विज्ञान भैरव तन्त्र

विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 9 — "मैं" का अन्वेषण

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VastuGuruji Team 20 Jun 2026

विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 9 — "मैं" का अन्वेषण

अध्याय नौ

धारणा 96 से 112 — आत्म-पहचान की चरम साधनाएँ

"मैं?" को है? "वह जो पूछ रहा है" शरीर? मन? विचार? भाव?
हर उत्तर के पीछे एक और प्रश्न — "वह कौन है जो जान रहा है?"

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"जिस दिन आप जान लेंगे कि 'मैं' कौन है —
उस दिन भैरव से अलग नहीं रहेंगे।"

े अन्तिम 17 धारणाएँ विज्ञान भैरव का शिखर हैं। यहाँ शिव साधक को सबसे गहरे प्रश्न पर ले जाते हैं — "मैं" कौन है?

हम सब "मैं" शब्द दिनभर बोलते हैं। "मैं भूखा हूँ", "मैं ख़ुश हूँ", "मैं वही हूँ"। पर "मैं" है क्या? कहाँ है? यह जिस दिन समझ आ गया, उस दिन सब समझ आ गया।

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धारणा 96-100

"मैं" का अन्वेषण

धारणा 96: "मैं हूँ" — यह वाक्य मन में बोलिए। फिर पूछिए — "हूँ" क्या? साँस लेता हूँ इसलिए हूँ? सोचता हूँ इसलिए हूँ? या "हूँ" से पहले भी कुछ है?

धारणा 97: शीशे में अपना चेहरा देखिए। आँखों में देखिए। पूछिए — "जो देख रहा है, वह कौन है?" शीशे में जो दिख रहा है — वह "मैं" है? या जो देख रहा है, वह "मैं" है?

धारणा 98: शरीर के एक-एक अंग का नाम लीजिए। "यह मेरा हाथ है। यह मेरा पैर है।" फिर पूछिए — "जिसका हाथ है, वह कौन?"

धारणा 99: विचार आता है। दूसरा आता है। तीसरा। पूछिए — "वह कौन है जो इन विचारों को 'मेरे विचार' कह रहा है?" विचार से पीछे जाइए।

धारणा 100: गहरी नींद — कोई विचार नहीं, कोई शरीर का बोध नहीं। फिर भी सुबह आप कहते हैं "मैं अच्छी नींद सोया।" तो उस नींद में "आप" कौन थे? जो अच्छी नींद का अनुभव कर रहा था?

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धारणा 101-105

साक्षी-भाव की स्थापना

सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः ।
स एवाहं शैवधर्मा इति दार्ढ्याच्छिवो भवेत् ॥

अर्थ

"सर्वज्ञ, सर्व-कर्ता, व्यापक परमेश्वर — वही मैं हूँ — यह शैव-धर्म का दृढ़ निश्चय जब आता है, तब साधक शिव बन जाता है।"

धारणा 101: सुबह उठते ही पहले शब्द — "शिवोऽहम्" (मैं शिव हूँ)। दिन में सौ बार। शाम होते-होते यह भाव हड्डियों में बैठ जाता है।

धारणा 102: कोई काम करते समय — "जो कर रहा है, वह शिव है"। बर्तन धो रहे? शिव। खाना खा रहे? शिव। हर क्रिया दैवीय।

धारणा 103: दूसरे को देखते समय — "जो दूसरे में बैठा है, वह भी मैं ही हूँ"। अहं घुलता है।

धारणा 104: "मैं" शब्द को रोज़ छोटा कीजिए। "मैं" → "मैं?" → "?"। हर बार थोड़ा संशय। हर बार थोड़ी विनम्रता।

धारणा 105: रात को सोने से पहले — "जो आज दिन भर 'मैं' था, अब सो जा। मैं तेरा साक्षी हूँ।" यह विभाजन ही जागरण।

