विज्ञान भैरव तन्त्र

विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 8 — इन्द्रियों का योग

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VastuGuruji Team 20 Jun 2026

विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 8 — इन्द्रियों का योग

अध्याय आठ

धारणा 76 से 95 — संवेदना और भोग के द्वार से भैरव तक

साक्षी (आप) आँख रूप कान शब्द नाक गन्ध जीभ रस त्वचा स्पर्श
पाँच इन्द्रियाँ — पाँच द्वार, एक केन्द्र (साक्षी)

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"इन्द्रियाँ शत्रु नहीं हैं।
वे पाँच खुली खिड़कियाँ हैं — जिनसे भैरव झाँक रहा है।"

ह अध्याय विज्ञान भैरव का सबसे क्रान्तिकारी हिस्सा है। यहाँ शिव कहते हैं — इन्द्रियों को दबाओ मत। उनके साथ रहो। हर इन्द्रिय एक द्वार है। हर भोग एक संकेत है।

पुराने योग में अक्सर यह कहा जाता है कि इन्द्रियों को जीतना है। विज्ञान भैरव कहता है — इन्द्रियों के अन्दर डूब जाओ। उसी डूबने में जागरण है।

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धारणा 76-80

रूप-दर्शन की साधनाएँ

धारणा 76: किसी सुन्दर वस्तु को देखिए — फूल, बच्चे का चेहरा, सूर्योदय। पूरी आँख से देखिए। "सोचना" बन्द कीजिए। बस देखिए। एक क्षण आता है जब "देखने वाला" और "देखी जाने वाली वस्तु" एक हो जाते हैं।

धारणा 77: कोई एक रंग चुनिए — गहरा नीला, या स्वर्ण। उसी रंग की कोई वस्तु ले आइए — कपड़ा, पत्थर। उसे देखिए। उसी रंग में डूब जाइए। आप वही रंग बन गए।

धारणा 78: आँखें बन्द कीजिए। अन्दर के "अन्धकार" को देखिए। अन्धकार में रंग उभरते हैं — हलके धब्बे। उन्हें देखिए। मन्दबुद्धि से देखिए।

धारणा 79: दृष्टि को एक बिन्दु पर स्थिर कीजिए — एक काला बिन्दु दीवार पर। 5 मिनट बिना पलक झपकाए। आँख से आँसू आ सकते हैं — आने दीजिए। उसी अवस्था में रहिए।

धारणा 80: मूर्ति-दर्शन। अपने इष्ट देवता की मूर्ति देखिए। आँखों में देखिए। एक क्षण के लिए मूर्ति "जीवित" लगती है। उसी क्षण को पकड़िए।

वास्तु से जोड़

घर में जो आपकी आँख बार-बार जाए — वह "वास्तु-वस्तु" है। यदि आपकी आँख टूटी हुई दीवार पर जाती है — हर बार उदासी मिलती है। यदि उत्तर-पूर्व के स्वच्छ कोने पर जाती है — हर बार शान्ति।

इसीलिए मुख्य देखने वाली दिशा में सुन्दर वस्तु रखिए — पौधा, मूर्ति, चित्र। आँख ही पहला वास्तु-यन्त्र है।

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धारणा 81-85

रस, गन्ध, स्पर्श की साधनाएँ

धारणा 81: भोजन करते समय — पहला कौर मुँह में। चबाइए नहीं। बस रस का अनुभव। कौन-सा स्वाद आया? कितनी परतें हैं? यह "रस-साक्षी" साधना है।

धारणा 82: कोई एक सुगन्ध — चन्दन, अगरबत्ती, फूल। नाक में आइए। फिर सोचना बन्द — बस गन्ध। गन्ध कहाँ से आ रही? आप ही "गन्ध-स्थान" हैं।

धारणा 83: स्नान करते समय — पानी की पहली धार शरीर पर। ठंडक का स्पर्श। पूरे शरीर पर पानी की संवेदना। उसी संवेदना में हो जाइए।

धारणा 84: किसी प्रिय का हाथ अपने हाथ में। दबाव। तापमान। पुलक। बस अनुभव। यहाँ साक्षी-भाव।

धारणा 85: हवा का स्पर्श — चेहरे पर ठंडी हवा। रोम-रोम जागृत। कोई संवेदना उठती है, ख़त्म होती है। संवेदनाओं की धारा — आप उसके साक्षी।

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धारणा 86-90

भाव की चरम स्थितियाँ

यथा तथा यत्र तत्र वासनात्तीव्रसङ्क्षयात् ।
तदाकाशं चित्तचेतयेत् तदभावे तदाश्रयः ॥

