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विषय-संग्रह

⚖️ धर्म

सत्य-धर्म, कर्तव्य

63श्लोक
16 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 धर्म विषय पर चाणक्य नीति

धर्म — चाणक्य के लिए धर्म religious ritual नहीं, बल्कि आचार-संहिता। 54 श्लोक धर्म-पालन, सत्य-निष्ठा, कर्तव्य-बोध, और यज्ञ-दान पर। उनकी प्रसिद्ध परिभाषा — "धारणाद्धर्म इत्याहुः" — जो धारण करता है, समाज को संगठित रखता है — वही धर्म।

चाणक्य ने धर्म के पाँच आयाम बताये — सत्य (वाणी), अहिंसा (कर्म), अस्तेय (अधिकार न लेना), दान (साझा करना), और शौच (शुद्धता — आन्तरिक + बाह्य)। उनका कड़ा सूत्र — "धर्मो रक्षति रक्षितः" — जो धर्म की रक्षा करता, धर्म उसकी रक्षा करता। यह karma-theory का प्राचीन वैज्ञानिक रूप। साथ ही "नास्ति सत्यात् परो धर्मः" — सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं। आज corporate ethics, legal-compliance, और personal integrity के context में चाणक्य की यह दृष्टि timeless framework बनाती। हर श्लोक — मूल पाठ + समकालीन ethics case-study + brain-research on moral cognition।

धर्म विषय से सम्बंधित 63 श्लोक चाणक्य नीति के 16 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

3 श्लोक
7
अ. 1 · श्लोक 7
आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुत आपदः ।

कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति ॥

लक्ष्मी की चंचलता

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15
अ. 1 · श्लोक 15
नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां शृङ्गिणां तथा ।

विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥

छह जिन पर अंधा विश्वास न करें

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17
अ. 1 · श्लोक 17
स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा ।

साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥

चार प्राकृतिक गुणांक

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अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

1 श्लोक
18
अ. 2 · श्लोक 18
गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं शिष्या दग्धारण्यं मृगास्तथा॥

दक्षिणा लेकर ब्राह्मण यजमान को, विद्या लेकर शिष्य गुरु को, और जलते वन को मृग — तीनों तुरन्त त्याग देते हैं।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

2 श्लोक
6
अ. 3 · श्लोक 6
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥

प्रलय में समुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़ते हैं, परन्तु साधु प्रलय में भी मर्यादा नहीं छोड़ते।

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20
अ. 3 · श्लोक 20
धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते।
जन्मफलं हि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चारों में से एक भी जिसमें नहीं, उसका जन्म व्यर्थ है, केवल मरण।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

3 श्लोक
13
अ. 4 · श्लोक 13
सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता।
सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥

शुचि+दक्ष, पतिव्रता, पतिप्रिय, सत्यवादिनी — चार लक्षण असली भार्या के।

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16
अ. 4 · श्लोक 16
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान्बान्धवांस्त्यजेत्॥

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोध-मुखी पत्नी, स्नेह-हीन बन्धु — चारों को त्याग दो।

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19
अ. 4 · श्लोक 19
अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिमास्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्॥

द्विजों के देव अग्नि, मुनियों के हृदय में, अल्पबुद्धियों के मूर्ति में, और समदर्शियों के सर्वत्र देव हैं।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

5 श्लोक
1
अ. 5 · श्लोक 1
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः।
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥

पत्नी का पति, सबका अभ्यागत (अतिथि), द्विज का अग्नि, चारों वर्णों का ब्राह्मण — चार categories के गुरु।

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2
अ. 5 · श्लोक 2
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥

घिसना, काटना, तपाना, पीटना — चार से सोना; त्याग, शील, गुण, कर्म — चार से मनुष्य परखा जाता है।

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13
अ. 5 · श्लोक 13
जन्ममृत्यू हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाशुभम्।
नरकेषु पतत्येकः एको याति पराङ्गतिम्॥

जन्म-मरण अकेला, सुख-दुख अकेला भोगता, नरक अकेला जाता, परा-गति अकेला पाता।

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19
अ. 5 · श्लोक 19
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥

सत्य से पृथ्वी स्थिर, सत्य से सूर्य तपता, सत्य से वायु बहती — सब सत्य पर प्रतिष्ठित।

