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विषय-संग्रह

🧠 बुद्धि

विवेक, मेधा, चिन्तन

71श्लोक
15 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 बुद्धि विषय पर चाणक्य नीति

बुद्धि — चाणक्य के 64 श्लोक विवेक, चिन्तन, और निर्णय-शक्ति पर। उनकी दृष्टि में बुद्धि शिक्षा-अर्जित नहीं, अभ्यास-निर्मित। शिक्षा से सूचना मिलती; बुद्धि अनुभव + सत्संग + ध्यान से विकसित होती।

चाणक्य ने बुद्धि के पाँच लक्षण बताये — (1) दीर्घ-दर्शिता (long-term thinking) (2) विवेक (right-wrong discrimination) (3) विश्लेषण (cause-effect analysis) (4) निर्णय (timely decision) (5) आत्म-नियन्त्रण (impulse control)। उनका कड़ा सूत्र — "बुद्धिः कर्मानुसारिणी" — बुद्धि कर्मानुसार चलती; यानी जैसी आदतें — वैसी बुद्धि बनती। पर सबसे महत्त्वपूर्ण — "बुद्धिर्बुद्धिमतां कस्य न चलति आपदाम्" — बुद्धिमान् की बुद्धि भी आपत्ति में अस्थिर हो सकती; इसलिए बुद्धि-संरक्षण की जरूरत भी है। आज cognitive psychology, decision science, और metacognition research चाणक्य की इन प्राचीन insights की वैज्ञानिक पुष्टि करते। प्रत्येक श्लोक — मूल पाठ + decision-making frameworks + neuroscience of executive function।

बुद्धि विषय से सम्बंधित 71 श्लोक चाणक्य नीति के 15 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

2 श्लोक
10
अ. 3 · श्लोक 10
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥

कुल के लिये एक, गाँव के लिए कुल, देश के लिए गाँव, और आत्मा के लिए पृथ्वी छोड़ देनी चाहिए।

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11
अ. 3 · श्लोक 11
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौनेन कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥

उद्यम से दरिद्रता, जप से पाप, मौन से कलह, और जागृति से भय नष्ट हो जाते हैं।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

2 श्लोक
18
अ. 4 · श्लोक 18
कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कस्याहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः॥

समय, मित्र, देश, आय-व्यय, मैं कौन, मेरी शक्ति — इन छह बातों पर निरन्तर विचार करो।

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19
अ. 4 · श्लोक 19
अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिमास्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्॥

द्विजों के देव अग्नि, मुनियों के हृदय में, अल्पबुद्धियों के मूर्ति में, और समदर्शियों के सर्वत्र देव हैं।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

7 श्लोक
2
अ. 5 · श्लोक 2
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥

घिसना, काटना, तपाना, पीटना — चार से सोना; त्याग, शील, गुण, कर्म — चार से मनुष्य परखा जाता है।

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3
अ. 5 · श्लोक 3
तावद्भयेषु भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशङ्कया॥

जब तक भय न आया, तब तक डरो — पर भय आ जाये तो बिना संशय प्रहार करो।

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5
अ. 5 · श्लोक 5
निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामो मण्डनप्रियः।
नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्पष्टवक्ता न वञ्चकः॥

इच्छा-रहित अधिकारी न बने, कामना-रहित श्रृंगारप्रिय न हो, अकुशल मीठा न बोले, स्पष्ट वक्ता ठग न हो।

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10
अ. 5 · श्लोक 10
अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा।
अन्यथा वदतो दृष्टा यश्शान्तस्तस्य पूज्यता॥

वेद-पाण्डित्य अन्यथा, शास्त्र-आचार अन्यथा, बोलने वाले अन्यथा — पर जो शान्त है वही पूज्य।

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18
अ. 5 · श्लोक 18
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥

निर्धन धन, चौपाये वाणी, मनुष्य स्वर्ग, देवता मोक्ष — चाहते हैं।

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20
अ. 5 · श्लोक 20
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीविते मन्दिरे।
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥

लक्ष्मी चंचल, प्राण चंचल, जीवन-घर चंचल — इस चराचर संसार में एक धर्म ही निश्चल।

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21
अ. 5 · श्लोक 21
नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः।
चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥

मनुष्यों में नापित (नाई), पक्षियों में कौवा, चौपायों में सियार, स्त्रियों में मालिनी — सबसे धूर्त।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

4 श्लोक
1
अ. 6 · श्लोक 1
श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥

सुनकर धर्म जाने, दुर्बुद्धि त्यागे, ज्ञान पाये, मोक्ष पाये — श्रवण-शक्ति का चतुर्विध फल।

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3
अ. 6 · श्लोक 3
भस्मना शुध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्ध्यति।
रजसा शुद्ध्यते नारी नदी वेगेन शुद्ध्यति॥

कांसा भस्म से, ताम्बा अम्ल से, स्त्री रजस्वला से, नदी वेग से शुद्ध होती।

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6
अ. 6 · श्लोक 6
तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥

जैसी भवितव्यता, वैसी बुद्धि उत्पन्न होती, वैसा ही व्यवसाय, वैसे ही सहायक मिलते।

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22
अ. 6 · श्लोक 22
य एतान्विंशतिगुणानाचरिष्यति मानवः।
कार्यावस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति॥

जो मनुष्य इन बीस गुणों को आचरण में लाये — हर परिस्थिति में अजेय हो जायेगा।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

6 श्लोक
1
अ. 7 · श्लोक 1
अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणीचरितानि च।
नीचवाक्यं चापमानं मतिमान्न प्रकाशयेत्॥

धन-नाश, मन-संताप, गृहिणी-चरित्र, नीच-वाक्य, अपमान — पाँच बातें बुद्धिमान् प्रकट न करे।

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6
अ. 7 · श्लोक 6
पादाभ्यां न स्पृशेदग्निं गुरुं ब्राह्मणमेव च।
नैव गां न कुमारीं च न वृद्धं न शिशुं तथा॥

अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गाय, कुमारी, वृद्ध, बालक — सात को पैरों से न छूओ।

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13
अ. 7 · श्लोक 13
यत्रोदकं तत्र वसन्ति हंसाः तथैव शुष्कं परिवर्जयन्ति।
न हंसतुल्येन नरेण भाव्यं पुनस्त्यजन्ति पुनराश्रयन्ते॥

जहाँ पानी, वहाँ हंस — सूखे को त्यागते।

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18
अ. 7 · श्लोक 18
गम्यते यदि मृगेन्द्रमन्दिरं लभ्यते करिकपोलमौक्तिकम्।
जम्बुकालयगते च लभ्यते वत्सपुच्छखरचर्मखण्डनम्॥

सिंह की गुफ़ा में जाओ तो हाथी का मोती मिलेगा।

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20
अ. 7 · श्लोक 20
वाचां शौचं च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
सर्वभूतदयाशौचमेतच्छौचं परार्थिनाम्॥

वाणी-शुद्धि, मन-शुद्धि, इन्द्रिय-निग्रह, सर्व-दया — परार्थियों की चार शुद्धियाँ।

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21
अ. 7 · श्लोक 21
पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्यात्मानं विवेकतः॥

पुष्प में गन्ध, तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, दूध में घी, ईख में गुड़ — वैसे ही देह में आत्मा को विवेक से देखो।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

6 श्लोक
1
अ. 8 · श्लोक 1
अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥

अधम केवल धन, मध्यम धन और मान, उत्तम केवल मान चाहते — मान ही महान् पुरुषों का धन।

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3
अ. 8 · श्लोक 3
दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्षयेन्नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥

दीप अन्धकार खाता और काजल पैदा करता है — जैसा अन्न खाओगे वैसी सन्तति।

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4
अ. 8 · श्लोक 4
वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र देहि क्वचित्।
प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुखे माधुर्यवद्भूतले॥

