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विषय-संग्रह

☠️ मरण

मृत्यु-दर्शन, अनित्यता

55श्लोक
16 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 मरण विषय पर चाणक्य नीति

मरण — चाणक्य के 51 श्लोक मृत्यु-दर्शन, अनित्यता, और जीवन-काल के सदुपयोग पर। उनकी दार्शनिक गहराई स्तब्ध करती — "अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः" — शरीर अनित्य, धन भी अशाश्वत; तब आसक्ति किसमें?

चाणक्य के अनुसार मृत्यु-स्मरण निराशा नहीं, प्रेरणा। मृत्यु की निश्चितता ही जीवन को मूल्यवान बनाती। उन्होंने मृत्यु से चार सीखें बताईं — (1) समय-मूल्य (time has limit) (2) आसक्ति-त्याग (detach from temporary) (3) कर्म-प्राथमिकता (act now, not tomorrow) (4) कीर्ति-स्थापना (build legacy that outlives body)। उनका प्रसिद्ध सूत्र — "आयुषः क्षणो लभ्यो न कोटिं हिरण्यैरपि" — आयु का एक क्षण करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओं से भी नहीं ख़रीदा जा सकता। आज Stoic philosophy, Buddhist meditation on impermanence, और terror management theory — सब चाणक्य की यह दृष्टि नए शब्दों में दोहराते। प्रत्येक श्लोक — मूल पाठ + existential psychology + death-acceptance research।

मरण विषय से सम्बंधित 55 श्लोक चाणक्य नीति के 16 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

2 श्लोक
8
अ. 2 · श्लोक 8
कथं चखलु मूर्खत्वं कथं चखलु यौवनम्।
कथात्कष्टतरं चैव परगेहनिवासनम्॥

मूर्खता दुखद है, युवापन भी दुखद है — पर पराये घर का वास इन दोनों से भी कठिन है।

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15
अ. 2 · श्लोक 15
नदी तीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशयम्॥

नदी-तीर के वृक्ष, पराये घर की स्त्री और मन्त्री-रहित राजा — तीनों शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

4 श्लोक
6
अ. 3 · श्लोक 6
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥

प्रलय में समुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़ते हैं, परन्तु साधु प्रलय में भी मर्यादा नहीं छोड़ते।

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7
अ. 3 · श्लोक 7
मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः।
भिनत्ति वाक्यशल्येन अदृशं कण्टको यथा॥

मूर्ख को त्यागो — वह प्रत्यक्ष दो पैर का पशु है।

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11
अ. 3 · श्लोक 11
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौनेन कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥

उद्यम से दरिद्रता, जप से पाप, मौन से कलह, और जागृति से भय नष्ट हो जाते हैं।

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15
अ. 3 · श्लोक 15
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥

एक भी सूखे वृक्ष में आग लग जाये तो पूरा वन जल जाता है — वैसे एक कुपुत्र पूरे कुल को।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

3 श्लोक
1
अ. 4 · श्लोक 1
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥

आयु, कर्म, वित्त, विद्या और मरण — ये पाँच गर्भ-काल में ही निर्धारित हो जाते हैं।

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5
अ. 4 · श्लोक 5
कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी।
प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥

विद्या कामधेनु-गुणा है — असमय फल देती, विदेश में माता-सम, गुप्त धन है।

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18
अ. 4 · श्लोक 18
कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कस्याहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः॥

समय, मित्र, देश, आय-व्यय, मैं कौन, मेरी शक्ति — इन छह बातों पर निरन्तर विचार करो।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

1 श्लोक
13
अ. 5 · श्लोक 13
जन्ममृत्यू हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाशुभम्।
नरकेषु पतत्येकः एको याति पराङ्गतिम्॥

जन्म-मरण अकेला, सुख-दुख अकेला भोगता, नरक अकेला जाता, परा-गति अकेला पाता।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

3 श्लोक
7
अ. 6 · श्लोक 7
कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥

काल भूतों को पकाता, प्रजा को संहारता, सोयों में जागता — काल दुरतिक्रम है।

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17
अ. 6 · श्लोक 17
इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत्पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥

बक की भाँति इन्द्रियों को संयम करके — देश-काल-बल समझकर सब कार्य सिद्ध करो।

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19
अ. 6 · श्लोक 19
गूढं च मैथुनं धार्ष्ट्यं च कालेऽप्यालयसङ्ग्रहम्।
अप्रमादमविश्वासं पञ्च शिक्षेच्च वायसात्॥

काक से पाँच — गुप्त सम्भोग, धृष्टता, समय पर संग्रह, सतर्कता, अविश्वास।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

3 श्लोक
3
अ. 7 · श्लोक 3
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च।
न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥

सन्तोष-अमृत से तृप्तों को जो सुख-शान्ति मिलती, वह धन-लोभी इधर-उधर भागते वालों को नहीं।

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14
अ. 7 · श्लोक 14
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्॥

कमायी सम्पत्ति की रक्षा त्याग में — जैसे तालाब के पानी की रक्षा निकलने में।

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18
अ. 7 · श्लोक 18
गम्यते यदि मृगेन्द्रमन्दिरं लभ्यते करिकपोलमौक्तिकम्।
जम्बुकालयगते च लभ्यते वत्सपुच्छखरचर्मखण्डनम्॥

