VastuGuruji सही वास्तु · खुशहाल जीवन
विषय-संग्रह

🧘 गुरु

आचार्य, शिक्षक, मार्गदर्शक

128श्लोक
15 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 गुरु विषय पर चाणक्य नीति

गुरु — चाणक्य के 128 श्लोकों में सर्वाधिक प्रमुख। 38% शलोकों में गुरु, ज्ञान, या शिष्य का सन्दर्भ। यह स्वयं प्रमाण कि गुरु-शिष्य परम्परा भारतीय ज्ञान-संरचना का केन्द्र है, और चाणक्य ने इसी पर अपनी पूरी नीति-शास्त्र की नींव रखी।

चाणक्य ने गुरु के पाँच रूप बताये (अध्याय 5) — पत्नी का पति, सबका अतिथि, द्विज की अग्नि, चारों वर्णों का ब्राह्मण, और शिष्य का आचार्य। यानी "गुरु" एक व्यक्ति नहीं — विभिन्न contexts में अलग-अलग मार्गदर्शक। उनका कड़ा सूत्र — "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः" — गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश। पर गुरु-चयन के लिए उन्होंने कठोर मापदण्ड बनाये — विद्या-पूर्ण, चरित्र-निर्मल, अनुभव-सम्पन्न, और शिष्य-हितैषी। आज mentor-mentee relationships, leadership coaching, और spiritual guidance — सब में चाणक्य की यह दृष्टि लागू। हर श्लोक — मूल पाठ + विवेचन + multi-mentor model + Linda Hill leadership research connections।

गुरु विषय से सम्बंधित 128 श्लोक चाणक्य नीति के 15 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

1 श्लोक
1
अ. 1 · श्लोक 1
प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।

नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ॥

विष्णु को नमन

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अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

6 श्लोक
9
अ. 2 · श्लोक 9
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥

हर पर्वत पर माणिक्य नहीं, हर हाथी में मोती नहीं, हर वन में चन्दन नहीं — वैसे ही साधु भी सर्वत्र नहीं।

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10
अ. 2 · श्लोक 10
पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥

पुत्रों को अनेक प्रकार के शीलों में निरन्तर लगाओ — नीतिज्ञ और शीलवान् पुत्र ही कुल में पूजे जाते हैं।

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11
अ. 2 · श्लोक 11
माता रिपुः पिता शत्रुर्बालो याभ्यां न पाठ्यते।
सभा मध्ये न शोभन्ते हंसमध्ये बको यथा॥

जिस माता-पिता ने बालक को नहीं पढ़ाया, वे माता-शत्रु, पिता-वैरी हैं — बालक हंसों के बीच बगुले-सा अशोभ रहेगा।

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12
अ. 2 · श्लोक 12
लालनाद् बहवो दोषाः ताडनाद् बहवो गुणाः।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत्॥

अति-दुलार से दोष, दण्ड से गुण उत्पन्न होते हैं — पुत्र और शिष्य को दण्ड दो, लाड़ नहीं।

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13
अ. 2 · श्लोक 13
श्लोकेन वा तदर्धेन तदर्धार्धाक्षरेण वा।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्यात् दानाध्ययनकर्मभिः॥

चाहे पूरा श्लोक, चाहे आधा, चाहे आधे का आधा भी — हर दिन को दान और अध्ययन से सार्थक बनाओ।

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18
अ. 2 · श्लोक 18
गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं शिष्या दग्धारण्यं मृगास्तथा॥

दक्षिणा लेकर ब्राह्मण यजमान को, विद्या लेकर शिष्य गुरु को, और जलते वन को मृग — तीनों तुरन्त त्याग देते हैं।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

15 श्लोक
1
अ. 3 · श्लोक 1
कस्य दोषः कुलेनास्ति व्याधिना केन पीडिताः।
व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्॥

किसके कुल में दोष नहीं?