गुणवानों को धन दो, अन्यत्र नहीं — समुद्र का जल बादल में मीठा होकर पृथ्वी पर गिरता है।

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8
अ. 8 · श्लोक 8
हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाज्ञानतो नरः।
हतं निर्णायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः॥

क्रिया-हीन ज्ञान नष्ट, अज्ञानी मनुष्य नष्ट, नायक-हीन सेना नष्ट, पति-हीन स्त्री (आज: support-less individual) नष्ट।

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11
अ. 8 · श्लोक 11
काष्ठपाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्।
श्रद्धया च तथा सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसादतः॥

काठ-पाषाण-धातु की भी भाव+श्रद्धा से सेवा करने पर विष्णु-कृपा से सिद्धि।

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22
अ. 8 · श्लोक 22
मांसभक्षैः सुरापानैर्मूर्खैश्चाक्षरवर्जितैः।
पशुभिः पुरुषाकारैर्भाराक्रान्ता हि मेदिनी॥

मांस-भक्षी, सुरापान-कर्ता, मूर्ख, अक्षर-वर्जित — ये "human-shaped पशु" पृथ्वी को बोझिल करते।

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अध्याय 9 — मुक्ति और क्षमा

4 श्लोक
3
अ. 9 · श्लोक 3
गन्धः सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे नाकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य। विद्वान्धनी भूपतिदीर्घजीवी विधातुरासीन्न मनस्यभीष्टम्॥

सोने में गन्ध, ईख में फल, चन्दन में पुष्प नहीं — विद्वान् धनी, राजा चिर-जीवी नहीं हुए।

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11
अ. 9 · श्लोक 11
प्रातः द्यूतप्रसङ्गेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसङ्गतः। रात्रौ चौरप्रसङ्गेन कालो गच्छति धीमताम्॥

बुद्धिमानों का काल — प्रात: जुआ-कथा (महाभारत), मध्याह्न स्त्री-कथा (रामायण), रात्रि चोर-कथा (भागवत) से बीतता।

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12
अ. 9 · श्लोक 12
स्वहस्तग्रथिता माला स्वहस्तघृष्टचन्दनम्। स्वहस्तलिखितं स्तोत्रं शक्रस्यापि श्रियं हरेत्॥

अपने हाथ से बनी माला, चन्दन, स्तोत्र — इन्द्र की भी श्री हर सकते।

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15
अ. 9 · श्लोक 15
धर्मार्थ काममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। जन्म जन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — एक भी न हो तो जन्म-जन्म केवल मरण।

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अध्याय 10 — विद्या-धन

3 श्लोक
2
अ. 10 · श्लोक 2
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्। शास्त्रपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत्॥

दृष्टि से शुद्ध भूमि पर पैर रखो, वस्त्र से छाना जल पियो, शास्त्र-शुद्ध वाक्य बोलो, मन-शुद्ध आचरण करो।

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7
अ. 10 · श्लोक 7
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

जिनमें न विद्या, न तप, न दान, न ज्ञान, न शील, न गुण, न धर्म — वे पृथ्वी के बोझ, मनुष्य-रूप में पशु।

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9
अ. 10 · श्लोक 9
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्। लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥

जिसमें स्वयं प्रज्ञा न हो — शास्त्र क्या करेगा?

