विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 5 — शरीर का मण्डल
अध्याय पाँच
धारणा 16 से 35 — चक्र, कुण्डलिनी, और देह की वास्तु
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"आपका शरीर एक मन्दिर है।
उसमें सात गर्भगृह हैं।"
अब शिव श्वास से एक कदम आगे ले जाते हैं। अगली 20 धारणाएँ शरीर के अन्दर हैं — चक्र, नाड़ी, और कुण्डलिनी पर। यह तन्त्र का सबसे प्रसिद्ध हिस्सा है।
पर ध्यान दीजिए — शिव यहाँ कोई जटिल हठ-योग नहीं सिखा रहे। न मुद्रा, न आसन, न बंध। बस सूक्ष्म ध्यान और कल्पना। यह क्रान्ति है — कि शरीर का सबसे गहरा अनुभव बैठे-बैठे भी हो सकता है।
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धारणा 16-18
द्वादशान्त पर ध्यान
यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् ।
प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥
अर्थ और तकनीक
"जैसे भी, जहाँ भी — मन को द्वादशान्त पर रखो। हर पल वृत्तियाँ क्षीण होंगी और कुछ ही दिनों में अलग ही अनुभव होगा।"
द्वादशान्त = 12 अंगुल का बिन्दु। नासाग्र से ऊपर — बाह्य द्वादशान्त। मूर्धा (सिर के ऊपर) पर — ऊर्ध्व द्वादशान्त। हृदय में — आन्तरिक द्वादशान्त।
तकनीक सरल — किसी भी समय, कुछ भी करते हुए, मन को इन तीन में से एक बिन्दु पर ले जाइए। बस 10-20 सेकंड के लिए। दिनभर में 50 बार। कुछ ही दिनों में मन का स्वभाव बदलेगा।
वास्तु से जोड़
घर में भी ये द्वादशान्त बिन्दु बनाइए। एक तस्वीर, एक छोटा अल्तार, एक तुलसी का पौधा — आपकी निगाह बार-बार जाए। ध्यान देने के लिए सिर्फ़ "औपचारिक" समय नहीं — हर पल छोटा ध्यान। यही "द्वादशान्त-वास्तु" है।
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धारणा 19-22
कुण्डलिनी का जागरण
धारणा 19: कल्पना कीजिए — रीढ़ की हड्डी के नीचे एक सोता हुआ नाग है। हर साँस के साथ वह जागता है। साँस अन्दर — नाग ऊपर उठता है। साँस बाहर — स्थिर रहता है। नीचे नहीं उतरता।
धारणा 20: सात चक्रों पर क्रम से ध्यान। पहले मूलाधार पर 1 मिनट। फिर स्वाधिष्ठान पर 1 मिनट। ऊपर तक। हर चक्र पर रंग, ध्वनि, और भाव अलग। मूलाधार लाल, स्वाधिष्ठान नारंगी, मणिपूर पीला, अनाहत हरा, विशुद्ध नीला, आज्ञा बैंगनी, सहस्रार स्वर्ण।
धारणा 21: शरीर को "खाली" मानिए। हड्डियाँ नहीं, मांस नहीं, अंग नहीं — बस एक खाली खोल। उस खाली खोल में प्रकाश भर रहा है। 5 मिनट यही कल्पना।
धारणा 22: शरीर को "जलता हुआ" मानिए। हर अंग आग में बदल रहा। राख बच रही। राख भी उड़ गई। बस आकाश। इस तकनीक से अहं-भाव कम होता है।
