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स्पन्दन अध्याय 8 — मायामत के स्थापत्य अनुपात

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VastuGuruji Team 21 Jun 2026

स्पन्दन अध्याय 8 — मायामत के स्थापत्य अनुपात

अध्याय आठ

चोल-काल का प्रामाणिक स्थापत्य-शास्त्र

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अनुपात — चार योजना-शैलियाँ चन्द (W:W+1) 1:1.125 विकल्प (W:W+2) 1:1.16 आभास (W:W+3) 1:1.25 जाति (W:W+4) 1:1.5 सबसे चौकोर से सबसे लम्बा — चार स्तर
पवेलियन और सभा के लिए चौड़ाई-लम्बाई के चार अनुपात

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"अनुपात ही सौन्दर्य की भाषा है — जिसे प्रकृति ने स्वयं चुना।"

मायामत — एक प्राचीन ग्रन्थ। संस्कृत में रचित, पर मूल रूप से द्रविड़ भारत — विशेषतः तमिल क्षेत्र से। शैव-आगम परम्परा का हिस्सा। रचना-काल — 9वीं से 12वीं शताब्दी, चोल राजवंश के समय।

मायामत भारतीय स्थापत्य-शास्त्र पर एक प्रामाणिक ग्रन्थ है। दो खण्डों में — 36 अध्याय, कुल 3336 श्लोक। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (IGNCA) ने इसका प्रकाशन कराया है।

विषय-क्षेत्र विशाल — नगर-योजना, आवासीय स्थापत्य, धार्मिक स्थापत्य, धार्मिक अनुष्ठान, प्रतिमा-शास्त्र, आन्तरिक सज्जा, जीर्णोद्धार, वाहन-निर्माण। मुख्य 30 अध्याय वास्तु और नगर-योजना पर हैं — कुल 2626 श्लोकों में।

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पाँच विषय जो वास्तु को परिभाषित करते हैं

1. समय (मुहूर्त) और ज्योतिष — कब आरम्भ करें, कब प्रवेश करें
2. अनुष्ठान और प्रक्रियाएँ — कौन-सी पूजा-विधि
3. सौन्दर्य — आयाम, अनुपात, संख्याएँ
4. क्रम — निर्माण के अंगों का क्रम
5. गतिविधि-स्थान — कौन-सा कार्य कहाँ

इन पाँचों का सन्तुलन ही उत्तम वास्तु बनाता है। मायामत हर पक्ष पर गहराई से बात करता है — पर इस अध्याय में हम केवल तीसरे — सौन्दर्य और अनुपात — पर ध्यान देंगे।

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वेदी-भद्र — आधार-शिला

स्थापत्य का पहला अंग है आधार या socle। मायामत इसके 13 श्लोक देता है — वेदी-भद्र प्रकार। ऊँचाई बारह बराबर भागों में बाँटी जाती है —

प्लिन्थ (कुर्सी) — 2 भाग
दोउचाइन् — 1 भाग
फिलेट — आधा भाग
दादो (मुख्य दीवार) — 5 भाग
फिलेट — आधा भाग
दोउचाइन् — 1 भाग
उपरी पट्टी — 2 भाग

आठ moulding (कारीगर बनावटें) ही वेदी-भद्र की पहचान हैं। ये अनुपात हर इमारत में लागू होते हैं — चाहे मन्दिर हो या निवास।

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पद्मक पवेलियन

मायामत में पद्मक-प्रकार के पवेलियन (मण्डप) का वर्णन है। 4 इकाई, 4 द्वार, सामने और पीछे बरामदा। मध्य में आँगन — किनारे लालटेन से ढका। 36 स्तम्भ, 28 नाशी (निच), 8 पञ्जर। कोनों पर हलगाह (L-आकार) दीवारें। हर तरफ़ सीढ़ियाँ।

उद्देश्य — देव-स्नान। यह मन्दिर के एक विशेष कक्ष का स्वरूप है, जहाँ देव-प्रतिमा का अभिषेक होता है।

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सुवर्ण-अनुपात (Golden Section)

पश्चिमी सभ्यता ने प्राचीन काल से सुवर्ण-अनुपात — 1:1.618 का उपयोग किया है। पार्थेनॉन का मन्दिर इसी अनुपात पर बना है।

आधुनिक युग में ले-कोर्बूज़ियर का "मॉड्यूलर" — मानव-शरीर के अनुपात और सुवर्ण-अनुपात — दोनों को मिलाकर बना। मनुष्य की नाभि से सिर तक की दूरी और सिर से पैर तक की दूरी का अनुपात — लगभग 1.618।

