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विषय-संग्रह

⚔️ शत्रु

शत्रु-पहचान, सावधानी, दुर्जन

51श्लोक
15 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 शत्रु विषय पर चाणक्य नीति

शत्रु-पहचान — आचार्य चाणक्य के लिए यह केवल युद्ध-शास्त्र नहीं, बल्कि दैनिक जीवन-कौशल है। 51 श्लोक शत्रु के विभिन्न रूपों पर — खुले शत्रु, छिपे शत्रु, मित्र-वेषधारी शत्रु, और सबसे ख़तरनाक — स्वयं के भीतर के शत्रु (क्रोध, लोभ, अहंकार)।

चाणक्य का प्रसिद्ध तुलना-सूत्र — "सर्पात् क्रूरतरो दुर्जनः" — दुष्ट सर्प से भी अधिक क्रूर। क्योंकि सर्प तो उकसाने पर ही डँसता; दुर्जन बिना कारण भी हानि पहुँचाता। उन्होंने शत्रु-निवारण के चार उपाय बताये — साम (समझाना), दान (देकर शान्त करना), भेद (शक्ति बँटना), और दण्ड (अन्तिम उपाय)। पर सबसे महत्त्वपूर्ण — "आत्मनो जय एव परं जयः" — स्वयं पर विजय ही सर्वोच्च विजय। आधुनिक corporate politics, family disputes, और mental health के context में चाणक्य की यह दृष्टि अत्यन्त उपयोगी। पढ़िए हर श्लोक का गहन हिन्दी विश्लेषण + leadership case-studies + cognitive psychology connections।

शत्रु विषय से सम्बंधित 51 श्लोक चाणक्य नीति के 15 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

7 श्लोक
4
अ. 1 · श्लोक 4
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।

दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥

विद्वान् भी कब हारता है

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5
अ. 1 · श्लोक 5
दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।

ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥

चार मृत्यु-तुल्य स्थितियाँ

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9
अ. 1 · श्लोक 9
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः ।

पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत् ॥

पाँच आवश्यक संस्थाएँ

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10
अ. 1 · श्लोक 10
लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।

पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संगतिम् ॥

चरित्र के पाँच गुण

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12
अ. 1 · श्लोक 12
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे ।

राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥

छह कठिन क्षण

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14
अ. 1 · श्लोक 14
वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् ।

रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥

कुल और चरित्र

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16
अ. 1 · श्लोक 16
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।

अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि काञ्चनम् ॥

चार स्रोतों से ग्रहण

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अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

8 श्लोक
1
अ. 2 · श्लोक 1
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभिता।
अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥

असत्य, अविचारी साहस, छल, मूर्खता, लोभ, अपवित्रता और निर्दयता — ये सात दोष स्वभाव-जन्य हैं।

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5
अ. 2 · श्लोक 5
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥

पीठ-पीछे काम बिगाड़ने और सामने मीठा बोलने वाला मित्र — मुख पर दूध, भीतर विष का घड़ा है — उसे त्यागो।

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7
अ. 2 · श्लोक 7
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्।
मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चापि नियोजयेत्॥

मन में सोचे काम को वाणी से प्रकट न करो — मन्त्र की भाँति गुप्त रखो, गुप्त रूप से ही कार्य में लगाओ।

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8
अ. 2 · श्लोक 8
कथं चखलु मूर्खत्वं कथं चखलु यौवनम्।
कथात्कष्टतरं चैव परगेहनिवासनम्॥

मूर्खता दुखद है, युवापन भी दुखद है — पर पराये घर का वास इन दोनों से भी कठिन है।

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11
अ. 2 · श्लोक 11
माता रिपुः पिता शत्रुर्बालो याभ्यां न पाठ्यते।
सभा मध्ये न शोभन्ते हंसमध्ये बको यथा॥

