विज्ञान भैरव तन्त्र

विज्ञान भैरव अध्याय 5: शरीर का मण्डल — धारणा 16-35 | VastuGuruji

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VastuGuruji Team 20 Jun 2026

विज्ञान भैरव अध्याय 5: शरीर का मण्डल — धारणा 16-35 | VastuGuruji

अध्याय पाँच

धारणा 16 से 35 — चक्र, कुण्डलिनी, और देह की वास्तु

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7 सहस्रार (शिरा) 6 आज्ञा (भ्रू-मध्य) 5 विशुद्ध (कण्ठ) 4 अनाहत (हृदय) 3 मणिपूर (नाभि) 2 स्वाधिष्ठान (त्रिक) 1 मूलाधार (आधार) कुण्डलिनी का मार्ग
सात चक्र — रीढ़ की सूक्ष्म नदी

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"आपका शरीर एक मन्दिर है।
उसमें सात गर्भगृह हैं।"

ब शिव श्वास से एक कदम आगे ले जाते हैं। अगली 20 धारणाएँ शरीर के अन्दर हैं — चक्र, नाड़ी, और कुण्डलिनी पर। यह तन्त्र का सबसे प्रसिद्ध हिस्सा है।

पर ध्यान दीजिए — शिव यहाँ कोई जटिल हठ-योग नहीं सिखा रहे। न मुद्रा, न आसन, न बंध। बस सूक्ष्म ध्यान और कल्पना। यह क्रान्ति है — कि शरीर का सबसे गहरा अनुभव बैठे-बैठे भी हो सकता है।

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धारणा 16-18

द्वादशान्त पर ध्यान

यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् ।
प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥

अर्थ और तकनीक

"जैसे भी, जहाँ भी — मन को द्वादशान्त पर रखो। हर पल वृत्तियाँ क्षीण होंगी और कुछ ही दिनों में अलग ही अनुभव होगा।"

द्वादशान्त = 12 अंगुल का बिन्दु। नासाग्र से ऊपर — बाह्य द्वादशान्त। मूर्धा (सिर के ऊपर) पर — ऊर्ध्व द्वादशान्त। हृदय में — आन्तरिक द्वादशान्त।

तकनीक सरल — किसी भी समय, कुछ भी करते हुए, मन को इन तीन में से एक बिन्दु पर ले जाइए। बस 10-20 सेकंड के लिए। दिनभर में 50 बार। कुछ ही दिनों में मन का स्वभाव बदलेगा।

वास्तु से जोड़

घर में भी ये द्वादशान्त बिन्दु बनाइए। एक तस्वीर, एक छोटा अल्तार, एक तुलसी का पौधा — आपकी निगाह बार-बार जाए। ध्यान देने के लिए सिर्फ़ "औपचारिक" समय नहीं — हर पल छोटा ध्यान। यही "द्वादशान्त-वास्तु" है।

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धारणा 19-22

कुण्डलिनी का जागरण

धारणा 19: कल्पना कीजिए — रीढ़ की हड्डी के नीचे एक सोता हुआ नाग है। हर साँस के साथ वह जागता है। साँस अन्दर — नाग ऊपर उठता है। साँस बाहर — स्थिर रहता है। नीचे नहीं उतरता।

धारणा 20: सात चक्रों पर क्रम से ध्यान। पहले मूलाधार पर 1 मिनट। फिर स्वाधिष्ठान पर 1 मिनट। ऊपर तक। हर चक्र पर रंग, ध्वनि, और भाव अलग। मूलाधार लाल, स्वाधिष्ठान नारंगी, मणिपूर पीला, अनाहत हरा, विशुद्ध नीला, आज्ञा बैंगनी, सहस्रार स्वर्ण।

धारणा 21: शरीर को "खाली" मानिए। हड्डियाँ नहीं, मांस नहीं, अंग नहीं — बस एक खाली खोल। उस खाली खोल में प्रकाश भर रहा है। 5 मिनट यही कल्पना।

धारणा 22: शरीर को "जलता हुआ" मानिए। हर अंग आग में बदल रहा। राख बच रही। राख भी उड़ गई। बस आकाश। इस तकनीक से अहं-भाव कम होता है।

वास्तु से जोड़ — घर के सात चक्र

घर के भी अपने "चक्र" हैं —

मूलाधार = प्रवेश-द्वार और नींव। स्वाधिष्ठान = स्नानघर और जल-स्रोत। मणिपूर = रसोई (अग्नि)। अनाहत = बैठक/लिविंग रूम (हृदय)। विशुद्ध = बातचीत वाला कक्ष/अध्ययन। आज्ञा = पूजा-घर। सहस्रार = छत/ब्रह्म-स्थान।

