VastuGuruji सही वास्तु · खुशहाल जीवन
विषय-संग्रह

⏳ समय

समय-प्रबंधन, मुहूर्त, क्षण

90श्लोक
17 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 समय विषय पर चाणक्य नीति

काल (समय) — चाणक्य की सबसे गहन दार्शनिक चिन्ता। 88 श्लोक समय की अनित्यता, मुहूर्त-निर्णय, present-moment की शक्ति, और कर्तव्य-काल के विवेक पर। उनका प्रसिद्ध सूत्र — "क्षणं चित्तं क्षणं वित्तम्" — मन क्षणभङ्गुर, धन क्षणभङ्गुर। तो अभी कर्म करो।

चाणक्य की दृष्टि में काल के तीन रूप — गत-काल (बीता समय जो वापस नहीं आता), वर्तमान-काल (एकमात्र वास्तविक), और अनागत-काल (अनिश्चित)। उन्होंने present-moment उपयोग को सर्वोच्च माना। साथ ही मुहूर्त-दर्शन में — कौन-सा कार्य कब करना (व्यापार, युद्ध, विवाह, शिक्षा-आरम्भ) — यह उनकी राजनीति-कुशलता का भाग था। उनकी सबसे कड़वी चेतावनी — "आयुषः क्षणो लभ्यः" — आयु का क्षण मूल्यवान, क्योंकि इसे करोड़ों भी देकर वापस नहीं ख़रीदा जा सकता। आधुनिक productivity research, time-management, और mindfulness practice इन्हीं प्राचीन सूत्रों की पुष्टि करती। प्रत्येक श्लोक — मूल पाठ + हिन्दी विवेचन + आज का application + brain-science।

समय विषय से सम्बंधित 90 श्लोक चाणक्य नीति के 17 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

15 श्लोक
1
अ. 1 · श्लोक 1
प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।

नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ॥

विष्णु को नमन

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2
अ. 1 · श्लोक 2
अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः ।

धर्मोपदेशविख्यातं कार्याकार्यं शुभाशुभम् ॥

सही-गलत का विवेक

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3
अ. 1 · श्लोक 3
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।

येन विज्ञातमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥

सर्वज्ञता का मार्ग

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5
अ. 1 · श्लोक 5
दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।

ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥

चार मृत्यु-तुल्य स्थितियाँ

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6
अ. 1 · श्लोक 6
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि ।

आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥

तीन प्राथमिकताएँ

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7
अ. 1 · श्लोक 7
आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।

कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति ॥

लक्ष्मी की चंचलता

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8
अ. 1 · श्लोक 8
यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः ।

न च विद्यागमः कश्चित् न तं देशं समाश्रयेत् ॥

चार आवश्यक तत्त्व

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9
अ. 1 · श्लोक 9
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः ।

पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत् ॥

पाँच आवश्यक संस्थाएँ

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10
अ. 1 · श्लोक 10
लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।

पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संगतिम् ॥

चरित्र के पाँच गुण

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11
अ. 1 · श्लोक 11
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे ।

मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥

चार सम्बन्धों की पहचान

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12
अ. 1 · श्लोक 12
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे ।

राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥

छह कठिन क्षण

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13
अ. 1 · श्लोक 13
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।

ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि ॥

दोनों हाथ नहीं रहते

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14
अ. 1 · श्लोक 14
वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् ।

रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥

कुल और चरित्र

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15
अ. 1 · श्लोक 15
नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां शृङ्गिणां तथा ।

विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥

छह जिन पर अंधा विश्वास न करें

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17
अ. 1 · श्लोक 17
स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा ।

साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥

चार प्राकृतिक गुणांक

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अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

14 श्लोक
2
अ. 2 · श्लोक 2
भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वराङ्गना।
विभवो दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपसः फलम्॥

छह सुख — भोजन, पाचन, सुन्दर साथी, रति-शक्ति, वैभव और दान-सामर्थ्य — थोड़े तप का फल नहीं हैं।

