का नाश, अति-दान से बलि का बन्धन — अति सब जगह वर्जित।

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13
अ. 3 · श्लोक 13
को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्।
को विदेशः सुविद्यानां को परः प्रियवादिनाम्॥

समर्थ को क्या भार, उद्यमी को क्या दूर, विद्वान् को कौन-सा विदेश, प्रियवादी को कौन पराया?

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14
अ. 3 · श्लोक 14
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥

एक भी सुगन्धित पुष्पित वृक्ष पूरे वन को सुवासित करता है — वैसे एक सुपुत्र पूरे कुल को।

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16
अ. 3 · श्लोक 16
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥

विद्या-युक्त साधु एक सुपुत्र से पूरा कुल वैसे आह्लादित होता है जैसे चन्द्रमा से रात्रि।

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17
अ. 3 · श्लोक 17
किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकैः।
वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्राम्यते कुलम्॥

शोक देने वाले बहुत पुत्रों से क्या?

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21
अ. 3 · श्लोक 21
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसञ्चितम्।
दाम्पत्यकलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥

जहाँ मूर्ख पूजे न जायें, अन्न सुसंचित हो, और दम्पति में कलह न हो — वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती है।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

10 श्लोक
1
अ. 4 · श्लोक 1
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥

आयु, कर्म, वित्त, विद्या और मरण — ये पाँच गर्भ-काल में ही निर्धारित हो जाते हैं।

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4
अ. 4 · श्लोक 4
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात्प्राणान्तेकिं करिष्यति॥

जब तक देह स्वस्थ है, मृत्यु दूर है — तब तक आत्म-हित करो।

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5
अ. 4 · श्लोक 5
कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी।
प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥

विद्या कामधेनु-गुणा है — असमय फल देती, विदेश में माता-सम, गुप्त धन है।

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6
अ. 4 · श्लोक 6
एकोऽपि गुणवान्पुत्रो निर्गुणैश्शतैर्वरः।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारा सहस्रशः॥

एक गुणी पुत्र सौ निर्गुणों से श्रेष्ठ — एक चन्द्र अन्धकार हरता है, हज़ार तारे नहीं।

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9
अ. 4 · श्लोक 9
किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गुर्विणी।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान्॥

जो गाय न दूध दे न गाभिन हो, उससे क्या?

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11
अ. 4 · श्लोक 11
सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः।
सकृत्कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्॥

राजा एक बार आदेश देते, पण्डित एक बार बोलते, कन्या एक बार दी जाती — ये तीनों एक-एक बार ही होते हैं।

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12
अ. 4 · श्लोक 12
एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभीरणम्॥

तप एक, पठन दो, गायन तीन, यात्रा चार, खेती पाँच और युद्ध बहुत लोगों के साथ — हर कार्य का अपना group-size है।

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13
अ. 4 · श्लोक 13
सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता।
सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥

शुचि+दक्ष, पतिव्रता, पतिप्रिय, सत्यवादिनी — चार लक्षण असली भार्या के।

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15
अ. 4 · श्लोक 15
अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥

अभ्यास-हीन को शास्त्र विष, अजीर्ण में भोजन विष, दरिद्र को सभा विष, वृद्ध को तरुणी विष।

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16
अ. 4 · श्लोक 16
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत्॥

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोध-मुखी पत्नी, स्नेह-हीन बन्धु — चारों को त्याग दो।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

10 श्लोक
6
अ. 5 · श्लोक 6
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः।
दुर्भगानां च सुभगाः कुलटानां च कुलाङ्गनाः॥

मूर्ख पण्डितों से, निर्धन धनवानों से, अभागे भाग्यवानों से, कुलटा कुलवती-स्त्रियों से — द्वेष करते हैं।

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7
अ. 5 · श्लोक 7
आलस्योपहता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥

आलस्य से विद्या, दूसरे के हाथ में धन, कम बीज से खेत, और नेता-हीन सेना नष्ट।

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8
अ. 5 · श्लोक 8
अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते॥

विद्या अभ्यास से, कुल शील से, आर्य गुण से, क्रोध नेत्र से पहचाने जाते।

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9
अ. 5 · श्लोक 9
वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृदुना रक्ष्यते भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम्॥

धन से धर्म, योग से विद्या, मृदुता से राजा, सद्गुणी पत्नी से घर — रक्षित।

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10
अ. 5 · श्लोक 10
अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा।
अन्यथा वदतो दृष्टा यश्शान्तस्तस्य पूज्यता॥

वेद-पाण्डित्य अन्यथा, शास्त्र-आचार अन्यथा, बोलने वाले अन्यथा — पर जो शान्त है वही पूज्य।

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11
अ. 5 · श्लोक 11
दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥

