VastuGuruji सही वास्तु · खुशहाल जीवन
विषय-संग्रह

📜 नीति

व्यवहार-नीति, युक्ति

97श्लोक
13 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 नीति विषय पर चाणक्य नीति

नीति — चाणक्य के ग्रन्थ का स्वयं नाम "नीति-दर्पण" है। 94 श्लोक नीति के विभिन्न आयामों पर — राज-नीति (शासन), लोक-नीति (समाज), व्यवहार-नीति (दैनिक जीवन), और आत्म-नीति (स्वयं के साथ ईमानदारी)।

चाणक्य की दृष्टि में "नीति" का अर्थ केवल चालाकी नहीं — दीर्घ-दर्शी विवेक। उन्होंने नीति के चार स्तम्भ बताये — (1) सही समय (मुहूर्त) (2) सही स्थान (देश) (3) सही व्यक्ति (पात्र) (4) सही उपाय (साधन)। चारों के सन्तुलन से ही कार्य-सिद्धि। उनका कड़वा सत्य — "अति सर्वत्र वर्जयेत्" — अति किसी भी चीज़ की निषिद्ध; अति-सरलता से दुर्जन फायदा उठाते, अति-कठोरता से प्रिय भी छूट जाते। यह middle-path का प्राचीन रूप। उनके policy-decision frameworks आज corporate strategy, public administration, और personal decision-making में सटीक template देते। प्रत्येक श्लोक — Sanskrit मूल + decision-science विश्लेषण + आधुनिक राजनीतिक उदाहरण + 🧠 cognitive-bias परिप्रेक्ष्य।

नीति विषय से सम्बंधित 97 श्लोक चाणक्य नीति के 13 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

1 श्लोक
13
अ. 1 · श्लोक 13
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।

ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि ॥

दोनों हाथ नहीं रहते

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

6 श्लोक
2
अ. 2 · श्लोक 2
भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वराङ्गना।
विभवो दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपसः फलम्॥

छह सुख — भोजन, पाचन, सुन्दर साथी, रति-शक्ति, वैभव और दान-सामर्थ्य — थोड़े तप का फल नहीं हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
6
अ. 2 · श्लोक 6
न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत्।
कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वगुह्यं प्रकाशयेत्॥

बुरे मित्र पर तो विश्वास न करो, अच्छे मित्र पर भी अति विश्वास न करो — क्योंकि कुपित होने पर वह सब रहस्य खोल देगा।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
9
अ. 2 · श्लोक 9
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥

हर पर्वत पर माणिक्य नहीं, हर हाथी में मोती नहीं, हर वन में चन्दन नहीं — वैसे ही साधु भी सर्वत्र नहीं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
13
अ. 2 · श्लोक 13
श्लोकेन वा तदर्धेन तदर्धार्धाक्षरेण वा।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्यात् दानाध्ययनकर्मभिः॥

चाहे पूरा श्लोक, चाहे आधा, चाहे आधे का आधा भी — हर दिन को दान और अध्ययन से सार्थक बनाओ।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
17
अ. 2 · श्लोक 17
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजाभग्नं नृपं त्यजेत्।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्ता अभ्यागता गृहम्॥

वेश्या निर्धन को, प्रजा भग्न राजा को, पक्षी फल-हीन वृक्ष को, अतिथि भोजन के बाद गृह को — स्वार्थ-पूर्ण लोग प्रयोजन-समाप्ति पर तुरन्त त्याग देते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
19
अ. 2 · श्लोक 19
दुराचारी दुष्टदृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुंसां स तु शीघ्रं विनश्यति॥

बुरे आचरण, बुरी दृष्टि, बुरे स्थान वाले दुर्जन से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट होता है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

15 श्लोक
1
अ. 3 · श्लोक 1
कस्य दोषः कुलेनास्ति व्याधिना केन पीडिताः।
व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्॥

किसके कुल में दोष नहीं?