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4
अ. 3 · श्लोक 4
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशति कालेतु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

दुर्जन और सर्प में सर्प श्रेष्ठ है, दुर्जन नहीं — सर्प तो कभी काटता है, दुर्जन पद-पद पर डंसता है।

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5
अ. 3 · श्लोक 5
एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्।
आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥

राजा कुलीनों का संग्रह इसलिए करते हैं क्योंकि वे आदि-मध्य-अन्त किसी भी अवस्था में राजा को नहीं छोड़ते।

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7
अ. 3 · श्लोक 7
मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः।
भिनत्ति वाक्यशल्येन अदृशं कण्टको यथा॥

मूर्ख को त्यागो — वह प्रत्यक्ष दो पैर का पशु है।

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8
अ. 3 · श्लोक 8
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

रूप, यौवन और बड़े कुल वाले भी विद्या-हीन हों तो गन्ध-हीन पलाश-पुष्प की तरह अशोभ हैं।

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9
अ. 3 · श्लोक 9
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥

कोयल का रूप उसका स्वर, स्त्री का रूप पतिव्रता, कुरूप का रूप विद्या, और तपस्वी का रूप क्षमा है।

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12
अ. 3 · श्लोक 12
अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यतिसर्वत्र वर्जयेत्॥

अति-सुन्दरता से सीता हरण, अति-गर्व से रावण का नाश, अति-दान से बलि का बन्धन — अति सब जगह वर्जित।

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13
अ. 3 · श्लोक 13
को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्।
को विदेशः सुविद्यानां को परः प्रियवादिनाम्॥

समर्थ को क्या भार, उद्यमी को क्या दूर, विद्वान् को कौन-सा विदेश, प्रियवादी को कौन पराया?

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14
अ. 3 · श्लोक 14
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥

एक भी सुगन्धित पुष्पित वृक्ष पूरे वन को सुवासित करता है — वैसे एक सुपुत्र पूरे कुल को।

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15
अ. 3 · श्लोक 15
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥

एक भी सूखे वृक्ष में आग लग जाये तो पूरा वन जल जाता है — वैसे एक कुपुत्र पूरे कुल को।

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16
अ. 3 · श्लोक 16
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥

विद्या-युक्त साधु एक सुपुत्र से पूरा कुल वैसे आह्लादित होता है जैसे चन्द्रमा से रात्रि।

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18
अ. 3 · श्लोक 18
लालयेत्पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥

पाँच वर्ष तक लाड़, दस वर्ष तक अनुशासन, सोलह के बाद मित्र-व्यवहार — पुत्र-पालन का तीन-चरण सूत्र।

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19
अ. 3 · श्लोक 19
उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे।
असाधुजनसम्पर्के यः पलायति जीवति॥

उपद्रव, शत्रु-आक्रमण, अकाल, भयानक स्थिति या दुर्जन-संगति में जो भाग जाता है, वही जीवित रहता है।

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20
अ. 3 · श्लोक 20
धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते।
जन्मफलं हि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चारों में से एक भी जिसमें नहीं, उसका जन्म व्यर्थ है, केवल मरण।

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21
अ. 3 · श्लोक 21
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसञ्चितम्।
दाम्पत्यकलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥

जहाँ मूर्ख पूजे न जायें, अन्न सुसंचित हो, और दम्पति में कलह न हो — वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती है।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

14 श्लोक
2
अ. 4 · श्लोक 2
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः।
ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥

साधुजनों से दूर हो जाने वाले पुत्र-मित्र-बन्धु निरर्थक हैं — जो उनके साथ चलें, उनसे ही कुल सुकृती बनता है।

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4
अ. 4 · श्लोक 4
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात्प्राणान्तेकिं करिष्यति॥

जब तक देह स्वस्थ है, मृत्यु दूर है — तब तक आत्म-हित करो।

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6
अ. 4 · श्लोक 6
एकोऽपि गुणवान्पुत्रो निर्गुणैश्शतैर्वरः।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारा सहस्रशः॥

एक गुणी पुत्र सौ निर्गुणों से श्रेष्ठ — एक चन्द्र अन्धकार हरता है, हज़ार तारे नहीं।

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8
अ. 4 · श्लोक 8
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं कोपमुखी च भार्या।
पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥

बुरा गाँव, नीच की सेवा, बुरा भोजन, क्रोधी पत्नी, मूर्ख पुत्र, विधवा पुत्री — ये छह बिना आग शरीर को जलाते हैं।

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9
अ. 4 · श्लोक 9
किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गुर्विणी।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान्॥

जो गाय न दूध दे न गाभिन हो, उससे क्या?

