विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 3 — भैरव का असली स्वरूप
अध्याय तीन
श्लोक तेईस से बत्तीस — रूप से परे का अनुभव
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"भैरव शब्द में नहीं हैं। मन्त्र में नहीं हैं।
वे उस मौन में हैं जो दो शब्दों के बीच रहता है।"
देवी ने माँगा — "उपाय बताइए, छोटा सा।" शिव अब उत्तर देते हैं। पर यह उत्तर सीधा नहीं है। पहले वे एक भूमिका बनाते हैं — बताते हैं कि भैरव वास्तव में कौन हैं। क्योंकि जब तक यह पता न चले कि "किसके पास पहुँचना है", तब तक "रास्ता कैसे चुना जाए"?
यह अध्याय पूरे विज्ञान भैरव की दार्शनिक नींव है।
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श्लोक तेईस-चौबीस
शिव का पहला आधिकारिक उत्तर
ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो विसर्गात्मा परोच्चरेत् ।
उत्पत्तिद्वितयस्थाने भरणाद् भरितः स्थितिः ॥
पद-विभाजन और अर्थ
ऊर्ध्वे प्राणः — ऊपर जाती हुई प्राण-वायु (श्वास का बाहर जाना)।
अधः जीवः — नीचे आती हुई जीव-वायु (श्वास का भीतर आना)।
विसर्ग-आत्मा परोच्चरेत् — विसर्ग (दो बिन्दुओं) के रूप में परम का उच्चारण होता है।
उत्पत्ति-द्वितय-स्थाने भरणाद् भरितः स्थितिः — दोनों उत्पत्ति-स्थानों (प्राण-जीव के मिलन-बिन्दु) पर ध्यान करने से पूर्णता आती है।
"भैरव वहाँ हैं जहाँ बाहर जाती श्वास और भीतर आती श्वास मिलती है। उस मिलन-बिन्दु में पूर्णता है।"
भावार्थ — पहली बार उपाय का संकेत
शिव की पहली शिक्षा सरल है पर क्रान्तिकारी। वे कहते हैं — परम तत्त्व का पहला द्वार आपकी ही साँस है। श्वास बाहर जाती है, श्वास भीतर आती है। दोनों के बीच एक क्षण मौन का है। उस क्षण में बैठो — वहीं भैरव हैं।
यह न मन्त्र है, न मूर्ति, न मन्दिर। यह आपकी अपनी श्वास है। जो हमेशा से थी और हमेशा रहेगी।
वास्तु की ओर एक झलक
वास्तु में भी यही सिद्धान्त है — "घर की श्वास" यानी हवा का प्रवाह। एक स्वस्थ घर वह है जिसमें हवा आती है, हवा जाती है, और बीच में एक संतुलन बना रहता है। यदि हवा रुक जाए — घर बीमार। यदि हवा बहुत तेज़ बहे — घर अस्थिर।
उत्तर-पूर्व से शुद्ध हवा आती है, दक्षिण-पश्चिम से पुरानी हवा जाती है। बीच का ब्रह्म-स्थान — जहाँ दोनों मिलते हैं — वहाँ "घर का भैरव" बैठा है।
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श्लोक पच्चीस-सत्ताईस
श्वास की चार सूक्ष्म स्थितियाँ
पाठ का सार
शिव अब बताते हैं कि श्वास के चार चरण होते हैं — पूरक (अन्दर लेना), कुम्भक (रुकाव), रेचक (छोड़ना), और फिर बाहर का कुम्भक (खाली ठहराव)। साधना के दो प्रमुख द्वार दोनों कुम्भक हैं।
जब साँस अन्दर भरी हुई हो और एक क्षण रुक जाए — वहाँ भीतर एक भाव-शून्य अवस्था आती है। और जब साँस पूरी निकल जाए और नई न आये — वहाँ बाहर एक मौन आता है। दोनों मौन हैं। दोनों भैरव के द्वार हैं।
वास्तु की ओर एक झलक
आपके घर में भी ये चार स्थितियाँ हैं। सुबह — हवा भरना (पूरक)। दोपहर — हवा का स्थिर ठहराव (कुम्भक)। शाम — हवा निकलना (रेचक)। रात — खाली ठहराव (कुम्भक)। एक स्वस्थ घर इन चारों को सहज जीता है। कोई एक चरण रुक जाए — बीमारी।
विशेष ध्यान दीजिए दो "मौन" वाली स्थितियों पर। यदि घर के ब्रह्म-स्थान में दोपहर 12 बजे और रात 12 बजे एक क्षण मौन और स्थिरता हो — वही "घर का भैरव" है।
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श्लोक तीस-बत्तीस
भैरव — जो शब्द से परे
न वर्णैर्न पदै शक्यं न मन्त्रैर्न च देवताभिः ।
ज्ञायते परमाद्वैतं तत्त्वमेव हि भैरवः ॥
अर्थ: "न तो अक्षरों से, न पदों से, न मन्त्रों से, न देवताओं से — परम अद्वैत तत्त्व जाना जा सकता है। वह तत्त्व ही भैरव है।"
भावार्थ
यह अध्याय 3 का चरम है। शिव सीधे कहते हैं — भैरव शब्द से परे हैं, पद से परे, मन्त्र से परे। यानी आप कितना भी पढ़ें, कितना भी जप करें, कितनी भी पूजा करें — सब साधन हैं। पहुँचने पर ये साधन छूट जाएँगे।
भैरव = वह अनुभव जब अनुभव-कर्ता और अनुभव-विषय अलग नहीं रहते। यही "परम अद्वैत" है।
