VastuGuruji सही वास्तु · खुशहाल जीवन
विषय-संग्रह

🤝 मित्र

सच्चे मित्र, संगति, विश्वास

50श्लोक
12 / 17अध्याय
📚 Cross-नavविषय-दर्शन

📜 मित्र विषय पर चाणक्य नीति

मित्र — चाणक्य की दृष्टि में जीवन का सबसे मूल्यवान सम्बन्ध, परन्तु सबसे ख़तरनाक भी। आचार्य ने 46 श्लोक मित्र-पहचान और संरक्षण पर लिखे। उनके अनुसार सच्चे मित्र की परख आपत्ति-काल में होती है — "विपत्तौ परीक्षेत मित्रम्"। सुख में सब निकट आते, दुख में सच्चे टिकते।

चाणक्य ने मित्र के तीन प्रकार बताये — स्वार्थ-मित्र (केवल लाभ के लिए), समान-मित्र (बराबरी का सम्बन्ध), और सहधर्म-मित्र (एक ही धर्म-पथ के साथी)। उनका सूक्ष्म चेतावनी-सूत्र — "विषकुम्भं पयोमुखम्" — ऊपर दूध, भीतर विष; ऐसे मीठे-बोलने वाले दुर्जन-मित्रों से सावधान। मित्र-चयन में पाँच मापदण्ड दिए — कुल, शील, गुप्तता-निर्वाह, संकट-काल का व्यवहार, और बोलने-सुनने की ईमानदारी। आज corporate alliances, life-partners, और family relations — सबमें यही सिद्धान्त लागू। हर श्लोक का 1905 ख़ेमराज मूल पाठ + विस्तृत हिन्दी अर्थ + corporate / family / personal उदाहरण + neuroscience perspective।

मित्र विषय से सम्बंधित 50 श्लोक चाणक्य नीति के 12 अध्यायों में फैले हुए हैं — नीचे अध्याय-क्रम से देखें।

अध्याय 1 — मंगलाचरण और मूल सूत्र

9 श्लोक
2
अ. 1 · श्लोक 2
अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः ।

धर्मोपदेशविख्यातं कार्याकार्यं शुभाशुभम् ॥

सही-गलत का विवेक

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4
अ. 1 · श्लोक 4
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।

दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥

विद्वान् भी कब हारता है

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5
अ. 1 · श्लोक 5
दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।

ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥

चार मृत्यु-तुल्य स्थितियाँ

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8
अ. 1 · श्लोक 8
यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः ।

न च विद्यागमः कश्चित् न तं देशं समाश्रयेत् ॥

चार आवश्यक तत्त्व

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10
अ. 1 · श्लोक 10
लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता ।

पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संगतिम् ॥

चरित्र के पाँच गुण

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11
अ. 1 · श्लोक 11
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे ।

मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥

चार सम्बन्धों की पहचान

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12
अ. 1 · श्लोक 12
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसङ्कटे ।

राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥

छह कठिन क्षण

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15
अ. 1 · श्लोक 15
नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां शृङ्गिणां तथा ।

विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥

छह जिन पर अंधा विश्वास न करें

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16
अ. 1 · श्लोक 16
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।

अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि काञ्चनम् ॥

चार स्रोतों से ग्रहण

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अध्याय 2 — मित्र-शत्रु और बुद्धि-संरक्षण

12 श्लोक
2
अ. 2 · श्लोक 2
भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वराङ्गना।
विभवो दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपसः फलम्॥

छह सुख — भोजन, पाचन, सुन्दर साथी, रति-शक्ति, वैभव और दान-सामर्थ्य — थोड़े तप का फल नहीं हैं।

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3
अ. 2 · श्लोक 3
यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी।
विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहैव हि॥

आज्ञाकारी पुत्र, अनुकूल पत्नी और अपनी संपदा में सन्तोष — इन तीन का स्वर्ग यहीं है।

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4
अ. 2 · श्लोक 4
ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः स पिता यस्तु पोषकः।
तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥

पुत्र-पिता-मित्र-पत्नी — चारों की कसौटी कर्तव्य और भाव से मापी जाती है, सम्बन्ध-नाम से नहीं।

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5
अ. 2 · श्लोक 5
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥

पीठ-पीछे काम बिगाड़ने और सामने मीठा बोलने वाला मित्र — मुख पर दूध, भीतर विष का घड़ा है — उसे त्यागो।

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6
अ. 2 · श्लोक 6
न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत्।
कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वगुह्यं प्रकाशयेत्॥

बुरे मित्र पर तो विश्वास न करो, अच्छे मित्र पर भी अति विश्वास न करो — क्योंकि कुपित होने पर वह सब रहस्य खोल देगा।

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9
अ. 2 · श्लोक 9
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥