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धारणा 106-110

समाधि की अन्तिम सीढ़ियाँ

धारणा 106: सब कुछ "मेरा अंश" है। प्रिय भी, अप्रिय भी। मित्र भी, शत्रु भी। यह अद्वैत-भावना।

धारणा 107: सुख आये — "यह भी मैं"। दुःख आये — "यह भी मैं"। दोनों भाव बराबर। यह समत्व।

धारणा 108: मृत्यु के क्षण की कल्पना। "अब मैं जा रहा हूँ" — पर कौन जा रहा है? शरीर तो रह जाएगा। जो जाएगा वही असली "मैं"।

धारणा 109: अपने प्रिय व्यक्ति के बारे में सोचिए — जो अब नहीं है। उसकी "अनुपस्थिति" को महसूस कीजिए। पर "जो महसूस कर रहा है" — वह अब भी है। तो आप भी कभी नहीं जाएँगे।

धारणा 110: "कुछ नहीं" — पूर्ण शून्य। न शरीर, न विचार, न भाव, न पहचान। पर "जो जान रहा है कि कुछ नहीं है" — वह तो है। वही आप।

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धारणा 111-112

पूर्णाहुति — अन्तिम दो

यथा तथा वा देहोऽयं देहत्वेन यदा परम् ।
प्रमाणसमयं प्राप्तं तदा भैरवतां व्रजेत् ॥

धारणा 111: "मैं शरीर हूँ" — यह भ्रम। शरीर तो आता-जाता है। जो "है", वह शरीर नहीं। शरीर से एक बार पूरी तरह विमुख हो जाइए — कुछ ही पल के लिए। उस पल में जो रहता है — वही आप।

धारणा 112: अन्तिम — और सबसे सरल। "मैं भैरव हूँ।" बस। पूछिए नहीं। तर्क नहीं। बस यह घोषणा। दिन में सौ बार। एक दिन यह घोषणा सच हो जाएगी — क्योंकि वह पहले से सच है।

वास्तु से अन्तिम जोड़ — घर में भैरव-भाव

जब आप यह जान लेते हैं कि "मैं भैरव हूँ" — तब घर का अर्थ बदल जाता है। घर अब "रहने की जगह" नहीं — घर "मेरा विस्तार" है।

हर दीवार आपका अंग है। हर खिड़की आपकी आँख है। हर दीया आपका हृदय है। ऐसे घर में बैठकर आप दुनिया को देखते हैं — और दुनिया आपको।

यही सर्वोच्च वास्तु है। नियमों से ऊपर। ज्यामिति से परे। बस — एक भाव।

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112 का सार

विज्ञान भैरव की 112 धारणाओं को यदि एक वाक्य में लिखें, तो वह यह है — "जो भी आप कर रहे हैं, उसी में पूर्ण जागरूक रहिए — वहीं भैरव हैं।"

श्वास में भैरव। आँख में भैरव। भोजन में भैरव। क्रोध में भैरव। मौन में भैरव। शून्य में भैरव।

112 तकनीकें — 112 खिड़कियाँ। एक खिड़की चुनिए। उसी में बैठिए। समय के साथ बाक़ी 111 भी अपने आप खुलेंगी। यही विज्ञान भैरव की क्रान्ति है।

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विस्तृत व्याख्या — शिवोऽहम् और तत्त्वमसि

तन्त्र का "शिवोऽहम्" और वेदान्त का "अहं ब्रह्मास्मि"

देखने में ये दो अलग सूत्र लगते हैं, पर सार एक है —

तन्त्र कहता है — "शिवोऽहम्" (मैं शिव हूँ)। यह घोषणा साधक स्वयं करता है।

वेदान्त कहता है — "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ)। यह घोषणा भी साधक स्वयं करता है।

शिव और ब्रह्म — दो नाम, एक तत्त्व। दोनों चेतन-स्वरूप, सर्व-व्यापक, परम-तत्त्व का बोध हैं।

