VastuGuruji सही वास्तु · खुशहाल जीवन
विषय-संग्रह

👩 स्त्री

पत्नी, स्त्री-धर्म, गृह

72श्लोक
17 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 स्त्री विषय पर चाणक्य नीति

स्त्री — चाणक्य के 72 श्लोक स्त्री-विषयक। यह संख्या स्वयं प्रमाण है कि गृहस्थ-जीवन उनकी प्राथमिकता में था। पर यहाँ एक चेतावनी ज़रूरी — चाणक्य 2300 साल पुराने युग के हैं, और कई श्लोक उस काल की सामाजिक संरचना को दर्शाते हैं। हमारी टीम ने हर श्लोक का आधुनिक-दृष्टि से अनुवाद किया — patriarchal उद्धरणों को context में रखकर, और जो universal truths हैं उन्हें gender-balanced ढंग से प्रस्तुत किया।

चाणक्य का मूल सूत्र — "पतिरेव गुरुः स्त्रीणाम्" — पति पत्नी का गुरु; पर अध्याय 5 का विस्तार दिखाता कि "गुरु" शब्द से चाणक्य का तात्पर्य दैनिक मार्गदर्शक है, न कि अन्ध-अनुगामी। उन्होंने पत्नी के पाँच गुण बताये — पावित्र्य, धर्म-निष्ठा, मधुर-वाणी, गृह-कौशल, और स्वामी-निष्ठा। अध्याय 12 में सुयोग्य पत्नी को धर्म-संग्रह का प्रथम स्तम्भ बताया। हर श्लोक — Sanskrit मूल + सन्तुलित हिन्दी अर्थ + family-relationship context + 🧠 modern psychology research।

स्त्री विषय से सम्बंधित 72 श्लोक चाणक्य नीति के 17 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

9 श्लोक
3
अ. 1 · श्लोक 3
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।

येन विज्ञातमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥

सर्वज्ञता का मार्ग

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4
अ. 1 · श्लोक 4
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।

दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥

विद्वान् भी कब हारता है

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5
अ. 1 · श्लोक 5
दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।

ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥

चार मृत्यु-तुल्य स्थितियाँ

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6
अ. 1 · श्लोक 6
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि ।

आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥

तीन प्राथमिकताएँ

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11
अ. 1 · श्लोक 11
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे ।

मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥

चार सम्बन्धों की पहचान

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13
अ. 1 · श्लोक 13
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।

ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि ॥

दोनों हाथ नहीं रहते

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14
अ. 1 · श्लोक 14
वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् ।

रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥

कुल और चरित्र

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15
अ. 1 · श्लोक 15
नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां शृङ्गिणां तथा ।

विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥

छह जिन पर अंधा विश्वास न करें

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17
अ. 1 · श्लोक 17
स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा ।

साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥

चार प्राकृतिक गुणांक

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अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

7 श्लोक
1
अ. 2 · श्लोक 1
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभिता।
अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥

असत्य, अविचारी साहस, छल, मूर्खता, लोभ, अपवित्रता और निर्दयता — ये सात दोष स्वभाव-जन्य हैं।

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3
अ. 2 · श्लोक 3
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी।
विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहैव हि॥

आज्ञाकारी पुत्र, अनुकूल पत्नी और अपनी संपदा में सन्तोष — इन तीन का स्वर्ग यहीं है।

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4
अ. 2 · श्लोक 4
ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः।
तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥

पुत्र-पिता-मित्र-पत्नी — चारों की कसौटी कर्तव्य और भाव से मापी जाती है, सम्बन्ध-नाम से नहीं।

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7
अ. 2 · श्लोक 7
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्।
मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चापि नियोजयेत्॥

मन में सोचे काम को वाणी से प्रकट न करो — मन्त्र की भाँति गुप्त रखो, गुप्त रूप से ही कार्य में लगाओ।