हर पर्वत पर माणिक्य नहीं, हर हाथी में मोती नहीं, हर वन में चन्दन नहीं — वैसे ही साधु भी सर्वत्र नहीं।

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10
अ. 2 · श्लोक 10
पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः।
नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥

पुत्रों को अनेक प्रकार के शीलों में निरन्तर लगाओ — नीतिज्ञ और शीलवान् पुत्र ही कुल में पूजे जाते हैं।

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14
अ. 2 · श्लोक 14
कान्तावियोगः स्वजनापमानो ऋणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा।
दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥

छह चीज़ें बिना आग के शरीर को जलाती हैं — प्रिय-विरह, अपनों का अनादर, बचा हुआ क़र्ज़, बुरे राजा की सेवा, दरिद्रता और विषम सभा।

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17
अ. 2 · श्लोक 17
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजाभग्नं नृपं त्यजेत्।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्ता अभ्यागता गृहम्॥

वेश्या निर्धन को, प्रजा भग्न राजा को, पक्षी फल-हीन वृक्ष को, अतिथि भोजन के बाद गृह को — स्वार्थ-पूर्ण लोग प्रयोजन-समाप्ति पर तुरन्त त्याग देते हैं।

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18
अ. 2 · श्लोक 18
गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं शिष्या दग्धारण्यं मृगास्तथा॥

दक्षिणा लेकर ब्राह्मण यजमान को, विद्या लेकर शिष्य गुरु को, और जलते वन को मृग — तीनों तुरन्त त्याग देते हैं।

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19
अ. 2 · श्लोक 19
दुराचारी दुष्टदृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुंसां स तु शीघ्रं विनश्यति॥

बुरे आचरण, बुरी दृष्टि, बुरे स्थान वाले दुर्जन से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट होता है।

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20
अ. 2 · श्लोक 20
समाने शोभते प्रीतीः राज्ञि सेवा च शोभते।
वाणिज्यं व्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे॥

समान जनों में प्रीति, राजा के यहाँ सेवा, व्यवहार में व्यापार, और घर में सद्गुणी साथी — ये चारों अपने सही स्थान में शोभते हैं।

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अध्याय 3 — कुल-दोष और संगति-विवेक

5 श्लोक
1
अ. 3 · श्लोक 1
कस्य दोषः कुलेनास्ति व्याधिना केन पीडिताः।
व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्॥

किसके कुल में दोष नहीं?

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3
अ. 3 · श्लोक 3
सत्कुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत्।
व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मेण योजयेत्॥

कन्या को सत्कुल में, पुत्र को विद्या में, शत्रु को व्यसन में, मित्र को धर्म में लगाओ।

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4
अ. 3 · श्लोक 4
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशति कालेतु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

दुर्जन और सर्प में सर्प श्रेष्ठ है, दुर्जन नहीं — सर्प तो कभी काटता है, दुर्जन पद-पद पर डंसता है।

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5
अ. 3 · श्लोक 5
एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्।
आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥

राजा कुलीनों का संग्रह इसलिए करते हैं क्योंकि वे आदि-मध्य-अन्त किसी भी अवस्था में राजा को नहीं छोड़ते।

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18
अ. 3 · श्लोक 18
लालयेत्पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥

पाँच वर्ष तक लाड़, दस वर्ष तक अनुशासन, सोलह के बाद मित्र-व्यवहार — पुत्र-पालन का तीन-चरण सूत्र।

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अध्याय 4 — पञ्च गर्भ-निर्णय

5 श्लोक
2
अ. 4 · श्लोक 2
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः।
ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥

साधुजनों से दूर हो जाने वाले पुत्र-मित्र-बन्धु निरर्थक हैं — जो उनके साथ चलें, उनसे ही कुल सुकृती बनता है।

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10
अ. 4 · श्लोक 10
संसारतापदग्धानां त्रयो विश्रामहेतवः।
अपत्यं च कलत्रं च सतां सङ्गतिरेव च॥

संसार-ताप से जले हुए लोगों के तीन विश्राम हैं — सन्तान, पत्नी और सत्संगति।

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12
अ. 4 · श्लोक 12
एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभीरणम्॥

तप एक, पठन दो, गायन तीन, यात्रा चार, खेती पाँच और युद्ध बहुत लोगों के साथ — हर कार्य का अपना group-size है।

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14
अ. 4 · श्लोक 14
अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्तु बान्धवाः।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता॥

सन्तान-हीन का घर, बन्धु-हीन की दिशा, मूर्ख का हृदय शून्य — पर दरिद्रता तो सर्व-शून्य है।

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18
अ. 4 · श्लोक 18
कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कस्याहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः॥

समय, मित्र, देश, आय-व्यय, मैं कौन, मेरी शक्ति — इन छह बातों पर निरन्तर विचार करो।