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
2
अ. 3 · श्लोक 2
आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्।
संभ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥

आचरण कुल बताता, भाषा देश बताती, संभ्रम स्नेह बताता, शरीर भोजन की कथा कहता है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
4
अ. 3 · श्लोक 4
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशति कालेतु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

दुर्जन और सर्प में सर्प श्रेष्ठ है, दुर्जन नहीं — सर्प तो कभी काटता है, दुर्जन पद-पद पर डंसता है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
6
अ. 3 · श्लोक 6
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥

प्रलय में समुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़ते हैं, परन्तु साधु प्रलय में भी मर्यादा नहीं छोड़ते।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
7
अ. 3 · श्लोक 7
मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः।
भिनत्ति वाक्यशल्येन अदृशं कण्टको यथा॥

मूर्ख को त्यागो — वह प्रत्यक्ष दो पैर का पशु है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
9
अ. 3 · श्लोक 9
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥

कोयल का रूप उसका स्वर, स्त्री का रूप पतिव्रता, कुरूप का रूप विद्या, और तपस्वी का रूप क्षमा है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
10
अ. 3 · श्लोक 10
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥

कुल के लिये एक, गाँव के लिए कुल, देश के लिए गाँव, और आत्मा के लिए पृथ्वी छोड़ देनी चाहिए।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
11
अ. 3 · श्लोक 11
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौनेन कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥

उद्यम से दरिद्रता, जप से पाप, मौन से कलह, और जागृति से भय नष्ट हो जाते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
12
अ. 3 · श्लोक 12
अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यतिसर्वत्र वर्जयेत्॥

अति-सुन्दरता से सीता हरण, अति-गर्व से रावण का नाश, अति-दान से बलि का बन्धन — अति सब जगह वर्जित।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
13
अ. 3 · श्लोक 13
को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्।
को विदेशः सुविद्यानां को परः प्रियवादिनाम्॥

समर्थ को क्या भार, उद्यमी को क्या दूर, विद्वान् को कौन-सा विदेश, प्रियवादी को कौन पराया?

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
14
अ. 3 · श्लोक 14
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥

एक भी सुगन्धित पुष्पित वृक्ष पूरे वन को सुवासित करता है — वैसे एक सुपुत्र पूरे कुल को।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
17
अ. 3 · श्लोक 17
किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकैः।
वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्राम्यते कुलम्॥

शोक देने वाले बहुत पुत्रों से क्या?

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
18
अ. 3 · श्लोक 18
लालयेत्पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥

पाँच वर्ष तक लाड़, दस वर्ष तक अनुशासन, सोलह के बाद मित्र-व्यवहार — पुत्र-पालन का तीन-चरण सूत्र।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
19
अ. 3 · श्लोक 19
उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे।
असाधुजनसम्पर्के यः पलायति जीवति॥

उपद्रव, शत्रु-आक्रमण, अकाल, भयानक स्थिति या दुर्जन-संगति में जो भाग जाता है, वही जीवित रहता है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
20
अ. 3 · श्लोक 20
धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते।
जन्मफलं हि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चारों में से एक भी जिसमें नहीं, उसका जन्म व्यर्थ है, केवल मरण।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

15 श्लोक
1
अ. 4 · श्लोक 1
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥

आयु, कर्म, वित्त, विद्या और मरण — ये पाँच गर्भ-काल में ही निर्धारित हो जाते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
2
अ. 4 · श्लोक 2
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः।
ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥

साधुजनों से दूर हो जाने वाले पुत्र-मित्र-बन्धु निरर्थक हैं — जो उनके साथ चलें, उनसे ही कुल सुकृती बनता है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
3
अ. 4 · श्लोक 3
दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्स्यीकूर्मी च पक्षिणी।
शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जनसङ्गतिः॥

मछली दृष्टि से, कछुआ ध्यान से, पक्षी स्पर्श से शिशु पालते हैं — वैसे सत्संग सूक्ष्म प्रभाव से जीव को पालता है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
4
अ. 4 · श्लोक 4
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात्प्राणान्तेकिं करिष्यति॥

जब तक देह स्वस्थ है, मृत्यु दूर है — तब तक आत्म-हित करो।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
7
अ. 4 · श्लोक 7
मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः।
मृतस्तु चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्॥

मूर्ख चिरायु जीवे उससे जन्म-मरण ही श्रेष्ठ — मरा थोड़ा दुख देता, जीवित जड़ जीवनभर जलाता है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
8
अ. 4 · श्लोक 8
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं कोपमुखी च भार्या।
पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥

बुरा गाँव, नीच की सेवा, बुरा भोजन, क्रोधी पत्नी, मूर्ख पुत्र, विधवा पुत्री — ये छह बिना आग शरीर को जलाते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
9
अ. 4 · श्लोक 9
किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गुर्विणी।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान्॥

जो गाय न दूध दे न गाभिन हो, उससे क्या?

