विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 7 — ध्वनि का रहस्य
अध्याय सात
धारणा 56 से 75 — नाद, मन्त्र, और मौन की साधनाएँ
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"मन्त्र का असली बल अक्षर में नहीं —
दो अक्षरों के बीच के मौन में है।"
ध्वनि — ब्रह्माण्ड की पहली रचना। "नादो ब्रह्म" — नाद ही ब्रह्म है। इन 20 धारणाओं में शिव बताते हैं कि ध्वनि के माध्यम से कैसे साधक परम तक पहुँचे।
पर ध्यान दीजिए — शिव ध्वनि के "अन्दर" नहीं ले जा रहे। वे ध्वनि के "पीछे" ले जा रहे हैं। हर ध्वनि की पीठ पर मौन बैठा है। मौन = असली शिक्षक।
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धारणा 56-60
ओम् की चार स्थितियाँ
प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावनात् ।
शून्यया परया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि ॥
अर्थ और तकनीक
"प्रणव (ओम्) आदि का उच्चारण करते-करते, उसके प्लुत (विस्तृत) अन्त में शून्य का भाव करने से, शून्यरूपा परम शक्ति के द्वारा साधक शून्य को प्राप्त करता है।"
तकनीक — ओम् का उच्चारण कीजिए। "ओऽऽऽऽऽम्ऽऽऽऽऽ"। अन्त में "म्" बहुत लम्बा खींचिए — जब तक साँस चले। फिर मौन। उस मौन में बैठिए। यह "अनुस्वार" है — जहाँ ध्वनि शून्य में बदल जाती है।
धारणा 57: ओम् को मन में दोहराइए — बिना मुँह से बोले। मानसिक जप। 108 बार। फिर रुकिए।
धारणा 58: ओम् के तीन अंग — अ, उ, म — को अलग-अलग अनुभव कीजिए। "अ" = पेट से उठती ध्वनि। "उ" = छाती से। "म" = सिर से। पूरा शरीर एक ओम्।
धारणा 59: ओम् की चौथी अवस्था — बिन्दु। तीन ध्वनियों के बाद का मौन। उसी में टिकिए।
धारणा 60: ओम् को "सुनिए" — बोलिए नहीं। आँख बन्द कीजिए। शरीर के भीतर ओम् की गूँज सुनिए। यह "अनहत नाद" है — बिना बजे की ध्वनि।
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धारणा 61-65
मन्त्र की सूक्ष्म साधनाएँ
धारणा 61: कोई भी एक अक्षर चुनिए — "ह", "स", "र", "क्ष"। उसी एक अक्षर को मन में दोहराते रहिए। शुरू में मन भटकेगा। दिनों बाद अक्षर मन में जम जाएगा। फिर वह अपने आप बजेगा।
धारणा 62: "सोऽहम्" (मैं वही हूँ) मन्त्र। हर साँस के साथ। साँस अन्दर — "सो"। साँस बाहर — "हम्"। यह "हंस-मन्त्र" प्रकृति का दिया हुआ।
धारणा 63: मन्त्र को "देखिए"। मानसिक रूप से ओम् का चित्र बनाइए। अक्षर ओम् ख़ुद को साकार करते देखिए। ध्वनि और रूप एक हो जाएँ।
धारणा 64: मन्त्र को "गहरा" कीजिए। पहले ज़ोर से। फिर हल्की आवाज़। फिर फुसफुसाहट। फिर सिर्फ़ होंठ। फिर सिर्फ़ मन। फिर — मौन। पाँच परतें एक-एक करके पार करिए।
धारणा 65: मन्त्र भूल जाइए। बस उस "भाव" में बैठिए जो मन्त्र लाता है। मन्त्र साधन है — भाव लक्ष्य।
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धारणा 66-70
प्राकृतिक ध्वनियों की साधना
धारणा 66: झरने की आवाज़ सुनिए। पानी के गिरने का अनवरत प्रवाह। अपने भीतर वही प्रवाह महसूस करिए।
