शिव-पार्वती संवाद · 112 ध्यान-धारणाएँ · 163 श्लोकों का word-by-word अध्ययन — और हर अध्याय में वास्तु से सम्बन्ध।
यत्किञ्चित्सकलं रूपं भैरवस्य प्रकीर्तितम् ।
तदसारतया देवि विज्ञेयं शक्रजालवत् ॥
"भैरव का जो भी साकार रूप वर्णित है — उसे असार जानना चाहिए, इन्द्रजाल की तरह।"
विज्ञान भैरव तन्त्र कश्मीर शैव परम्परा का सबसे संक्षिप्त और गहरा ग्रन्थ है। 163 श्लोकों में देवी पार्वती परम तत्त्व का स्वरूप पूछती हैं, और भगवान शिव 112 छोटी-छोटी ध्यान-धारणाएँ बताते हैं — हर एक एक-दो वाक्य की, पर अपने आप में पूरी साधना।
श्वास से लेकर शून्य तक, मन्त्र से लेकर मौन तक, इन्द्रिय-भोग से लेकर आत्म-पहचान तक — हर द्वार से शिव साधक को परम तक ले जाते हैं।
हर अध्याय में — Sanskrit श्लोक, पद-विभाजन, अर्थ, भावार्थ, स्पष्ट चित्र, और वास्तु से सम्बन्ध। क्योंकि "भीतर का घर" (चेतना) और "बाहर का घर" (भवन) — दोनों एक ही शिव-शक्ति संवाद से उत्पन्न हुए हैं।
क्रम से पढ़िए — या जिस विषय पर पुकार सुनें, वहीं उतरिए।
The Opening Dialogue
श्लोक 1-6 — रुद्र-यामल, त्रिक, शक्रजाल
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The Devi's Probing
श्लोक 7-22 — साधक क्या करे? "नातिविस्तीर्णम्"
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The True Nature of Bhairava
श्लोक 23-32 — प्राण-अपान, श्वास के दो ठहराव
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The Science of Breath
धारणा 1-15 — द्वादशान्त, हंस, सोऽहम्, कुम्भक
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The Mandala of the Body
धारणा 16-35 — चक्र, कुण्डलिनी, अंग-ध्यान
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The Science of Void
धारणा 36-55 — आकाश, प्रकाश, अन्धकार, अनन्त
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The Secret of Sound
धारणा 56-75 — ओम्, मन्त्र, नाद, मौन
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The Yoga of the Senses
धारणा 76-95 — रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, भाव
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The Inquiry of "I"
धारणा 96-112 — आत्म-पहचान, शिवोऽहम्
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The Devi's Recognition
श्लोक 139-163 — संवाद का समापन
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Introduction to Tantra
चार यामल · शास्त्र-श्रेणी · तन्त्र की क्रान्ति
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Comparing Three Schools
सांख्य · वेदान्त · तन्त्र — एक तुलनात्मक यात्रा
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108 Tantra Teachings
रत्न-कोश — 108 सूत्र · 108 दिन की यात्रा
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Guru, Diksha, Mantra
गुरु-शिष्य त्रिक · 11 दीक्षाएँ · मन्त्र-चैतन्य
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The Subtle Body
3.5 करोड़ नाड़ी · 7 चक्र · 3 ग्रन्थी · कुण्डलिनी
पढ़िएहर पाठक के लिए अलग प्रवेश-द्वार।
पूरा संवाद, क्रम से
सीधे धारणाओं पर
घर और चेतना का मेल
"धन्योऽहं कृतकृत्यास्मि सम्पूर्णाहं महेश्वर ।
इदानीं ज्ञातमेवेदं भैरवस्य परं पदम् ॥"
— देवी पार्वती · अन्तिम वाक्य · श्लोक 156
VastuGuruji · हिन्दी सम्पूर्ण भाष्य