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विषय-संग्रह

💰 धन

धन-सम्पदा, सम्पत्ति, अर्थ

121श्लोक
17 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 धन विषय पर चाणक्य नीति

धन — चाणक्य नीति का सबसे बहु-चर्चित विषय। आचार्य चाणक्य धन को न तो पाप मानते, न ही जीवन का परम लक्ष्य। उनके अनुसार धन एक साधन है — धर्म-पालन के लिए, परिवार-रक्षण के लिए, और स्वतन्त्र जीवन के लिए। चाणक्य के 114 श्लोक धन के पाँच आयामों पर प्रकाश डालते हैं — अर्जन (कैसे कमायें), संरक्षण (कैसे बचायें), उपयोग (कैसे खर्च करें), वितरण (कैसे दान दें), और प्रभाव (कैसे यह मित्रता, सम्बन्ध और राज्य को बदलता है)।

चाणक्य का सबसे प्रसिद्ध सूत्र — "यस्यार्थास्तस्य मित्राणि" — जिसके पास धन, उसी के मित्र। यह कड़वा सच आज भी उतना ही प्रासंगिक है। पर वे यह भी कहते हैं — "धनहीनः चन्द्रमा निष्प्रभो भवति" — धन के बिना चाँद भी फीका। इसलिए उन्होंने सुपात्र को दान, अपात्र से बचाव, गुप्त धन-संग्रह, और लोभ-नियन्त्रण के सूक्ष्म नियम दिए। पढ़िए हर अध्याय से धन-सम्बन्धी श्लोक — Sanskrit मूल + विस्तृत हिन्दी अर्थ + आधुनिक उदाहरण + neuroscience-आधारित 🧠 मस्तिष्क-दर्शन।

धन विषय से सम्बंधित 121 श्लोक चाणक्य नीति के 17 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

16 श्लोक
1
अ. 1 · श्लोक 1
प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।

नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ॥

विष्णु को नमन

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2
अ. 1 · श्लोक 2
अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः ।

धर्मोपदेशविख्यातं कार्याकार्यं शुभाशुभम् ॥

सही-गलत का विवेक

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3
अ. 1 · श्लोक 3
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।

येन विज्ञातमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥

सर्वज्ञता का मार्ग

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4
अ. 1 · श्लोक 4
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।

दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥

विद्वान् भी कब हारता है

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5
अ. 1 · श्लोक 5
दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।

ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥

चार मृत्यु-तुल्य स्थितियाँ

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6
अ. 1 · श्लोक 6
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि ।

आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥

तीन प्राथमिकताएँ

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7
अ. 1 · श्लोक 7
आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।

कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति ॥

लक्ष्मी की चंचलता

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8
अ. 1 · श्लोक 8
यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः ।

न च विद्यागमः कश्चित् न तं देशं समाश्रयेत् ॥

चार आवश्यक तत्त्व

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9
अ. 1 · श्लोक 9
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः ।

पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत् ॥

पाँच आवश्यक संस्थाएँ

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10
अ. 1 · श्लोक 10
लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।

पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संगतिम् ॥

चरित्र के पाँच गुण

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11
अ. 1 · श्लोक 11
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे ।

मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥

चार सम्बन्धों की पहचान

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12
अ. 1 · श्लोक 12
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे ।

राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥

छह कठिन क्षण

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13
अ. 1 · श्लोक 13
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।

ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि ॥

दोनों हाथ नहीं रहते

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14
अ. 1 · श्लोक 14
वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् ।

रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥

कुल और चरित्र

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16
अ. 1 · श्लोक 16
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।

अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि काञ्चनम् ॥

चार स्रोतों से ग्रहण

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17
अ. 1 · श्लोक 17
स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा ।

साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥

चार प्राकृतिक गुणांक

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अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

15 श्लोक
1
अ. 2 · श्लोक 1
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभिता।
अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥

असत्य, अविचारी साहस, छल, मूर्खता, लोभ, अपवित्रता और निर्दयता — ये सात दोष स्वभाव-जन्य हैं।

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2
अ. 2 · श्लोक 2
भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वराङ्गना।
विभवो दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपसः फलम्॥

छह सुख — भोजन, पाचन, सुन्दर साथी, रति-शक्ति, वैभव और दान-सामर्थ्य — थोड़े तप का फल नहीं हैं।