धारणा 67: समुद्र की लहरों की आवाज़। हर लहर एक मन्त्र है। हज़ार लहरें — हज़ार मन्त्र। बिना थके।
धारणा 68: रात की झींगुर की आवाज़। निरन्तर। एक तानपूरे की तरह। उसी पर ध्यान लगाइए — मन शान्त।
धारणा 69: मन्दिर की घंटी। एक घंटी। उसके बजने के बाद की लम्बी गूँज। गूँज कहाँ गई? उसी "जाने" के साथ जाइए।
धारणा 70: शंख की ध्वनि। सात बार बजाइए। फिर बैठिए। शरीर में जो "स्पन्दन" बचा — वही असली शंख।
वास्तु से जोड़ — घर में ध्वनि
घर में किस तरह की ध्वनि है — यह वास्तु का सूक्ष्म पहलू है।
शुभ ध्वनियाँ: मन्दिर की घंटी, घर में बजते मन्त्र, बच्चों की हँसी, पक्षियों की चहचहाहट, बहता पानी (छोटा fountain)।
अशुभ ध्वनियाँ: लड़ाई, चिल्लाहट, दूर के यातायात का शोर, टूटी मशीन की आवाज़, अनवरत TV।
एक स्वस्थ घर वह है जहाँ "अच्छी ध्वनियाँ" बहती हैं और "बुरी ध्वनियाँ" दूर रहती हैं। यह दीवारों से नहीं, मन से बनता है।
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धारणा 71-75
मौन की चरम साधनाएँ
धारणा 71: एक दिन पूरा मौन रखिए। न बोलिए, न लिखिए। बस सुनिए। शाम तक आप पाएँगे — आप दूसरा ही व्यक्ति बन गए।
धारणा 72: रात के 2 बजे — सबसे शान्त समय। उठिए। बाहर खुले में बैठिए। केवल मौन सुनिए। मौन की भी अपनी ध्वनि है।
धारणा 73: शब्दों के "बीच" का मौन। जब कोई बोल रहा हो — दो शब्दों के बीच का pause पकड़िए। वह pause = असली बातचीत।
धारणा 74: दो विचारों के बीच का अन्तराल। एक विचार आया — अगला विचार आने से पहले एक क्षण मौन है। उस क्षण को बड़ा करिए। अभ्यास से वह क्षण मिनटों में बदलता है।
धारणा 75: "मैं" शब्द को मन में बोलिए। अब उस "मैं" के पीछे जो है — वह "क्या" है? शब्द पीछे, मौन आगे। उसी मौन में बसिए।
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ध्वनि-वास्तु — सात नियम
एक: सुबह 5-7 बजे घर में ओम् या गायत्री का जप गूँजाइए।
दो: शाम 6-7 बजे दीप-दान और हनुमान चालीसा/संध्या-वंदना।
तीन: TV और तेज़ संगीत — रसोई और बेडरूम में बिल्कुल नहीं।
चार: घर में एक "मौन-कक्ष" बनाइए — चाहे एक छोटा कोना ही हो।
पाँच: सोने से पहले 5 मिनट का मौन — परिवार के साथ।
छह: घर में एक छोटा बजता fountain या जल-स्रोत रखिए — उत्तर-पूर्व में।
सात: चिल्लाहट और गाली — घर की वास्तु तोड़ती है। सबसे बड़ा वास्तु-दोष यही है।
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विस्तृत व्याख्या — शब्द-ब्रह्म और दस प्रकार का अनाहत नाद
आहत और अनाहत — दो प्रकार की ध्वनियाँ
संसार में सभी ध्वनियाँ दो प्रकार की होती हैं —
• आहत नाद — दो वस्तुओं के टकराने से उत्पन्न। जैसे ताली, ढोल, वाणी आदि। यह कानों से सुनी जाती है।
• अनाहत नाद — बिना किसी टकराव के, स्वयं उत्पन्न। यह कानों से नहीं, गहरे ध्यान में सुनी जाती है।
