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स्पन्दन अध्याय 9 — पुराणों के स्थपति

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VastuGuruji Team 21 Jun 2026

स्पन्दन अध्याय 9 — पुराणों के स्थपति

अध्याय नौ

विश्वकर्मा · मय · 18 ऋषि — जिन्होंने वास्तु को रचा

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18 स्थपति-ऋषियों की वंशावली ब्रह्मा विश्वकर्मा मय भृगुअत्रिवसिष्ठ मयनारदनग्नजित् विशालाक्षपुरन्दरकुमार नन्दीशशौनकगर्ग वासुदेवअनिरुद्धशुक्र बृहस्पतिमनुव्यास मत्स्यपुराण में 18 शिल्प-शास्त्र-प्रवर्तक
वास्तु शास्त्र की मूल परम्परा

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"भृगुर्वै भगवान् पूर्व गर्गाये तस्मात् बृहस्पतये।
स विश्वकर्मा जगतो हिता-कथया मनवे मत्स्यरूपिणे॥"

वास्तुशास्त्र के मानसार, मत्स्यपुराण, समराङ्गण-सूत्रधार, अपराजित-पृच्छा, विश्वकर्म-प्रकाश — इन ग्रन्थों की अपनी सूची है। वास्तु-शास्त्र-प्रवर्तक 18 शिल्प-शास्त्र के मूल आचार्य कौन थे?

मत्स्यपुराण ने इन्हें इस क्रम में दिखाया है —

भृगु · अत्रि · वसिष्ठ · विश्वकर्मा · मय · नारद · नग्नजित् · विशालाक्ष · पुरन्दर · ब्रह्मा · कुमार · नन्दीश · शौनक · गर्ग · वासुदेव · अनिरुद्ध · शुक्र · बृहस्पति

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विश्वकर्मा — सृष्टि के पहले स्थपति

विश्वकर्म-प्रकाश में गुरु-परम्परा का उल्लेख है — गर्गाचार्य ने पराशर को वास्तु-शास्त्र सिखाया, उन्होंने बृहद्रथ को, और उन्होंने बृहस्पति से विश्वकर्मा को।

विश्वकर्मा ने वासुदेवादिक को कहा। शिल्प-रत्न के आरम्भिक मङ्गल-श्लोक में विश्वकर्मा की मदद के लिए प्रार्थना है — स्थपतियों में पहले विश्वकर्मा, बाक़ी सब बाद के।

सनत्कुमार वास्तुशास्त्र में 18 तेजों के अनुसार आचार्यों का क्रम — ब्रह्मा, इन्द्र, यम, भार्गव, अङ्गिरस, गौतम, गार्ग्य, मनु, व्यास, भृगु, विश्वकर्मन् और अन्य।

विश्वकर्मा — पौराणिक परम्परा से निकाले हुए। वंशावली वेन राजा तक पहुँचती है, जो सुमेरियन संस्कृति में अलग रूप से Berossus के Oannes के रूप में जाना जाता था। एक तरफ़ सुमेरियन संस्कृति और दूसरी तरफ़ नर्मदा घाटी की संस्कृति — के बीच एक जोड़ने वाली कड़ी।

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विश्वकर्मा की वंशावली

अत्रि के वंशज राजा अंगने (या सुमेरियों के Berossus के Oannes) नाम का एक पुत्र हुआ। यह वेन के बाद भारतवर्ष में आया। उसके दो पुत्र थे — हविर्धन और हविर्धनी। शिखंडिनी से पराई। एक पुत्र प्राचीनबर्हिष को जन्म दिया।

इस राजा ने अनेक यज्ञ किए हैं ऐसा कहा जाता है कि उनके समय में पृथ्वी दर्भों से ढकी हुई थी। वह बहुत ही धार्मिक वृत्ति का था। उसने समुद्र की पुत्री शची के साथ विवाह किया जिससे उसे दस प्रचेता नामक पुत्र हुए। वे सब धनुर्विद्या में निष्णात थे।

एक बार वे दरियाई मुसाफिरी पर निकले, जहाँ उन्होंने पूरी बार वर्ष बिताए। उनकी गैरहाजिरी के दौरान आधा देश उजड़ गया और घना जंगल के रूप में बढ़ पाया। वे पास भर्ज करते त्वारे जहाँ पहले लीली हरियाली खेती थी त्वारा उन्होंने घना जंगल सिवाय कुछ न मिला।

सद्भाग्यवश एम वायु ने वह देश गरम भेजवाला तूफानी चक्रवातों की जपटमां आया। परिणामे लगभग बधा ज पृथा उछड़ गया जहाँ बने गया, अने जलते अने पडेला भङ्गारमांथी एक सुन्दर युवती प्रगट थई। पाछ प्रचेताओं की सम्मुख सोम पोते प्रगट थया जेमणे तेमणे लग्नमां आ सुन्दरी का हाथ आपा। यह सुन्दरी मरत जती दश की माता बनी।