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3
अ. 2 · श्लोक 3
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी।
विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहैव हि॥

आज्ञाकारी पुत्र, अनुकूल पत्नी और अपनी संपदा में सन्तोष — इन तीन का स्वर्ग यहीं है।

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4
अ. 2 · श्लोक 4
ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः।
तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥

पुत्र-पिता-मित्र-पत्नी — चारों की कसौटी कर्तव्य और भाव से मापी जाती है, सम्बन्ध-नाम से नहीं।

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5
अ. 2 · श्लोक 5
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥

पीठ-पीछे काम बिगाड़ने और सामने मीठा बोलने वाला मित्र — मुख पर दूध, भीतर विष का घड़ा है — उसे त्यागो।

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6
अ. 2 · श्लोक 6
न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत्।
कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वगुह्यं प्रकाशयेत्॥

बुरे मित्र पर तो विश्वास न करो, अच्छे मित्र पर भी अति विश्वास न करो — क्योंकि कुपित होने पर वह सब रहस्य खोल देगा।

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8
अ. 2 · श्लोक 8
कथं चखलु मूर्खत्वं कथं चखलु यौवनम्।
कथात्कष्टतरं चैव परगेहनिवासनम्॥

मूर्खता दुखद है, युवापन भी दुखद है — पर पराये घर का वास इन दोनों से भी कठिन है।

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9
अ. 2 · श्लोक 9
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥

हर पर्वत पर माणिक्य नहीं, हर हाथी में मोती नहीं, हर वन में चन्दन नहीं — वैसे ही साधु भी सर्वत्र नहीं।

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10
अ. 2 · श्लोक 10
पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥

पुत्रों को अनेक प्रकार के शीलों में निरन्तर लगाओ — नीतिज्ञ और शीलवान् पुत्र ही कुल में पूजे जाते हैं।

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11
अ. 2 · श्लोक 11
माता रिपुः पिता शत्रुर्बालो याभ्यां न पाठ्यते।
सभा मध्ये न शोभन्ते हंसमध्ये बको यथा॥

जिस माता-पिता ने बालक को नहीं पढ़ाया, वे माता-शत्रु, पिता-वैरी हैं — बालक हंसों के बीच बगुले-सा अशोभ रहेगा।

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12
अ. 2 · श्लोक 12
लालनाद् बहवो दोषाः ताडनाद् बहवो गुणाः।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत्॥

अति-दुलार से दोष, दण्ड से गुण उत्पन्न होते हैं — पुत्र और शिष्य को दण्ड दो, लाड़ नहीं।

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14
अ. 2 · श्लोक 14
कान्तावियोगः स्वजनापमानो ऋणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा।
दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥

छह चीज़ें बिना आग के शरीर को जलाती हैं — प्रिय-विरह, अपनों का अनादर, बचा हुआ क़र्ज़, बुरे राजा की सेवा, दरिद्रता और विषम सभा।

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16
अ. 2 · श्लोक 16
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा।
बलं वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां च कनिष्ठिका॥

ब्राह्मण का बल विद्या, राजा का सेना, वैश्य का धन, शूद्र का सेवा — हर वर्ण का अपना विशिष्ट बल है।

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17
अ. 2 · श्लोक 17
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजाभग्नं नृपं त्यजेत्।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्ता अभ्यागता गृहम्॥

वेश्या निर्धन को, प्रजा भग्न राजा को, पक्षी फल-हीन वृक्ष को, अतिथि भोजन के बाद गृह को — स्वार्थ-पूर्ण लोग प्रयोजन-समाप्ति पर तुरन्त त्याग देते हैं।

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20
अ. 2 · श्लोक 20
समाने शोभते प्रीतीः राज्ञि सेवा च शोभते।
वाणिज्यं व्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे॥

समान जनों में प्रीति, राजा के यहाँ सेवा, व्यवहार में व्यापार, और घर में सद्गुणी साथी — ये चारों अपने सही स्थान में शोभते हैं।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

11 श्लोक
1
अ. 3 · श्लोक 1
कस्य दोषः कुलेनास्ति व्याधिना केन पीडिताः।
व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्॥

किसके कुल में दोष नहीं?

