विज्ञान भैरव तन्त्र

विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 13 — तन्त्र की 108 शिक्षाएँ

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VastuGuruji Team 20 Jun 2026

विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 13 — तन्त्र की 108 शिक्षाएँ

अध्याय तेरह

108 सूत्रों का रत्न-कोश — जीवन-भर का साथी

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"एक शिक्षा को पढ़ो।
उसे दिनभर मन में रखो।
शाम तक एक नया मनुष्य बनो।"

यह अध्याय तन्त्र शास्त्र की मूल शिक्षाओं का संग्रह है — एक रत्न-कोश। ये सूत्र विज्ञान भैरव और इसकी मूल परम्परा रुद्र-यामल से निकले हैं। हर सूत्र अपने आप में पूरा है।

इन्हें एक साथ नहीं पढ़ना है। एक दिन एक सूत्र चुनिए। उस पर पूरा दिन मनन कीजिए। कल अगला। 108 दिन की एक साधना-यात्रा।

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ईश्वर और शक्ति के सूत्र (1-15)

1. ईश्वर के पाँच कार्य हैं — सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह।

2. तिरोधान के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है।

3. ईश्वर के अनुग्रह से ही जीव जन्म-मृत्यु से मुक्त होता है।

4. ईश्वरीय ज्ञान ईश्वर के अनुग्रह के बिना तथा बिना गुरु के नहीं होता।

5. भैरव के निराकार और साकार दो रूप हैं। साकार अस्थिर, निराकार शाश्वत।

6. सत्य ज्ञान की प्राप्ति पर मिथ्या ज्ञान को साँप अपनी केंचुली की तरह त्याग देता है।

7. निष्कल का वर्णन नहीं हो सकता। वह स्वानुभव का विषय है।

8. परम तत्त्व का न कोई कारण है, न कार्य।

9. शक्ति के तीन रूप हैं — परा, परापरा, अपरा। शक्ति शक्तिमान से भिन्न नहीं।

10. ईश्वर-कृपा सब पर नहीं होती। पात्रता के लिए आरम्भ में प्रयत्न करना ही पड़ेगा।

11. शिव ज्ञान-स्वरूप है, क्रिया नहीं करता। सब क्रियाएँ शक्ति से होती हैं।

12. शिव अर्धनारीश्वर है — चेतन व शक्ति का संयुक्त रूप। मनुष्य भी अर्धनारीश्वर है।

13. शिव को सीधा नहीं साधा जा सकता। शक्ति की सहायता से ही पहचान होती है।

14. जहाँ चेतना है वहाँ शक्ति है; जहाँ शक्ति है वहाँ चेतना है। दोनों अभिन्न।

15. सूर्य से उसका प्रकाश भिन्न नहीं — शिव से उसकी शक्ति भिन्न नहीं।

सृष्टि और प्राण के सूत्र (16-30)

16. बीज में पूरा वृक्ष समाया रहता है — चैतन्य में सम्पूर्ण सृष्टि।

17. इच्छा, ज्ञान और क्रिया ही सृष्टि-रचना का कारण है।

18. शरीरों में वही शक्ति प्राण-रूप में सभी जीवों को जीवन देती है।

19. प्राण और अपान के मध्य का अवकाश ही ध्यान-स्थल है।

20. सब विचार बन्द होने पर जो शान्त अवस्था है, वही समाधि है।

21. संसार मन की वृत्ति के अनुसार दिखाई देता है। मन बदले — संसार बदले।

22. ध्यान स्थूल से शुरू करो। फिर सूक्ष्म। अन्त में शिव-रूप ही बच जाओगे।

23. परम-ज्योति शिव-शक्ति स्वरूप है। योगी इसका प्रत्यक्ष दर्शन करता है।

24. शरीर के भीतर अनाहत-नाद निरन्तर चलता रहता है। यही शब्द-ब्रह्म है।

25. संगीत-शास्त्र में प्रवीण व्यक्ति अनायास ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

26. ॐ ही ईश्वर का वास्तविक स्वरूप है। "सोऽहं" इसी का रूप है।

27. सांसारिक पदार्थों का अस्तित्व उस परम चैतन्य से ही है।

28. भिन्नता की प्रतीति अज्ञान के कारण है।

29. ज्ञान की साधना ही जीवन को उच्चता देती है।

30. केवल चेतन आत्मा सत्-स्वरूप है, अन्य सब मिथ्या।

मन और ध्यान के सूत्र (31-50)