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3
अ. 2 · श्लोक 3
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी।
विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहैव हि॥

आज्ञाकारी पुत्र, अनुकूल पत्नी और अपनी संपदा में सन्तोष — इन तीन का स्वर्ग यहीं है।

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5
अ. 2 · श्लोक 5
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥

पीठ-पीछे काम बिगाड़ने और सामने मीठा बोलने वाला मित्र — मुख पर दूध, भीतर विष का घड़ा है — उसे त्यागो।

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6
अ. 2 · श्लोक 6
न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत्।
कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वगुह्यं प्रकाशयेत्॥

बुरे मित्र पर तो विश्वास न करो, अच्छे मित्र पर भी अति विश्वास न करो — क्योंकि कुपित होने पर वह सब रहस्य खोल देगा।

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7
अ. 2 · श्लोक 7
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्।
मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चापि नियोजयेत्॥

मन में सोचे काम को वाणी से प्रकट न करो — मन्त्र की भाँति गुप्त रखो, गुप्त रूप से ही कार्य में लगाओ।

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9
अ. 2 · श्लोक 9
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥

हर पर्वत पर माणिक्य नहीं, हर हाथी में मोती नहीं, हर वन में चन्दन नहीं — वैसे ही साधु भी सर्वत्र नहीं।

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11
अ. 2 · श्लोक 11
माता रिपुः पिता शत्रुर्बालो याभ्यां न पाठ्यते।
सभा मध्ये न शोभन्ते हंसमध्ये बको यथा॥

जिस माता-पिता ने बालक को नहीं पढ़ाया, वे माता-शत्रु, पिता-वैरी हैं — बालक हंसों के बीच बगुले-सा अशोभ रहेगा।

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12
अ. 2 · श्लोक 12
लालनाद् बहवो दोषाः ताडनाद् बहवो गुणाः।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत्॥

अति-दुलार से दोष, दण्ड से गुण उत्पन्न होते हैं — पुत्र और शिष्य को दण्ड दो, लाड़ नहीं।

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13
अ. 2 · श्लोक 13
श्लोकेन वा तदर्धेन तदर्धार्धाक्षरेण वा।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्यात् दानाध्ययनकर्मभिः॥

चाहे पूरा श्लोक, चाहे आधा, चाहे आधे का आधा भी — हर दिन को दान और अध्ययन से सार्थक बनाओ।

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15
अ. 2 · श्लोक 15
नदी तीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशयम्॥

नदी-तीर के वृक्ष, पराये घर की स्त्री और मन्त्री-रहित राजा — तीनों शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

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16
अ. 2 · श्लोक 16
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा।
बलं वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां च कनिष्ठिका॥

ब्राह्मण का बल विद्या, राजा का सेना, वैश्य का धन, शूद्र का सेवा — हर वर्ण का अपना विशिष्ट बल है।

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17
अ. 2 · श्लोक 17
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजाभग्नं नृपं त्यजेत्।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्ता अभ्यागता गृहम्॥

वेश्या निर्धन को, प्रजा भग्न राजा को, पक्षी फल-हीन वृक्ष को, अतिथि भोजन के बाद गृह को — स्वार्थ-पूर्ण लोग प्रयोजन-समाप्ति पर तुरन्त त्याग देते हैं।

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18
अ. 2 · श्लोक 18
गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं शिष्या दग्धारण्यं मृगास्तथा॥

दक्षिणा लेकर ब्राह्मण यजमान को, विद्या लेकर शिष्य गुरु को, और जलते वन को मृग — तीनों तुरन्त त्याग देते हैं।

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19
अ. 2 · श्लोक 19
दुराचारी दुष्टदृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुंसां स तु शीघ्रं विनश्यति॥

बुरे आचरण, बुरी दृष्टि, बुरे स्थान वाले दुर्जन से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट होता है।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

