📜 मित्र विषय पर चाणक्य नीति
चाणक्य ने मित्र के तीन प्रकार बताये — स्वार्थ-मित्र (केवल लाभ के लिए), समान-मित्र (बराबरी का सम्बन्ध), और सहधर्म-मित्र (एक ही धर्म-पथ के साथी)। उनका सूक्ष्म चेतावनी-सूत्र — "विषकुम्भं पयोमुखम्" — ऊपर दूध, भीतर विष; ऐसे मीठे-बोलने वाले दुर्जन-मित्रों से सावधान। मित्र-चयन में पाँच मापदण्ड दिए — कुल, शील, गुप्तता-निर्वाह, संकट-काल का व्यवहार, और बोलने-सुनने की ईमानदारी। आज corporate alliances, life-partners, और family relations — सबमें यही सिद्धान्त लागू। हर श्लोक का 1905 ख़ेमराज मूल पाठ + विस्तृत हिन्दी अर्थ + corporate / family / personal उदाहरण + neuroscience perspective।
मित्र विषय से सम्बंधित 50 श्लोक चाणक्य नीति के 12 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।
अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र
9 श्लोकअधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः । धर्मोपदेशविख्यातं कार्याकार्यं शुभाशुभम् ॥
सही-गलत का विवेक
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च । दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥
विद्वान् भी कब हारता है
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः । ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥
चार मृत्यु-तुल्य स्थितियाँ
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः । न च विद्यागमः कश्चित् न तं देशं समाश्रयेत् ॥
चार आवश्यक तत्त्व
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता । पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संगतिम् ॥
चरित्र के पाँच गुण
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे । मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥
चार सम्बन्धों की पहचान
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥
छह कठिन क्षण
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां शृङ्गिणां तथा । विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥
छह जिन पर अंधा विश्वास न करें
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् । अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि काञ्चनम् ॥
चार स्रोतों से ग्रहण
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण
12 श्लोकभोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वराङ्गना। विभवो दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपसः फलम्॥
छह सुख — भोजन, पाचन, सुन्दर साथी, रति-शक्ति, वैभव और दान-सामर्थ्य — थोड़े तप का फल नहीं हैं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी। विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहैव हि॥
आज्ञाकारी पुत्र, अनुकूल पत्नी और अपनी संपदा में सन्तोष — इन तीन का स्वर्ग यहीं है।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥
पुत्र-पिता-मित्र-पत्नी — चारों की कसौटी कर्तव्य और भाव से मापी जाती है, सम्बन्ध-नाम से नहीं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥
पीठ-पीछे काम बिगाड़ने और सामने मीठा बोलने वाला मित्र — मुख पर दूध, भीतर विष का घड़ा है — उसे त्यागो।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत्। कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वगुह्यं प्रकाशयेत्॥
बुरे मित्र पर तो विश्वास न करो, अच्छे मित्र पर भी अति विश्वास न करो — क्योंकि कुपित होने पर वह सब रहस्य खोल देगा।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे। साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥
हर पर्वत पर माणिक्य नहीं, हर हाथी में मोती नहीं, हर वन में चन्दन नहीं — वैसे ही साधु भी सर्वत्र नहीं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः। नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥
पुत्रों को अनेक प्रकार के शीलों में निरन्तर लगाओ — नीतिज्ञ और शीलवान् पुत्र ही कुल में पूजे जाते हैं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →कान्तावियोगः स्वजनापमानो ऋणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा। दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥
छह चीज़ें बिना आग के शरीर को जलाती हैं — प्रिय-विरह, अपनों का अनादर, बचा हुआ क़र्ज़, बुरे राजा की सेवा, दरिद्रता और विषम सभा।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजाभग्नं नृपं त्यजेत्। खगा वीतफलं वृक्षं भुक्ता अभ्यागता गृहम्॥
वेश्या निर्धन को, प्रजा भग्न राजा को, पक्षी फल-हीन वृक्ष को, अतिथि भोजन के बाद गृह को — स्वार्थ-पूर्ण लोग प्रयोजन-समाप्ति पर तुरन्त त्याग देते हैं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्। प्राप्तविद्या गुरुं शिष्या दग्धारण्यं मृगास्तथा॥
दक्षिणा लेकर ब्राह्मण यजमान को, विद्या लेकर शिष्य गुरु को, और जलते वन को मृग — तीनों तुरन्त त्याग देते हैं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →दुराचारी दुष्टदृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः। यन्मैत्री क्रियते पुंसां स तु शीघ्रं विनश्यति॥
बुरे आचरण, बुरी दृष्टि, बुरे स्थान वाले दुर्जन से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट होता है।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →समाने शोभते प्रीतीः राज्ञि सेवा च शोभते। वाणिज्यं व्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे॥
समान जनों में प्रीति, राजा के यहाँ सेवा, व्यवहार में व्यापार, और घर में सद्गुणी साथी — ये चारों अपने सही स्थान में शोभते हैं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक
5 श्लोककस्य दोषः कुलेनास्ति व्याधिना केन पीडिताः। व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्॥
किसके कुल में दोष नहीं?