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
11
अ. 4 · श्लोक 11
सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः।
सकृत्कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्॥

राजा एक बार आदेश देते, पण्डित एक बार बोलते, कन्या एक बार दी जाती — ये तीनों एक-एक बार ही होते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
12
अ. 4 · श्लोक 12
एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभीरणम्॥

तप एक, पठन दो, गायन तीन, यात्रा चार, खेती पाँच और युद्ध बहुत लोगों के साथ — हर कार्य का अपना group-size है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
14
अ. 4 · श्लोक 14
अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्तु बान्धवाः।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता॥

सन्तान-हीन का घर, बन्धु-हीन की दिशा, मूर्ख का हृदय शून्य — पर दरिद्रता तो सर्व-शून्य है।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
15
अ. 4 · श्लोक 15
अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥

अभ्यास-हीन को शास्त्र विष, अजीर्ण में भोजन विष, दरिद्र को सभा विष, वृद्ध को तरुणी विष।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
16
अ. 4 · श्लोक 16
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत्॥

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोध-मुखी पत्नी, स्नेह-हीन बन्धु — चारों को त्याग दो।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
17
अ. 4 · श्लोक 17
अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धने जरा।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपे जरा॥

मनुष्य को यात्रा, घोड़े को बँधन, स्त्री को रति-अभाव, और वस्त्र को धूप — चारों को बूढ़ा बनाते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
18
अ. 4 · श्लोक 18
कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कस्याहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः॥

समय, मित्र, देश, आय-व्यय, मैं कौन, मेरी शक्ति — इन छह बातों पर निरन्तर विचार करो।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
19
अ. 4 · श्लोक 19
अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिमास्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्॥

द्विजों के देव अग्नि, मुनियों के हृदय में, अल्पबुद्धियों के मूर्ति में, और समदर्शियों के सर्वत्र देव हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

17 श्लोक
1
अ. 5 · श्लोक 1
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः।
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥

पत्नी का पति, सबका अभ्यागत (अतिथि), द्विज का अग्नि, चारों वर्णों का ब्राह्मण — चार categories के गुरु।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
3
अ. 5 · श्लोक 3
तावद्भयेषु भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशङ्कया॥

जब तक भय न आया, तब तक डरो — पर भय आ जाये तो बिना संशय प्रहार करो।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
4
अ. 5 · श्लोक 4
एकोदरसमुद्भूता एकनक्षत्रजातकाः।
न भवन्ति समाः शीले यथा बदरीकण्टकाः॥

एक गर्भ से, एक नक्षत्र में जन्मे — फिर भी शील में समान नहीं होते, जैसे बेर-काँटे एक पेड़ के।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
5
अ. 5 · श्लोक 5
निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामो मण्डनप्रियः।
नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्पष्टवक्ता न वञ्चकः॥

इच्छा-रहित अधिकारी न बने, कामना-रहित श्रृंगारप्रिय न हो, अकुशल मीठा न बोले, स्पष्ट वक्ता ठग न हो।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
6
अ. 5 · श्लोक 6
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः।
दुर्भगानां च सुभगाः कुलटानां च कुलाङ्गनाः॥

मूर्ख पण्डितों से, निर्धन धनवानों से, अभागे भाग्यवानों से, कुलटा कुलवती-स्त्रियों से — द्वेष करते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
10
अ. 5 · श्लोक 10
अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा।
अन्यथा वदतो दृष्टा यश्शान्तस्तस्य पूज्यता॥

वेद-पाण्डित्य अन्यथा, शास्त्र-आचार अन्यथा, बोलने वाले अन्यथा — पर जो शान्त है वही पूज्य।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
11
अ. 5 · श्लोक 11
दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥

दान दरिद्रता, शील दुर्गति, प्रज्ञा अज्ञान, भावना भय का नाश करते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
13
अ. 5 · श्लोक 13
जन्ममृत्यू हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाशुभम्।
नरकेषु पतत्येकः एको याति पराङ्गतिम्॥