सिंह की गुफ़ा में जाओ तो हाथी का मोती मिलेगा।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

5 श्लोक
2
अ. 8 · श्लोक 2
इक्षुदण्डास्तिलाः शूद्राः कान्ता हेम च मेदिनी।
चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥

ईख, तिल, सोना, चन्दन, दही, पान — पीसने/मर्दन से गुण बढ़ते।

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7
अ. 8 · श्लोक 7
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम्॥

अजीर्ण में पानी औषधि, पाचन-काल में बल-दायी, भोजन में अमृत, भोजनान्त में विष।

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8
अ. 8 · श्लोक 8
हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाज्ञानतो नरः।
हतं निर्णायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः॥

क्रिया-हीन ज्ञान नष्ट, अज्ञानी मनुष्य नष्ट, नायक-हीन सेना नष्ट, पति-हीन स्त्री (आज: support-less individual) नष्ट।

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12
अ. 8 · श्लोक 12
न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृन्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥

काठ, पाषाण, मृत्तिका में देव नहीं — भाव में देव है।

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16
अ. 8 · श्लोक 16
निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्।
असिद्धस्य हता विद्या ह्यभोगेन हतं धनम्॥

निर्गुण का रूप, दुःशील का कुल, असिद्ध की विद्या, अभोगी का धन — सब नष्ट।

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अध्याय 9 — मुक्ति और क्षमा

6 श्लोक
1
अ. 9 · श्लोक 1
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयाशौचं सत्यं पीयूषवत्पिब॥

मुक्ति चाहो तो विषयों को विष-समान त्यागो, क्षमा-सरलता-दया-शुद्धि-सत्य को अमृत-समान पिओ।

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2
अ. 9 · श्लोक 2
परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः। त एव विलयं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत्॥

जो परस्पर के मर्म प्रकाशित करते — वे नराधम वल्मीक के सर्प की भाँति स्वयं नष्ट।

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4
अ. 9 · श्लोक 4
सर्वौषधीनाममृता प्रधाना सर्वेषु सौख्येष्वशनं प्रधानम्। सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधानं सर्वेषु गात्रेषु शिरः प्रधानम्॥

औषधियों में अमृत, सुखों में भोजन, इन्द्रियों में नेत्र, अंगों में शिर — सर्वोच्च।

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11
अ. 9 · श्लोक 11
प्रातः द्यूतप्रसङ्गेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसङ्गतः। रात्रौ चौरप्रसङ्गेन कालो गच्छति धीमताम्॥

बुद्धिमानों का काल — प्रात: जुआ-कथा (महाभारत), मध्याह्न स्त्री-कथा (रामायण), रात्रि चोर-कथा (भागवत) से बीतता।

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13
अ. 9 · श्लोक 13
इक्षुदण्डास्तिलाः शूद्राः कान्ता हेम च मेदिनी। चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥

ईख, तिल, सोना, चन्दन — मर्दन से गुण-वर्धन।

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15
अ. 9 · श्लोक 15
धर्मार्थ काममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। जन्म जन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — एक भी न हो तो जन्म-जन्म केवल मरण।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

4 श्लोक
7
अ. 10 · श्लोक 7
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

जिनमें न विद्या, न तप, न दान, न ज्ञान, न शील, न गुण, न धर्म — वे पृथ्वी के बोझ, मनुष्य-रूप में पशु।

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10
अ. 10 · श्लोक 10
दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले। अपानं शुचि इन्द्रियं नहि सौगन्ध्यलेपनैः॥

दुर्जन को सज्जन बनाने का उपाय नहीं — अपान-इन्द्रिय हज़ार सुगन्धों से शुद्ध नहीं होती।

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11
अ. 10 · श्लोक 11
आत्मद्वेषाद्भवेन्मृत्युः परद्वेषाद्धनक्षयः। राजद्वेषाद्भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः॥

आत्म-द्वेष से मृत्यु, पर-द्वेष से धन-क्षय, राज-द्वेष से नाश, ब्रह्म-द्वेष से कुल-क्षय।

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12
अ. 10 · श्लोक 12
वरं वनं वरं भिक्षा वरं भारोपजीवनम्। वरं रोगो वरं मृत्युर्न तु धर्मस्य लोपनम्॥

वन-वास, भिक्षा, भार-वहन, रोग, मृत्यु — सब श्रेष्ठ, धर्म-लोप नहीं।

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

5 श्लोक
2
अ. 11 · श्लोक 2
आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत्। स्वयमेव लयं याति यथा राज्यमधर्मतः॥

अपना वर्ग छोड़कर पराये वर्ग का आश्रय — स्वयं नष्ट, जैसे अधर्मी राज्य।

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12
अ. 11 · श्लोक 12
एकाहारेण सन्तुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा। ऋतुकालाभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते॥

एक-समय भोजन से सन्तुष्ट, षट्-कर्म-निरत, ऋतु-काल मर्यादित — वह "द्विज।

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14
अ. 11 · श्लोक 14
लाक्षादितैलनीलीनां कौसुम्भमधुसर्पिषाम्। विक्रेता मद्यमांसानां विप्रः शूद्र इति स्मृतः॥