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2
अ. 3 · श्लोक 2
आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्।
संभ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥

आचरण कुल बताता, भाषा देश बताती, संभ्रम स्नेह बताता, शरीर भोजन की कथा कहता है।

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3
अ. 3 · श्लोक 3
सत्कुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत्।
व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मेण योजयेत्॥

कन्या को सत्कुल में, पुत्र को विद्या में, शत्रु को व्यसन में, मित्र को धर्म में लगाओ।

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5
अ. 3 · श्लोक 5
एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्।
आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥

राजा कुलीनों का संग्रह इसलिए करते हैं क्योंकि वे आदि-मध्य-अन्त किसी भी अवस्था में राजा को नहीं छोड़ते।

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8
अ. 3 · श्लोक 8
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

रूप, यौवन और बड़े कुल वाले भी विद्या-हीन हों तो गन्ध-हीन पलाश-पुष्प की तरह अशोभ हैं।

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10
अ. 3 · श्लोक 10
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥

कुल के लिये एक, गाँव के लिए कुल, देश के लिए गाँव, और आत्मा के लिए पृथ्वी छोड़ देनी चाहिए।

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12
अ. 3 · श्लोक 12
अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यतिसर्वत्र वर्जयेत्॥

अति-सुन्दरता से सीता हरण, अति-गर्व से रावण का नाश, अति-दान से बलि का बन्धन — अति सब जगह वर्जित।

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15
अ. 3 · श्लोक 15
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥

एक भी सूखे वृक्ष में आग लग जाये तो पूरा वन जल जाता है — वैसे एक कुपुत्र पूरे कुल को।

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16
अ. 3 · श्लोक 16
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥

विद्या-युक्त साधु एक सुपुत्र से पूरा कुल वैसे आह्लादित होता है जैसे चन्द्रमा से रात्रि।

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20
अ. 3 · श्लोक 20
धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते।
जन्मफलं हि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चारों में से एक भी जिसमें नहीं, उसका जन्म व्यर्थ है, केवल मरण।

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21
अ. 3 · श्लोक 21
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसञ्चितम्।
दाम्पत्यकलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥

जहाँ मूर्ख पूजे न जायें, अन्न सुसंचित हो, और दम्पति में कलह न हो — वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती है।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

9 श्लोक
1
अ. 4 · श्लोक 1
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥

आयु, कर्म, वित्त, विद्या और मरण — ये पाँच गर्भ-काल में ही निर्धारित हो जाते हैं।

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2
अ. 4 · श्लोक 2
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः।
ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥

साधुजनों से दूर हो जाने वाले पुत्र-मित्र-बन्धु निरर्थक हैं — जो उनके साथ चलें, उनसे ही कुल सुकृती बनता है।

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4
अ. 4 · श्लोक 4
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात्प्राणान्तेकिं करिष्यति॥

जब तक देह स्वस्थ है, मृत्यु दूर है — तब तक आत्म-हित करो।

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5
अ. 4 · श्लोक 5
कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी।
प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥

विद्या कामधेनु-गुणा है — असमय फल देती, विदेश में माता-सम, गुप्त धन है।

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6
अ. 4 · श्लोक 6
एकोऽपि गुणवान्पुत्रो निर्गुणैश्शतैर्वरः।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारा सहस्रशः॥

एक गुणी पुत्र सौ निर्गुणों से श्रेष्ठ — एक चन्द्र अन्धकार हरता है, हज़ार तारे नहीं।

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9
अ. 4 · श्लोक 9
किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गुर्विणी।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान्॥

जो गाय न दूध दे न गाभिन हो, उससे क्या?

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12
अ. 4 · श्लोक 12
एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभीरणम्॥

तप एक, पठन दो, गायन तीन, यात्रा चार, खेती पाँच और युद्ध बहुत लोगों के साथ — हर कार्य का अपना group-size है।

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15
अ. 4 · श्लोक 15
अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥

अभ्यास-हीन को शास्त्र विष, अजीर्ण में भोजन विष, दरिद्र को सभा विष, वृद्ध को तरुणी विष।

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17
अ. 4 · श्लोक 17
अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धने जरा।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपे जरा॥

मनुष्य को यात्रा, घोड़े को बँधन, स्त्री को रति-अभाव, और वस्त्र को धूप — चारों को बूढ़ा बनाते हैं।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

11 श्लोक
1
अ. 5 · श्लोक 1
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः।
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥