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10
अ. 4 · श्लोक 10
संसारतापदग्धानां त्रयो विश्रामहेतवः।
अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च॥

संसार-ताप से जले हुए लोगों के तीन विश्राम हैं — सन्तान, पत्नी और सत्संगति।

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11
अ. 4 · श्लोक 11
सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः।
सकृत्कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्॥

राजा एक बार आदेश देते, पण्डित एक बार बोलते, कन्या एक बार दी जाती — ये तीनों एक-एक बार ही होते हैं।

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12
अ. 4 · श्लोक 12
एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभीरणम्॥

तप एक, पठन दो, गायन तीन, यात्रा चार, खेती पाँच और युद्ध बहुत लोगों के साथ — हर कार्य का अपना group-size है।

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13
अ. 4 · श्लोक 13
सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता।
सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥

शुचि+दक्ष, पतिव्रता, पतिप्रिय, सत्यवादिनी — चार लक्षण असली भार्या के।

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14
अ. 4 · श्लोक 14
अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्तु बान्धवाः।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता॥

सन्तान-हीन का घर, बन्धु-हीन की दिशा, मूर्ख का हृदय शून्य — पर दरिद्रता तो सर्व-शून्य है।

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15
अ. 4 · श्लोक 15
अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥

अभ्यास-हीन को शास्त्र विष, अजीर्ण में भोजन विष, दरिद्र को सभा विष, वृद्ध को तरुणी विष।

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16
अ. 4 · श्लोक 16
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत्॥

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोध-मुखी पत्नी, स्नेह-हीन बन्धु — चारों को त्याग दो।

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17
अ. 4 · श्लोक 17
अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धने जरा।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपे जरा॥

मनुष्य को यात्रा, घोड़े को बँधन, स्त्री को रति-अभाव, और वस्त्र को धूप — चारों को बूढ़ा बनाते हैं।

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19
अ. 4 · श्लोक 19
अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिमास्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्॥

द्विजों के देव अग्नि, मुनियों के हृदय में, अल्पबुद्धियों के मूर्ति में, और समदर्शियों के सर्वत्र देव हैं।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

22 श्लोक
1
अ. 5 · श्लोक 1
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः।
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥

पत्नी का पति, सबका अभ्यागत (अतिथि), द्विज का अग्नि, चारों वर्णों का ब्राह्मण — चार categories के गुरु।

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2
अ. 5 · श्लोक 2
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥

घिसना, काटना, तपाना, पीटना — चार से सोना; त्याग, शील, गुण, कर्म — चार से मनुष्य परखा जाता है।

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3
अ. 5 · श्लोक 3
तावद्भयेषु भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशङ्कया॥

जब तक भय न आया, तब तक डरो — पर भय आ जाये तो बिना संशय प्रहार करो।

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4
अ. 5 · श्लोक 4
एकोदरसमुद्भूता एकनक्षत्रजातकाः।
न भवन्ति समाः शीले यथा बदरीकण्टकाः॥

एक गर्भ से, एक नक्षत्र में जन्मे — फिर भी शील में समान नहीं होते, जैसे बेर-काँटे एक पेड़ के।

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5
अ. 5 · श्लोक 5
निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामो मण्डनप्रियः।
नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्पष्टवक्ता न वञ्चकः॥

इच्छा-रहित अधिकारी न बने, कामना-रहित श्रृंगारप्रिय न हो, अकुशल मीठा न बोले, स्पष्ट वक्ता ठग न हो।

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6
अ. 5 · श्लोक 6
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः।
दुर्भगानां च सुभगाः कुलटानां च कुलाङ्गनाः॥

मूर्ख पण्डितों से, निर्धन धनवानों से, अभागे भाग्यवानों से, कुलटा कुलवती-स्त्रियों से — द्वेष करते हैं।

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7
अ. 5 · श्लोक 7
आलस्योपहता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥

आलस्य से विद्या, दूसरे के हाथ में धन, कम बीज से खेत, और नेता-हीन सेना नष्ट।

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8
अ. 5 · श्लोक 8
अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते॥

विद्या अभ्यास से, कुल शील से, आर्य गुण से, क्रोध नेत्र से पहचाने जाते।

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9
अ. 5 · श्लोक 9
वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृदुना रक्ष्यते भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम्॥

धन से धर्म, योग से विद्या, मृदुता से राजा, सद्गुणी पत्नी से घर — रक्षित।

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11
अ. 5 · श्लोक 11
दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥

दान दरिद्रता, शील दुर्गति, प्रज्ञा अज्ञान, भावना भय का नाश करते हैं।

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12
अ. 5 · श्लोक 12
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः।
नास्ति कोपसमो वह्निर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम्॥

काम-समान व्याधि, मोह-समान शत्रु, क्रोध-समान अग्नि — कोई नहीं; और ज्ञान से बढ़कर सुख कोई नहीं।

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13
अ. 5 · श्लोक 13
जन्ममृत्यू हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाशुभम्।
नरकेषु पतत्येकः एको याति पराङ्गतिम्॥

जन्म-मरण अकेला, सुख-दुख अकेला भोगता, नरक अकेला जाता, परा-गति अकेला पाता।

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14
अ. 5 · श्लोक 14
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गं तृणं शूरस्य जीवितम्।
जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥

ब्रह्मज्ञानी को स्वर्ग, शूर को जीवन, इन्द्रिय-विजयी को नारी, निःस्पृह को जगत् — तिनके के समान।

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15
अ. 5 · श्लोक 15
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

विदेश में विद्या, घर में पत्नी, रोगी को औषधि, मरे को धर्म — मित्र हैं।

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16
अ. 5 · श्लोक 16
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवापि च॥

समुद्र में वर्षा, तृप्त को भोजन, धनिक को दान, दिन में दीपक — सब व्यर्थ।

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17
अ. 5 · श्लोक 17
नास्ति मेघसमं तोयं नास्ति चात्मसमं बलम्।
नास्ति चक्षुःसमं तेजो नास्ति चान्नसमं प्रियम्॥

मेघ-सम जल, आत्म-सम बल, चक्षु-सम तेज, अन्न-सम प्रिय — कुछ नहीं।

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18
अ. 5 · श्लोक 18
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥

निर्धन धन, चौपाये वाणी, मनुष्य स्वर्ग, देवता मोक्ष — चाहते हैं।

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19
अ. 5 · श्लोक 19
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥

सत्य से पृथ्वी स्थिर, सत्य से सूर्य तपता, सत्य से वायु बहती — सब सत्य पर प्रतिष्ठित।

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20
अ. 5 · श्लोक 20
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीविते मन्दिरे।
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥

लक्ष्मी चंचल, प्राण चंचल, जीवन-घर चंचल — इस चराचर संसार में एक धर्म ही निश्चल।

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21
अ. 5 · श्लोक 21
नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः।
चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥

मनुष्यों में नापित (नाई), पक्षियों में कौवा, चौपायों में सियार, स्त्रियों में मालिनी — सबसे धूर्त।

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22
अ. 5 · श्लोक 22
जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति।
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥

जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत कराने वाला, विद्या देने वाला, अन्न देने वाला, भय से बचाने वाला — ये पाँच पिता-समान।

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23
अ. 5 · श्लोक 23
राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥

राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, सास, अपनी माँ — ये पाँच माँ-समान।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

19 श्लोक
1
अ. 6 · श्लोक 1
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥

सुनकर धर्म जाने, दुर्बुद्धि त्यागे, ज्ञान पाये, मोक्ष पाये — श्रवण-शक्ति का चतुर्विध फल।

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2
अ. 6 · श्लोक 2
काकः पक्षिषु चाण्डालः पशूनां चैव कुक्कुरः।
पापो मुनीनां चाण्डालः सर्वेषां चैव निन्दकः॥

पक्षियों में कौवा, पशुओं में कुक्कुर, मुनियों में पापी, और सबमें निन्दक — चाण्डाल हैं।

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3
अ. 6 · श्लोक 3
भस्मना शुध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्ध्यति।
रजसा शुद्ध्यते नारी नदी वेगेन शुद्ध्यति॥

कांसा भस्म से, ताम्बा अम्ल से, स्त्री रजस्वला से, नदी वेग से शुद्ध होती।

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4
अ. 6 · श्लोक 4
भ्रमन्सम्पूज्यते राजा भ्रमन्सम्पूज्यते द्विजः।
भ्रमन्सम्पूज्यते योगी स्त्री भ्रमन्ती विनश्यति॥

घूमने वाला राजा, ब्राह्मण, योगी पूजे जाते — पर स्त्री घूमती तो नष्ट।

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5
अ. 6 · श्लोक 5
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥

जिसके पास धन, उसके मित्र-बन्धु, उसी की समाज में पहचान, उसी को विद्वान् माना जाता।

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6
अ. 6 · श्लोक 6
तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥

जैसी भवितव्यता, वैसी बुद्धि उत्पन्न होती, वैसा ही व्यवसाय, वैसे ही सहायक मिलते।

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7
अ. 6 · श्लोक 7
कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥

काल भूतों को पकाता, प्रजा को संहारता, सोयों में जागता — काल दुरतिक्रम है।

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8
अ. 6 · श्लोक 8
न पश्यन्ति च जन्मान्धाः कामान्धा नैव पश्यन्ति।
मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति॥

चार "अन्धे" — जन्मान्ध, कामान्ध, मदोन्मत्त, अर्थी (स्वार्थी) — सच नहीं देखते।

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9
अ. 6 · श्लोक 9
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते॥

आत्मा स्वयं कर्म करती, स्वयं फल भोगती, स्वयं संसार में भटकती, स्वयं मुक्त होती।

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10
अ. 6 · श्लोक 10
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः।
भर्तारं च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा॥

राष्ट्र का पाप राजा भोगता, राजा का पुरोहित, स्त्री का पति, शिष्य का गुरु।

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11
अ. 6 · श्लोक 11
ऋणकर्ता पिता शत्रुर्माता च व्यभिचारिणी।
भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः॥

ऋणी पिता, व्यभिचारी माता, अति-रूपवती भार्या, अपण्डित पुत्र — चार पारिवारिक "शत्रु।

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12
अ. 6 · श्लोक 12
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्स्तब्धमञ्जलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च यथार्थत्वेन पण्डितम्॥

लोभी को धन से, अहंकारी को नमस्कार से, मूर्ख को उसके अनुसार चलकर, पण्डित को यथार्थ से जीतो।

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14
अ. 6 · श्लोक 14
कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिर्वृतिः।
कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥

कुराज से सुख नहीं, कुमित्र से शान्ति नहीं, कुदार से घर-सुख नहीं, कुशिष्य से यश नहीं।

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15
अ. 6 · श्लोक 15
सिंहादेकं वकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।
वायसात्पञ्च शिक्षेच्च षट् शुनस्त्रीणि गर्दभात्॥

सिंह से एक, बक से एक, कुक्कुट से चार, काक से पाँच, श्वान से छह, गर्दभ से तीन गुण — सीखो।

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16
अ. 6 · श्लोक 16
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

सिंह से सीखो — चाहे काम छोटा हो या बड़ा, उसे पूरी शक्ति से करो।

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17
अ. 6 · श्लोक 17
इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत्पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥

बक की भाँति इन्द्रियों को संयम करके — देश-काल-बल समझकर सब कार्य सिद्ध करो।

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20
अ. 6 · श्लोक 20
बह्वाशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः।
स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः॥

श्वान से छह — बहुत खाता पर थोड़े में सन्तुष्ट, गहरी नींद पर हल्की चेतना, स्वामी-भक्त, शूर।

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21
अ. 6 · श्लोक 21
सुश्रान्तोऽपि वहेद्भारं शीतोष्णं न च पश्यति।
सन्तुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्॥

गर्दभ से तीन — थका होने पर भी भार उठाये, शीत-गर्मी की चिन्ता न करे, सदा सन्तुष्ट रहे।

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22
अ. 6 · श्लोक 22
य एतान्विंशतिगुणानाचरिष्यति मानवः।
कार्यावस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति॥

जो मनुष्य इन बीस गुणों को आचरण में लाये — हर परिस्थिति में अजेय हो जायेगा।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

21 श्लोक
1
अ. 7 · श्लोक 1
अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणीचरितानि च।
नीचवाक्यं चापमानं मतिमान्न प्रकाशयेत्॥

धन-नाश, मन-संताप, गृहिणी-चरित्र, नीच-वाक्य, अपमान — पाँच बातें बुद्धिमान् प्रकट न करे।

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2
अ. 7 · श्लोक 2
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासङ्ग्रहणे तथा।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥

धन-धान्य, विद्या-अर्जन, आहार, व्यवहार — पाँच में लज्जा त्यागकर ही सुखी होते।

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3
अ. 7 · श्लोक 3
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च।
न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥

सन्तोष-अमृत से तृप्तों को जो सुख-शान्ति मिलती, वह धन-लोभी इधर-उधर भागते वालों को नहीं।