11 श्लोक
2
अ. 3 · श्लोक 2
आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्।
संभ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥

आचरण कुल बताता, भाषा देश बताती, संभ्रम स्नेह बताता, शरीर भोजन की कथा कहता है।

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4
अ. 3 · श्लोक 4
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशति कालेतु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

दुर्जन और सर्प में सर्प श्रेष्ठ है, दुर्जन नहीं — सर्प तो कभी काटता है, दुर्जन पद-पद पर डंसता है।

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5
अ. 3 · श्लोक 5
एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्।
आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥

राजा कुलीनों का संग्रह इसलिए करते हैं क्योंकि वे आदि-मध्य-अन्त किसी भी अवस्था में राजा को नहीं छोड़ते।

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6
अ. 3 · श्लोक 6
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥

प्रलय में समुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़ते हैं, परन्तु साधु प्रलय में भी मर्यादा नहीं छोड़ते।

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7
अ. 3 · श्लोक 7
मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः।
भिनत्ति वाक्यशल्येन अदृशं कण्टको यथा॥

मूर्ख को त्यागो — वह प्रत्यक्ष दो पैर का पशु है।

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9
अ. 3 · श्लोक 9
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥

कोयल का रूप उसका स्वर, स्त्री का रूप पतिव्रता, कुरूप का रूप विद्या, और तपस्वी का रूप क्षमा है।

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13
अ. 3 · श्लोक 13
को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्।
को विदेशः सुविद्यानां को परः प्रियवादिनाम्॥

समर्थ को क्या भार, उद्यमी को क्या दूर, विद्वान् को कौन-सा विदेश, प्रियवादी को कौन पराया?

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16
अ. 3 · श्लोक 16
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥

विद्या-युक्त साधु एक सुपुत्र से पूरा कुल वैसे आह्लादित होता है जैसे चन्द्रमा से रात्रि।

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18
अ. 3 · श्लोक 18
लालयेत्पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥

पाँच वर्ष तक लाड़, दस वर्ष तक अनुशासन, सोलह के बाद मित्र-व्यवहार — पुत्र-पालन का तीन-चरण सूत्र।

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19
अ. 3 · श्लोक 19
उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे।
असाधुजनसम्पर्के यः पलायति जीवति॥

उपद्रव, शत्रु-आक्रमण, अकाल, भयानक स्थिति या दुर्जन-संगति में जो भाग जाता है, वही जीवित रहता है।

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20
अ. 3 · श्लोक 20
धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते।
जन्मफलं हि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चारों में से एक भी जिसमें नहीं, उसका जन्म व्यर्थ है, केवल मरण।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

10 श्लोक
1
अ. 4 · श्लोक 1
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥

आयु, कर्म, वित्त, विद्या और मरण — ये पाँच गर्भ-काल में ही निर्धारित हो जाते हैं।

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3
अ. 4 · श्लोक 3
दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्स्यीकूर्मी च पक्षिणी।
शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जनसङ्गतिः॥

मछली दृष्टि से, कछुआ ध्यान से, पक्षी स्पर्श से शिशु पालते हैं — वैसे सत्संग सूक्ष्म प्रभाव से जीव को पालता है।

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4
अ. 4 · श्लोक 4
यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात्प्राणान्तेकिं करिष्यति॥

जब तक देह स्वस्थ है, मृत्यु दूर है — तब तक आत्म-हित करो।

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5
अ. 4 · श्लोक 5
कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी।
प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥

विद्या कामधेनु-गुणा है — असमय फल देती, विदेश में माता-सम, गुप्त धन है।

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6
अ. 4 · श्लोक 6
एकोऽपि गुणवान्पुत्रो निर्गुणैश्शतैर्वरः।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारा सहस्रशः॥

एक गुणी पुत्र सौ निर्गुणों से श्रेष्ठ — एक चन्द्र अन्धकार हरता है, हज़ार तारे नहीं।

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7
अ. 4 · श्लोक 7
मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः।
मृतस्तु चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्॥