दान दरिद्रता, शील दुर्गति, प्रज्ञा अज्ञान, भावना भय का नाश करते हैं।

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12
अ. 5 · श्लोक 12
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः।
नास्ति कोपसमो वह्निर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम्॥

काम-समान व्याधि, मोह-समान शत्रु, क्रोध-समान अग्नि — कोई नहीं; और ज्ञान से बढ़कर सुख कोई नहीं।

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14
अ. 5 · श्लोक 14
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गं तृणं शूरस्य जीवितम्।
जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥

ब्रह्मज्ञानी को स्वर्ग, शूर को जीवन, इन्द्रिय-विजयी को नारी, निःस्पृह को जगत् — तिनके के समान।

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15
अ. 5 · श्लोक 15
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

विदेश में विद्या, घर में पत्नी, रोगी को औषधि, मरे को धर्म — मित्र हैं।

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22
अ. 5 · श्लोक 22
जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति।
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥

जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत कराने वाला, विद्या देने वाला, अन्न देने वाला, भय से बचाने वाला — ये पाँच पिता-समान।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

7 श्लोक
1
अ. 6 · श्लोक 1
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥

सुनकर धर्म जाने, दुर्बुद्धि त्यागे, ज्ञान पाये, मोक्ष पाये — श्रवण-शक्ति का चतुर्विध फल।

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3
अ. 6 · श्लोक 3
भस्मना शुध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्ध्यति।
रजसा शुद्ध्यते नारी नदी वेगेन शुद्ध्यति॥

कांसा भस्म से, ताम्बा अम्ल से, स्त्री रजस्वला से, नदी वेग से शुद्ध होती।

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4
अ. 6 · श्लोक 4
भ्रमन्सम्पूज्यते राजा भ्रमन्सम्पूज्यते द्विजः।
भ्रमन्सम्पूज्यते योगी स्त्री भ्रमन्ती विनश्यति॥

घूमने वाला राजा, ब्राह्मण, योगी पूजे जाते — पर स्त्री घूमती तो नष्ट।

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5
अ. 6 · श्लोक 5
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥

जिसके पास धन, उसके मित्र-बन्धु, उसी की समाज में पहचान, उसी को विद्वान् माना जाता।

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10
अ. 6 · श्लोक 10
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः।
भर्तारं च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा॥

राष्ट्र का पाप राजा भोगता, राजा का पुरोहित, स्त्री का पति, शिष्य का गुरु।

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13
अ. 6 · श्लोक 13
वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदाराः॥

कुराज से राज्य न हो, कुमित्र से मित्र न हो, कुशिष्य से शिष्य न हो, कुदार से दारा (पत्नी) न हो — श्रेष्ठ।

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14
अ. 6 · श्लोक 14
कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिर्वृतिः।
कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥

कुराज से सुख नहीं, कुमित्र से शान्ति नहीं, कुदार से घर-सुख नहीं, कुशिष्य से यश नहीं।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

4 श्लोक
2
अ. 7 · श्लोक 2
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासङ्ग्रहणे तथा।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥

धन-धान्य, विद्या-अर्जन, आहार, व्यवहार — पाँच में लज्जा त्यागकर ही सुखी होते।

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4
अ. 7 · श्लोक 4
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥

पत्नी, भोजन, धन में सन्तोष; पठन, जप, दान में सन्तोष न करो।

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11
अ. 7 · श्लोक 11
बाहुवीर्यं बलं राज्ञो ब्राह्मणो ब्रह्मविद्बली।
रूपयौवनमाधुर्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम्॥

राजा का बल भुजबल, ब्राह्मण का ब्रह्मविद्या, स्त्री का रूप-यौवन-माधुर्य — सर्वोच्च बल।

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19
अ. 7 · श्लोक 19
शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना।
न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे॥

विद्या के बिना जीवन कुत्ते की पूँछ-समान व्यर्थ — न गुह्य ढक सकती न मच्छर भगा सकती।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

8 श्लोक
8
अ. 8 · श्लोक 8
हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाज्ञानतो नरः।
हतं निर्णायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः॥

क्रिया-हीन ज्ञान नष्ट, अज्ञानी मनुष्य नष्ट, नायक-हीन सेना नष्ट, पति-हीन स्त्री (आज: support-less individual) नष्ट।

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14
अ. 8 · श्लोक 14
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुधा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम्॥

क्रोध यमराज, तृष्णा वैतरणी नदी, विद्या कामधेनु, सन्तोष नन्दन वन — चार equivalences।

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15
अ. 8 · श्लोक 15
गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥

गुण रूप को, शील कुल को, सिद्धि विद्या को, भोग धन को सजाते हैं।

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16
अ. 8 · श्लोक 16
निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्।
असिद्धस्य हता विद्या ह्यभोगेन हतं धनम्॥