जिस माता-पिता ने बालक को नहीं पढ़ाया, वे माता-शत्रु, पिता-वैरी हैं — बालक हंसों के बीच बगुले-सा अशोभ रहेगा।

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14
अ. 2 · श्लोक 14
कान्तावियोगः स्वजनापमानो ऋणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा।
दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥

छह चीज़ें बिना आग के शरीर को जलाती हैं — प्रिय-विरह, अपनों का अनादर, बचा हुआ क़र्ज़, बुरे राजा की सेवा, दरिद्रता और विषम सभा।

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19
अ. 2 · श्लोक 19
दुराचारी दुष्टदृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुंसां स तु शीघ्रं विनश्यति॥

बुरे आचरण, बुरी दृष्टि, बुरे स्थान वाले दुर्जन से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट होता है।

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20
अ. 2 · श्लोक 20
समाने शोभते प्रीतीः राज्ञि सेवा च शोभते।
वाणिज्यं व्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे॥

समान जनों में प्रीति, राजा के यहाँ सेवा, व्यवहार में व्यापार, और घर में सद्गुणी साथी — ये चारों अपने सही स्थान में शोभते हैं।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

3 श्लोक
3
अ. 3 · श्लोक 3
सत्कुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत्।
व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मेण योजयेत्॥

कन्या को सत्कुल में, पुत्र को विद्या में, शत्रु को व्यसन में, मित्र को धर्म में लगाओ।

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4
अ. 3 · श्लोक 4
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशति कालेतु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

दुर्जन और सर्प में सर्प श्रेष्ठ है, दुर्जन नहीं — सर्प तो कभी काटता है, दुर्जन पद-पद पर डंसता है।

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19
अ. 3 · श्लोक 19
उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे।
असाधुजनसम्पर्के यः पलायति जीवति॥

उपद्रव, शत्रु-आक्रमण, अकाल, भयानक स्थिति या दुर्जन-संगति में जो भाग जाता है, वही जीवित रहता है।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

3 श्लोक
5
अ. 5 · श्लोक 5
निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामो मण्डनप्रियः।
नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्पष्टवक्ता न वञ्चकः॥

इच्छा-रहित अधिकारी न बने, कामना-रहित श्रृंगारप्रिय न हो, अकुशल मीठा न बोले, स्पष्ट वक्ता ठग न हो।

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6
अ. 5 · श्लोक 6
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः।
दुर्भगानां च सुभगाः कुलटानां च कुलाङ्गनाः॥

मूर्ख पण्डितों से, निर्धन धनवानों से, अभागे भाग्यवानों से, कुलटा कुलवती-स्त्रियों से — द्वेष करते हैं।

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12
अ. 5 · श्लोक 12
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः।
नास्ति कोपसमो वह्निर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम्॥

काम-समान व्याधि, मोह-समान शत्रु, क्रोध-समान अग्नि — कोई नहीं; और ज्ञान से बढ़कर सुख कोई नहीं।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

1 श्लोक
11
अ. 6 · श्लोक 11
ऋणकर्ता पिता शत्रुर्माता च व्यभिचारिणी।
भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः॥

ऋणी पिता, व्यभिचारी माता, अति-रूपवती भार्या, अपण्डित पुत्र — चार पारिवारिक "शत्रु।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

4 श्लोक
7
अ. 7 · श्लोक 7
शकटं पञ्चहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम्।
हस्तिनं तु सहस्रेण देशत्यागेन दुर्जनम्॥

गाड़ी पाँच हाथ, घोड़ा दस, हाथी हज़ार हाथ, और दुर्जन से देश-त्याग कर दूर रहो।

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8
अ. 7 · श्लोक 8
हस्ती ह्यङ्कुशमात्रेण वाजी हस्तेन ताड्यते।
शृङ्गी लकुटहस्तेन खड्गहस्तेन दुर्जनः॥