मूर्ख चिरायु जीवे उससे जन्म-मरण ही श्रेष्ठ — मरा थोड़ा दुख देता, जीवित जड़ जीवनभर जलाता है।

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10
अ. 4 · श्लोक 10
संसारतापदग्धानां त्रयो विश्रामहेतवः।
अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च॥

संसार-ताप से जले हुए लोगों के तीन विश्राम हैं — सन्तान, पत्नी और सत्संगति।

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13
अ. 4 · श्लोक 13
सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता।
सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥

शुचि+दक्ष, पतिव्रता, पतिप्रिय, सत्यवादिनी — चार लक्षण असली भार्या के।

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17
अ. 4 · श्लोक 17
अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धने जरा।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपे जरा॥

मनुष्य को यात्रा, घोड़े को बँधन, स्त्री को रति-अभाव, और वस्त्र को धूप — चारों को बूढ़ा बनाते हैं।

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18
अ. 4 · श्लोक 18
कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कस्याहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः॥

समय, मित्र, देश, आय-व्यय, मैं कौन, मेरी शक्ति — इन छह बातों पर निरन्तर विचार करो।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

3 श्लोक
3
अ. 5 · श्लोक 3
तावद्भयेषु भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशङ्कया॥

जब तक भय न आया, तब तक डरो — पर भय आ जाये तो बिना संशय प्रहार करो।

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16
अ. 5 · श्लोक 16
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवापि च॥

समुद्र में वर्षा, तृप्त को भोजन, धनिक को दान, दिन में दीपक — सब व्यर्थ।

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22
अ. 5 · श्लोक 22
जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति।
अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥

जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत कराने वाला, विद्या देने वाला, अन्न देने वाला, भय से बचाने वाला — ये पाँच पिता-समान।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

6 श्लोक
7
अ. 6 · श्लोक 7
कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥

काल भूतों को पकाता, प्रजा को संहारता, सोयों में जागता — काल दुरतिक्रम है।

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12
अ. 6 · श्लोक 12
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्स्तब्धमञ्जलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च यथार्थत्वेन पण्डितम्॥

लोभी को धन से, अहंकारी को नमस्कार से, मूर्ख को उसके अनुसार चलकर, पण्डित को यथार्थ से जीतो।

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17
अ. 6 · श्लोक 17
इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत्पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥

बक की भाँति इन्द्रियों को संयम करके — देश-काल-बल समझकर सब कार्य सिद्ध करो।

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18
अ. 6 · श्लोक 18
प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बन्धुषु।
स्वयमाक्रम्य भोगं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्॥

कुक्कुट से चार — समय पर उठना, युद्ध, बन्धुओं में वितरण, स्वयं उद्यम से भोग।

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19
अ. 6 · श्लोक 19
गूढं च मैथुनं धार्ष्ट्यं च कालेऽप्यालयसङ्ग्रहम्।
अप्रमादमविश्वासं पञ्च शिक्षेच्च वायसात्॥

काक से पाँच — गुप्त सम्भोग, धृष्टता, समय पर संग्रह, सतर्कता, अविश्वास।

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22
अ. 6 · श्लोक 22
य एतान्विंशतिगुणानाचरिष्यति मानवः।
कार्यावस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति॥

जो मनुष्य इन बीस गुणों को आचरण में लाये — हर परिस्थिति में अजेय हो जायेगा।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

4 श्लोक
11
अ. 7 · श्लोक 11
बाहुवीर्यं बलं राज्ञो ब्राह्मणो ब्रह्मविद्बली।
रूपयौवनमाधुर्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम्॥

राजा का बल भुजबल, ब्राह्मण का ब्रह्मविद्या, स्त्री का रूप-यौवन-माधुर्य — सर्वोच्च बल।

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14
अ. 7 · श्लोक 14
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्॥