पत्नी का पति, सबका अभ्यागत (अतिथि), द्विज का अग्नि, चारों वर्णों का ब्राह्मण — चार categories के गुरु।

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2
अ. 5 · श्लोक 2
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥

घिसना, काटना, तपाना, पीटना — चार से सोना; त्याग, शील, गुण, कर्म — चार से मनुष्य परखा जाता है।

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4
अ. 5 · श्लोक 4
एकोदरसमुद्भूता एकनक्षत्रजातकाः।
न भवन्ति समाः शीले यथा बदरीकण्टकाः॥

एक गर्भ से, एक नक्षत्र में जन्मे — फिर भी शील में समान नहीं होते, जैसे बेर-काँटे एक पेड़ के।

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6
अ. 5 · श्लोक 6
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः।
दुर्भगानां च सुभगाः कुलटानां च कुलाङ्गनाः॥

मूर्ख पण्डितों से, निर्धन धनवानों से, अभागे भाग्यवानों से, कुलटा कुलवती-स्त्रियों से — द्वेष करते हैं।

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7
अ. 5 · श्लोक 7
आलस्योपहता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥

आलस्य से विद्या, दूसरे के हाथ में धन, कम बीज से खेत, और नेता-हीन सेना नष्ट।

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9
अ. 5 · श्लोक 9
वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृदुना रक्ष्यते भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम्॥

धन से धर्म, योग से विद्या, मृदुता से राजा, सद्गुणी पत्नी से घर — रक्षित।

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10
अ. 5 · श्लोक 10
अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा।
अन्यथा वदतो दृष्टा यश्शान्तस्तस्य पूज्यता॥

वेद-पाण्डित्य अन्यथा, शास्त्र-आचार अन्यथा, बोलने वाले अन्यथा — पर जो शान्त है वही पूज्य।

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14
अ. 5 · श्लोक 14
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गं तृणं शूरस्य जीवितम्।
जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥

ब्रह्मज्ञानी को स्वर्ग, शूर को जीवन, इन्द्रिय-विजयी को नारी, निःस्पृह को जगत् — तिनके के समान।

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16
अ. 5 · श्लोक 16
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवापि च॥

समुद्र में वर्षा, तृप्त को भोजन, धनिक को दान, दिन में दीपक — सब व्यर्थ।

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18
अ. 5 · श्लोक 18
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥

निर्धन धन, चौपाये वाणी, मनुष्य स्वर्ग, देवता मोक्ष — चाहते हैं।

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20
अ. 5 · श्लोक 20
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीविते मन्दिरे।
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥

लक्ष्मी चंचल, प्राण चंचल, जीवन-घर चंचल — इस चराचर संसार में एक धर्म ही निश्चल।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

3 श्लोक
5
अ. 6 · श्लोक 5
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥

जिसके पास धन, उसके मित्र-बन्धु, उसी की समाज में पहचान, उसी को विद्वान् माना जाता।

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8
अ. 6 · श्लोक 8
न पश्यन्ति च जन्मान्धाः कामान्धा नैव पश्यन्ति।
मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति॥

चार "अन्धे" — जन्मान्ध, कामान्ध, मदोन्मत्त, अर्थी (स्वार्थी) — सच नहीं देखते।

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12
अ. 6 · श्लोक 12
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्स्तब्धमञ्जलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च यथार्थत्वेन पण्डितम्॥

लोभी को धन से, अहंकारी को नमस्कार से, मूर्ख को उसके अनुसार चलकर, पण्डित को यथार्थ से जीतो।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

7 श्लोक
1
अ. 7 · श्लोक 1
अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणीचरितानि च।
नीचवाक्यं चापमानं मतिमान्न प्रकाशयेत्॥

धन-नाश, मन-संताप, गृहिणी-चरित्र, नीच-वाक्य, अपमान — पाँच बातें बुद्धिमान् प्रकट न करे।

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2
अ. 7 · श्लोक 2
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासङ्ग्रहणे तथा।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥

धन-धान्य, विद्या-अर्जन, आहार, व्यवहार — पाँच में लज्जा त्यागकर ही सुखी होते।

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3
अ. 7 · श्लोक 3
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च।
न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥

सन्तोष-अमृत से तृप्तों को जो सुख-शान्ति मिलती, वह धन-लोभी इधर-उधर भागते वालों को नहीं।

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4
अ. 7 · श्लोक 4
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥