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14
अ. 2 · श्लोक 14
कान्तावियोगः स्वजनापमानो ऋणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा।
दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥

छह चीज़ें बिना आग के शरीर को जलाती हैं — प्रिय-विरह, अपनों का अनादर, बचा हुआ क़र्ज़, बुरे राजा की सेवा, दरिद्रता और विषम सभा।

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15
अ. 2 · श्लोक 15
नदी तीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशयम्॥

नदी-तीर के वृक्ष, पराये घर की स्त्री और मन्त्री-रहित राजा — तीनों शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

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16
अ. 2 · श्लोक 16
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा।
बलं वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां च कनिष्ठिका॥

ब्राह्मण का बल विद्या, राजा का सेना, वैश्य का धन, शूद्र का सेवा — हर वर्ण का अपना विशिष्ट बल है।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

2 श्लोक
9
अ. 3 · श्लोक 9
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥

कोयल का रूप उसका स्वर, स्त्री का रूप पतिव्रता, कुरूप का रूप विद्या, और तपस्वी का रूप क्षमा है।

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21
अ. 3 · श्लोक 21
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसञ्चितम्।
दाम्पत्यकलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥

जहाँ मूर्ख पूजे न जायें, अन्न सुसंचित हो, और दम्पति में कलह न हो — वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती है।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

8 श्लोक
2
अ. 4 · श्लोक 2
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः।
ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥

साधुजनों से दूर हो जाने वाले पुत्र-मित्र-बन्धु निरर्थक हैं — जो उनके साथ चलें, उनसे ही कुल सुकृती बनता है।

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8
अ. 4 · श्लोक 8
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं कोपमुखी च भार्या।
पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥

बुरा गाँव, नीच की सेवा, बुरा भोजन, क्रोधी पत्नी, मूर्ख पुत्र, विधवा पुत्री — ये छह बिना आग शरीर को जलाते हैं।

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10
अ. 4 · श्लोक 10
संसारतापदग्धानां त्रयो विश्रामहेतवः।
अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च॥

संसार-ताप से जले हुए लोगों के तीन विश्राम हैं — सन्तान, पत्नी और सत्संगति।

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11
अ. 4 · श्लोक 11
सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः।
सकृत्कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्॥

राजा एक बार आदेश देते, पण्डित एक बार बोलते, कन्या एक बार दी जाती — ये तीनों एक-एक बार ही होते हैं।

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13
अ. 4 · श्लोक 13
सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता।
सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥

शुचि+दक्ष, पतिव्रता, पतिप्रिय, सत्यवादिनी — चार लक्षण असली भार्या के।

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14
अ. 4 · श्लोक 14
अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्तु बान्धवाः।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता॥

सन्तान-हीन का घर, बन्धु-हीन की दिशा, मूर्ख का हृदय शून्य — पर दरिद्रता तो सर्व-शून्य है।

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16
अ. 4 · श्लोक 16
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत्॥

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोध-मुखी पत्नी, स्नेह-हीन बन्धु — चारों को त्याग दो।

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17
अ. 4 · श्लोक 17
अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बन्धने जरा।
अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपे जरा॥

मनुष्य को यात्रा, घोड़े को बँधन, स्त्री को रति-अभाव, और वस्त्र को धूप — चारों को बूढ़ा बनाते हैं।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

6 श्लोक
1
अ. 5 · श्लोक 1
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः।
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥

पत्नी का पति, सबका अभ्यागत (अतिथि), द्विज का अग्नि, चारों वर्णों का ब्राह्मण — चार categories के गुरु।

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9
अ. 5 · श्लोक 9
वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृदुना रक्ष्यते भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम्॥

धन से धर्म, योग से विद्या, मृदुता से राजा, सद्गुणी पत्नी से घर — रक्षित।

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14
अ. 5 · श्लोक 14
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गं तृणं शूरस्य जीवितम्।
जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥

ब्रह्मज्ञानी को स्वर्ग, शूर को जीवन, इन्द्रिय-विजयी को नारी, निःस्पृह को जगत् — तिनके के समान।

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15
अ. 5 · श्लोक 15
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

विदेश में विद्या, घर में पत्नी, रोगी को औषधि, मरे को धर्म — मित्र हैं।

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21
अ. 5 · श्लोक 21
नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः।
चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥

मनुष्यों में नापित (नाई), पक्षियों में कौवा, चौपायों में सियार, स्त्रियों में मालिनी — सबसे धूर्त।

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23
अ. 5 · श्लोक 23
राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥

राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, सास, अपनी माँ — ये पाँच माँ-समान।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

6 श्लोक
3
अ. 6 · श्लोक 3
भस्मना शुध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्ध्यति।
रजसा शुद्ध्यते नारी नदी वेगेन शुद्ध्यति॥

कांसा भस्म से, ताम्बा अम्ल से, स्त्री रजस्वला से, नदी वेग से शुद्ध होती।

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4
अ. 6 · श्लोक 4
भ्रमन्सम्पूज्यते राजा भ्रमन्सम्पूज्यते द्विजः।
भ्रमन्सम्पूज्यते योगी स्त्री भ्रमन्ती विनश्यति॥

घूमने वाला राजा, ब्राह्मण, योगी पूजे जाते — पर स्त्री घूमती तो नष्ट।

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10
अ. 6 · श्लोक 10
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः।
भर्तारं च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा॥

राष्ट्र का पाप राजा भोगता, राजा का पुरोहित, स्त्री का पति, शिष्य का गुरु।

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11
अ. 6 · श्लोक 11
ऋणकर्ता पिता शत्रुर्माता च व्यभिचारिणी।
भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः॥

ऋणी पिता, व्यभिचारी माता, अति-रूपवती भार्या, अपण्डित पुत्र — चार पारिवारिक "शत्रु।

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13
अ. 6 · श्लोक 13
वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदाराः॥

कुराज से राज्य न हो, कुमित्र से मित्र न हो, कुशिष्य से शिष्य न हो, कुदार से दारा (पत्नी) न हो — श्रेष्ठ।

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15
अ. 6 · श्लोक 15
सिंहादेकं वकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।
वायसात्पञ्च शिक्षेच्च षट् शुनस्त्रीणि गर्दभात्॥

सिंह से एक, बक से एक, कुक्कुट से चार, काक से पाँच, श्वान से छह, गर्दभ से तीन गुण — सीखो।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

3 श्लोक
1
अ. 7 · श्लोक 1
अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणीचरितानि च।
नीचवाक्यं चापमानं मतिमान्न प्रकाशयेत्॥

धन-नाश, मन-संताप, गृहिणी-चरित्र, नीच-वाक्य, अपमान — पाँच बातें बुद्धिमान् प्रकट न करे।

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4
अ. 7 · श्लोक 4
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥

पत्नी, भोजन, धन में सन्तोष; पठन, जप, दान में सन्तोष न करो।

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11
अ. 7 · श्लोक 11
बाहुवीर्यं बलं राज्ञो ब्राह्मणो ब्रह्मविद्बली।
रूपयौवनमाधुर्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम्॥

राजा का बल भुजबल, ब्राह्मण का ब्रह्मविद्या, स्त्री का रूप-यौवन-माधुर्य — सर्वोच्च बल।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

5 श्लोक
8
अ. 8 · श्लोक 8
हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाज्ञानतो नरः।
हतं निर्णायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः॥

क्रिया-हीन ज्ञान नष्ट, अज्ञानी मनुष्य नष्ट, नायक-हीन सेना नष्ट, पति-हीन स्त्री (आज: support-less individual) नष्ट।

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9
अ. 8 · श्लोक 9
वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्तगतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः॥