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →सत्कुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत्। व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मेण योजयेत्॥
कन्या को सत्कुल में, पुत्र को विद्या में, शत्रु को व्यसन में, मित्र को धर्म में लगाओ।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः। सर्पो दशति कालेतु दुर्जनस्तु पदे पदे॥
दुर्जन और सर्प में सर्प श्रेष्ठ है, दुर्जन नहीं — सर्प तो कभी काटता है, दुर्जन पद-पद पर डंसता है।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्। आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥
राजा कुलीनों का संग्रह इसलिए करते हैं क्योंकि वे आदि-मध्य-अन्त किसी भी अवस्था में राजा को नहीं छोड़ते।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →लालयेत्पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥
पाँच वर्ष तक लाड़, दस वर्ष तक अनुशासन, सोलह के बाद मित्र-व्यवहार — पुत्र-पालन का तीन-चरण सूत्र।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय
5 श्लोकसाधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः। ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥
साधुजनों से दूर हो जाने वाले पुत्र-मित्र-बन्धु निरर्थक हैं — जो उनके साथ चलें, उनसे ही कुल सुकृती बनता है।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →संसारतापदग्धानां त्रयो विश्रामहेतवः। अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च॥
संसार-ताप से जले हुए लोगों के तीन विश्राम हैं — सन्तान, पत्नी और सत्संगति।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः। चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभीरणम्॥
तप एक, पठन दो, गायन तीन, यात्रा चार, खेती पाँच और युद्ध बहुत लोगों के साथ — हर कार्य का अपना group-size है।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्तु बान्धवाः। मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता॥
सन्तान-हीन का घर, बन्धु-हीन की दिशा, मूर्ख का हृदय शून्य — पर दरिद्रता तो सर्व-शून्य है।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ। कस्याहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः॥
समय, मित्र, देश, आय-व्यय, मैं कौन, मेरी शक्ति — इन छह बातों पर निरन्तर विचार करो।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य
2 श्लोकविद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥
विदेश में विद्या, घर में पत्नी, रोगी को औषधि, मरे को धर्म — मित्र हैं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च। पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥
राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, सास, अपनी माँ — ये पाँच माँ-समान।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण
4 श्लोकयस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः। यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥
जिसके पास धन, उसके मित्र-बन्धु, उसी की समाज में पहचान, उसी को विद्वान् माना जाता।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः। सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥
जैसी भवितव्यता, वैसी बुद्धि उत्पन्न होती, वैसा ही व्यवसाय, वैसे ही सहायक मिलते।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्। वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदाराः॥
कुराज से राज्य न हो, कुमित्र से मित्र न हो, कुशिष्य से शिष्य न हो, कुदार से दारा (पत्नी) न हो — श्रेष्ठ।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिर्वृतिः। कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥
कुराज से सुख नहीं, कुमित्र से शान्ति नहीं, कुदार से घर-सुख नहीं, कुशिष्य से यश नहीं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता
1 श्लोकयस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः। यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च जीवति॥
जिसके पास धन — उसके मित्र, बन्धु, सामाजिक पहचान, और जीवन।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव
1 श्लोकवृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्तगतं धनम्। भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः॥
वृद्धावस्था में पत्नी की मृत्यु, बन्धुओं के हाथ में धन, परवशता का भोजन — तीन सबसे बड़ी विडम्बनाएँ।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम
4 श्लोकसानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियालापिनी।
आनन्द-युक्त घर, बुद्धिमान् पुत्र, मधुर-भाषिणी पत्नी — गृहस्थाश्रम धन्य।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।
सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शान्ति पत्नी, क्षमा पुत्र — मेरे 6 बन्धु।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दानेषु सत्साहसः।
धर्म-तत्परता, मुख-मधुरता, दान-साहस, मित्र-निश्छलता, गुरु-नम्रता, मनो-गम्भीरता, आचार-पवित्रता, गुण-रसिकता, शास्त्र-विज्ञता, रूप-सुन्दरता, शिव-भक्ति — हे राघव, आपमें ये सब।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
विद्या विदेश में, पत्नी घर में, औषधि रोग में, धर्म मरण में — मित्र।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न
2 श्लोकपुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।
धन, मित्र, भार्या, पृथ्वी फिर मिल सकते — पर मनुष्य-देह नहीं।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य ब्रूयात्सदा प्रियम्।
प्रिय चाहो तो प्रिय बोलो — व्याध मृग-वध के लिए मधुर गाता।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 15 — दया-चित्त
2 श्लोकत्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च।
धन-हीन को मित्र, पत्नी, सेवक, सुहृद छोड़ देते — फिर धनी होते ही लौट आते।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →एकवृक्षसमारूढा नानावर्णा विहंगमाः।
अनेक रंग के पक्षी एक वृक्ष पर — प्रभात में 10 दिशाओं को उड़ जाते — फिर शोक क्या?
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →अध्याय 16 — गुण-शोभा
3 श्लोककोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः।
धन पाकर कौन गर्व-रहित, विषयों के दुख किसे नहीं, स्त्रियाँ किसका मन-खंडित नहीं किया — समय किसका मित्र, याचक को कौन गौरव देता, खल के जाल में कौन नहीं फँसा।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →परस्तुतगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्।
जिसके गुण दूसरे प्रशंसा करें — वह निर्गुण भी गुणी।
📖 पूरा श्लोक पढ़ें →गुणैः सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः।
गुणों में सर्वज्ञ-तुल्य भी अकेला निराश्रित दुख पाये — अनर्घ्य माणि भी सोने के सहारे की अपेक्षा।
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