31. मन को किसी एक स्थान पर केन्द्रित करो — विधि कोई भी हो।

32. स्वयं को जान लेना ही परमेश्वर को जान लेना है। मुक्ति = परम स्वतन्त्रता।

33. सृष्टि स्थूल, सूक्ष्म व पर — तीन रूपों में विद्यमान है।

34. शिव अपनी दो शक्तियों — चेतन व क्रिया — से ही सृष्टि-रचना करते हैं।

35. जगत् मन से ही कल्पित है। मन बदले बिना संसार नहीं बदलता।

36. संसार बाधा नहीं — मन ही बाधा है। मन के विलीन होने पर वह ब्रह्म।

37. 112 धारणाएँ मन की वृत्तियों को गलित करने की विधियाँ हैं।

38. दो विचारों के मध्य का अवकाश — वही स्थिर अवस्था है।

39. मन की चंचलता से ही आत्मा का बिम्ब साफ़ नहीं दिखाई देता।

40. चित्त शून्य अवस्था में पहुँचने पर ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता — तीनों एक।

41. चित्त अपनी इच्छित वस्तु की ओर ही आकर्षित होता है।

42. चित्त पवन-रहित स्थान के दीपक की तरह स्थिर हो — यही ब्रह्म-स्वरूप।

43. मन भेद का जनक है। आत्मा के तल पर ही अभेद का ज्ञान होता है।

44. वास्तविक आनन्द बाह्य विषयों में नहीं — स्वयं के भीतर है।

45. आनन्द चेतन आत्मा के कारण होता है। आत्मा स्वयं आनन्द-स्वरूप।

46. शरीरों में भेद होने से आत्म-चेतना में भेद नहीं होता।

47. आत्माओं को भिन्न मानने वालों की दृष्टि ही विकृति पैदा करती है।

48. भोग का आनन्द भी स्वाभाविक आनन्द ही है — ब्रह्मानन्द-सहोदर।

49. भोजन-पान से जो सुख मिलता है — वह भी स्व-आत्म-सुख है।

50. पाँचों ज्ञानेन्द्रियों का आनन्द भी स्व-चेतना का आनन्द है।

आत्म-बोध और जीवन के सूत्र (51-75)

51. आनन्द मनुष्य का स्वभाव है। उसी में तन्मय होना — उपलब्धि।

52. मन जिस सुन्दर वस्तु की ओर जाता है — उसी में स्थिर करने का अभ्यास।

53. चित्त में स्पन्दन न हो, हलचल न हो — वही परमगति।

54. ध्यान में आँखें खुली होने पर भी बाहरी वस्तुएँ न दिखाई दें — परावस्था।

55. ध्यान में आत्मा का प्रकाश दिखाई देने लगता है।

56. मन के शान्त होने पर आत्म-स्वरूप का अनुभव।

57. स्थूल पदार्थ पर एकटक दृष्टि — मन अन्तर्मुख होता है।

58. प्राणों को स्थिर करने से एकाग्रता सिद्ध होती है।

59. भीतर का सुख अनुभव होने पर बाह्य सुख अपने आप छूट जाते हैं।

60. धार्मिक भावना दृढ़ होने पर यौन-आकर्षण कम हो जाता है।

61. सृष्टि का प्रथम तत्त्व शिव है। यही परमेश्वर।

62. परमात्मा शून्य-स्वभाव भी आकाश की तरह सत्ता-रूप है।

63. ईश्वर विश्व-व्यापी चैतन्य है — भीतर आत्मा-रूप में।

64. पीड़ा का अनुभव करने वाली चेतना ही है।

65. साधक अन्तर्मुखी होने पर आत्म-स्वरूप का ज्ञान।

66. मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी आत्मा है, मन नहीं।

67. "अयमात्मा ब्रह्म" — यह आत्मा ही ब्रह्म।

68. शरीरों के भिन्न होने से चेतन में भिन्नता नहीं आती।

69. मन वासना-ग्रस्त है। वासना ही जन्म-पुनर्जन्म का कारण।

70. काम, क्रोध, लोभ, मोह — चित्त की वृत्तियाँ। किसी एक में धारणा।

71. कछुए की तरह सब वृत्तियों को भीतर समेटना — सुख।

72. जिन्होंने उच्च नहीं जाना — वे ही निम्न को स्वीकार करते हैं।

73. सिनेमा के पर्दे की तरह जगत् भ्रम-स्वरूप है।

74. सुख-दुःख मन के धर्म हैं। चेतन को नहीं होते।

75. मन की निरालम्ब अवस्था ही चैतन्य का स्वरूप।

अद्वैत और साधना के सूत्र (76-108)