हाथी अंकुश से, घोड़ा हाथ से, सींगवाला लाठी से, दुर्जन तलवार से वश में आता।

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9
अ. 7 · श्लोक 9
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा घनगर्जिते।
साधवः परसम्पत्तौ खलाः परविपत्तिषु॥

ब्राह्मण भोजन से, मयूर मेघ-गर्जन से, सज्जन दूसरों की सम्पत्ति से, दुष्ट दूसरों की विपत्ति से प्रसन्न होते।

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10
अ. 7 · श्लोक 10
अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्बलम्।
आत्मतुल्यबलं शत्रुं विनयेन बलेन वा॥

बली से अनुकूल, दुर्बल से प्रतिकूल, समान से विनय या बल से — जीतो।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

1 श्लोक
23
अ. 8 · श्लोक 23
अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनश्च ऋत्विजः।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः॥

अन्न-हीन यज्ञ राज्य को, मन्त्र-हीन ऋत्विज को, दान-हीन यजमान को जलाता — यज्ञ-सम कोई शत्रु नहीं।

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अध्याय 9 — मुक्ति और क्षमा

5 श्लोक
2
अ. 9 · श्लोक 2
परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः। त एव विलयं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत्॥

जो परस्पर के मर्म प्रकाशित करते — वे नराधम वल्मीक के सर्प की भाँति स्वयं नष्ट।

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3
अ. 9 · श्लोक 3
गन्धः सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे नाकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य। विद्वान्धनी भूपतिदीर्घजीवी विधातुरासीन्न मनस्यभीष्टम्॥

सोने में गन्ध, ईख में फल, चन्दन में पुष्प नहीं — विद्वान् धनी, राजा चिर-जीवी नहीं हुए।

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7
अ. 9 · श्लोक 7
अहिं नृपं च शार्दूलं किटिं च बालकं तथा। परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत्॥

सर्प, राजा, शार्दूल, सूकर, बालक, पराये कुत्ते, मूर्ख — 7 सोते हों तो न जगाओ।

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8
अ. 9 · श्लोक 8
अर्थाधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनः। ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः॥

जिन्होंने केवल धन के लिए वेद पढ़ा — वे विष-हीन सर्प के समान निरुपयोगी।

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10
अ. 9 · श्लोक 10
निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा। विषमस्तु न चाप्यस्तु फटाटोपो भयङ्करः॥

विष-हीन साँप को भी फणा बड़ी रखनी चाहिए — विष हो या न, फणा का आडम्बर डरावना।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

3 श्लोक
6
अ. 10 · श्लोक 6
लुब्धानां याचकः शत्रुर्मूर्खाणां बोधको रिपुः। जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चौराणां चन्द्रमा रिपुः॥

लोभी का याचक, मूर्ख का बोधक, जार-स्त्री का पति, चोर का चन्द्रमा — शत्रु।

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10
अ. 10 · श्लोक 10
दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले। अपानं शुचि इन्द्रियं नहि सौगन्ध्यलेपनैः॥

दुर्जन को सज्जन बनाने का उपाय नहीं — अपान-इन्द्रिय हज़ार सुगन्धों से शुद्ध नहीं होती।

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11
अ. 10 · श्लोक 11
आत्मद्वेषाद्भवेन्मृत्युः परद्वेषाद्धनक्षयः। राजद्वेषाद्भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः॥

आत्म-द्वेष से मृत्यु, पर-द्वेष से धन-क्षय, राज-द्वेष से नाश, ब्रह्म-द्वेष से कुल-क्षय।

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

4 श्लोक
6
अ. 11 · श्लोक 6
न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः। आमूलसिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति॥

दुर्जन साधु-दशा नहीं पाता, दूध-घी से सींचने पर भी निम्ब-वृक्ष में मधुरता नहीं आती।

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7
अ. 11 · श्लोक 7
अन्तर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि। न शुध्यति यथा भाण्डं सुराया दाहितं च तत्॥