जन्म-मरण अकेला, सुख-दुख अकेला भोगता, नरक अकेला जाता, परा-गति अकेला पाता।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
14
अ. 5 · श्लोक 14
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गं तृणं शूरस्य जीवितम्।
जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥

ब्रह्मज्ञानी को स्वर्ग, शूर को जीवन, इन्द्रिय-विजयी को नारी, निःस्पृह को जगत् — तिनके के समान।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
15
अ. 5 · श्लोक 15
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

विदेश में विद्या, घर में पत्नी, रोगी को औषधि, मरे को धर्म — मित्र हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
16
अ. 5 · श्लोक 16
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवापि च॥

समुद्र में वर्षा, तृप्त को भोजन, धनिक को दान, दिन में दीपक — सब व्यर्थ।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
18
अ. 5 · श्लोक 18
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥

निर्धन धन, चौपाये वाणी, मनुष्य स्वर्ग, देवता मोक्ष — चाहते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
19
अ. 5 · श्लोक 19
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥

सत्य से पृथ्वी स्थिर, सत्य से सूर्य तपता, सत्य से वायु बहती — सब सत्य पर प्रतिष्ठित।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
20
अ. 5 · श्लोक 20
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीविते मन्दिरे।
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥

लक्ष्मी चंचल, प्राण चंचल, जीवन-घर चंचल — इस चराचर संसार में एक धर्म ही निश्चल।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
21
अ. 5 · श्लोक 21
नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः।
चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥

मनुष्यों में नापित (नाई), पक्षियों में कौवा, चौपायों में सियार, स्त्रियों में मालिनी — सबसे धूर्त।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
22
अ. 5 · श्लोक 22
जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति।
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥

जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत कराने वाला, विद्या देने वाला, अन्न देने वाला, भय से बचाने वाला — ये पाँच पिता-समान।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
23
अ. 5 · श्लोक 23
राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥

राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, सास, अपनी माँ — ये पाँच माँ-समान।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

11 श्लोक
1
अ. 6 · श्लोक 1
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥

सुनकर धर्म जाने, दुर्बुद्धि त्यागे, ज्ञान पाये, मोक्ष पाये — श्रवण-शक्ति का चतुर्विध फल।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
2
अ. 6 · श्लोक 2
काकः पक्षिषु चाण्डालः पशूनां चैव कुक्कुरः।
पापो मुनीनां चाण्डालः सर्वेषां चैव निन्दकः॥

पक्षियों में कौवा, पशुओं में कुक्कुर, मुनियों में पापी, और सबमें निन्दक — चाण्डाल हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
4
अ. 6 · श्लोक 4
भ्रमन्सम्पूज्यते राजा भ्रमन्सम्पूज्यते द्विजः।
भ्रमन्सम्पूज्यते योगी स्त्री भ्रमन्ती विनश्यति॥

घूमने वाला राजा, ब्राह्मण, योगी पूजे जाते — पर स्त्री घूमती तो नष्ट।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
5
अ. 6 · श्लोक 5
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥

जिसके पास धन, उसके मित्र-बन्धु, उसी की समाज में पहचान, उसी को विद्वान् माना जाता।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
6
अ. 6 · श्लोक 6
तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥

जैसी भवितव्यता, वैसी बुद्धि उत्पन्न होती, वैसा ही व्यवसाय, वैसे ही सहायक मिलते।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
8
अ. 6 · श्लोक 8
न पश्यन्ति च जन्मान्धाः कामान्धा नैव पश्यन्ति।
मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति॥

चार "अन्धे" — जन्मान्ध, कामान्ध, मदोन्मत्त, अर्थी (स्वार्थी) — सच नहीं देखते।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
9
अ. 6 · श्लोक 9
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते॥

आत्मा स्वयं कर्म करती, स्वयं फल भोगती, स्वयं संसार में भटकती, स्वयं मुक्त होती।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
16
अ. 6 · श्लोक 16
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति।
सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

सिंह से सीखो — चाहे काम छोटा हो या बड़ा, उसे पूरी शक्ति से करो।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
18
अ. 6 · श्लोक 18
प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बन्धुषु।
स्वयमाक्रम्य भोगं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्॥

