विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 4 — श्वास का विज्ञान
अध्याय चार
पहली 15 धारणाएँ — प्राण के द्वार से भैरव तक
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"साँस आपकी सबसे पुरानी शिक्षक है।
उसे ध्यान से सुनो — वह सब बता देगी।"
यहाँ से विज्ञान भैरव की असली यात्रा शुरू होती है — 112 धारणाओं की। हर धारणा एक-दो पंक्ति की है। हर एक अपने आप में पूरी साधना। इस अध्याय में पहली 15 धारणाएँ — सभी श्वास से सम्बन्धित।
शिव ने श्वास से क्यों शुरू किया? क्योंकि यह सबसे सरल है। हर कोई साँस लेता है। कोई धन नहीं चाहिए, कोई शिक्षा नहीं चाहिए, कोई गुरु की भी प्रत्यक्ष उपस्थिति नहीं चाहिए। बस साँस — जो हमेशा से आपके साथ है।
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धारणा 1 — श्लोक 24
श्वास के दो छोरों पर ध्यान
ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो विसर्गात्मा परोच्चरेत् ।
उत्पत्तिद्वितयस्थाने भरणाद् भरितः स्थितिः ॥
तकनीक
एक शान्त जगह बैठिए। साँस को बिना बदले सिर्फ़ देखिए। ध्यान सबसे ऊपर के बिन्दु पर ले जाइए — जहाँ साँस बाहर जाती है (नासाग्र से 12 अंगुल ऊपर/बाहर — बाह्य द्वादशान्त)। फिर सबसे नीचे के बिन्दु पर — जहाँ साँस अन्दर रुकती है (हृदय-गुहा, आन्तरिक द्वादशान्त)। दोनों के बीच की यात्रा देखते रहिए। कुछ दिनों में आप पाएँगे — दोनों छोरों पर एक "खाली पल" है। उस खाली पल में बैठिए।
वास्तु से जोड़
घर में भी ये "द्वादशान्त" बिन्दु हैं। मुख्य द्वार से 12 कदम बाहर — वह "बाह्य द्वादशान्त" है। यह क्षेत्र साफ़ रखिए। और घर के ब्रह्म-स्थान का केन्द्र — वह "आन्तरिक द्वादशान्त" है। इन दो बिन्दुओं के बीच घर की पूरी ऊर्जा बहती है।
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धारणा 2 — श्लोक 25
श्वास के विराम-बिन्दु में स्थिति
मरुतोऽन्तर्बहिर्वापि वियद्युग्मानिवर्तनात् ।
भैरव्या भैरवस्येत्थं भैरवि व्यज्यते वपुः ॥
अर्थ और तकनीक
"प्राण-वायु अन्दर या बाहर — दोनों जगह — जब रुकती है, तब भैरव का स्वरूप प्रकट होता है, हे भैरवी।"
यह विज्ञान भैरव की सबसे प्रसिद्ध धारणाओं में से एक है। तकनीक — साँस छोड़िए। पूरी निकल जाए। नई साँस लेने से ठीक पहले एक क्षण रुकता है — वहाँ रुकिए। उसी क्षण को बार-बार पहचानिए। यही "भैरवी की स्थिति" है।
यह क्षण आपकी साँस में हर बार आता है — आप उसे नहीं पहचानते। एक बार पहचान लिए, तो जीवनभर का सहारा बन जाता है।
वास्तु से जोड़
घर में एक "विराम बिन्दु" होना चाहिए। एक ऐसा कोना जहाँ आप पाँच मिनट चुपचाप बैठ सकें। न TV, न फ़ोन, न बातचीत। बस मौन। यदि घर में यह जगह नहीं है — तो घर "साँस नहीं ले रहा है"।
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धारणा 3 से 7
श्वास के सूक्ष्म रूप
श्लोक 26 से 30 तक शिव श्वास की कई सूक्ष्म तकनीकें बताते हैं —
धारणा 3: साँस को "हम्" और "स" की ध्वनि के रूप में सुनिए — अन्दर आती तो "स", बाहर जाती तो "ह"। यह "हंस-मन्त्र" प्रकृति का दिया हुआ मन्त्र है। दिनभर साँस लेते हुए यही जप अपने आप होता है। उसे पहचानिए।
धारणा 4: साँस की "12 अंगुल" की लम्बाई पर ध्यान। नासाग्र से शुरू होकर हृदय तक — 12 अंगुल। इस पूरी यात्रा को सेकंड-दर-सेकंड देखिए।
धारणा 5: साँस को बिना बदले — बस गिनिए। एक अन्दर, एक बाहर — एक चक्र। दस चक्र पूरे करिए बिना ध्यान भटके। नहीं कर पाते? फिर से शुरू।
