विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 11 — तन्त्र शास्त्र का परिचय
अध्याय ग्यारह
वेदों से प्राचीन परम्परा · रुद्र-यामल का मूल · तन्त्र की क्रान्ति
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"तन्त्र वेदों से प्राचीन है।
पर इसकी कहानी कभी सीधे नहीं कही गयी।"
अब तक के दस अध्यायों में हमने विज्ञान भैरव का संवाद देखा। पर यह संवाद किस परम्परा से निकला है? किस ग्रन्थ-वंश का यह हिस्सा है? आज का अध्याय उसी पृष्ठभूमि का है।
तन्त्र शास्त्र वह विषय है जिस पर सबसे अधिक भ्रम फैले हैं। आम धारणा है कि यह "गुप्त-विद्या" है, "वाम-मार्ग" है, "विवादास्पद" है। पर शास्त्र-ज्ञानी जानते हैं कि तन्त्र वेदों से भी प्राचीन है, और भारतीय अध्यात्म की सबसे गहरी जड़ों में से एक है।
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तन्त्र की प्राचीनता
शास्त्रों में स्वयं भगवान शिव ने यह श्रेणी बताई है —
"वेद से श्रेष्ठ शैव शास्त्र है, शैव से श्रेष्ठ वाम शास्त्र है,
वाम से श्रेष्ठ दक्षिण शास्त्र है, दक्षिण से श्रेष्ठ कौल शास्त्र है,
और उससे भी श्रेष्ठ त्रिक शास्त्र है।
इनसे भी श्रेष्ठ अन्य शास्त्र हैं।"
यह श्रेणी न केवल समय की है — गहराई की भी है। प्रत्येक स्तर पहले से अधिक सूक्ष्म, अधिक अनुभव-केन्द्रित होता जाता है। वेद कर्मकाण्ड पर ज़ोर देते हैं, शैव ज्ञान पर, त्रिक सीधे अनुभव पर।
तन्त्र की प्रथम उपदेष्टा स्वयं भगवान शिव हैं। ये उपदेश "यामल" नामक ग्रन्थों में संगृहीत हैं। यामल का अर्थ है — युग्म, जोड़ी। यानी रुद्र (शिव) और शक्ति का संयुक्त ज्ञान-कोश।
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यामल ग्रन्थ — चार प्रमुख
तन्त्र की मूल पुस्तकें "यामल" कहलाती हैं। इनमें चार प्रमुख हैं —
1. रुद्र-यामल
सर्वाधिक प्रामाणिक यामल ग्रन्थ। यह शिव-शक्ति के संयोग से उत्पन्न सम्पूर्ण तन्त्र-विज्ञान का स्रोत है। विज्ञान भैरव तन्त्र इसी रुद्र-यामल का गूढ़ रहस्य है। इसी से वाम, दक्षिण, कौल, त्रिक आदि सभी परम्पराएँ निकलीं।
2. ब्रह्म-यामल
ब्रह्मा को केन्द्र में रखकर शक्ति-तत्त्व का विवेचन। सृष्टि-रचना के सिद्धान्त यहाँ विस्तार से।
3. विष्णु-यामल
विष्णु-तत्त्व और शक्ति का सामरस्य। पालन और स्थिति के सिद्धान्त।
4. भैरव-यामल
भैरव और भैरवी का संवाद-रूप ज्ञान। संहार और पुनर्जागरण की प्रक्रिया।
इन यामलों की परम्परा अनादि है, यद्यपि वर्तमान में उपलब्ध ग्रन्थों की रचना आठवीं शताब्दी की मानी जाती है।
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तन्त्र की क्रान्ति — चार बातें
1. अद्वैत की स्वीकार्यता
तन्त्र सीधे अद्वैत मानता है — सब कुछ शिव है। न द्वैत, न द्वैत-अद्वैत। केवल अद्वय। इसीलिए तन्त्र में शक्ति को शिव से भिन्न नहीं माना — दोनों एक हैं।
2. अनुपाय का मार्ग
तन्त्र कहता है — परम तत्त्व कोई "वस्तु" नहीं है जिसे प्राप्त करना हो। वह "बोध" है जिसे जानना मात्र है। इसलिए किसी जटिल क्रिया की आवश्यकता नहीं। केवल चित्त की एकाग्रता पर्याप्त।
3. भोग और मोक्ष का सामरस्य
अन्य परम्पराएँ कहती हैं — भोग छोड़ो तब मोक्ष मिलेगा। तन्त्र कहता है — भोग को सजगता से जीओ, उसी से मोक्ष मिलेगा। हर सुख-क्षण में आत्म-दर्शन की सम्भावना है।
4. गृहस्थ का स्वागत
तन्त्र संन्यासी का नहीं, गृहस्थ का शास्त्र है। यह कहता है — घर में रहो, परिवार पालो, और साथ-साथ साधना करो। यह कलियुग के लिए सबसे प्रासंगिक मार्ग है।
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तन्त्र को क्यों गलत समझा गया
तन्त्र पर सबसे बड़ा आरोप है — कि इसमें मद्य, मांस, मैथुन आदि का प्रयोग होता है। पञ्च-मकार। यह आरोप पूरी तरह सच नहीं, और पूरी तरह झूठ भी नहीं।