कुक्कुट से चार — समय पर उठना, युद्ध, बन्धुओं में वितरण, स्वयं उद्यम से भोग।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
19
अ. 6 · श्लोक 19
गूढं च मैथुनं धार्ष्ट्यं च कालेऽप्यालयसङ्ग्रहम्।
अप्रमादमविश्वासं पञ्च शिक्षेच्च वायसात्॥

काक से पाँच — गुप्त सम्भोग, धृष्टता, समय पर संग्रह, सतर्कता, अविश्वास।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
22
अ. 6 · श्लोक 22
य एतान्विंशतिगुणानाचरिष्यति मानवः।
कार्यावस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति॥

जो मनुष्य इन बीस गुणों को आचरण में लाये — हर परिस्थिति में अजेय हो जायेगा।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

10 श्लोक
1
अ. 7 · श्लोक 1
अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणीचरितानि च।
नीचवाक्यं चापमानं मतिमान्न प्रकाशयेत्॥

धन-नाश, मन-संताप, गृहिणी-चरित्र, नीच-वाक्य, अपमान — पाँच बातें बुद्धिमान् प्रकट न करे।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
2
अ. 7 · श्लोक 2
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासङ्ग्रहणे तथा।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥

धन-धान्य, विद्या-अर्जन, आहार, व्यवहार — पाँच में लज्जा त्यागकर ही सुखी होते।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
3
अ. 7 · श्लोक 3
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च।
न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥

सन्तोष-अमृत से तृप्तों को जो सुख-शान्ति मिलती, वह धन-लोभी इधर-उधर भागते वालों को नहीं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
12
अ. 7 · श्लोक 12
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥

अति-सरल मत बनो — वन में देखो, सीधे वृक्ष काटे जाते, टेढ़े बच जाते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
13
अ. 7 · श्लोक 13
यत्रोदकं तत्र वसन्ति हंसाः तथैव शुष्कं परिवर्जयन्ति।
न हंसतुल्येन नरेण भाव्यं पुनस्त्यजन्ति पुनराश्रयन्ते॥

जहाँ पानी, वहाँ हंस — सूखे को त्यागते।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
14
अ. 7 · श्लोक 14
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्॥

कमायी सम्पत्ति की रक्षा त्याग में — जैसे तालाब के पानी की रक्षा निकलने में।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
15
अ. 7 · श्लोक 15
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च जीवति॥

जिसके पास धन — उसके मित्र, बन्धु, सामाजिक पहचान, और जीवन।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
17
अ. 7 · श्लोक 17
अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।
नीचप्रसङ्गः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम्॥

अति-क्रोध, कटु वाणी, दरिद्रता, स्वजनों में बैर, नीच-संगति, कुलहीन-सेवा — नर्क-निवासियों के चिह्न।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
19
अ. 7 · श्लोक 19
शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना।
न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे॥

विद्या के बिना जीवन कुत्ते की पूँछ-समान व्यर्थ — न गुह्य ढक सकती न मच्छर भगा सकती।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
21
अ. 7 · श्लोक 21
पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्यात्मानं विवेकतः॥

पुष्प में गन्ध, तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, दूध में घी, ईख में गुड़ — वैसे ही देह में आत्मा को विवेक से देखो।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

12 श्लोक
1
अ. 8 · श्लोक 1
अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥

अधम केवल धन, मध्यम धन और मान, उत्तम केवल मान चाहते — मान ही महान् पुरुषों का धन।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
2
अ. 8 · श्लोक 2
इक्षुदण्डास्तिलाः शूद्राः कान्ता हेम च मेदिनी।
चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥

ईख, तिल, सोना, चन्दन, दही, पान — पीसने/मर्दन से गुण बढ़ते।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
3
अ. 8 · श्लोक 3
दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्षयेन्नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥

दीप अन्धकार खाता और काजल पैदा करता है — जैसा अन्न खाओगे वैसी सन्तति।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
5
अ. 8 · श्लोक 5
चाण्डालानां सहस्रैश्च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।
एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः॥

तत्त्व-दर्शी पण्डितों ने कहा — सहस्र चाण्डालों के तुल्य एक यवन, यवन से नीच कोई नहीं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
6
अ. 8 · श्लोक 6
तैलाभ्यङ्गे चितायां च मैथुने क्षौरकर्मणि।
तावद्भवति चाण्डालो यावत्स्नानं न चाचरेत्॥