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विश्वकर्मा — द्वितीय वंशावली

ऊपर दी गई वंशावली से बिल्कुल अलग ही विश्वकर्मा की वंशावली मानसार का बीसरा अध्याय देता है। यहाँ विश्वकर्मा को ब्रह्मा के पुत्र और इन्द्र की पुत्री का पति के रूप में वर्णन किया गया है।

वे प्रभासवसु के पुत्र के रूप में गिने जाते हैं जो कि साथ ही वर्षनो के संवादिततमां लावुं मुश्केल है। मानसार के विश्वकर्मा इतिहास के घणा दूरना नोंधपात्र समयगाणामां विद्यमान हता।

ब्रह्मा सीधी अग्राह्य आक्रमणाकार और हिंसा वसवात करनार हता अने मानसारमां उल्लिखित विश्वकर्मा शिल्पकार हता जेमणे ब्रह्माना संस्थानवाटीओने मदद करी।

आ विश्वकर्मा ब्रह्मकुलमां सत्ययुगमां मार्गशीर्षमां जन्मा हता। बीजा विश्वकर्मा प्रभासवसुना पुत्र तेम नहोता। तेओ कार्तिक सुद बेरसदशीने दिवसे (अपराजितपृच्छा प्रमाणे चतुर्दशीने दिवसे) जन्मा हता।

तेओ त्वष्टा, भद्रशिल्प, भद्रभद्र वगैरे तरीके पण जाणीता छे। विश्वकर्माथी उतरी आवेला छट्टा मनु चाक्षुषमुनि चाक्षुषवंशना मुख्य बन्या, आ चाक्षुषमुनिने पांच पुत्रो हता। पुरु, पुरुष, सुधुम्न, विष्ण अने साध्य अने तेना वंशवारसोए शिल्प अने वास्तुशास्त्रनो प्रचार प्रसार कर्यो।

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भृगु कुटुम्ब और कुशल कारीगरी

E. Sieg "Encyclopaedia of Religion and Ethics" में भृगु शब्द को कारीगर माटे एक शब्द तरीके समजावे छे। Dr. Hermann Weller नो मत मुजब असलमां भृगुओ अग्नि साथे काम करनार कारीगरोनो प्रतिनिधित्व करता हता जेमां प्राथमिक रीते लुहार और रथ बनाववानारानो समावेश करातो हतो।

शूरवीर भीष्मनो धोडानो रथ मुख्ये तेओए बनावेलो मनाय छे। भृगु कुटुम्बनी विशिष्ट कारीगरीमां अत्यन्त ऊँची उत्कृष्टता माटे विश्वकर्मानुं भृगु साथेनुं जोडाण जरा पण ओछुं जवाबदार न हतुं।

तेना पैतृक अने मातृक बन्ने सम्बन्धोए तेने समूह वारसाईथी सज्ज करवामां फाला आप्या हता। कारीगर तरीकेनी तेनी निपुणताए तेने वसुओ मध्ये श्रेष्ठ व्यक्तित्व बनाव्यो हतो।

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मय की वंशावली

मयमतम् के कर्ता मय ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि के पुत्र प्रजापति कश्यप का दनु नामनी पत्नी से उत्पन्न पुत्र हुए। कश्यप दक्ष की तेर पुत्रियों के परणे हुए। तेओमां प्रथम अदिति, बीजी दिति अने त्रीजी दनु हती। दनु के पुत्रों दानवो कहेवाया। मय दनुना पुत्रोमां मुख्य हता।

तेमना बाल्यकालथी ज मय स्थापत्यशास्त्रनी कलामां घणा निष्णात हता। तेमणे हिमवननमां स्थापत्यशास्त्रमां अनोखा निष्णातपणा माटे ब्रह्माजी की उपासना करी। ब्रह्माजी ने उन्होंने देवों, असुरों और दानवों के अनोखे स्थपति होनेका वरदान आपयुं।

त्यारबाद देवो माटे और असुरो माटे भव्य महलो बांधवामां मय रोकायेला रहता। तेओ दानवों के राजा तरीके पण सीमाया हता।

ते समय देव अने असुरो वच्चे मैत्रीपूर्ण सहकार और भ्रातृभाव वाला सम्बन्धो हता। देवलोकमां एकवार नृत्यनो कार्यक्रम रखावामां आव्यो हतो। देवलोक के स्त्रीओनां कार्यकलापने जोवा माटे मय ने पण निमंत्रण आपवामां आव्युं हतुं।