यदि किसी एक "चक्र" में रुकावट है — पूरा घर अस्थिर। अगर पूजा-घर भीतर के कमरे में दबा है, या रसोई दक्षिण-पूर्व नहीं है — चक्र खुले नहीं हैं।

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धारणा 23-28

शरीर के अंगों पर ध्यान

धारणा 23: सिर के ऊपर एक छोटे "बिन्दु" पर ध्यान। 12 अंगुल ऊपर। वह बिन्दु आपका असली घर है।

धारणा 24: भ्रू-मध्य (दोनों भौंहों के बीच) — आज्ञा-चक्र — पर ध्यान। वहाँ एक सफ़ेद प्रकाश है। उसी प्रकाश में डूब जाइए।

धारणा 25: कण्ठ (विशुद्ध) पर ध्यान। यहाँ "हम्" की ध्वनि गूँजती है। उसे सुनिए।

धारणा 26: हृदय में 12 पंखुड़ी का कमल। बीच में सोने का बिन्दु। उस बिन्दु में सब कुछ समा जाए।

धारणा 27: नाभि के नीचे 4 अंगुल — हाराह-चक्र (मणिपूर के पास)। यह वह बिन्दु है जहाँ शरीर का सारा बल केन्द्रित है।

धारणा 28: रीढ़ की हड्डी के बिल्कुल आधार पर — मूलाधार। यहाँ कुण्डलिनी सोई है।

सम्मिलित निर्देश

ये छह तकनीकें सब "एक बिन्दु पर ध्यान" की हैं — पर हर बिन्दु अलग प्रभाव देता है। सिर पर ध्यान = वैराग्य बढ़ता है। हृदय पर = प्रेम बढ़ता है। नाभि पर = बल बढ़ता है। मूलाधार पर = स्थिरता आती है।

अपनी ज़रूरत के अनुसार चुनिए।

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धारणा 29-35

शरीर से परे — आकाश-तत्त्व

अन्तिम सात धारणाएँ शरीर को "खोलने" की हैं।

धारणा 29: शरीर के हर अंग को "आकाश" मानिए। हाथ आकाश। पैर आकाश। पूरा शरीर बस खाली स्थान।

धारणा 30: ब्रह्मरन्ध्र (सिर के बीचों-बीच, ऊपर) से प्रकाश-धारा आ रही है। पूरे शरीर में भरती जा रही। शरीर प्रकाश-पुञ्ज बन गया।

धारणा 31: दो भौंहों के बीच ध्यान करते हुए, श्वास को बहुत हलका कीजिए। एक क्षण आता है जब लगता है — श्वास नहीं है। उस क्षण को पकड़िए।

धारणा 32: कल्पना कीजिए — आप मर गए। शरीर निर्जीव पड़ा है। फिर भी "देख" रहे हैं। जो देख रहा है — वही आप हैं।

धारणा 33: शरीर को सीमा-रहित मानिए। न कहाँ शुरू, न कहाँ ख़त्म। बस फैलाव।

धारणा 34: शरीर को "नदी" मानिए। हर पल बदल रहा। कोशिकाएँ मर रही हैं, नई बन रही हैं। फिर भी "मैं" वही हूँ। क्यों?

धारणा 35: शरीर को बिल्कुल भूल जाइए। 10 मिनट के लिए न देखिए, न महसूस कीजिए। बस मन को "खाली" रहने दीजिए। जो बचेगा — वही भैरव।

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शरीर — पहली वास्तु

इन 20 धारणाओं की सबसे बड़ी सीख यह है कि आपका शरीर ही पहली वास्तु है। जिस तरह घर को संतुलित करना ज़रूरी है, उसी तरह शरीर को भी। और जिस तरह घर के नियम हैं — दिशा, ज्यामिति, ऊर्जा — वैसे ही शरीर के भी हैं।

यदि आपके शरीर के सात चक्र सन्तुलित हैं, तो किसी घर की दीवार आपकी ऊर्जा को नहीं रोक सकती। और यदि शरीर अस्थिर है, तो दुनिया का सबसे सही वास्तु-वाला घर भी आपको शान्ति नहीं देगा।

घर की वास्तु बाहर है, शरीर की वास्तु भीतर है। दोनों एक साथ ठीक रखिए।

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

— अध्याय पाँच समाप्त —

अगले अध्याय में — आकाश, शून्य, और प्रकाश की धारणाएँ

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