तेल-मालिश, श्मशान, मैथुन, क्षौर के बाद — स्नान करने तक "अशुद्ध" स्थिति।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
7
अ. 8 · श्लोक 7
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम्॥

अजीर्ण में पानी औषधि, पाचन-काल में बल-दायी, भोजन में अमृत, भोजनान्त में विष।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
11
अ. 8 · श्लोक 11
काष्ठपाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्।
श्रद्धया च तथा सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसादतः॥

काठ-पाषाण-धातु की भी भाव+श्रद्धा से सेवा करने पर विष्णु-कृपा से सिद्धि।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
14
अ. 8 · श्लोक 14
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुधा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम्॥

क्रोध यमराज, तृष्णा वैतरणी नदी, विद्या कामधेनु, सन्तोष नन्दन वन — चार equivalences।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
15
अ. 8 · श्लोक 15
गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥

गुण रूप को, शील कुल को, सिद्धि विद्या को, भोग धन को सजाते हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
19
अ. 8 · श्लोक 19
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।
दुष्कुलं चापि विदुषो देवैरपि सुपूज्यते॥

विद्या-हीन व्यक्ति का विशाल कुल किस काम का?

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
22
अ. 8 · श्लोक 22
मांसभक्षैः सुरापानैर्मूर्खैश्चाक्षरवर्जितैः।
पशुभिः पुरुषाकारैर्भाराक्रान्ता हि मेदिनी॥

मांस-भक्षी, सुरापान-कर्ता, मूर्ख, अक्षर-वर्जित — ये "human-shaped पशु" पृथ्वी को बोझिल करते।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
23
अ. 8 · श्लोक 23
अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनश्च ऋत्विजः।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः॥

अन्न-हीन यज्ञ राज्य को, मन्त्र-हीन ऋत्विज को, दान-हीन यजमान को जलाता — यज्ञ-सम कोई शत्रु नहीं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 10 — विद्या-धन

1 श्लोक
10
अ. 10 · श्लोक 10
दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले। अपानं शुचि इन्द्रियं नहि सौगन्ध्यलेपनैः॥

दुर्जन को सज्जन बनाने का उपाय नहीं — अपान-इन्द्रिय हज़ार सुगन्धों से शुद्ध नहीं होती।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

3 श्लोक
2
अ. 12 · श्लोक 2
आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्च श्रद्धान्वितः सत्त्वगुणोपपन्नः।

दया, श्रद्धा, सत्त्व-गुण — द्विज में आवश्यक।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
16
अ. 12 · श्लोक 16
काष्ठकल्पतरुः सुमेरुरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः।

कल्पवृक्ष काठ, सुमेरु अचल, चिन्तामणि पत्थर, सूर्य गर्म, चन्द्र क्षीण — हे राम, आपकी उपमा नहीं दी जा सकती।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

2 श्लोक
8
अ. 14 · श्लोक 8
दानेन तपसा शौर्येण विज्ञानेन विनयेन च।

दान, तप, शूरता, विज्ञान, विनय, नीति — आश्चर्य नहीं, पृथ्वी पर बहुत रत्न हैं।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
10
अ. 14 · श्लोक 10
यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य ब्रूयात्सदा प्रियम्।

प्रिय चाहो तो प्रिय बोलो — व्याध मृग-वध के लिए मधुर गाता।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 15 — दया-चित्त

1 श्लोक
3
अ. 15 · श्लोक 3
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।

खल और काँटे — दोनों के दो उपाय: मुख तोड़ो या दूर से बच कर निकल जाओ।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →

अध्याय 17 — समापन

3 श्लोक
19
अ. 17 · श्लोक 19
इदं चाणक्यनीतिं तु यः पठेच्छृणुयादपि।

जो चाणक्य-नीति पढ़े, सुने, या अनुसरण करे — वह देवों के पूज्य अर्थ-धर्म-कामा-सिद्धि पाता।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →
20
अ. 17 · श्लोक 20
अष्टादशपुराणानां सारः सारो भविष्यति।

अठारह पुराणों का सार — परोपकार ही पुण्य, परपीड़न ही पाप।

📖 पूरा श्लोक पढ़ें →