अर्थ

"जब वासना तीव्र हो — किसी भी विषय पर, किसी भी समय — उस आकाश को चित्त में जागृत रखें। उस वासना के अभाव में भी वही आश्रय।"

धारणा 86: क्रोध आये — पूरी तरह आये। उसे रोकिए नहीं। बस उसकी "गर्मी" को देखिए। शरीर में कहाँ है क्रोध? पेट में? छाती में? वहीं रहिए।

धारणा 87: भय आये — डर के बीच में। शरीर में कहाँ है डर? उसके केन्द्र में जाइए। बीच में एक "खाली" स्थान है। वहाँ बैठिए।

धारणा 88: कामना उठे — किसी वस्तु, व्यक्ति, अनुभव की। कामना को रोकिए नहीं। उसकी "ऊर्जा" को देखिए। कामना तीव्र होगी। फिर अपने आप गिरेगी। आप साक्षी।

धारणा 89: अत्यन्त ख़ुशी का क्षण — हँसी, उल्लास, संगीत। उसी क्षण में "मैं कौन हूँ?" पूछिए। ख़ुशी और प्रश्न एक साथ।

धारणा 90: दुःख का क्षण — रोना आता है। रोइए। पर एक हिस्सा साक्षी रहे — "देखो, मैं रो रहा हूँ।" यह विभाजन ही मुक्ति की पहली सीढ़ी।

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धारणा 91-95

विरोधाभास के द्वार

विज्ञान भैरव का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा।

धारणा 91: झूले पर बैठिए। आगे-पीछे झूलिए। मन भी आगे-पीछे जा रहा। एक क्षण ऐसा आता है जब झूला रुकता-सा लगता है — बीच में। उसी क्षण को पकड़िए।

धारणा 92: गहरा छींकने के क्षण में — साक्षी रहिए। छींक के बाद का एक क्षण मन एकदम खाली होता है। उसी में रहिए।

धारणा 93: बहुत थकान — सोने से पहले की अवस्था। पूरी तरह सो जाने से ठीक पहले एक "मध्य-अवस्था" है। उसी में "देखते" रहिए — पर नींद की तरह आराम से।

धारणा 94: गहरा भूख — पर अभी भोजन उपलब्ध नहीं। भूख के बीच में रहिए। उसकी संवेदना देखिए। फिर खाते समय — और भी जागरूक।

धारणा 95: अप्रिय स्थिति — जिसे आप टालना चाहते हैं। उसी में बैठिए। भागिए नहीं। उसकी "गन्ध" लीजिए। उसके भीतर भी भैरव है।

सारांश — साधना भोग में है

यह अध्याय हमें सिखाता है कि साधना के लिए कुछ अलग करने की ज़रूरत नहीं है। जो कर रहे हैं — उसी में जागरूक बनिए। खा रहे हैं — साधना। सूँघ रहे हैं — साधना। क्रोधित हैं — साधना। दुःखी हैं — साधना।

बस "जागरूक" होकर करिए। यही पूरा रहस्य है।

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वास्तु का इन्द्रिय-मानचित्र

एक स्वस्थ घर वह है जहाँ हर इन्द्रिय को सही "आहार" मिले।

आँख: सौम्य रंग — हरा, हलका पीला, क्रीम। उग्र लाल/काले से बचाव। पौधे, मूर्तियाँ, खिड़की से दृश्य।

कान: सुबह-शाम मन्त्र। दिनभर शान्त। शोरगुल से बचाव।

नाक: रोज़ अगरबत्ती, ताज़ी हवा, फूल। बदबू (बासी खाना, गन्दा कपड़ा) तुरन्त साफ़।

जीभ: घर में ताज़ा खाना। पुरानी, बासी, fast food की वास्तु बहुत बुरी।

त्वचा: हवा का प्रवाह। सूती कपड़े। प्राकृतिक प्रकाश। AC में 24-घंटे रहना — वास्तु-दोष।

पाँचों इन्द्रियाँ खुश = घर खुश।

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विस्तृत व्याख्या — सुख-दुःख का स्रोत और ब्रह्मानन्द-सहोदर

इन्द्रिय-द्वारक सुख-दुःख

शास्त्र की एक स्पष्ट परिभाषा देखिए —

"अनुकूल-वेदनीयं सुखम् । प्रतिकूल-वेदनीयं दुःखम् ॥"
— जो अनुकूल अनुभव हो, वह सुख। जो प्रतिकूल अनुभव हो, वह दुःख।