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20
अ. 5 · श्लोक 20
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीविते मन्दिरे।
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥

लक्ष्मी चंचल, प्राण चंचल, जीवन-घर चंचल — इस चराचर संसार में एक धर्म ही निश्चल।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

2 श्लोक
1
अ. 6 · श्लोक 1
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥

सुनकर धर्म जाने, दुर्बुद्धि त्यागे, ज्ञान पाये, मोक्ष पाये — श्रवण-शक्ति का चतुर्विध फल।

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12
अ. 6 · श्लोक 12
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्स्तब्धमञ्जलिकर्मणा।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च यथार्थत्वेन पण्डितम्॥

लोभी को धन से, अहंकारी को नमस्कार से, मूर्ख को उसके अनुसार चलकर, पण्डित को यथार्थ से जीतो।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

2 श्लोक
13
अ. 8 · श्लोक 13
शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम्।
न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥

शान्ति-सम तप नहीं, सन्तोष-सम सुख नहीं, तृष्णा-सम व्याधि नहीं, दया-सम धर्म नहीं।

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23
अ. 8 · श्लोक 23
अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनश्च ऋत्विजः।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः॥

अन्न-हीन यज्ञ राज्य को, मन्त्र-हीन ऋत्विज को, दान-हीन यजमान को जलाता — यज्ञ-सम कोई शत्रु नहीं।

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अध्याय 9 — मुक्ति और क्षमा

6 श्लोक
1
अ. 9 · श्लोक 1
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयाशौचं सत्यं पीयूषवत्पिब॥

मुक्ति चाहो तो विषयों को विष-समान त्यागो, क्षमा-सरलता-दया-शुद्धि-सत्य को अमृत-समान पिओ।

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10
अ. 9 · श्लोक 10
निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा। विषमस्तु न चाप्यस्तु फटाटोपो भयङ्करः॥

विष-हीन साँप को भी फणा बड़ी रखनी चाहिए — विष हो या न, फणा का आडम्बर डरावना।

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11
अ. 9 · श्लोक 11
प्रातः द्यूतप्रसङ्गेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसङ्गतः। रात्रौ चौरप्रसङ्गेन कालो गच्छति धीमताम्॥

बुद्धिमानों का काल — प्रात: जुआ-कथा (महाभारत), मध्याह्न स्त्री-कथा (रामायण), रात्रि चोर-कथा (भागवत) से बीतता।

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12
अ. 9 · श्लोक 12
स्वहस्तग्रथिता माला स्वहस्तघृष्टचन्दनम्। स्वहस्तलिखितं स्तोत्रं शक्रस्यापि श्रियं हरेत्॥

अपने हाथ से बनी माला, चन्दन, स्तोत्र — इन्द्र की भी श्री हर सकते।

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15
अ. 9 · श्लोक 15
धर्मार्थ काममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। जन्म जन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — एक भी न हो तो जन्म-जन्म केवल मरण।

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16
अ. 9 · श्लोक 16
पठन्ति चतुरो वेदान्धर्मशास्त्राण्यनेकशः। आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा॥

चार वेद और अनेक धर्मशास्त्र पढ़ने वाले भी आत्मा को नहीं जानते — जैसे करछी पाकरस को।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

3 श्लोक
7
अ. 10 · श्लोक 7
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

जिनमें न विद्या, न तप, न दान, न ज्ञान, न शील, न गुण, न धर्म — वे पृथ्वी के बोझ, मनुष्य-रूप में पशु।

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12
अ. 10 · श्लोक 12
वरं वनं वरं भिक्षा वरं भारोपजीवनम्। वरं रोगो वरं मृत्युर्न तु धर्मस्य लोपनम्॥

वन-वास, भिक्षा, भार-वहन, रोग, मृत्यु — सब श्रेष्ठ, धर्म-लोप नहीं।

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13
अ. 10 · श्लोक 13
क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञहोमबलिक्रियाः। न क्षीयते पात्रदानमभयं सर्वदेहिनाम्॥

सब दान, यज्ञ, होम, बलि क्षीण होते — पर पात्र-दान और सब प्राणियों को अभय — क्षीण नहीं।

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

4 श्लोक
2
अ. 11 · श्लोक 2
आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत्। स्वयमेव लयं याति यथा राज्यमधर्मतः॥