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अध्याय 11 — दान, धैर्य, वर्ण-कर्म

4 श्लोक
3
अ. 11 · श्लोक 3
हस्ती स्थूलतनुः स चाङ्कुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः। दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमात्रं तमः। वज्रेणाभिहताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रो गिरिः। तेजो यस्य विराजते स बलवान् स्थूलेषु कः प्रत्ययः॥

हाथी विशाल पर अंकुश से वश — अंकुश हस्ती-मात्र नहीं।

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7
अ. 11 · श्लोक 7
अन्तर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि। न शुध्यति यथा भाण्डं सुराया दाहितं च तत्॥

मन-मलिन दुष्ट तीर्थ-स्नानों से शुद्ध नहीं — मद्य-पात्र जलाने पर भी शुद्ध नहीं।

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12
अ. 11 · श्लोक 12
एकाहारेण सन्तुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा। ऋतुकालाभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते॥

एक-समय भोजन से सन्तुष्ट, षट्-कर्म-निरत, ऋतु-काल मर्यादित — वह "द्विज।

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16
अ. 11 · श्लोक 16
वापीकूपतडागानामारामसुरवेश्मनाम्। उच्छेदने निराशङ्कः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते॥

बावली, कुँआ, तालाब, उद्यान, देवालय — को नष्ट करने में निडर — "म्लेच्छ-विप्र।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

4 श्लोक
13
अ. 12 · श्लोक 13
निमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः।

ब्राह्मण को निमन्त्रण, गौ को नवीन घास, मेरा "उत्सव" हे कृष्ण — आपका दर्शन।

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19
अ. 12 · श्लोक 19
अनालोक्य व्ययं कर्ता अनाथः कलहप्रियः।

विचार-हीन व्यय, सहायक-हीन कलह-प्रिय, सब जातियों की स्त्रियों से सम्बन्ध — पुरुष शीघ्र नष्ट।

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20
अ. 12 · श्लोक 20
नाहारं चिन्तयेत्प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।

पण्डित को आहार-चिन्ता नहीं — धर्म-चिन्ता।

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अध्याय 13 — मुहूर्त-जीवन

7 श्लोक
5
अ. 13 · श्लोक 5
अहो वत विचित्राणि चरितानि महात्मनाम्।

महात्माओं के चरित्र अद्भुत — लक्ष्मी को तृण-समान मानते, मिल जाये तो भारी विनम्र हो जाते।

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7
अ. 13 · श्लोक 7
अनागत विधाता च प्रत्युत्पन्न मतिस्तथा।

भविष्य-नियोजक और तत्क्षण-बुद्धिमान् — दोनों सुखी, भाग्य-निर्भर डूब जाता।

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9
अ. 13 · श्लोक 9
जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्।

धर्म-रहित जीवित मृत-समान, धर्मी मरकर भी चिर-जीवी।

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12
अ. 13 · श्लोक 12
बन्धाय विषयासङ्गो मुक्त्यै निर्विषयं मनः।

विषयासक्ति बन्ध, विषय-रहित मन मुक्ति — दोनों का कारण मन।

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13
अ. 13 · श्लोक 13
देहाभिमाने गलिते ज्ञानेन परमात्मनः।

देह-अभिमान galit होने पर — मन जहाँ जाये, वहाँ समाधि।

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18
अ. 13 · श्लोक 18
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।

फल कर्म पर निर्भर, बुद्धि कर्म-अनुसार — विवेकी lekin विचार से कार्य करते।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

8 श्लोक
1
अ. 14 · श्लोक 1
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।

पृथ्वी पर तीन रत्न — जल, अन्न, सुभाषित।

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3
अ. 14 · श्लोक 3
पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।

धन, मित्र, भार्या, पृथ्वी फिर मिल सकते — पर मनुष्य-देह नहीं।

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5
अ. 14 · श्लोक 5
जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।

जल में तेल, खल को गुप्त बात, पात्र को दान, शास्त्र पंडित को — स्वभाव से फैलते।

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6
अ. 14 · श्लोक 6
धर्माख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।

धर्म-कथा, श्मशान, रोग में जो बुद्धि उत्पन्न होती — यदि सर्वदा रहे तो कौन मुक्त न हो?

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7
अ. 14 · श्लोक 7
उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी।

पश्चात्ताप में जो बुद्धि — वही पूर्व में हो तो किसे समृद्धि नहीं?