यानी सुख और दुःख वस्तु में नहीं, अनुभव-कर्ता के मन में हैं। एक ही वस्तु एक को सुख दे सकती है, दूसरे को दुःख। यह सब इन्द्रियों के द्वार से होता है।

आत्मा को सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता। आत्मा निर्विकार चेतना है। यह मन ही है जो वासना-ग्रस्त होकर सुख-दुःख का अनुभव करता है। वासना की पूर्ति होने पर सुख, न होने पर दुःख।

पञ्च इन्द्रियों के पाँच विषय

पाँचों ज्ञान-इन्द्रियाँ बाहर ही देखती हैं। इनको विषय ही दिखाई देते हैं —

आँख → रूप (देखना)
कान → शब्द (सुनना)
नाक → गन्ध (सूँघना)
जीभ → रस (चखना)
त्वचा → स्पर्श (छूना)

ये इन विषयों के भोग में रस लेने लगती हैं और अपने वास्तविक स्वरूप — आत्म-चेतना — को विस्मृत कर जाती हैं।

तन्त्र की क्रान्ति यह है कि वह इन्द्रियों को दबाता नहीं — उन्हें "देखना" सिखाता है। हर सुख के क्षण में पूछो — "यह सुख मुझे क्यों मिल रहा है? क्या यह वस्तु में है, या मेरे मन में?"

ब्रह्मानन्द-सहोदर — एक चौंकाने वाला सूत्र

तन्त्र का सबसे विवादित और गहरा सूत्र यह है — कि भोग के परम क्षण में जो आनन्द होता है, वह ब्रह्मानन्द का "सहोदर" (छोटा भाई) है।

अर्थात् — गहरी भूख के बाद भोजन का पहला कौर, गहरी प्यास के बाद जल की पहली बूँद, या स्त्री-पुरुष के मिलन का चरम क्षण — इन सबमें जो आनन्द होता है, उसका मूल बाह्य वस्तु नहीं है। वह आनन्द स्वयं आत्मा का है, जो उस क्षण में "मैंपन" टूट जाने से बाहर प्रकट हो जाता है।

"शक्ति-सङ्गम-संक्षुब्ध-शक्त्यावेशावसानिकम् ।
यत् सुखं ब्रह्म-तत्त्वस्य तत् सुखं स्वाक्यमुच्यते ॥"
— शक्ति के मिलन से उठी आन्तरिक उत्तेजना के अन्त में जो आनन्द आता है, वही ब्रह्म-तत्त्व का स्व-आनन्द है।

तन्त्र इसका लाभ उठाता है। वह कहता है — इन्हीं क्षणों में अगर साधक सजग रहे, "देखे" कि यह आनन्द कहाँ से आ रहा है — तो उसे आत्म-दर्शन हो सकता है।

क्षुधा, भय, क्रोध — चरम भाव क्यों उपयोगी हैं

शास्त्र कहता है — चरम भाव की स्थिति में मन एकाग्र हो जाता है। उसी क्षण ब्रह्म-सत्ता समीप होती है —

1. छींक के अन्त में — मन क्षणभर खाली होता है।

2. तीव्र भय के क्षण — पूरा शरीर रोमांचित हो जाता है, मन रुक जाता है।

3. गहरे शोक में — विचार थम जाते हैं।

4. युद्ध से भागते समय — आत्म-रक्षा की सजगता शिखर पर होती है।

5. आश्चर्य के समय — मन एकदम स्थिर हो जाता है।

6. भूख-प्यास के बाद तृप्ति — परम सन्तोष का क्षण।

इन सबमें मन की चंचल वृत्ति क्षणभर के लिए रुकती है। प्रबुद्ध साधक इन क्षणों को पकड़कर उस आनन्द में लीन हो जाता है। अप्रबुद्ध इनसे वंचित रह जाता है।

वास्तु में इन्द्रिय-तृप्ति का ध्यान

स्वस्थ घर वही है जहाँ पाँचों इन्द्रियाँ तृप्त हों —

आँख — सुन्दर रंग, साफ़ खिड़की, ताज़े पौधे।
कान — मधुर संगीत, मन्त्र-गुंजन, पक्षियों की आवाज़।
नाक — रोज़ अगरबत्ती, ताज़ी हवा, फूल, चन्दन।
जीभ — गरम, ताज़ा, घर का भोजन।
त्वचा — सूती कपड़े, खुली हवा, धूप का स्पर्श।

पाँचों इन्द्रियाँ खुश = घर खुश। यही वास्तु का इन्द्रिय-शास्त्र है।

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

— अध्याय आठ समाप्त —

अगले अध्याय में — अन्तिम 17 धारणाएँ और आत्म-पहचान

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