वृद्धावस्था में पत्नी की मृत्यु, बन्धुओं के हाथ में धन, परवशता का भोजन — तीन सबसे बड़ी विडम्बनाएँ।

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12
अ. 8 · श्लोक 12
न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृन्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥

काठ, पाषाण, मृत्तिका में देव नहीं — भाव में देव है।

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17
अ. 8 · श्लोक 17
शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता।
शुचिः क्षेमकरो राजा सन्तुष्टो ब्राह्मणः शुचिः॥

भूमिगत जल शुद्ध, पतिव्रता पत्नी शुद्ध, कल्याण-करता राजा शुद्ध, सन्तुष्ट ब्राह्मण शुद्ध।

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18
अ. 8 · श्लोक 18
असन्तुष्टा द्विजा नष्टाः सन्तुष्टाश्च महीभृतः।
सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलाङ्गनाः॥

असन्तुष्ट ब्राह्मण नष्ट, सन्तुष्ट राजा नष्ट, सलज्ज वेश्या नष्ट, निर्लज्ज कुलनारी नष्ट।

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अध्याय 9 — मुक्ति और क्षमा

1 श्लोक
11
अ. 9 · श्लोक 11
प्रातः द्यूतप्रसङ्गेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसङ्गतः। रात्रौ चौरप्रसङ्गेन कालो गच्छति धीमताम्॥

बुद्धिमानों का काल — प्रात: जुआ-कथा (महाभारत), मध्याह्न स्त्री-कथा (रामायण), रात्रि चोर-कथा (भागवत) से बीतता।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

2 श्लोक
4
अ. 10 · श्लोक 4
कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः। मद्यपाः किं न जल्पन्ति किं न खादन्ति वायसाः॥

कवि क्या नहीं देखते, स्त्री क्या नहीं कर सकती, मद्यपी क्या नहीं बकते, कौवे क्या नहीं खाते?

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6
अ. 10 · श्लोक 6
लुब्धानां याचकः शत्रुर्मूर्खाणां बोधको रिपुः। जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चौराणां चन्द्रमा रिपुः॥

लोभी का याचक, मूर्ख का बोधक, जार-स्त्री का पति, चोर का चन्द्रमा — शत्रु।

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

3 श्लोक
5
अ. 11 · श्लोक 5
गृहासक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनः। द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता॥

घर में आसक्त को विद्या, मांस-भोजी को दया, द्रव्य-लोभी को सत्य, स्त्री-आसक्त को पवित्रता नहीं मिलती।

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8
अ. 11 · श्लोक 8
न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्षं स तं सदा निन्दति नात्र चित्रम्। यथा किरातीकरिकुम्भलब्धां मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुञ्जाम्॥

जो किसी के गुणों को नहीं जानता, वह उसकी निंदा करता — आश्चर्य नहीं।

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17
अ. 11 · श्लोक 17
देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्शनम्। निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते॥

देवता-धन, गुरु-धन, पर-स्त्री-स्पर्श करने वाला, सब प्राणियों पर निर्वाह करने वाला विप्र — "चाण्डाल।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

5 श्लोक
1
अ. 12 · श्लोक 1
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियालापिनी।

आनन्द-युक्त घर, बुद्धिमान् पुत्र, मधुर-भाषिणी पत्नी — गृहस्थाश्रम धन्य।

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5
अ. 12 · श्लोक 5
येषां श्रीमद्यशोदासुतपदकमलेऽनस्ति भक्ति।

जिनकी कृष्ण-पाद-कमल में भक्ति नहीं — उनका जीवन व्यर्थ।

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11
अ. 12 · श्लोक 11
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।

सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शान्ति पत्नी, क्षमा पुत्र — मेरे 6 बन्धु।

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14
अ. 12 · श्लोक 14
मातृवत्परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्ठवत्।

पर-स्त्री को माँ-तुल्य, पर-धन को मिट्टी-तुल्य, सब प्राणियों को अपने-तुल्य — जो देखे, वही देखता।