पत्नी, भोजन, धन में सन्तोष; पठन, जप, दान में सन्तोष न करो।

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9
अ. 7 · श्लोक 9
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा घनगर्जिते।
साधवः परसम्पत्तौ खलाः परविपत्तिषु॥

ब्राह्मण भोजन से, मयूर मेघ-गर्जन से, सज्जन दूसरों की सम्पत्ति से, दुष्ट दूसरों की विपत्ति से प्रसन्न होते।

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14
अ. 7 · श्लोक 14
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्॥

कमायी सम्पत्ति की रक्षा त्याग में — जैसे तालाब के पानी की रक्षा निकलने में।

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15
अ. 7 · श्लोक 15
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च जीवति॥

जिसके पास धन — उसके मित्र, बन्धु, सामाजिक पहचान, और जीवन।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

7 श्लोक
1
अ. 8 · श्लोक 1
अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥

अधम केवल धन, मध्यम धन और मान, उत्तम केवल मान चाहते — मान ही महान् पुरुषों का धन।

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2
अ. 8 · श्लोक 2
इक्षुदण्डास्तिलाः शूद्राः कान्ता हेम च मेदिनी।
चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥

ईख, तिल, सोना, चन्दन, दही, पान — पीसने/मर्दन से गुण बढ़ते।

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4
अ. 8 · श्लोक 4
वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र देहि क्वचित्।
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुखे माधुर्यवद्भूतले॥

गुणवानों को धन दो, अन्यत्र नहीं — समुद्र का जल बादल में मीठा होकर पृथ्वी पर गिरता है।

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9
अ. 8 · श्लोक 9
वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्तगतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः॥

वृद्धावस्था में पत्नी की मृत्यु, बन्धुओं के हाथ में धन, परवशता का भोजन — तीन सबसे बड़ी विडम्बनाएँ।

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15
अ. 8 · श्लोक 15
गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥

गुण रूप को, शील कुल को, सिद्धि विद्या को, भोग धन को सजाते हैं।

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16
अ. 8 · श्लोक 16
निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्।
असिद्धस्य हता विद्या ह्यभोगेन हतं धनम्॥

निर्गुण का रूप, दुःशील का कुल, असिद्ध की विद्या, अभोगी का धन — सब नष्ट।

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21
अ. 8 · श्लोक 21
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

रूप, यौवन, बड़े कुल वाले भी विद्या-हीन हों तो गन्ध-हीन पलाश-पुष्प के समान अशोभ हैं।

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अध्याय 9 — मुक्ति और क्षमा

5 श्लोक
3
अ. 9 · श्लोक 3
गन्धः सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे नाकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य। विद्वान्धनी भूपतिदीर्घजीवी विधातुरासीन्न मनस्यभीष्टम्॥

सोने में गन्ध, ईख में फल, चन्दन में पुष्प नहीं — विद्वान् धनी, राजा चिर-जीवी नहीं हुए।

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8
अ. 9 · श्लोक 8
अर्थाधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनः। ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः॥

जिन्होंने केवल धन के लिए वेद पढ़ा — वे विष-हीन सर्प के समान निरुपयोगी।

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9
अ. 9 · श्लोक 9
यस्मिन्रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनागमः। निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति॥

जिसके रुष्ट होने पर भय न हो, प्रसन्न होने पर धन-लाभ न हो — वह रुष्ट क्या करेगा?

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13
अ. 9 · श्लोक 13
इक्षुदण्डास्तिलाः शूद्राः कान्ता हेम च मेदिनी। चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥

ईख, तिल, सोना, चन्दन — मर्दन से गुण-वर्धन।

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15
अ. 9 · श्लोक 15
धर्मार्थ काममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। जन्म जन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — एक भी न हो तो जन्म-जन्म केवल मरण।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

5 श्लोक
1
अ. 10 · श्लोक 1
धनहीनो न हीनश्च धनिकः सुसुनिश्चयः। विद्यारत्नेन यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुषु॥

धन-हीन हीन नहीं, विद्या-रत्न से हीन सब वस्तुओं में हीन।

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5
अ. 10 · श्लोक 5
रङ्कं करोति राजानं राजानं रङ्कमेव च। धनिनं निर्धनं चैव निर्धनं धनिनं विधिः॥