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9
अ. 14 · श्लोक 9
दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः।

जो मन में बसे — वह दूर भी नहीं, जो मन में नहीं — पास भी दूर।

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14
अ. 14 · श्लोक 14
यदीच्छसि वशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा।

एक कर्म से जगत् वश में चाहो — 15 इन्द्रिय-मुखों से मन का निवारण करो।

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17
अ. 14 · श्लोक 17
सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहच्छिद्रं च मैथुनम्।

सिद्ध-औषध, धर्म, घर-दोष, मैथुन, कुभोजन, कुवचन — बुद्धिमान् प्रकट नहीं करता।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

2 श्लोक
1
अ. 15 · श्लोक 1
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु।

जिसका चित्त सब प्राणियों पर दया से द्रवीभूत — उसको ज्ञान, मोक्ष, जटा, भस्म से क्या?

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16
अ. 15 · श्लोक 16
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।

जिसमें बुद्धि, उसी में बल — निर्बुद्धि का बल कहाँ?

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

8 श्लोक
2
अ. 16 · श्लोक 2
जल्पन्ति साधुमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः।

स्त्री किसी और से बात करे, किसी और को देखे, किसी और से प्रेम करे — एक पुरुष पर रति नहीं।

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3
अ. 16 · श्लोक 3
यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।

जो मोह से मानता "यह स्त्री मुझ पर मुग्ध" — वह उसके वश में, खेल-पक्षी समान नाचता।

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4
अ. 16 · श्लोक 4
कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः।

धन पाकर कौन गर्व-रहित, विषयों के दुख किसे नहीं, स्त्रियाँ किसका मन-खंडित नहीं किया — समय किसका मित्र, याचक को कौन गौरव देता, खल के जाल में कौन नहीं फँसा।

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5
अ. 16 · श्लोक 5
न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरङ्गी।

सोने की मृगी किसी ने बनायी न देखी न सुनी — फिर भी रघुनाथ ने तृष्णा की।

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6
अ. 16 · श्लोक 6
गुणैरुत्तमतां यान्ति नोच्चैरासनसंस्थिताः।

गुणों से उत्तमता, ऊँचे आसन से नहीं — ऊँचे कोठे पर बैठा कौवा गरुड़ नहीं।

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8
अ. 16 · श्लोक 8
परस्तुतगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्।

जिसके गुण दूसरे प्रशंसा करें — वह निर्गुण भी गुणी।

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9
अ. 16 · श्लोक 9
विवेकिनमनुप्राप्ता गुणा यान्ति मनोज्ञताम्।

विवेकी को प्राप्त गुण सुन्दरता पाते — रत्न-घनी सोने में जड़ी मणि अति-शोभित।

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17
अ. 16 · श्लोक 17
पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।

पुष्प में गन्ध, तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, दूध में घी, ईख में गुड़ — वैसे देह में आत्मा।

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अध्याय 17 — समापन

4 श्लोक
7
अ. 17 · श्लोक 7
नान्नोदकसमं दानं न तिथिर्द्वादशी समा।

अन्न-जल-समान दान, द्वादशी-समान तिथि, गायत्री-समान मन्त्र, माता-समान देवता — कोई नहीं।

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11
अ. 17 · श्लोक 11
पादशेषं पीतशेषं सन्ध्याशेषं तथैव च।

चरणों के बचे, पीने के बचे, संध्या के बचे जल — कुत्ते के मूत्र-समान।

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14
अ. 17 · श्लोक 14
सद्यः प्रज्ञाहरा तुण्डी सद्यः प्रज्ञाकरी वचा।

कुन्दरू बुद्धि हरती, वच बुद्धि देती, स्त्री शक्ति हरती, दूध शक्ति देती।

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15
अ. 17 · श्लोक 15
यदीच्छेद्रामसदृशं सद्गुणैरुपलक्षितम्।

राम-सदृश सद्गुणी पुत्र चाहो — कौसल्या-तुल्य पवित्र-मन-पत्नी होनी चाहिए।

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