76. जल से लहर भिन्न नहीं — शिव से विश्व भिन्न नहीं।

77. आत्म-ज्ञान न होने पर ही व्यक्ति विषयों में भटकता है।

78. सद्गुरु से ही उस परम तत्त्व की जिज्ञासा होती है।

79. चित्त की एकाग्रता बिना श्रेष्ठता प्राप्त नहीं हो सकती।

80. चित्त की निर्विकल्प अवस्था में शिव का स्वरूप अभिव्यक्त।

81. शरीर-शुद्धि साक्षात्कार में सहायक नहीं। इसको अशुद्धि ही मानो।

82. शुद्ध मन ही ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है।

83. ज्ञानी विषयों का उपभोग करता है — पर जल में कमल की तरह निर्लिप्त।

84. सब स्नानों में मानस-स्नान सर्वोत्तम।

85. सृष्टि का सारा ज्ञान उस चैतन्य के कारण ही है।

86. सूर्य को कौन प्रकाशित करे? चैतन्य को कौन जाने?

87. सुखी होने का एक राज — सबमें एक ही ब्रह्म।

88. सुख-दुःख का कारण मन की वासना।

89. शिव-तत्त्व शून्य जैसा भासे — पर अशून्य है।

90. चैतन्य को जानने की एक ही विधि — मन को स्थिर करो।

91. सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर का ही रूप। भिन्न मानना भ्रम।

92. द्वैत भयभीत; अद्वैत निर्भय।

93. बन्धन-मोक्ष की कल्पना अज्ञानी के लिए। तत्त्वज्ञानी के लिए सब कल्पना।

94. 112 धारणाओं में एक की भी साधना — साक्षात् भैरव। यह ध्रुव सत्य।

95. कर्मकाण्ड का विधान उन स्थूल शरीरधारियों के लिए — जिन्हें अनुभूति नहीं हुई।

96. आत्मज्ञानी को कर्मकाण्ड की आवश्यकता नहीं। न करना ही अच्छा।

97. "सोऽहम्" की निरन्तर भावना — असली जप।

98. बुद्धि बिना आश्रय स्थिर हो — समाधि अवस्था = ध्यान।

99. चैतन्य-स्वरूप भैरव में दृढ़ आस्था — वास्तविक पूजा।

100. अद्वैत-अवस्था ही जीव की पूर्ण तृप्ति।

101. बोध-भैरव-अग्नि में पंचमहाभूत, इन्द्रिय, विषय, मन — सबकी आहुति = असली होम।

102. जल-स्नान शरीर शुद्ध करता। चेतना का परम-चेतना में विलय = असली स्नान।

103. बाह्य पूजा उनके लिए जो शिव-शक्ति, जीव-शिव, सृष्टि-सृष्टा में भेद करते हैं।

104. उच्च ज्ञान सामान्य को देने का निषेध — दुरुपयोग का खतरा।

105. सार-तत्त्व का त्याग कर असार ग्रहण — बुद्धिमानी नहीं।

106. शिव के उपदेश से भैरवी एकाकार। शिव-शक्ति अद्वय।

107. ग्रन्थ के अन्त में देवी ने रुद्रयामल का रहस्य जान लिया।

108. एक धारणा पर चलकर साधक चित्-शक्ति में विलीन होने की विधि खोज सकता है।

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साधक के लिए मार्गदर्शन

108 सूत्र पढ़ लिए। अब क्या?

एक — इन सबको एक साथ याद रखने की चेष्टा मत कीजिए। यह कोई परीक्षा नहीं।

दो — रोज़ सुबह एक सूत्र चुनिए। उसे एक कागज़ पर लिख कर दिनभर साथ रखिए।

तीन — शाम तक उस पर मनन कीजिए। क्या यह आपके जीवन में लागू है?

चार — रात को सोते समय वह सूत्र मन में रखकर सो जाइए।

पाँच — अगले दिन अगला। 108 दिन में आप पूरा कोश जी चुके होंगे।

यह तीन महीने और 18 दिन की एक यात्रा है। आरम्भ कीजिए। अन्त में नया मनुष्य मिलेगा।

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

— अध्याय तेरह समाप्त —

अगले अध्याय में — गुरु, दीक्षा और मन्त्र-चैतन्य का त्रिक।

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