सच यह है — कुछ "वाम-मार्गी" साधक इन वस्तुओं का बाहरी प्रयोग करते थे, पर वह तन्त्र की मुख्य धारा नहीं। मुख्य परम्परा "दक्षिण-मार्गी" है — जहाँ इन शब्दों का आन्तरिक, प्रतीकात्मक अर्थ लिया जाता है। (हमने अध्याय 6 में इन पञ्च-मकारों का असली अर्थ देखा।)
पर बाहर से देखने वालों ने पूरे तन्त्र को इन्हीं वाम-प्रथाओं से जोड़ दिया। फिर वेदान्त का प्रचार बढ़ा, उसकी सरल भाषा ने जनता को आकर्षित किया, और तन्त्र हाशिये पर चला गया।
"यद्यपि यह तन्त्र शास्त्र प्रामाणिक है,
किन्तु वेदान्त के अधिक प्रचार-प्रसार के कारण
इसके प्रसार में कमी आई है।
तथा इसकी क्लिष्टता व अन्य भी कई कारण रहे हैं
जिससे यह सर्वमान्य न हो सका।
किन्तु इसकी प्रमाणिकता में कोई सन्देह नहीं है।
यह भारत की एक अमूल्य धरोहर है
जिसकी सुरक्षा की जानी चाहिए।"
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तन्त्र का मूल सूत्र — करके जानना
तन्त्र शास्त्र की सबसे विशिष्ट बात है उसकी प्रयोगात्मकता। यह कहता है —
"तन्त्र के लिए — करके जानना है, स्वयं अनुभव करना है।
शब्दों से जानना कोई जानना नहीं है।
शब्दों द्वारा कहा गया गलत भी हो सकता है।
कुछ ऐसे रहस्य हैं जिनको शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।"
काम, क्रोध, लोभ, मोह, सुख, दुःख, आनन्द — इनको शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसकी अनुभूति स्वयं को ही होती है। ये वृत्तियाँ हैं जो सभी में समान हैं — हिन्दू, मुस्लिम में भेद नहीं करतीं। वस्त्र भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, इनके रूप भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किन्तु मूल-रूप सबमें समान हैं।
इन पर नियन्त्रण की विधियाँ भी समान ही हैं। इन पर नियन्त्रण करने से ही मानव का रूपान्तरण हो सकता है। इनको जानना मात्र है। उपदेशों से परिवर्तन नहीं आएगा। तन्त्र स्वयं जानने की बात कहता है।
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तन्त्र और वास्तु — एक ही जड़
तन्त्र शास्त्र और वास्तु शास्त्र की जड़ें एक हैं। दोनों रुद्र-यामल से निकले हैं। दोनों में चार साझा सिद्धान्त हैं —
1. शिव-शक्ति का संयोग — तन्त्र में चेतना और क्रिया का मिलन; वास्तु में मालिक का संकल्प और भूमि-शक्ति का मिलन।
2. ब्रह्म-स्थान — तन्त्र में चित्त का केन्द्र-बिन्दु; वास्तु में भवन का केन्द्रीय खुला स्थान।
3. पञ्च महाभूत — तन्त्र में आन्तरिक सूक्ष्म तत्त्व; वास्तु में दिशा-नियामक तत्त्व (पूर्व = आकाश, आग्नेय = अग्नि, आदि)।
4. यन्त्र-संरचना — तन्त्र में 81-कोष्ठ मण्डल; वास्तु में 81-पद वास्तु पुरुष मण्डल।
इसलिए जो साधक तन्त्र को समझ लेता है, उसकी वास्तु-दृष्टि अपने आप गहरी हो जाती है। और जो वास्तु को सच्चे रूप में समझ लेता है, उसके भीतर तन्त्र के बीज स्वतः अंकुरित होते हैं।
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अध्याय का सार
एक — तन्त्र वेदों से प्राचीन है। इसके मूल उपदेष्टा स्वयं भगवान शिव हैं।
दो — चार यामल ग्रन्थ हैं — रुद्र, ब्रह्म, विष्णु, भैरव। रुद्र-यामल सर्वश्रेष्ठ।
तीन — तन्त्र की क्रान्ति चार बातों में — अद्वैत, अनुपाय, भोग-मोक्ष-सामरस्य, गृहस्थ-स्वागत।
चार — तन्त्र को वाम-मार्गियों के कारण गलत समझा गया, पर मुख्य परम्परा शुद्ध और प्रामाणिक है।
पाँच — तन्त्र का सूत्र है — करके जानो, स्वयं अनुभव करो। उपदेश से नहीं, अनुभव से बोध होता है।
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
— अध्याय ग्यारह समाप्त —
अगले अध्याय में — सांख्य, वेदान्त और तन्त्र — तीन दर्शनों की तुलना।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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