वास्तु से जोड़ — घर के सात चक्र
घर के भी अपने "चक्र" हैं —
मूलाधार = प्रवेश-द्वार और नींव। स्वाधिष्ठान = स्नानघर और जल-स्रोत। मणिपूर = रसोई (अग्नि)। अनाहत = बैठक/लिविंग रूम (हृदय)। विशुद्ध = बातचीत वाला कक्ष/अध्ययन। आज्ञा = पूजा-घर। सहस्रार = छत/ब्रह्म-स्थान।
यदि किसी एक "चक्र" में रुकावट है — पूरा घर अस्थिर। अगर पूजा-घर भीतर के कमरे में दबा है, या रसोई दक्षिण-पूर्व नहीं है — चक्र खुले नहीं हैं।
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धारणा 23-28
शरीर के अंगों पर ध्यान
धारणा 23: सिर के ऊपर एक छोटे "बिन्दु" पर ध्यान। 12 अंगुल ऊपर। वह बिन्दु आपका असली घर है।
धारणा 24: भ्रू-मध्य (दोनों भौंहों के बीच) — आज्ञा-चक्र — पर ध्यान। वहाँ एक सफ़ेद प्रकाश है। उसी प्रकाश में डूब जाइए।
धारणा 25: कण्ठ (विशुद्ध) पर ध्यान। यहाँ "हम्" की ध्वनि गूँजती है। उसे सुनिए।
धारणा 26: हृदय में 12 पंखुड़ी का कमल। बीच में सोने का बिन्दु। उस बिन्दु में सब कुछ समा जाए।
धारणा 27: नाभि के नीचे 4 अंगुल — हाराह-चक्र (मणिपूर के पास)। यह वह बिन्दु है जहाँ शरीर का सारा बल केन्द्रित है।
धारणा 28: रीढ़ की हड्डी के बिल्कुल आधार पर — मूलाधार। यहाँ कुण्डलिनी सोई है।
सम्मिलित निर्देश
ये छह तकनीकें सब "एक बिन्दु पर ध्यान" की हैं — पर हर बिन्दु अलग प्रभाव देता है। सिर पर ध्यान = वैराग्य बढ़ता है। हृदय पर = प्रेम बढ़ता है। नाभि पर = बल बढ़ता है। मूलाधार पर = स्थिरता आती है।
अपनी ज़रूरत के अनुसार चुनिए।
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धारणा 29-35
शरीर से परे — आकाश-तत्त्व
अन्तिम सात धारणाएँ शरीर को "खोलने" की हैं।
धारणा 29: शरीर के हर अंग को "आकाश" मानिए। हाथ आकाश। पैर आकाश। पूरा शरीर बस खाली स्थान।
धारणा 30: ब्रह्मरन्ध्र (सिर के बीचों-बीच, ऊपर) से प्रकाश-धारा आ रही है। पूरे शरीर में भरती जा रही। शरीर प्रकाश-पुञ्ज बन गया।
धारणा 31: दो भौंहों के बीच ध्यान करते हुए, श्वास को बहुत हलका कीजिए। एक क्षण आता है जब लगता है — श्वास नहीं है। उस क्षण को पकड़िए।
धारणा 32: कल्पना कीजिए — आप मर गए। शरीर निर्जीव पड़ा है। फिर भी "देख" रहे हैं। जो देख रहा है — वही आप हैं।
धारणा 33: शरीर को सीमा-रहित मानिए। न कहाँ शुरू, न कहाँ ख़त्म। बस फैलाव।
धारणा 34: शरीर को "नदी" मानिए। हर पल बदल रहा। कोशिकाएँ मर रही हैं, नई बन रही हैं। फिर भी "मैं" वही हूँ। क्यों?