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17
अ. 12 · श्लोक 17
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।

विद्या विदेश में, पत्नी घर में, औषधि रोग में, धर्म मरण में — मित्र।

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अध्याय 13 — मुहूर्त-जीवन

1 श्लोक
19
अ. 13 · श्लोक 19
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।

पत्नी-भोजन-धन में सन्तोष; पठन-दान-तप में नहीं।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

3 श्लोक
3
अ. 14 · श्लोक 3
पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।

धन, मित्र, भार्या, पृथ्वी फिर मिल सकते — पर मनुष्य-देह नहीं।

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11
अ. 14 · श्लोक 11
अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्थाः फलं न दत्ताम्।

अति-निकट विनाश, अति-दूर निष्फल — मध्यम-दूरी से सेवनीय।

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12
अ. 14 · श्लोक 12
अग्निरापः स्त्रियो मूर्खाः सर्पा राजकुलानि च।

अग्नि, जल, स्त्री, मूर्ख, सर्प, राजकुल — सावधानी से सेवनीय, ये 6 शीघ्र प्राण-हरते।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

1 श्लोक
5
अ. 15 · श्लोक 5
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च।

धन-हीन को मित्र, पत्नी, सेवक, सुहृद छोड़ देते — फिर धनी होते ही लौट आते।

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

4 श्लोक
1
अ. 16 · श्लोक 1
न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये।

विधि-पूर्वक ईश्वर-पाद नहीं ध्याया, स्वर्ग-कपाट खोलने वाला धर्म नहीं अर्जित, स्वप्न में भी स्त्री-संग नहीं — मातृ-यौवन-वन के काटने वाले कुठार।

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2
अ. 16 · श्लोक 2
जल्पन्ति साधुमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः।

स्त्री किसी और से बात करे, किसी और को देखे, किसी और से प्रेम करे — एक पुरुष पर रति नहीं।

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3
अ. 16 · श्लोक 3
यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।

जो मोह से मानता "यह स्त्री मुझ पर मुग्ध" — वह उसके वश में, खेल-पक्षी समान नाचता।

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13
अ. 16 · श्लोक 13
धनेषु जीविते चैव स्त्रीषु चाहारकर्मसु।

धन, जीवन, स्त्री, आहार, कर्म — अतृप्ति।

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अध्याय 17 — समापन

6 श्लोक
6
अ. 17 · श्लोक 6
अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः।

असमर्थ साधु, निर्धन ब्रह्मचारी, रोगी देव-भक्त, बूढ़ी स्त्री पतिव्रता — स्वाभाविक नहीं, परिस्थिति-जन्य।

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9
अ. 17 · श्लोक 9
पत्युराज्ञां विना नारी उपोष्य व्रतचारिणी।

पति-आज्ञा-विना उपवास-व्रत स्त्री — पति की आयु हरे, स्वयं नर्क जाये।

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10
अ. 17 · श्लोक 10
न दानैः शुद्ध्यते नारी नोपवासशतैरपि।

सब दान, सैकड़ों उपवास, तीर्थ-स्नान से नहीं — पति-चरणोदक से ही "शुद्ध" (आज: partner-reverence se relationship shudh)।

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14
अ. 17 · श्लोक 14
सद्यः प्रज्ञाहरा तुण्डी सद्यः प्रज्ञाकरी वचा।

कुन्दरू बुद्धि हरती, वच बुद्धि देती, स्त्री शक्ति हरती, दूध शक्ति देती।

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15
अ. 17 · श्लोक 15
यदीच्छेद्रामसदृशं सद्गुणैरुपलक्षितम्।

राम-सदृश सद्गुणी पुत्र चाहो — कौसल्या-तुल्य पवित्र-मन-पत्नी होनी चाहिए।

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18
अ. 17 · श्लोक 18
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोधी पत्नी (आज: partner), स्नेह-हीन बन्धु — त्याज्य।

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