अपना वर्ग छोड़कर पराये वर्ग का आश्रय — स्वयं नष्ट, जैसे अधर्मी राज्य।

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5
अ. 11 · श्लोक 5
गृहासक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनः। द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता॥

घर में आसक्त को विद्या, मांस-भोजी को दया, द्रव्य-लोभी को सत्य, स्त्री-आसक्त को पवित्रता नहीं मिलती।

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11
अ. 11 · श्लोक 11
अकृष्टफलमूलानि वनवासरतिः सदा। कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते॥

जो बिना खेती फल-मूल खाये, वन-वास, नित्य श्राद्ध — वह विप्र-ऋषि।

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13
अ. 11 · श्लोक 13
लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः। वाणिज्यकृषिकर्मा यः स विप्रो वैश्य उच्यते॥

लौकिक कर्म, पशु-पालन, वाणिज्य, खेती करने वाला विप्र — "वैश्य।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

7 श्लोक
5
अ. 12 · श्लोक 5
येषां श्रीमद्यशोदासुतपदकमलेऽनस्ति भक्ति।

जिनकी कृष्ण-पाद-कमल में भक्ति नहीं — उनका जीवन व्यर्थ।

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11
अ. 12 · श्लोक 11
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।

सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शान्ति पत्नी, क्षमा पुत्र — मेरे 6 बन्धु।

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12
अ. 12 · श्लोक 12
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः।

शरीर अनित्य, वैभव अशाश्वत, मृत्यु निकट — धर्म-संग्रह करना चाहिए।

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15
अ. 12 · श्लोक 15
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दानेषु सत्साहसः।

धर्म-तत्परता, मुख-मधुरता, दान-साहस, मित्र-निश्छलता, गुरु-नम्रता, मनो-गम्भीरता, आचार-पवित्रता, गुण-रसिकता, शास्त्र-विज्ञता, रूप-सुन्दरता, शिव-भक्ति — हे राघव, आपमें ये सब।

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17
अ. 12 · श्लोक 17
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।

विद्या विदेश में, पत्नी घर में, औषधि रोग में, धर्म मरण में — मित्र।

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20
अ. 12 · श्लोक 20
नाहारं चिन्तयेत्प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।

पण्डित को आहार-चिन्ता नहीं — धर्म-चिन्ता।

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22
अ. 12 · श्लोक 22
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।

जल-बिन्दु-गिरने से घट भरता — सब विद्या, धर्म, धन का यही कारण।

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अध्याय 13 — मुहूर्त-जीवन

6 श्लोक
2
अ. 13 · श्लोक 2
गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्।

गये पर शोक नहीं, आगे की चिन्ता नहीं — वर्तमान से कुशल लोग चलते।

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8
अ. 13 · श्लोक 8
राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः।

धर्मी राजा से प्रजा धर्मी, पापी से पापी, समान से समान — प्रजा राजा-तुल्य।

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9
अ. 13 · श्लोक 9
जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्।

धर्म-रहित जीवित मृत-समान, धर्मी मरकर भी चिर-जीवी।

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10
अ. 13 · श्लोक 10
धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते।

4 पुरुषार्थ — एक भी न हो तो जन्म व्यर्थ।

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15
अ. 13 · श्लोक 15
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्।

सहस्र गायों में भी बछड़ा माँ को ढूँढ लेता — किया हुआ कर्म कर्ता को ढूँढ लेता।

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19
अ. 13 · श्लोक 19
सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।

पत्नी-भोजन-धन में सन्तोष; पठन-दान-तप में नहीं।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

6 श्लोक
2
अ. 14 · श्लोक 2
आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम्।

अपने अपराध-वृक्ष के फल — दरिद्रता, रोग, दुख, बन्ध, विपत्ति।

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6
अ. 14 · श्लोक 6
धर्माख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।

धर्म-कथा, श्मशान, रोग में जो बुद्धि उत्पन्न होती — यदि सर्वदा रहे तो कौन मुक्त न हो?