विधि — रंक को राजा, राजा को रंक, धनी को निर्धन, निर्धन को धनी बना देती है।

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6
अ. 10 · श्लोक 6
लुब्धानां याचकः शत्रुर्मूर्खाणां बोधको रिपुः। जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चौराणां चन्द्रमा रिपुः॥

लोभी का याचक, मूर्ख का बोधक, जार-स्त्री का पति, चोर का चन्द्रमा — शत्रु।

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11
अ. 10 · श्लोक 11
आत्मद्वेषाद्भवेन्मृत्युः परद्वेषाद्धनक्षयः। राजद्वेषाद्भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः॥

आत्म-द्वेष से मृत्यु, पर-द्वेष से धन-क्षय, राज-द्वेष से नाश, ब्रह्म-द्वेष से कुल-क्षय।

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14
अ. 10 · श्लोक 14
तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः। वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं प्रार्थयिष्यति॥

तृण हल्का, उससे रुई, उससे याचक हल्का — हवा उसे क्यों नहीं उड़ाती?

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

5 श्लोक
5
अ. 11 · श्लोक 5
गृहासक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनः। द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता॥

घर में आसक्त को विद्या, मांस-भोजी को दया, द्रव्य-लोभी को सत्य, स्त्री-आसक्त को पवित्रता नहीं मिलती।

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10
अ. 11 · श्लोक 10
कामक्रोधौ तथा लोभं स्वादुशृङ्गारकौतुके। अतिनिद्रातिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत्॥

विद्यार्थी 8 त्यागे — काम, क्रोध, लोभ, स्वाद, शृंगार, कौतुक, अति-निद्रा, अति-सेवा।

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13
अ. 11 · श्लोक 13
लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः। वाणिज्यकृषिकर्मा यः स विप्रो वैश्य उच्यते॥

लौकिक कर्म, पशु-पालन, वाणिज्य, खेती करने वाला विप्र — "वैश्य।

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17
अ. 11 · श्लोक 17
देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्शनम्। निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते॥

देवता-धन, गुरु-धन, पर-स्त्री-स्पर्श करने वाला, सब प्राणियों पर निर्वाह करने वाला विप्र — "चाण्डाल।

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18
अ. 11 · श्लोक 18
देयं भोज्यधनं धनं सुकृतिभिर्नो सञ्चयस्तस्य वै। श्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्तिः स्थिता॥

सुकृति लोग भोग्य धन देते रहें — संचय नहीं।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

4 श्लोक
1
अ. 12 · श्लोक 1
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियालापिनी।

आनन्द-युक्त घर, बुद्धिमान् पुत्र, मधुर-भाषिणी पत्नी — गृहस्थाश्रम धन्य।

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14
अ. 12 · श्लोक 14
मातृवत्परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्ठवत्।

पर-स्त्री को माँ-तुल्य, पर-धन को मिट्टी-तुल्य, सब प्राणियों को अपने-तुल्य — जो देखे, वही देखता।

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21
अ. 12 · श्लोक 21
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासङ्ग्रहणेषु च।

धन-धान्य, विद्या-संग्रह, भोजन, सभा में — लज्जा त्यागो तो सुखी।

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22
अ. 12 · श्लोक 22
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।

जल-बिन्दु-गिरने से घट भरता — सब विद्या, धर्म, धन का यही कारण।

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अध्याय 13 — मुहूर्त-जीवन

2 श्लोक
4
अ. 13 · श्लोक 4
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।

आयु, कर्म, वित्त, विद्या, मरण — पाँच गर्भ में निर्धारित।

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19
अ. 13 · श्लोक 19
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।

पत्नी-भोजन-धन में सन्तोष; पठन-दान-तप में नहीं।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

2 श्लोक
3
अ. 14 · श्लोक 3
पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।

धन, मित्र, भार्या, पृथ्वी फिर मिल सकते — पर मनुष्य-देह नहीं।

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19
अ. 14 · श्लोक 19
धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम्।

धर्म, धन, धान्य, गुरु-वचन, औषध — 5 शुभ रूप से ग्रहण करो, अन्यथा जीना नहीं।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

5 श्लोक
5
अ. 15 · श्लोक 5
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च।

धन-हीन को मित्र, पत्नी, सेवक, सुहृद छोड़ देते — फिर धनी होते ही लौट आते।

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6
अ. 15 · श्लोक 6
अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति।