वास्तु की ओर एक झलक — घर का अद्वैत
एक सच्चा वास्तु-घर वह है जहाँ "घर" और "रहने वाला" अलग नहीं लगते। आप घर में लौटते हैं और घर आपकी साँस लेने लगता है। आप उदास होते हैं — घर भारी हो जाता है। आप ख़ुश होते हैं — घर खिल उठता है। यह अद्वैत है।
नियम-आधारित घर "जुड़ी हुई वस्तु" है। अद्वैत-आधारित घर "विस्तार है आपका"। यही वास्तु का अन्तिम लक्ष्य है।
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अध्याय की समाप्ति पर
शिव ने अध्याय 3 में तीन क्रान्तिकारी बातें कहीं —
एक — परम का पहला द्वार आपकी श्वास है। कोई मन्दिर नहीं, कोई मन्त्र नहीं। बस श्वास।
दो — श्वास के दो "रुकाव" — अन्दर भरे और बाहर खाली — सबसे शक्तिशाली ध्यान-स्थल हैं। इन्हें कुम्भक कहते हैं।
तीन — परम तत्त्व किसी रूप में नहीं आता। वह अनुभव है, परिभाषा नहीं।
अगले अध्याय से शिव की 112 धारणाओं की यात्रा शुरू होगी। हर धारणा एक छोटी सी "खिड़की" है — जिससे आप परम को झाँक सकें।
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विस्तृत व्याख्या — भैरव और विज्ञान शब्दों का गूढ़ अर्थ
"भैरव" शब्द का व्युत्पत्ति-अर्थ
शास्त्रों के अनुसार "भैरव" शब्द तीन धातुओं से बना है — भरण, रवण, वमन।
भरण = भरण-पोषण करने वाला। यानी सम्पूर्ण विश्व का जो पालन करता है।
रवण = ध्वनि करने वाला। यानी जिससे यह सारी सृष्टि का स्पन्दन (अनाहत नाद) उत्पन्न होता है।
वमन = बाहर निकालने वाला। यानी सृष्टि को प्रकट करने वाला।
अर्थात् भैरव वह है जो विश्व का भरण-पोषण करता है, सृष्टि का स्पन्दन करता है, और संहार भी करता है। यही संसारी जीवों को अभय-दान देता है। निग्रह और अनुग्रह भी इसी के कार्य हैं।
यह काल का भी काल है, इसलिए इसको काल भैरव भी कहते हैं। इसका स्वरूप एक साथ महाभयानक है और सौम्य भी।
"विज्ञान" का अर्थ — चेतना
"विज्ञान भैरव" नाम में "विज्ञान" शब्द आधुनिक अर्थ में science नहीं है। यहाँ विज्ञान = चेतना, बोध। यह वह बोध है जो शास्त्र के अध्ययन से नहीं, सीधे अनुभव से होता है।
यह भाव-स्वरूप है। इसका ज्ञान विवेकहीन जनों को भी होता है। सभी इस चेतना के ही रूप हैं। चेतना से भिन्न किसी की सत्ता नहीं है। सब कुछ चित्-मात्र ही है।
"जिस प्रकार घनीभूत प्रकाश ही सूर्य है,
उसी प्रकार यह घनीभूत चित्-शक्ति ही जगत का रूप धारण करती है।
जिस प्रकार घनीभूत हिम ही पिघलकर जल बन जाता है,
उसी प्रकार यह घनीभूत चित्-शक्ति ही जगत् का रूप धारण कर लेती है।"
अर्थात् यह सम्पूर्ण दृश्य जगत् "विज्ञान भैरव" से भिन्न नहीं है। यह उसी का घनीभूत रूप है। जैसे जल और बर्फ़ — रूप अलग, सार एक।
अनुपाय — सहज योग की प्रक्रिया
यहीं विज्ञान भैरव की क्रान्ति है। यह "अनुपाय" अर्थात् बिना किसी क्रिया के स्वयं-बोध की प्रक्रिया है। इसमें —
• पतंजलि का योग = क्रिया-मार्ग (अष्टांग योग, यम-नियम-आसन आदि)
• हठयोग = षट्-कर्म, मुद्रा, बन्ध आदि क्रियाएँ
• तन्त्र का सहज-योग = केवल चित्त की एकाग्रता; क्रिया की आवश्यकता नहीं
क्रिया-मार्ग में अहंकार होता है — "मैं कर रहा हूँ"। यह "मैंपन" ही बाधा बन जाता है। तन्त्र का अनुपाय-मार्ग समर्पण का मार्ग है। जो है, जैसा है — स्वीकार है। बस मन पर सीधा नियन्त्रण।
शिव-शक्ति का सामरस्य
शिव अकेले निष्क्रिय हैं — केवल ज्ञान-स्वरूप। शक्ति अकेली अन्धी है — केवल क्रिया-स्वरूप। दोनों का संयोग ही सृष्टि का कारण है। यह अर्धनारीश्वर स्वरूप है — शिव का आधा अंग शक्ति है।
शास्त्र कहते हैं —
"शक्त्या विना शिवे सूक्ष्मे नाम धाम न विद्यते।"
— शक्ति के बिना सूक्ष्म शिव में न नाम है, न धाम।
इसी कारण इस शास्त्र में देवी (शक्ति) के प्रश्नों का अंत में देवी का स्वयं शिव में विलीन हो जाना घटित होता है (अध्याय 10)। यही अद्वैत की चरम अनुभूति है।
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
— अध्याय तीन समाप्त —
अगले अध्याय में — श्वास की पहली 15 धारणाएँ
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।








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