लाक्षा, तेल, नील, कुसुम, मधु, घी, मद्य, मांस बेचने वाला विप्र — "शूद्र।

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16
अ. 11 · श्लोक 16
वापीकूपतडागानामारामसुरवेश्मनाम्। उच्छेदने निराशङ्कः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते॥

बावली, कुँआ, तालाब, उद्यान, देवालय — को नष्ट करने में निडर — "म्लेच्छ-विप्र।

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17
अ. 11 · श्लोक 17
देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्शनम्। निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते॥

देवता-धन, गुरु-धन, पर-स्त्री-स्पर्श करने वाला, सब प्राणियों पर निर्वाह करने वाला विप्र — "चाण्डाल।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

6 श्लोक
8
अ. 12 · श्लोक 8
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः।

साधु-दर्शन पुण्य, साधु तीर्थ-रूप — काल से तीर्थ फल देता, साधु तुरन्त।

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10
अ. 12 · श्लोक 10
न विप्रपादोदककर्दमानि न वेदशास्त्रध्वनिगर्जितानि।

जिन घरों में ब्राह्मण-चरणामृत नहीं, वेद-शास्त्र की ध्वनि नहीं — श्मशान-तुल्य।

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12
अ. 12 · श्लोक 12
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः।

शरीर अनित्य, वैभव अशाश्वत, मृत्यु निकट — धर्म-संग्रह करना चाहिए।

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16
अ. 12 · श्लोक 16
काष्ठकल्पतरुः सुमेरुरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः।

कल्पवृक्ष काठ, सुमेरु अचल, चिन्तामणि पत्थर, सूर्य गर्म, चन्द्र क्षीण — हे राम, आपकी उपमा नहीं दी जा सकती।

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17
अ. 12 · श्लोक 17
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।

विद्या विदेश में, पत्नी घर में, औषधि रोग में, धर्म मरण में — मित्र।

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19
अ. 12 · श्लोक 19
अनालोक्य व्ययं कर्ता अनाथः कलहप्रियः।

विचार-हीन व्यय, सहायक-हीन कलह-प्रिय, सब जातियों की स्त्रियों से सम्बन्ध — पुरुष शीघ्र नष्ट।

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अध्याय 13 — मुहूर्त-जीवन

3 श्लोक
4
अ. 13 · श्लोक 4
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।

आयु, कर्म, वित्त, विद्या, मरण — पाँच गर्भ में निर्धारित।

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9
अ. 13 · श्लोक 9
जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्।

धर्म-रहित जीवित मृत-समान, धर्मी मरकर भी चिर-जीवी।

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11
अ. 13 · श्लोक 11
दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना।

नीच पर-यश की आग में जलते — असमर्थ होकर निंदा करते।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

3 श्लोक
2
अ. 14 · श्लोक 2
आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम्।

अपने अपराध-वृक्ष के फल — दरिद्रता, रोग, दुख, बन्ध, विपत्ति।

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16
अ. 14 · श्लोक 16
एकेव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः।

एक देह तीन प्रकार से देखी जाती — योगी-शव, कामी-मांस, श्वान-कुणप।

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20
अ. 14 · श्लोक 20
त्यजेद्दुर्जनसंसर्गं भजेत्साधुसमागमम्।

दुर्जन-संग त्यागो, साधु-संग भजो — दिन-रात पुण्य करो, संसार अनित्य स्मरण रखो।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

4 श्लोक
6
अ. 15 · श्लोक 6
अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति।

अन्याय से अर्जित धन 10 वर्ष ठहरता — 11वें में मूल-सहित नष्ट होता।

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7
अ. 15 · श्लोक 7
अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम्।

अयोग्य चीज़ भी समर्थ के लिए योग्य, योग्य भी नीच के लिए दोषण — अमृत राहु को मृत्यु, विष शंकर को भूषण।

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10
अ. 15 · श्लोक 10
अनन्तशास्त्रं बहु वेद्यमल्पः कालो बह्वविघ्नश्च।

शास्त्र अनन्त, ज्ञेय बहुत, काल अल्प, विघ्न बहुत — हंस-दूध की तरह सार ले लो।

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15
अ. 15 · श्लोक 15
एकवृक्षसमारूढा नानावर्णा विहंगमाः।

अनेक रंग के पक्षी एक वृक्ष पर — प्रभात में 10 दिशाओं को उड़ जाते — फिर शोक क्या?

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

1 श्लोक
16
अ. 16 · श्लोक 16
वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गेन जीवनात्।

मान-भङ्ग से जीने से मरण श्रेष्ठ।

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अध्याय 17 — समापन

2 श्लोक
6
अ. 17 · श्लोक 6
अशक्तस्तु भवेत्साधुर्ब्रह्मचारी च निर्धनः।

असमर्थ साधु, निर्धन ब्रह्मचारी, रोगी देव-भक्त, बूढ़ी स्त्री पतिव्रता — स्वाभाविक नहीं, परिस्थिति-जन्य।

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