अन्याय से अर्जित धन 10 वर्ष ठहरता — 11वें में मूल-सहित नष्ट होता।

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9
अ. 15 · श्लोक 9
मणिर्लुठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते।

मणि पैरों में लुढ़कती, काँच सिर पर पहना जाता — पर क्रय-विक्रय में काँच काँच, मणि मणि।

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13
अ. 15 · श्लोक 13
धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे।

ब्राह्मण-रूप नौका भव-सागर में विपरीत — नीचे रहने वाले तरते, ऊपर वाले डूबते।

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14
अ. 15 · श्लोक 14
माता च कमलादेवी पिता देवो जनार्दनः।

जिसकी माँ लक्ष्मी, पिता विष्णु, बन्धु विष्णु-भक्त — तीनों लोक उसके स्वदेश।

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

6 श्लोक
4
अ. 16 · श्लोक 4
कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः।

धन पाकर कौन गर्व-रहित, विषयों के दुख किसे नहीं, स्त्रियाँ किसका मन-खंडित नहीं किया — समय किसका मित्र, याचक को कौन गौरव देता, खल के जाल में कौन नहीं फँसा।

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7
अ. 16 · श्लोक 7
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः।

गुण सर्वत्र पूज्य, बड़ी सम्पत्ति नहीं — पूर्णेन्दु कलंक-रहित द्वितीया-चन्द्र की तरह वंदित नहीं।

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11
अ. 16 · श्लोक 11
अतिक्लेशेन ये अर्थाः धर्मस्यातिक्रमेण च।

अत्यन्त पीड़ा से, धर्म-त्याग से, शत्रु-प्रणति से प्राप्त धन — मेरे पास नहीं।

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12
अ. 16 · श्लोक 12
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।

सामान्य वधू-तुल्य लक्ष्मी से क्या लाभ — पथिकों से भी सेवित वेश्या-तुल्य लक्ष्मी ही उत्तम।

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13
अ. 16 · श्लोक 13
धनेषु जीविते चैव स्त्रीषु चाहारकर्मसु।

धन, जीवन, स्त्री, आहार, कर्म — अतृप्ति।

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15
अ. 16 · श्लोक 15
तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः।

तृण हल्का, तूल उससे, याचक उससे — हवा नहीं उड़ाती, सोचती "मुझसे माँगेगा।

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अध्याय 17 — समापन

8 श्लोक
4
अ. 17 · श्लोक 4
लोभश्चेद्गुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः।

लोभ हो तो दूसरे दुर्गुणों से क्या, चुगली हो तो पाप से क्या, सत्य हो तो तप से क्या — सब virtues + vices interrelated।

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5
अ. 17 · श्लोक 5
पितारत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरी।

जिसका पिता रत्नाकर समुद्र, बहिन लक्ष्मी — फिर भी शंख भीख माँगता, बिना दिये कुछ नहीं मिलता।

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6
अ. 17 · श्लोक 6
अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः।

असमर्थ साधु, निर्धन ब्रह्मचारी, रोगी देव-भक्त, बूढ़ी स्त्री पतिव्रता — स्वाभाविक नहीं, परिस्थिति-जन्य।

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10
अ. 17 · श्लोक 10
न दानैः शुद्ध्यते नारी नोपवासशतैरपि।

सब दान, सैकड़ों उपवास, तीर्थ-स्नान से नहीं — पति-चरणोदक से ही "शुद्ध" (आज: partner-reverence se relationship shudh)।

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13
अ. 17 · श्लोक 13
नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्धलेपनम्।

नाई के घर मूँडना, पत्थर पर चन्दन, अपने रूप पानी में देखना, अन्याय-धन इन्द्र की भी लक्ष्मी हरते।

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17
अ. 17 · श्लोक 17
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजाभग्नं नृपं त्यजेत्।

वेश्या निर्धन, प्रजा भग्न-राजा, पक्षी फल-हीन वृक्ष, अतिथि भोजन-बाद घर — छोड़ देते।

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19
अ. 17 · श्लोक 19
इदं चाणक्यनीतिं तु यः पठेच्छृणुयादपि।

जो चाणक्य-नीति पढ़े, सुने, या अनुसरण करे — वह देवों के पूज्य अर्थ-धर्म-कामा-सिद्धि पाता।

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