श्लोक (अध्याय में दिया गया) कहता है —

"सर्वज्ञः सर्व-कर्ता च व्यापकः परमेश्वरः ।
स एवाहं शैव-धर्मा इति दार्ढ्याच्छिवो भवेत् ॥"
— सर्वज्ञ, सर्व-कर्ता, व्यापक परमेश्वर — वही मैं हूँ — यह दृढ़ हो जाने पर साधक स्वयं शिव हो जाता है।

तत्त्वमसि — एक महावाक्य का रहस्य

उपनिषदों में चार महावाक्य हैं। उनमें सबसे प्रसिद्ध है — "तत्त्वमसि" (तू वह है)।

यह केवल शब्द नहीं — यह गुरु द्वारा शिष्य पर किया गया एक "शक्तिपात" है। जब गुरु यह वाक्य उच्चारित करता है उस क्षण में जब शिष्य पात्र हो — तो शिष्य के "मैं" का भ्रम टूट जाता है। उसे यह अनुभव होता है — "मैं वह ब्रह्म ही हूँ।"

तन्त्र की भाषा में यही "शक्तिपात" है। ईश्वर के अनुग्रह के बिना, सद्गुरु के बिना, यह बोध नहीं हो सकता। शास्त्र-पठन से बौद्धिक समझ हो सकती है — पर वह वास्तविक बोध नहीं।

हृदय-ग्रन्थि का भिदना

मुण्डक उपनिषद् का प्रसिद्ध सूत्र —

"भिद्यते हृदय-ग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्व-संशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥"
— जब उस पर-अवर (परम तत्त्व) के दर्शन होते हैं, तब हृदय की ग्रन्थि भिद जाती है, सारे संशय छिद जाते हैं, और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं।

यह तीन-स्तरीय परिवर्तन है —

1. भावनात्मक — हृदय की ग्रन्थि टूटना। अहं का मोह नष्ट होना।

2. बौद्धिक — संशयों का छेद होना। शंकाएँ समाप्त।

3. कर्म-शास्त्रीय — संचित कर्मों का क्षय। नये बन्धन नहीं बनते।

तीनों एक साथ होते हैं। यह कोई धीमी प्रक्रिया नहीं — यह एक क्षण की क्रान्ति है। पर उस क्षण के लिए तैयारी जीवन-भर की लगती है।

जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त — दो प्रकार की मुक्ति

शास्त्र दो प्रकार की मुक्ति की बात करते हैं —

जीवन्मुक्त — जो जीते-जी ही मुक्त हो गया। शरीर है, पर बन्धन नहीं। काम करता है, पर कर्म-फल से अप्रभावित।

विदेह-मुक्त — जिसकी मुक्ति शरीर त्यागने पर पूर्ण हो गयी।

"विज्ञान भैरव में जो भी एक विधि द्वारा चित्त को एकाग्र करने वाला साधक
जीवनपर्यन्त जीवन्मुक्त अवस्था में रहता है,
तथा मृत्यु के उपरान्त वह विदेह-मुक्ति को प्राप्त हो जाता है।"

इसका अर्थ — 112 धारणाओं में से एक भी एक की पूर्ण साधना करने वाला साधक उसी जन्म में मुक्त हो जाता है। मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं।

अहं और ममकार का भेद

एक सूक्ष्म अन्तर — अहं (मैं) और ममकार (मेरा)।

"मैं हूँ" यह बोध सत्य है। यह आत्मा का सहज स्फुरण है। "मेरा है" यह बोध माया है। यह वस्तुओं से तादात्म्य है।

अहं को मिटाने की आवश्यकता नहीं। ममकार को मिटाने की आवश्यकता है। अहं को शुद्ध करना है — "मैं शरीर" से "मैं चेतना" तक।

अध्याय 9 की सारी 17 धारणाएँ इसी रूपान्तरण की हैं — परिमित "मैं" से असीम "मैं" तक की यात्रा।

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

— अध्याय नौ समाप्त —

अन्तिम अध्याय में — देवी की पुकार और शिव का अन्तिम आशीर्वाद

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