मन-मलिन दुष्ट तीर्थ-स्नानों से शुद्ध नहीं — मद्य-पात्र जलाने पर भी शुद्ध नहीं।

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14
अ. 11 · श्लोक 14
लाक्षादितैलनीलीनां कौसुम्भमधुसर्पिषाम्। विक्रेता मद्यमांसानां विप्रः शूद्र इति स्मृतः॥

लाक्षा, तेल, नील, कुसुम, मधु, घी, मद्य, मांस बेचने वाला विप्र — "शूद्र।

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15
अ. 11 · श्लोक 15
परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः। छली द्वेषी मृदुः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते॥

दूसरों का काम बिगाड़ने वाला, दम्भी, स्वार्थी, छली, द्वेषी, बाहर मृदु भीतर क्रूर विप्र — "मार्जार" (बिल्ली)।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

3 श्लोक
3
अ. 12 · श्लोक 3
दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने।

स्वजन में दाक्षिण्य, परजन में दया, दुर्जन में शाठ्य — context-specific behavior।

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7
अ. 12 · श्लोक 7
सत्सङ्गाद्भवति हि साधुता खलानां साधूनां न हि खलसङ्गतः खलत्वम्।

सत्संग से दुर्जन में साधुता, पर सत्संग में दुर्जन का प्रभाव सज्जन पर नहीं — मिट्टी फूल को सुगन्धित कर सकती, फूल मिट्टी को नहीं।

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23
अ. 12 · श्लोक 23
वयसः परिणामेऽपि यः खलः खल एव सः।

बूढ़े होने पर भी खल खल ही — पकी हुई ईख भी मीठी नहीं होती।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

4 श्लोक
4
अ. 14 · श्लोक 4
बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः।

अनेक मिलकर शत्रु जीतते — तृण-समूह बाँध को मेघ-धारा रोकता।

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5
अ. 14 · श्लोक 5
जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।

जल में तेल, खल को गुप्त बात, पात्र को दान, शास्त्र पंडित को — स्वभाव से फैलते।

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12
अ. 14 · श्लोक 12
अग्निरापः स्त्रियो मूर्खाः सर्पा राजकुलानि च।

अग्नि, जल, स्त्री, मूर्ख, सर्प, राजकुल — सावधानी से सेवनीय, ये 6 शीघ्र प्राण-हरते।

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20
अ. 14 · श्लोक 20
त्यजेद्दुर्जनसंसर्गं भजेत्साधुसमागमम्।

दुर्जन-संग त्यागो, साधु-संग भजो — दिन-रात पुण्य करो, संसार अनित्य स्मरण रखो।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

1 श्लोक
3
अ. 15 · श्लोक 3
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।

खल और काँटे — दोनों के दो उपाय: मुख तोड़ो या दूर से बच कर निकल जाओ।

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

2 श्लोक
4
अ. 16 · श्लोक 4
कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः।

धन पाकर कौन गर्व-रहित, विषयों के दुख किसे नहीं, स्त्रियाँ किसका मन-खंडित नहीं किया — समय किसका मित्र, याचक को कौन गौरव देता, खल के जाल में कौन नहीं फँसा।

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11
अ. 16 · श्लोक 11
अतिक्लेशेन ये अर्थाः धर्मस्यातिक्रमेण च।

अत्यन्त पीड़ा से, धर्म-त्याग से, शत्रु-प्रणति से प्राप्त धन — मेरे पास नहीं।

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अध्याय 17 — समापन

2 श्लोक
2
अ. 17 · श्लोक 2
कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्धिंसने प्रतिहिंसनम्।

उपकार का प्रत्युपकार, हिंसा का प्रतिहिंसा — दुष्ट के साथ दुष्टता निर्दोष।

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8
अ. 17 · श्लोक 8
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायाश्च मस्तके।

सर्प के दाँत, मक्खी के सिर, बिच्छू के पूँछ — पर दुर्जन के सब अंग में विष।

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