निर्गुण का रूप, दुःशील का कुल, असिद्ध की विद्या, अभोगी का धन — सब नष्ट।

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17
अ. 8 · श्लोक 17
शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता।
शुचिः क्षेमकरो राजा सन्तुष्टो ब्राह्मणः शुचिः॥

भूमिगत जल शुद्ध, पतिव्रता पत्नी शुद्ध, कल्याण-करता राजा शुद्ध, सन्तुष्ट ब्राह्मण शुद्ध।

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19
अ. 8 · श्लोक 19
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।
दुष्कुलं चापि विदुषो देवैरपि सुपूज्यते॥

विद्या-हीन व्यक्ति का विशाल कुल किस काम का?

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20
अ. 8 · श्लोक 20
विद्वान्प्रशस्यते लोके विद्वान्सर्वत्र गौरवम्।
विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥

विद्वान् लोक में प्रशंसित, सर्वत्र गौरव-योग्य।

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21
अ. 8 · श्लोक 21
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

रूप, यौवन, बड़े कुल वाले भी विद्या-हीन हों तो गन्ध-हीन पलाश-पुष्प के समान अशोभ हैं।

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अध्याय 9 — मुक्ति और क्षमा

5 श्लोक
3
अ. 9 · श्लोक 3
गन्धः सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे नाकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य। विद्वान्धनी भूपतिदीर्घजीवी विधातुरासीन्न मनस्यभीष्टम्॥

सोने में गन्ध, ईख में फल, चन्दन में पुष्प नहीं — विद्वान् धनी, राजा चिर-जीवी नहीं हुए।

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5
अ. 9 · श्लोक 5
दूतो न सञ्चरति खे न चलेच्च वार्ता पूर्वं न जल्पितमिदं न च सङ्गमोऽस्ति। व्योम्नि स्थितं रविशशिग्रहणं प्रशस्तं जानाति यो द्विजवरः स कथं न विद्वान्॥

जो आकाश में सूर्य-चन्द्र ग्रहण जान सकें — वही विद्वान्।

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6
अ. 9 · श्लोक 6
विद्यार्थी सेवकः पान्थः क्षुधार्तो भयकातरः। भाण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान्प्रबोधयेत्॥

विद्यार्थी, सेवक, पथिक, भूखा, भय-व्याकुल, भण्डारी, द्वारपाल — 7 सोते हों तो जगाओ।

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8
अ. 9 · श्लोक 8
अर्थाधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनः। ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः॥

जिन्होंने केवल धन के लिए वेद पढ़ा — वे विष-हीन सर्प के समान निरुपयोगी।

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16
अ. 9 · श्लोक 16
पठन्ति चतुरो वेदान्धर्मशास्त्राण्यनेकशः। आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा॥

चार वेद और अनेक धर्मशास्त्र पढ़ने वाले भी आत्मा को नहीं जानते — जैसे करछी पाकरस को।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

4 श्लोक
1
अ. 10 · श्लोक 1
धनहीनो न हीनश्च धनिकः सुसुनिश्चयः। विद्यारत्नेन यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुषु॥

धन-हीन हीन नहीं, विद्या-रत्न से हीन सब वस्तुओं में हीन।

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3
अ. 10 · श्लोक 3
सुखार्थी चेत्त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत्त्यजेत्सुखम्। सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्॥

सुख चाहो तो विद्या त्यागो, विद्या चाहो तो सुख त्यागो — दोनों एक साथ असम्भव।

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7
अ. 10 · श्लोक 7
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

जिनमें न विद्या, न तप, न दान, न ज्ञान, न शील, न गुण, न धर्म — वे पृथ्वी के बोझ, मनुष्य-रूप में पशु।

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8
अ. 10 · श्लोक 8
अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न जायते। मलयाचलसंसर्गान्न वेणुश्चन्दनायते॥

अन्तःसार-विहीन को उपदेश नहीं लगता — मलयाचल पर बाँस चन्दन नहीं बनता।

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

4 श्लोक
1
अ. 11 · श्लोक 1
दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता। अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः॥

दानशीलता, प्रिय-वाणी, धैर्य, उचित ज्ञान — चार natural गुण अभ्यास से नहीं मिलते।

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5
अ. 11 · श्लोक 5
गृहासक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनः। द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता॥

घर में आसक्त को विद्या, मांस-भोजी को दया, द्रव्य-लोभी को सत्य, स्त्री-आसक्त को पवित्रता नहीं मिलती।

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10
अ. 11 · श्लोक 10
कामक्रोधौ तथा लोभं स्वादुशृङ्गारकौतुके। अतिनिद्रातिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत्॥