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4
अ. 7 · श्लोक 4
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥

पत्नी, भोजन, धन में सन्तोष; पठन, जप, दान में सन्तोष न करो।

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5
अ. 7 · श्लोक 5
विप्रयोर्विप्रवह्न्योश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः।
अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य वृषभस्य च॥

दो ब्राह्मणों के बीच, ब्राह्मण-अग्नि के बीच, दम्पति, स्वामी-भृत्य, हल-बैल — के बीच से न जाओ।

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6
अ. 7 · श्लोक 6
पादाभ्यां न स्पृशेदग्निं गुरुं ब्राह्मणमेव च।
नैव गां न कुमारीं च न वृद्धं न शिशुं तथा॥

अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गाय, कुमारी, वृद्ध, बालक — सात को पैरों से न छूओ।

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7
अ. 7 · श्लोक 7
शकटं पञ्चहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम्।
हस्तिनं तु सहस्रेण देशत्यागेन दुर्जनम्॥

गाड़ी पाँच हाथ, घोड़ा दस, हाथी हज़ार हाथ, और दुर्जन से देश-त्याग कर दूर रहो।

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8
अ. 7 · श्लोक 8
हस्ती ह्यङ्कुशमात्रेण वाजी हस्तेन ताड्यते।
शृङ्गी लकुटहस्तेन खड्गहस्तेन दुर्जनः॥

हाथी अंकुश से, घोड़ा हाथ से, सींगवाला लाठी से, दुर्जन तलवार से वश में आता।

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9
अ. 7 · श्लोक 9
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा घनगर्जिते।
साधवः परसम्पत्तौ खलाः परविपत्तिषु॥

ब्राह्मण भोजन से, मयूर मेघ-गर्जन से, सज्जन दूसरों की सम्पत्ति से, दुष्ट दूसरों की विपत्ति से प्रसन्न होते।

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10
अ. 7 · श्लोक 10
अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्बलम्।
आत्मतुल्यबलं शत्रुं विनयेन बलेन वा॥

बली से अनुकूल, दुर्बल से प्रतिकूल, समान से विनय या बल से — जीतो।

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11
अ. 7 · श्लोक 11
बाहुवीर्यं बलं राज्ञो ब्राह्मणो ब्रह्मविद्बली।
रूपयौवनमाधुर्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम्॥

राजा का बल भुजबल, ब्राह्मण का ब्रह्मविद्या, स्त्री का रूप-यौवन-माधुर्य — सर्वोच्च बल।

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12
अ. 7 · श्लोक 12
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥

अति-सरल मत बनो — वन में देखो, सीधे वृक्ष काटे जाते, टेढ़े बच जाते हैं।

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13
अ. 7 · श्लोक 13
यत्रोदकं तत्र वसन्ति हंसाः तथैव शुष्कं परिवर्जयन्ति।
न हंसतुल्येन नरेण भाव्यं पुनस्त्यजन्ति पुनराश्रयन्ते॥

जहाँ पानी, वहाँ हंस — सूखे को त्यागते।

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14
अ. 7 · श्लोक 14
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्॥

कमायी सम्पत्ति की रक्षा त्याग में — जैसे तालाब के पानी की रक्षा निकलने में।

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15
अ. 7 · श्लोक 15
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च जीवति॥

जिसके पास धन — उसके मित्र, बन्धु, सामाजिक पहचान, और जीवन।

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16
अ. 7 · श्लोक 16
स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे।
दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवार्चनं ब्राह्मणतर्पणं च॥

स्वर्ग-निवासियों के चार चिह्न — दान-प्रसंग, मधुर वाणी, देव-पूजा, ब्राह्मण-तर्पण।

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17
अ. 7 · श्लोक 17
अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।
नीचप्रसङ्गः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम्॥

अति-क्रोध, कटु वाणी, दरिद्रता, स्वजनों में बैर, नीच-संगति, कुलहीन-सेवा — नर्क-निवासियों के चिह्न।

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18
अ. 7 · श्लोक 18
गम्यते यदि मृगेन्द्रमन्दिरं लभ्यते करिकपोलमौक्तिकम्।
जम्बुकालयगते च लभ्यते वत्सपुच्छखरचर्मखण्डनम्॥