धारणा 35: शरीर को बिल्कुल भूल जाइए। 10 मिनट के लिए न देखिए, न महसूस कीजिए। बस मन को "खाली" रहने दीजिए। जो बचेगा — वही भैरव।
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शरीर — पहली वास्तु
इन 20 धारणाओं की सबसे बड़ी सीख यह है कि आपका शरीर ही पहली वास्तु है। जिस तरह घर को संतुलित करना ज़रूरी है, उसी तरह शरीर को भी। और जिस तरह घर के नियम हैं — दिशा, ज्यामिति, ऊर्जा — वैसे ही शरीर के भी हैं।
यदि आपके शरीर के सात चक्र सन्तुलित हैं, तो किसी घर की दीवार आपकी ऊर्जा को नहीं रोक सकती। और यदि शरीर अस्थिर है, तो दुनिया का सबसे सही वास्तु-वाला घर भी आपको शान्ति नहीं देगा।
घर की वास्तु बाहर है, शरीर की वास्तु भीतर है। दोनों एक साथ ठीक रखिए।
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विस्तृत व्याख्या — शरीर के 700+ ऊर्जा-केन्द्र
साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य देह में साढ़े तीन करोड़ (3.5 करोड़) नाड़ियाँ हैं। ये सब आत्मा की प्राण-ऊर्जा के वाहक हैं। इनमें 14 प्रमुख नाड़ियाँ हैं, और उन 14 में से तीन सर्वप्रमुख हैं —
• इडा — बायीं ओर, शीतल, चन्द्र-स्वभाव
• पिङ्गला — दायीं ओर, उष्ण, सूर्य-स्वभाव
• सुषुम्ना — मध्य में, रक्त-वर्ण, सर्वश्रेष्ठ। इसके भीतर "चित्रा" नाड़ी, और उसके भीतर "ब्रह्मनाड़ी" मानी जाती है।
नाभि-केन्द्र से लेकर शरीर में सात-सौ से अधिक छोटे-छोटे ऊर्जा-केन्द्र हैं जहाँ ये नाड़ियाँ मिलती हैं। आधुनिक एक्यूप्रेशर व एक्यूपंक्चर चिकित्सा-पद्धति इन्हीं केन्द्रों के उपचार पर आधारित है।
सूक्ष्म शरीर में बारह आधार
योग शास्त्र में पवन के ठहराव के सोलह स्थान हैं — इन्हें "आधार" कहा जाता है। इनमें से 12 स्थान साधना में उपयोगी हैं —
1. जन्माग्र (मूल के नीचे)
2. मूल (मूलाधार)
3. कन्द (नाभि के नीचे)
4. नाभि
5. हृदय
6. कण्ठ
7. तालु
8. भ्रू-मध्य
9. ललाट
10. ब्रह्मरन्ध्र
11. शक्ति
12. व्यापिनी
ये बारह स्थान क्रमशः एक-दूसरे से ऊर्ध्व (ऊपर) स्थित हैं। साधक के लिए यह सीढ़ी है — जिस पर वह क्रमशः नीचे से ऊपर चढ़ता है।
तीन ग्रन्थियाँ — साधना के तीन कड़े पड़ाव
साधक की यात्रा में तीन ग्रन्थियाँ (knots) मिलती हैं जिन्हें तोड़ना पड़ता है —
• ब्रह्म-ग्रन्थि (मणिपूर चक्र) — पुत्रैषणा। संतान, परिवार का मोह।
• विष्णु-ग्रन्थि (अनाहत चक्र) — वित्तैषणा। धन-सम्पत्ति का मोह।
• रुद्र-ग्रन्थि (आज्ञा चक्र) — लोकैषणा। यश-कीर्ति का मोह।
वेदान्त शास्त्र में इन्हीं को तीन एषणाएँ कहा गया है। मुण्डक उपनिषद् कहता है —
"भिद्यते हृदय-ग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्व-संशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥"
— जब परावर (परम तत्त्व) के दर्शन होते हैं, तब हृदय की ग्रन्थि भिद जाती है, सब संशय छिद जाते हैं, और सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं।
वास्तु में सूक्ष्म नाड़ी-संगम
जैसे शरीर में नाड़ियाँ हैं, वैसे ही वास्तु पुरुष मण्डल में भी "मर्म" (joints), "वंश" (विकर्ण-रीढ़), और "शिरा" (grid lines) हैं। ये भवन के सूक्ष्म नाड़ी-तन्त्र हैं।
निर्माण के समय इन सूक्ष्म रेखाओं पर —
• खंभा न रखें (मर्म पर चोट)
• कील न ठोकें (शिरा को छेद)
• भारी सामान न दबाएँ (वंश पर बोझ)
यदि इन तीन नियमों का पालन हो जाये, तो घर का "नाड़ी-तन्त्र" स्वस्थ रहेगा और ऊर्जा-प्रवाह बना रहेगा। यह वास्तु का सूक्ष्मतम पहलू है।
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
— अध्याय पाँच समाप्त —
अगले अध्याय में — आकाश, शून्य, और प्रकाश की धारणाएँ
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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