विद्यार्थी 8 त्यागे — काम, क्रोध, लोभ, स्वाद, शृंगार, कौतुक, अति-निद्रा, अति-सेवा।

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11
अ. 11 · श्लोक 11
अकृष्टफलमूलानि वनवासरतिः सदा। कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते॥

जो बिना खेती फल-मूल खाये, वन-वास, नित्य श्राद्ध — वह विप्र-ऋषि।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

6 श्लोक
2
अ. 12 · श्लोक 2
आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्च श्रद्धान्वितः सत्त्वगुणोपपन्नः।

दया, श्रद्धा, सत्त्व-गुण — द्विज में आवश्यक।

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4
अ. 12 · श्लोक 4
हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ।

दान-हीन हाथ, ज्ञान-त्यागी कान, सत्संग-हीन नेत्र — व्यर्थ।

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11
अ. 12 · श्लोक 11
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।

सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शान्ति पत्नी, क्षमा पुत्र — मेरे 6 बन्धु।

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17
अ. 12 · श्लोक 17
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।

विद्या विदेश में, पत्नी घर में, औषधि रोग में, धर्म मरण में — मित्र।

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21
अ. 12 · श्लोक 21
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासङ्ग्रहणेषु च।

धन-धान्य, विद्या-संग्रह, भोजन, सभा में — लज्जा त्यागो तो सुखी।

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22
अ. 12 · श्लोक 22
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।

जल-बिन्दु-गिरने से घट भरता — सब विद्या, धर्म, धन का यही कारण।

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अध्याय 13 — मुहूर्त-जीवन

4 श्लोक
4
अ. 13 · श्लोक 4
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।

आयु, कर्म, वित्त, विद्या, मरण — पाँच गर्भ में निर्धारित।

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13
अ. 13 · श्लोक 13
देहाभिमाने गलिते ज्ञानेन परमात्मनः।

देह-अभिमान galit होने पर — मन जहाँ जाये, वहाँ समाधि।

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17
अ. 13 · श्लोक 17
यथा खनित्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति।

जैसे खोदने से जल मिलता — वैसे गुरु-सेवा से विद्या मिलती।

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19
अ. 13 · श्लोक 19
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।

पत्नी-भोजन-धन में सन्तोष; पठन-दान-तप में नहीं।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

2 श्लोक
8
अ. 14 · श्लोक 8
दानेन तपसा शौर्येण विज्ञानेन विनयेन च।

दान, तप, शूरता, विज्ञान, विनय, नीति — आश्चर्य नहीं, पृथ्वी पर बहुत रत्न हैं।

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16
अ. 14 · श्लोक 16
एकेव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः।

एक देह तीन प्रकार से देखी जाती — योगी-शव, कामी-मांस, श्वान-कुणप।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

4 श्लोक
1
अ. 15 · श्लोक 1
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु।

जिसका चित्त सब प्राणियों पर दया से द्रवीभूत — उसको ज्ञान, मोक्ष, जटा, भस्म से क्या?

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2
अ. 15 · श्लोक 2
एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्।

गुरु एक अक्षर भी शिष्य को दे — पृथ्वी पर कोई द्रव्य नहीं जिससे शिष्य उऋण हो।

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9
अ. 15 · श्लोक 9
मणिर्लुठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते।

मणि पैरों में लुढ़कती, काँच सिर पर पहना जाता — पर क्रय-विक्रय में काँच काँच, मणि मणि।

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12
अ. 15 · श्लोक 12
पठन्ति चतुरो वेदान्धर्मशास्त्राण्यनेकशः।

चार वेद, अनेक शास्त्र पढ़कर भी आत्म-ज्ञान न हो — पाक-रस-अनभिज्ञ करछी समान।

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

1 श्लोक
17
अ. 16 · श्लोक 17
पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।

पुष्प में गन्ध, तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, दूध में घी, ईख में गुड़ — वैसे देह में आत्मा।

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अध्याय 17 — समापन

4 श्लोक
1
अ. 17 · श्लोक 1
पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ।

पुस्तक-भरोसे पढ़ा — गुरु-सान्निध्य में नहीं — सभा में अव्यभिचारी गर्भिणी-समान शोभा नहीं।

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12
अ. 17 · श्लोक 12
दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन।

हाथ दान से शोभा, कंगन से नहीं।

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18
अ. 17 · श्लोक 18
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोधी पत्नी (आज: partner), स्नेह-हीन बन्धु — त्याज्य।

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19
अ. 17 · श्लोक 19
इदं चाणक्यनीतिं तु यः पठेच्छृणुयादपि।

जो चाणक्य-नीति पढ़े, सुने, या अनुसरण करे — वह देवों के पूज्य अर्थ-धर्म-कामा-सिद्धि पाता।

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