बधी नृत्याङ्गनाओए पोतानु नृत्य सारी रीते कर्यु। पण मय और हेमा अप्सराओए करेला नृत्यथी सौथी वधारे आकर्षायो हतो। मय अने हेमा परस्पर आकृष्ट यथा हता अने एक बीजाना प्रेममां पड़या हता। देवोने ज्यारे आनी जाण थई त्यारे तेओए हेमाने लग्नमां मय ने आपी।

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मय के अद्भुत निर्माण

मय और हेमा हिमवननी दक्षिण तरफनी खीणमां गया और त्यां "हेमपुर" नामनुं नगर बांध्युं। त्यां सुखी जिन्दगी जिवतां तेओने मायावि और दुन्दुभि नामे बे पुत्रो जन्म्या। पण तेओने कोई पुत्री नहोती। तेथी तेओए पुत्री माटे प्रार्थना करतां शिवनी उपासना करी।

लगभग ते समये एक दिवस मधुरा नामनी अप्सराए सोमप्रत राखीने शिव पासे आवी अने तेमने नमस्कार कर्यो। ते सघे पार्वती घेर नहोती। मधुराना सौंदर्यथी आकृष्ट थयेला शिवे तेने आलिङ्गन आप्युं। पार्वतीए ज्यारे ते जाण्युं त्यारे तेमणे मधुराने शाप आपयो अने तेने टेडकी बनावी दीधी।

शापथी मुक्त थयेली मधुरा बार वर्ष बाद देडकाना रूपमां ज "मन्दोदरी" रूपमां मय अने हेमा पासे पहोंची। मय अने हेमाए ज्यारे रावणे राक्षसो पाठीने तेने उठावी जवा माटे मोकल्या त्यारे — पोते मय अने हेमाना कुटुम्ब साथे दक्षिण तरफ नासी गयो अने विन्ध्य पहोंच्यो।

"मय और विश्वकर्मा — दोनों ब्रह्मा से उत्पन्न — एक देवों के, एक दानवों के। पर वास्तु-विद्या में दोनों समान निष्णात।"

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मय का इन्द्रप्रस्थ निर्माण

एक वखत कृष्ण और अर्जुने अग्निदेवने निजबाणी तरीके खाण्डववन आप्युं। ज्यारे अग्नि भयंकर रीते वनोने आरोगता हता त्यारे तेमां रहेल मानव अने प्राणी रहेवासीओ तेमांथी नासवा मांड्या।

कृष्ण अने अर्जुने तेओने बाणो वडे वींधी नाख्या। ते समये मय तस्करना वेशमां पोताने सन्ताडी रहयो हतो। ज्यारे अग्निनी ज्वालाओने ते जग्याए पहोंची त्यारे मये तेनुं आश्रयस्थान छोडी दीधुं अने बहार धसी गयो।

श्रीकृष्णे तेमनुं हथियार चक्र तेनी तरफ ताक्युं। भयथी मोटेथी बूमो पाडतो मय रक्षण माटे प्रार्थना करतो अर्जुन तरफ दोडयो। अर्जुने अग्निदेव अने श्रीकृष्णने रोक्या अने आम मयने बचाव्यो।

त्यारथी मांडी मय अर्जुननो वफादार अनुयायी बन्यो। खांडवदाह पछी कृष्ण अने अर्जुन आराम करता हता त्यारे मय बन्ने हाथनी हथेलीओ जोडीने तेमनी पासे गयो अने अर्जुनने पूछ्यो के कृष्ण अने धगधगता अग्निना भयमांथी तेने बचाव्याना बदलामां तेणे (मये) शुं करवुं जोईए?

अर्जुने जवाब आप्यो के मयनी जिन्दगी बचाववा माटे ते कोई बदलानी अपेक्षा राखतो नहोतो परन्तु मात्र तेनी मैत्री जोईती हती। मयने सन्तोष थयो नहीं। तेणे भारपूर्वक मागणी करी के तेनी ऊँडी आभारनी लागणीनी निशानीरूपे अर्जुने तेनी कोई सेवा स्वीकारवी जोईए।

आ सांभलीने श्रीकृष्णे सूचन कर्युं के मय पाण्डवो माटे एक सुन्दर महल बांधवो जोईए। तदनुसार तेणे पाण्डवोने माटे खाण्डवप्रस्थ नामे जग्याए एक भव्य राजमहल बांध्यो।

॥ इति शुभम् ॥

अगले अध्याय में — समराङ्गण-सूत्रधार से नगर-योजना। राजा भोज ने जो शास्त्र रचा — पुर, खेट, ग्राम — और नगरों की वैदिक संरचना।

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