भारतीय ग्रन्थों में भी सुवर्ण-अनुपात की प्रतिध्वनि है — पर वहाँ शिल्प-रत्न कहता है — सर्वोत्तम अनुपात हैं 1:2, 2:3, 3:5, 5:8। यह फिबोनाची संख्याएँ हैं, जो अन्ततः 1:1.618 की ओर बढ़ती हैं।

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मायामत की माप-पद्धति

मायामत के पाँचवें अध्याय में माप-पद्धति का विस्तार है। परमाणु से लेकर योजन तक। साथ ही — मात्रांगुल या देहलब्धांगुल — पुजारी की उँगली के मध्य पोर के बराबर। यह केवल अनुष्ठान-कर्म में लागू होता है।

मायामत में अन्य माप भी हैं —

क्रोश, गव्यूति, योजन — दूरियों के लिए
काकनी, मासा, वर्तनक, वाटिका — क्षेत्रफल के लिए
दण्ड (मॉड्यूल) — स्तम्भ-निर्माण
भक्ति (इन्टरकोलमनेशन) — पवेलियन और हॉल के अनुपात
आयादि — दिशा-शुभाशुभ की परीक्षा

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योजना के अनुपात (Plan Proportions)

मायामत ने हर प्रकार की इमारत के लिए चौड़ाई से लम्बाई का अनुपात निश्चित किया है।

पवेलियन के लिए

1. छन्द — W : (W+1) इकाई
2. विकल्प — W : (W+2)
3. आभास — W : (W+3)
4. जाति — W : (W+4)

हॉल के लिए

वही चार अनुपात — छन्द, विकल्प, आभास, जाति।

घरों के लिए

1. जाति — W : (W+2)
2. छन्द — W : (W+4)
3. विकल्प — W : (W+6)
4. आभास — W : (W+8)

घर — पवेलियन से कुछ अधिक लम्बे होते हैं। ये अनुपात ही "सुडौलता" तय करते हैं।

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ऊँचाई के अनुपात (Elevation Proportions)

घरों के लिए — चौड़ाई : ऊँचाई

शान्तिक — 1 : 1 (समान)
पौष्टिक — 1 : 1¼
जयद — 1 : 1½
धनद — 1 : 1¾
अद्भुत — 1 : 2

मन्दिरों के लिए — चौड़ाई : ऊँचाई

शान्तिक — 7 : 10
पौष्टिक — 6 : 9
जयद — 5 : 8
अद्भुत — 4 : 7
सर्वकर्मिक — 3 : 6

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ऊँचाई के उप-विभाग

मायामत भवन की ऊँचाई को कई स्तरों में बाँटता है —

उप-पीठ (वैकल्पिक) → पीठ (आधार) → स्तम्भप्रस्तर (entablature) → ग्रीवा (attic) → शिखर (छत) → स्तुपिका (final)

उदाहरण — दो-मञ्जिले मन्दिर की कुल ऊँचाई 28 भागों में: आधार 3, पहली मञ्जिल 6, पहली प्रस्तर 3, दूसरी मञ्जिल 5, दूसरी प्रस्तर 2, ग्रीवा 2, शिखर 4.5, स्तुपिका 1.5 भाग।

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सङ्ख्याओं का महत्त्व

देवताओं के मन्दिर में संख्या विषम और सम दोनों हो सकती है। पर मनुष्यों के निवास में केवल विषम — एक, तीन, पाँच — संख्या में कमरे, द्वार और स्तम्भ। पवेलियन में सामने के भाग (bhadra) एक से चार तक हो सकते हैं।

"प्राचीन भारतीय स्थापत्य — योजना, ऊँचाई और निर्माण-अंगों के लिए — समय-परीक्षित अनुपातों की एक श्रृंखला रखता है।"

सबसे छोटा मण्डल सकल (1×1) कहलाता है, सबसे बड़ा इन्द्रकान्त (32×32 = 1024)। पर ध्यान देने योग्य — मायामत आर्किटेक्ट को अपनी सूझ-बूझ के अनुसार बदलाव की पूरी छूट देता है। परम्परा मार्गदर्शक है, बन्धन नहीं

॥ इति शुभम् ॥

अगले अध्याय में — पुराणों के स्थपति। विश्वकर्मा, मय, और 18 ऋषि-स्थपति — जिन्होंने वास्तु शास्त्र को रचा।

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