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8
अ. 14 · श्लोक 8
दानेन तपसा शौर्येण विज्ञानेन विनयेन च।

दान, तप, शूरता, विज्ञान, विनय, नीति — आश्चर्य नहीं, पृथ्वी पर बहुत रत्न हैं।

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13
अ. 14 · श्लोक 13
सजीवति गुणा यस्य धर्मो यस्य स जीवति।

गुणी जीता है, धर्मी जीता है — गुण-धर्म-हीन का जीना व्यर्थ।

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17
अ. 14 · श्लोक 17
सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहच्छिद्रं च मैथुनम्।

सिद्ध-औषध, धर्म, घर-दोष, मैथुन, कुभोजन, कुवचन — बुद्धिमान् प्रकट नहीं करता।

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19
अ. 14 · श्लोक 19
धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम्।

धर्म, धन, धान्य, गुरु-वचन, औषध — 5 शुभ रूप से ग्रहण करो, अन्यथा जीना नहीं।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

4 श्लोक
8
अ. 15 · श्लोक 8
तद्भोजनं यद्द्विजभुक्तशेषं तत्सौहृदं यत्क्रियते परस्मिन्।

द्विज-भोजन-शेष ही भोजन, दूसरों पर किया सौहृद्य ही सौहृद्य — पाप-रहित ही चतुरता, दम्भ-रहित ही धर्म।

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11
अ. 15 · श्लोक 11
दूरागतं पथिश्रान्तं वृथा च गृहमागतम्।

दूर से थका आया अतिथि — अन-पूजित खाये तो वह चाण्डाल।

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12
अ. 15 · श्लोक 12
पठन्ति चतुरो वेदान्धर्मशास्त्राण्यनेकशः।

चार वेद, अनेक शास्त्र पढ़कर भी आत्म-ज्ञान न हो — पाक-रस-अनभिज्ञ करछी समान।

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14
अ. 15 · श्लोक 14
माता च कमलादेवी पिता देवो जनार्दनः।

जिसकी माँ लक्ष्मी, पिता विष्णु, बन्धु विष्णु-भक्त — तीनों लोक उसके स्वदेश।

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

4 श्लोक
1
अ. 16 · श्लोक 1
न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये।

विधि-पूर्वक ईश्वर-पाद नहीं ध्याया, स्वर्ग-कपाट खोलने वाला धर्म नहीं अर्जित, स्वप्न में भी स्त्री-संग नहीं — मातृ-यौवन-वन के काटने वाले कुठार।

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11
अ. 16 · श्लोक 11
अतिक्लेशेन ये अर्थाः धर्मस्यातिक्रमेण च।

अत्यन्त पीड़ा से, धर्म-त्याग से, शत्रु-प्रणति से प्राप्त धन — मेरे पास नहीं।

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12
अ. 16 · श्लोक 12
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।

सामान्य वधू-तुल्य लक्ष्मी से क्या लाभ — पथिकों से भी सेवित वेश्या-तुल्य लक्ष्मी ही उत्तम।

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14
अ. 16 · श्लोक 14
क्षीयन्ते सर्वदानानि यज्ञहोमबलिक्रियाः।

सब दान, यज्ञ, होम, बलि क्षीण होते — पात्र-दान और अभय-दान कभी नहीं।

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अध्याय 17 — समापन

5 श्लोक
3
अ. 17 · श्लोक 3
यद्दूरं यदुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्।

जो दूर, दुराराध्य, बहुत दूर — सब तप से साध्य, तप-बल समान कोई नहीं।

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4
अ. 17 · श्लोक 4
लोभश्चेद्गुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः।

लोभ हो तो दूसरे दुर्गुणों से क्या, चुगली हो तो पाप से क्या, सत्य हो तो तप से क्या — सब virtues + vices interrelated।

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11
अ. 17 · श्लोक 11
पादशेषं पीतशेषं सन्ध्याशेषं तथैव च।

चरणों के बचे, पीने के बचे, संध्या के बचे जल — कुत्ते के मूत्र-समान।

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18
अ. 17 · श्लोक 18
त्यजेद्धर्मे दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।

दया-हीन धर्म, विद्या-हीन गुरु, क्रोधी पत्नी (आज: partner), स्नेह-हीन बन्धु — त्याज्य।

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19
अ. 17 · श्लोक 19
इदं चाणक्यनीतिं तु यः पठेच्छृणुयादपि।

जो चाणक्य-नीति पढ़े, सुने, या अनुसरण करे — वह देवों के पूज्य अर्थ-धर्म-कामा-सिद्धि पाता।

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