धारणा 6: साँस को कुम्भक के बीच रोकिए — पर बल से नहीं, सहज रूप से। जब तक सहज है, रोकिए। बल पड़े — छोड़ दीजिए।
धारणा 7: साँस को ध्यान नहीं देना — साँस को "गायब" कर देना। बस बैठिए और देखते रहिए कि साँस आ रही है या नहीं। एक पल आता है जब आप समझ नहीं पाते कि अन्दर है या बाहर। उसी पल में बैठिए।
सामूहिक वास्तु निर्देश
ये पाँच धारणाएँ बताती हैं कि "सूक्ष्मता" के अलग-अलग स्तर हैं। वास्तु में भी यही है। एक सरल नियम है "रसोई दक्षिण-पूर्व"। पर सूक्ष्म स्तर पर — रसोई के बर्तन, बर्नर की दिशा, धुएँ का निकास, अग्नि के सामने का दृश्य — सब मायने रखते हैं। पहले सरल नियम, फिर सूक्ष्मता।
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धारणा 8 — श्लोक 31
श्वास के साथ कुण्डलिनी का जागरण
उद्गच्छन्तीं तडिद्रूपां प्रतीचक्रं क्रमात्क्रमम् ।
ऊर्ध्वं मुष्टित्रयं यावत् तावदन्ते महोदयः ॥
अर्थ
"बिजली के समान चमकती हुई (कुण्डलिनी), एक चक्र से दूसरे चक्र की ओर — क्रमशः ऊपर उठती हुई, जब तीन मुष्टि (मुठ्ठियाँ) ऊपर पहुँचती है, तब महान उदय होता है।"
यहाँ श्वास के साथ कुण्डलिनी के ऊपर उठने का संकेत है। हर साँस के साथ कल्पना कीजिए — एक प्रकाश-धारा रीढ़ की हड्डी से ऊपर उठ रही है। पहले मूलाधार (नाभि के नीचे), फिर मणिपूर (नाभि), फिर अनाहत (हृदय)। तीन "मुष्टि" यानी तीनों मुख्य चक्र।
वास्तु से जोड़
घर के तीन मुख्य "चक्र" हैं — प्रवेश-द्वार (मूलाधार), रसोई (मणिपूर — अग्नि), और पूजा-घर (अनाहत — हृदय)। तीनों जब संतुलित हों — घर की कुण्डलिनी जागृत।
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धारणा 9 से 15
श्वास के साथ रूपान्तरण
श्लोक 32 से 38 तक की धारणाएँ — सब श्वास से सम्बन्धित, पर अब साधक भीतर की यात्रा करता है।
धारणा 9: साँस को "ओम्" मानिए। हर अन्दर आती साँस — "अ"। रुकाव — "उ"। बाहर जाती साँस — "म"। बाद का मौन — बिन्दु। एक पूरा "ओम्" हर श्वास में।
धारणा 10: साँस को रंग के रूप में देखिए। अन्दर आती — सफ़ेद/नीली। बाहर जाती — गुलाबी/स्वर्ण। बीच — स्वच्छ प्रकाश।
धारणा 11: साँस को "हृदय में फूल खिलना" मानिए। हर साँस के साथ एक पंखुड़ी खुलती है। पूरा कमल — पूरी पूर्णता।
धारणा 12: साँस के साथ शरीर का विस्तार महसूस करिए। साँस अन्दर — शरीर बड़ा हो रहा। साँस बाहर — पूरे ब्रह्माण्ड में फैल रहा। बहुत बार करने के बाद — आप ही ब्रह्माण्ड।
धारणा 13: साँस को "लहर" मानिए, ख़ुद को "समुद्र"। लहरें आती-जाती हैं, समुद्र वही रहता है। साक्षी बनिए।
धारणा 14: साँस छोड़कर — "मैं नहीं हूँ" का भाव। साँस लेकर — "मैं हूँ"। इन दो के बीच जो "है" — वही भैरव।
धारणा 15: श्वास को बिल्कुल भूल जाइए। न देखिए, न नियन्त्रित कीजिए, न ध्यान दीजिए। बस बैठिए। जब आप साँस को भूल जाते हैं, तब साँस आपको याद आती है।
साधक के लिए सलाह
15 तकनीकों में से सिर्फ़ एक चुनिए। 40 दिन उसी का अभ्यास। फिर अगली। एक साथ कई करने का प्रयास — कोई काम नहीं करेगा।
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घर और साधक — एक ही नियम
इस अध्याय की सबसे बड़ी सीख यह है कि घर भी साँस लेता है, और साधक भी।
घर की साँस = हवा का प्रवाह (उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम)। यदि यह रुक जाए — घर बीमार। यदि बहुत तेज़ हो — घर अस्थिर। साधक की साँस = प्राण-अपान। यदि रुक जाए — मृत्यु। यदि अव्यवस्थित हो — अस्वस्थता।