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अध्याय 5 — गुरु-पञ्चक और सत्य

2 श्लोक
15
अ. 5 · श्लोक 15
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

विदेश में विद्या, घर में पत्नी, रोगी को औषधि, मरे को धर्म — मित्र हैं।

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23
अ. 5 · श्लोक 23
राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च।
पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥

राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, सास, अपनी माँ — ये पाँच माँ-समान।

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अध्याय 6 — श्रुति, काल-गति, बीस-गुण

4 श्लोक
5
अ. 6 · श्लोक 5
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥

जिसके पास धन, उसके मित्र-बन्धु, उसी की समाज में पहचान, उसी को विद्वान् माना जाता।

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6
अ. 6 · श्लोक 6
तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥

जैसी भवितव्यता, वैसी बुद्धि उत्पन्न होती, वैसा ही व्यवसाय, वैसे ही सहायक मिलते।

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13
अ. 6 · श्लोक 13
वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदाराः॥

कुराज से राज्य न हो, कुमित्र से मित्र न हो, कुशिष्य से शिष्य न हो, कुदार से दारा (पत्नी) न हो — श्रेष्ठ।

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14
अ. 6 · श्लोक 14
कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिर्वृतिः।
कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥

कुराज से सुख नहीं, कुमित्र से शान्ति नहीं, कुदार से घर-सुख नहीं, कुशिष्य से यश नहीं।

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अध्याय 7 — सन्तोष और गुप्तता

1 श्लोक
15
अ. 7 · श्लोक 15
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च जीवति॥

जिसके पास धन — उसके मित्र, बन्धु, सामाजिक पहचान, और जीवन।

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अध्याय 8 — मान, गुण-कुल, भाव

1 श्लोक
9
अ. 8 · श्लोक 9
वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्तगतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः॥

वृद्धावस्था में पत्नी की मृत्यु, बन्धुओं के हाथ में धन, परवशता का भोजन — तीन सबसे बड़ी विडम्बनाएँ।

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अध्याय 12 — गृहस्थाश्रम

4 श्लोक
1
अ. 12 · श्लोक 1
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियालापिनी।

आनन्द-युक्त घर, बुद्धिमान् पुत्र, मधुर-भाषिणी पत्नी — गृहस्थाश्रम धन्य।

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11
अ. 12 · श्लोक 11
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।

सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शान्ति पत्नी, क्षमा पुत्र — मेरे 6 बन्धु।

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15
अ. 12 · श्लोक 15
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दानेषु सत्साहसः।

धर्म-तत्परता, मुख-मधुरता, दान-साहस, मित्र-निश्छलता, गुरु-नम्रता, मनो-गम्भीरता, आचार-पवित्रता, गुण-रसिकता, शास्त्र-विज्ञता, रूप-सुन्दरता, शिव-भक्ति — हे राघव, आपमें ये सब।

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17
अ. 12 · श्लोक 17
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।

विद्या विदेश में, पत्नी घर में, औषधि रोग में, धर्म मरण में — मित्र।

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अध्याय 14 — पृथ्वी-रत्न

2 श्लोक
3
अ. 14 · श्लोक 3
पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।

धन, मित्र, भार्या, पृथ्वी फिर मिल सकते — पर मनुष्य-देह नहीं।

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10
अ. 14 · श्लोक 10
यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य ब्रूयात्सदा प्रियम्।

प्रिय चाहो तो प्रिय बोलो — व्याध मृग-वध के लिए मधुर गाता।

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अध्याय 15 — दया-चित्त

2 श्लोक
5
अ. 15 · श्लोक 5
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च।

धन-हीन को मित्र, पत्नी, सेवक, सुहृद छोड़ देते — फिर धनी होते ही लौट आते।

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15
अ. 15 · श्लोक 15
एकवृक्षसमारूढा नानावर्णा विहंगमाः।

अनेक रंग के पक्षी एक वृक्ष पर — प्रभात में 10 दिशाओं को उड़ जाते — फिर शोक क्या?

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अध्याय 16 — गुण-शोभा

3 श्लोक
4
अ. 16 · श्लोक 4
कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विषयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः।

धन पाकर कौन गर्व-रहित, विषयों के दुख किसे नहीं, स्त्रियाँ किसका मन-खंडित नहीं किया — समय किसका मित्र, याचक को कौन गौरव देता, खल के जाल में कौन नहीं फँसा।

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8
अ. 16 · श्लोक 8
परस्तुतगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्।

जिसके गुण दूसरे प्रशंसा करें — वह निर्गुण भी गुणी।

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10
अ. 16 · श्लोक 10
गुणैः सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः।

गुणों में सर्वज्ञ-तुल्य भी अकेला निराश्रित दुख पाये — अनर्घ्य माणि भी सोने के सहारे की अपेक्षा।

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