सिंह की गुफ़ा में जाओ तो हाथी का मोती मिलेगा।

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19
अ. 7 · श्लोक 19
शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना।
न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे॥

विद्या के बिना जीवन कुत्ते की पूँछ-समान व्यर्थ — न गुह्य ढक सकती न मच्छर भगा सकती।

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20
अ. 7 · श्लोक 20
वाचां शौचं च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
सर्वभूतदयाशौचमेतच्छौचं परार्थिनाम्॥

वाणी-शुद्धि, मन-शुद्धि, इन्द्रिय-निग्रह, सर्व-दया — परार्थियों की चार शुद्धियाँ।

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21
अ. 7 · श्लोक 21
पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्यात्मानं विवेकतः॥

पुष्प में गन्ध, तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, दूध में घी, ईख में गुड़ — वैसे ही देह में आत्मा को विवेक से देखो।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

20 श्लोक
1
अ. 8 · श्लोक 1
अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥

अधम केवल धन, मध्यम धन और मान, उत्तम केवल मान चाहते — मान ही महान् पुरुषों का धन।

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2
अ. 8 · श्लोक 2
इक्षुदण्डास्तिलाः शूद्राः कान्ता हेम च मेदिनी।
चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥

ईख, तिल, सोना, चन्दन, दही, पान — पीसने/मर्दन से गुण बढ़ते।

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4
अ. 8 · श्लोक 4
वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र देहि क्वचित्।
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुखे माधुर्यवद्भूतले॥

गुणवानों को धन दो, अन्यत्र नहीं — समुद्र का जल बादल में मीठा होकर पृथ्वी पर गिरता है।

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5
अ. 8 · श्लोक 5
चाण्डालानां सहस्रैश्च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।
एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः॥

तत्त्व-दर्शी पण्डितों ने कहा — सहस्र चाण्डालों के तुल्य एक यवन, यवन से नीच कोई नहीं।

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7
अ. 8 · श्लोक 7
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम्॥

अजीर्ण में पानी औषधि, पाचन-काल में बल-दायी, भोजन में अमृत, भोजनान्त में विष।

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8
अ. 8 · श्लोक 8
हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाज्ञानतो नरः।
हतं निर्णायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः॥

क्रिया-हीन ज्ञान नष्ट, अज्ञानी मनुष्य नष्ट, नायक-हीन सेना नष्ट, पति-हीन स्त्री (आज: support-less individual) नष्ट।

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9
अ. 8 · श्लोक 9
वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्तगतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः॥

वृद्धावस्था में पत्नी की मृत्यु, बन्धुओं के हाथ में धन, परवशता का भोजन — तीन सबसे बड़ी विडम्बनाएँ।

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10
अ. 8 · श्लोक 10
अग्निहोत्रं विना वेदा न च दानं विना क्रिया।
न भावेन विना सिद्धिस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥

अग्निहोत्र बिना वेद, दान बिना क्रिया, भाव बिना सिद्धि — कुछ नहीं।

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11
अ. 8 · श्लोक 11
काष्ठपाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्।
श्रद्धया च तथा सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसादतः॥

काठ-पाषाण-धातु की भी भाव+श्रद्धा से सेवा करने पर विष्णु-कृपा से सिद्धि।

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12
अ. 8 · श्लोक 12
न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृन्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥

काठ, पाषाण, मृत्तिका में देव नहीं — भाव में देव है।

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13
अ. 8 · श्लोक 13
शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम्।
न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥

शान्ति-सम तप नहीं, सन्तोष-सम सुख नहीं, तृष्णा-सम व्याधि नहीं, दया-सम धर्म नहीं।

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14
अ. 8 · श्लोक 14
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुधा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम्॥

क्रोध यमराज, तृष्णा वैतरणी नदी, विद्या कामधेनु, सन्तोष नन्दन वन — चार equivalences।

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15
अ. 8 · श्लोक 15
गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥

गुण रूप को, शील कुल को, सिद्धि विद्या को, भोग धन को सजाते हैं।

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16
अ. 8 · श्लोक 16
निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्।
असिद्धस्य हता विद्या ह्यभोगेन हतं धनम्॥

निर्गुण का रूप, दुःशील का कुल, असिद्ध की विद्या, अभोगी का धन — सब नष्ट।

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17
अ. 8 · श्लोक 17
शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता।
शुचिः क्षेमकरो राजा सन्तुष्टो ब्राह्मणः शुचिः॥