विज्ञान भैरव की पहली 15 धारणाएँ हमें बताती हैं — साँस को देखिए। यह सबसे सस्ती, सबसे सहज, सबसे प्रभावी साधना है।
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विस्तृत व्याख्या — अजपा गायत्री और 21,600 का रहस्य
द्वादशान्त — बारह अंगुल का बिन्दु
योग शास्त्र में हृदय-स्थित कमल-कोश से प्राण का उदय होकर नासिका मार्ग से बाहर निकलकर बारह अंगुल चलकर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है। यह बाहरी द्वादशान्त है। प्राण की इस बाह्य गति को "रेचक" कहा जाता है।
इसी बाह्य आकाश से अपान का उदय होता है तथा नासिका मार्ग से चलकर यह हृदय में विलीन हो जाता है। अपान की इस आन्तरिक गति को "पूरक" कहा जाता है।
जब द्वादशान्त में तथा अपान वायु हृदय में क्षणभर के लिए रुक जाती है, उसे योग शास्त्रों में "कुम्भक" कहा जाता है। यह कुम्भक अवस्था दो तरह की होती है — बाह्य कुम्भक (बाहर रुकाव) तथा आन्तर कुम्भक (भीतर रुकाव)।
योगाभ्यास द्वारा इन दोनों प्रकार के कुम्भकों के समय को बढ़ाया जाता है। इस अवस्था में प्राण व अपान की गति नहीं होती। इस शान्त अवस्था में ही शक्ति का कोई कार्य नहीं रहता — यही चैतन्य स्वरूप शिव का स्थान है।
हंस — अजपा गायत्री का गणित
श्वास के दो भागों की दो ध्वनियाँ हैं —
• सकार (स) = श्वास बाहर निकलते समय का स्वर
• हकार (ह) = श्वास भीतर आते समय का स्वर
इन दोनों को मिलाकर "हंसः" या "सोऽहं" का स्वाभाविक उच्चारण होता रहता है। यह कोई जप नहीं — यह स्वतः चलता है। इसी को "अजपा गायत्री" कहा जाता है। यह वह जप है जो बिना प्रयास के, चौबीसों घंटे, स्वयं चलता रहता है।
21,600 — एक दिन का प्राकृतिक जप
शास्त्र की एक अद्भुत गणना देखिए। एक स्वस्थ मनुष्य औसतन प्रति मिनट 15 बार साँस लेता है। दिन-रात मिलाकर 24 घंटे = 1,440 मिनट। तो प्रति दिन साँसों की संख्या —
15 × 1,440 = 21,600 साँसें प्रति दिन
यानी हर मनुष्य प्रतिदिन अनजाने में 21,600 बार "हंस-हंस" का जप करता है। यह देवी का प्राकृतिक जप है।
शास्त्र कहता है — मृत्यु के समय यदि साधक का ध्यान इस "हंस" जप के साथ बना रहे, तो यह अनेक जन्मों के अर्जित पुण्यों का फल है। अन्यथा सामान्यतया यह तन्मयता नहीं रह पाती।
वास्तु से जोड़ — घर की साँस
घर भी साँस लेता है। हर भवन में हवा का प्रवेश (पूरक) और निकास (रेचक) होता है। जिस घर में हवा का प्राकृतिक प्रवाह रुक जाता है, वह घर "साँस नहीं ले रहा है" — और वहाँ रहने वाले भी निष्प्राण से हो जाते हैं।
उत्तर-पूर्व से नया प्राण (साफ़ हवा) आये, दक्षिण-पश्चिम से पुराना अपान (बासी हवा) निकले — यही घर का सहज प्राणायाम है। इन दोनों के बीच का "ब्रह्म-स्थान" वह है जहाँ घर का असली कुम्भक होता है। उस स्थान को खाली और शान्त रखिए।
साधक के लिए एक सरल विधि
आज ही शुरू कर सकते हैं —
1. सुबह 5 मिनट शान्ति से बैठें।
2. साँस को बदलें नहीं — सिर्फ़ देखें।
3. साँस अन्दर आते समय मन में "सो" सुनें।
4. साँस बाहर जाते समय मन में "हम्" सुनें।
5. कुछ नहीं करना — बस सुनना। 40 दिन के अभ्यास से यह जप अपने आप होने लगेगा।
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
— अध्याय चार समाप्त —
अगले अध्याय में — शरीर के चक्र और कुण्डलिनी की धारणाएँ
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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