यह अनाहत नाद ही शब्द-ब्रह्म का स्वरूप है। यह शरीर के भीतर निरन्तर बहता रहता है — जैसे नदी का जल बहता है। दिन-रात, बिना रुके।
दस प्रकार के अनाहत नाद
शास्त्र दस प्रकार के अनाहत नादों का वर्णन करते हैं जो साधक की प्रगति के अनुसार क्रमशः सुनाई देते हैं —
- चिनी ध्वनि — मच्छर जैसी
- चिञ्चिनी — झींगुर जैसी
- घण्टा-नाद — घंटी जैसी
- शंख-नाद — शंख जैसी
- तन्त्री-नाद — वीणा जैसी
- ताल-नाद — झाँझ जैसी
- वंशी-नाद — बाँसुरी जैसी
- भेरी-नाद — नगाड़े जैसी
- मृदङ्ग-नाद — ढोल जैसी
- मेघ-नाद — बादल जैसी
दसवें "मेघ-नाद" तक पहुँचने पर साधक शब्द-ब्रह्म में लीन हो जाता है। यह क्रम सुप्त-कुण्डलिनी के जागरण के साथ-साथ होता है। बाह्य ध्वनियों के रुकने पर ही ये भीतरी ध्वनियाँ सुनाई देती हैं।
शब्द-ब्रह्म और पर-ब्रह्म
पुराणों में शब्द-ब्रह्म को पर-ब्रह्म से भिन्न बताया गया है — कि शब्द-ब्रह्म में निष्णात व्यक्ति ही पर-ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
"अनाहते पात्र-कर्णेऽभग्न-शब्दे सरिद्द्रुते ।
शब्द-ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥"
— अनाहत के अखण्ड शब्द में जो निरन्तर रहता है, वही शब्द-ब्रह्म में पारंगत होकर पर-ब्रह्म को प्राप्त करता है।
संगीत-शास्त्र में पारंगत व्यक्ति को अनायास मोक्ष
एक चौंकाने वाला शास्त्रीय वचन — संगीत-शास्त्र में पारंगत व्यक्ति अनायास ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
क्यों? क्योंकि संगीतज्ञ का चित्त निरन्तर "स्वर" से जुड़ा रहता है। स्वर सूक्ष्म होते-होते अनाहत नाद से एकाकार हो जाता है। यह एक नैसर्गिक साधना है — बिना नाम लिए।
इसीलिए भारतीय परम्परा में संगीत को धर्म से अलग नहीं माना गया। मीरा, सूरदास, तुलसीदास, तानसेन — सब इसी सूत्र को जानते थे। संगीत अध्यात्म का सबसे सहज मार्ग है।
ओम् का गहरा अर्थ
पतंजलि योग दर्शन (1/27) में कहा है — "तस्य वाचकः प्रणवः" — अर्थात् उस ईश्वर का यदि कोई नाम हो सकता है, तो वह "ॐ" ही है।
यह ॐ कोई अक्षर नहीं — यह वह ध्वनि है जो योगी को समाधि-अवस्था में सुनाई देती है। इसके भी कई रूप हैं —
• वेद का प्रणव — ॐ (अ + उ + म्)
• तन्त्र का बीज — हुं, ह्रीं, क्रीं आदि
• उच्चारण के तीन भेद — ह्रस्व (छोटा), दीर्घ (बड़ा), प्लुत (बहुत बड़ा)
वास्तु में ध्वनि का स्थान
घर की ध्वनि-वास्तु बहुत सूक्ष्म है। तीन नियम —
1. शुभ ध्वनियाँ निरन्तर हों — मन्त्र, घंटी, भजन, बच्चों की हँसी।
2. क्लेश-वाणी न हो — चिल्लाहट, गाली, झगड़ा। ये दीवारों में बस जाते हैं।
3. एक "मौन-कोना" हो — जहाँ रोज़ 5 मिनट चुप्पी रहे। यही घर का अनाहत-कोश है।
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
— अध्याय सात समाप्त —
अगले अध्याय में — इन्द्रियों, भोग, और विरोधाभास की धारणाएँ
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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