कमायी सम्पत्ति की रक्षा त्याग में — जैसे तालाब के पानी की रक्षा निकलने में।

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17
अ. 7 · श्लोक 17
अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।
नीचप्रसङ्गः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम्॥

अति-क्रोध, कटु वाणी, दरिद्रता, स्वजनों में बैर, नीच-संगति, कुलहीन-सेवा — नर्क-निवासियों के चिह्न।

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18
अ. 7 · श्लोक 18
गम्यते यदि मृगेन्द्रमन्दिरं लभ्यते करिकपोलमौक्तिकम्।
जम्बुकालयगते च लभ्यते वत्सपुच्छखरचर्मखण्डनम्॥

सिंह की गुफ़ा में जाओ तो हाथी का मोती मिलेगा।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

5 श्लोक
2
अ. 8 · श्लोक 2
इक्षुदण्डास्तिलाः शूद्राः कान्ता हेम च मेदिनी।
चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥

ईख, तिल, सोना, चन्दन, दही, पान — पीसने/मर्दन से गुण बढ़ते।

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4
अ. 8 · श्लोक 4
वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र देहि क्वचित्।
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुखे माधुर्यवद्भूतले॥

गुणवानों को धन दो, अन्यत्र नहीं — समुद्र का जल बादल में मीठा होकर पृथ्वी पर गिरता है।

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7
अ. 8 · श्लोक 7
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम्॥

अजीर्ण में पानी औषधि, पाचन-काल में बल-दायी, भोजन में अमृत, भोजनान्त में विष।

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9
अ. 8 · श्लोक 9
वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्तगतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः॥

वृद्धावस्था में पत्नी की मृत्यु, बन्धुओं के हाथ में धन, परवशता का भोजन — तीन सबसे बड़ी विडम्बनाएँ।

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22
अ. 8 · श्लोक 22
मांसभक्षैः सुरापानैर्मूर्खैश्चाक्षरवर्जितैः।
पशुभिः पुरुषाकारैर्भाराक्रान्ता हि मेदिनी॥

मांस-भक्षी, सुरापान-कर्ता, मूर्ख, अक्षर-वर्जित — ये "human-shaped पशु" पृथ्वी को बोझिल करते।

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अध्याय 9 — मुक्ति और क्षमा

2 श्लोक
11
अ. 9 · श्लोक 11
प्रातः द्यूतप्रसङ्गेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसङ्गतः। रात्रौ चौरप्रसङ्गेन कालो गच्छति धीमताम्॥

बुद्धिमानों का काल — प्रात: जुआ-कथा (महाभारत), मध्याह्न स्त्री-कथा (रामायण), रात्रि चोर-कथा (भागवत) से बीतता।

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13
अ. 9 · श्लोक 13
इक्षुदण्डास्तिलाः शूद्राः कान्ता हेम च मेदिनी। चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥

ईख, तिल, सोना, चन्दन — मर्दन से गुण-वर्धन।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

1 श्लोक
15
अ. 10 · श्लोक 15
वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गेन जीवनात्। प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभङ्गे दिने दिने॥

मान-भङ्ग के जीवन से प्राण-त्याग श्रेष्ठ — प्राण-त्याग में क्षण-दुख, मान-भङ्ग में दैनिक दुख।

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

3 श्लोक
4
अ. 11 · श्लोक 4
कलौ दशसहस्राणि हरिस्त्यजति मेदिनीम्। तदर्धं जाह्नवीतोयं तदर्धं ग्रामदेवताः॥

कलियुग के 10,000 वर्ष में विष्णु पृथ्वी छोड़ते, उसके आधे में गंगा, उसके आधे में ग्राम-देवता।

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9
अ. 11 · श्लोक 9
ये तु संवत्सरं पूर्णं नित्यं मौनेन भुञ्जते। युगकोटिसहस्रं ते स्वर्गलोके महीयते॥

जो पूरे वर्ष मौन भोजन करे — सहस्र-कोटि-युग स्वर्ग पाये।

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12
अ. 11 · श्लोक 12
एकाहारेण सन्तुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा। ऋतुकालाभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते॥

एक-समय भोजन से सन्तुष्ट, षट्-कर्म-निरत, ऋतु-काल मर्यादित — वह "द्विज।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

4 श्लोक
6
अ. 12 · श्लोक 6
पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम्।

करीर में पत्ते नहीं — वसन्त का दोष?