भूमिगत जल शुद्ध, पतिव्रता पत्नी शुद्ध, कल्याण-करता राजा शुद्ध, सन्तुष्ट ब्राह्मण शुद्ध।

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18
अ. 8 · श्लोक 18
असन्तुष्टा द्विजा नष्टाः सन्तुष्टाश्च महीभृतः।
सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलाङ्गनाः॥

असन्तुष्ट ब्राह्मण नष्ट, सन्तुष्ट राजा नष्ट, सलज्ज वेश्या नष्ट, निर्लज्ज कुलनारी नष्ट।

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19
अ. 8 · श्लोक 19
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।
दुष्कुलं चापि विदुषो देवैरपि सुपूज्यते॥

विद्या-हीन व्यक्ति का विशाल कुल किस काम का?

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20
अ. 8 · श्लोक 20
विद्वान्प्रशस्यते लोके विद्वान्सर्वत्र गौरवम्।
विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥

विद्वान् लोक में प्रशंसित, सर्वत्र गौरव-योग्य।

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21
अ. 8 · श्लोक 21
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

रूप, यौवन, बड़े कुल वाले भी विद्या-हीन हों तो गन्ध-हीन पलाश-पुष्प के समान अशोभ हैं।

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22
अ. 8 · श्लोक 22
मांसभक्षैः सुरापानैर्मूर्खैश्चाक्षरवर्जितैः।
पशुभिः पुरुषाकारैर्भाराक्रान्ता हि मेदिनी॥

मांस-भक्षी, सुरापान-कर्ता, मूर्ख, अक्षर-वर्जित — ये "human-shaped पशु" पृथ्वी को बोझिल करते।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

1 श्लोक
8
अ. 10 · श्लोक 8
अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न जायते। मलयाचलसंसर्गान्न वेणुश्चन्दनायते॥

अन्तःसार-विहीन को उपदेश नहीं लगता — मलयाचल पर बाँस चन्दन नहीं बनता।

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

1 श्लोक
17
अ. 11 · श्लोक 17
देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्शनम्। निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते॥

देवता-धन, गुरु-धन, पर-स्त्री-स्पर्श करने वाला, सब प्राणियों पर निर्वाह करने वाला विप्र — "चाण्डाल।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

2 श्लोक
1
अ. 12 · श्लोक 1
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियालापिनी।

आनन्द-युक्त घर, बुद्धिमान् पुत्र, मधुर-भाषिणी पत्नी — गृहस्थाश्रम धन्य।

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15
अ. 12 · श्लोक 15
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दानेषु सत्साहसः।

धर्म-तत्परता, मुख-मधुरता, दान-साहस, मित्र-निश्छलता, गुरु-नम्रता, मनो-गम्भीरता, आचार-पवित्रता, गुण-रसिकता, शास्त्र-विज्ञता, रूप-सुन्दरता, शिव-भक्ति — हे राघव, आपमें ये सब।

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अध्याय 13 — मुहूर्त-जीवन

1 श्लोक
17
अ. 13 · श्लोक 17
यथा खनित्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति।

जैसे खोदने से जल मिलता — वैसे गुरु-सेवा से विद्या मिलती।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

2 श्लोक
11
अ. 14 · श्लोक 11
अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्थाः फलं न दत्ताम्।

अति-निकट विनाश, अति-दूर निष्फल — मध्यम-दूरी से सेवनीय।

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19
अ. 14 · श्लोक 19
धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम्।

धर्म, धन, धान्य, गुरु-वचन, औषध — 5 शुभ रूप से ग्रहण करो, अन्यथा जीना नहीं।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

1 श्लोक
2
अ. 15 · श्लोक 2
एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्।

गुरु एक अक्षर भी शिष्य को दे — पृथ्वी पर कोई द्रव्य नहीं जिससे शिष्य उऋण हो।

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अध्याय 17 — समापन

2 श्लोक
1
अ. 17 · श्लोक 1
पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ।

पुस्तक-भरोसे पढ़ा — गुरु-सान्निध्य में नहीं — सभा में अव्यभिचारी गर्भिणी-समान शोभा नहीं।

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18
अ. 17 · श्लोक 18
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोधी पत्नी (आज: partner), स्नेह-हीन बन्धु — त्याज्य।

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