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8
अ. 12 · श्लोक 8
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः।

साधु-दर्शन पुण्य, साधु तीर्थ-रूप — काल से तीर्थ फल देता, साधु तुरन्त।

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12
अ. 12 · श्लोक 12
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः।

शरीर अनित्य, वैभव अशाश्वत, मृत्यु निकट — धर्म-संग्रह करना चाहिए।

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16
अ. 12 · श्लोक 16
काष्ठकल्पतरुः सुमेरुरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः।

कल्पवृक्ष काठ, सुमेरु अचल, चिन्तामणि पत्थर, सूर्य गर्म, चन्द्र क्षीण — हे राम, आपकी उपमा नहीं दी जा सकती।

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अध्याय 13 — मुहूर्त-जीवन

4 श्लोक
1
अ. 13 · श्लोक 1
मुहूर्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा।

शुभ कर्म से मुहूर्त भर भी जीना श्रेष्ठ, लोक-विरोधी कर्म से कल्प भर भी नहीं।

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4
अ. 13 · श्लोक 4
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।

आयु, कर्म, वित्त, विद्या, मरण — पाँच गर्भ में निर्धारित।

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7
अ. 13 · श्लोक 7
अनागत विधाता च प्रत्युत्पन्न मतिस्तथा।

भविष्य-नियोजक और तत्क्षण-बुद्धिमान् — दोनों सुखी, भाग्य-निर्भर डूब जाता।

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15
अ. 13 · श्लोक 15
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्।

सहस्र गायों में भी बछड़ा माँ को ढूँढ लेता — किया हुआ कर्म कर्ता को ढूँढ लेता।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

1 श्लोक
20
अ. 14 · श्लोक 20
त्यजेद्दुर्जनसंसर्गं भजेत्साधुसमागमम्।

दुर्जन-संग त्यागो, साधु-संग भजो — दिन-रात पुण्य करो, संसार अनित्य स्मरण रखो।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

3 श्लोक
4
अ. 15 · श्लोक 4
कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरभाषिणं च।

मलिन वस्त्र, गन्दे दाँत, बहु-भोजी, कटु-वाणी, सूर्योदय-अस्त के समय सोने वाला — लक्ष्मी छोड़ देती।

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6
अ. 15 · श्लोक 6
अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति।

अन्याय से अर्जित धन 10 वर्ष ठहरता — 11वें में मूल-सहित नष्ट होता।

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10
अ. 15 · श्लोक 10
अनन्तशास्त्रं बहु वेद्यमल्पः कालो बह्वविघ्नश्च।

शास्त्र अनन्त, ज्ञेय बहुत, काल अल्प, विघ्न बहुत — हंस-दूध की तरह सार ले लो।

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

2 श्लोक
4
अ. 16 · श्लोक 4
कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः।

धन पाकर कौन गर्व-रहित, विषयों के दुख किसे नहीं, स्त्रियाँ किसका मन-खंडित नहीं किया — समय किसका मित्र, याचक को कौन गौरव देता, खल के जाल में कौन नहीं फँसा।

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5
अ. 16 · श्लोक 5
न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरङ्गी।

सोने की मृगी किसी ने बनायी न देखी न सुनी — फिर भी रघुनाथ ने तृष्णा की।

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अध्याय 17 — समापन

2 श्लोक
9
अ. 17 · श्लोक 9
पत्युराज्ञां विना नारी उपोष्य व्रतचारिणी।

पति-आज्ञा-विना उपवास-व्रत स्त्री — पति की आयु हरे, स्वयं नर्क जाये।

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