स्पन्दन अध्याय 6 — वास्तु की आत्मा, पञ्च महाभूत
अध्याय छह
पृथ्वी · जल · अग्नि · वायु · आकाश — हर तत्त्व का रहस्य
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"पंच-तत्त्व ही वास्तु की आत्मा हैं। इनके बिना भवन — केवल पत्थर।"
पृथ्वी एक गोलाकार पिण्ड है — द्रव्यमान 5.98×10²⁴ किलोग्राम, सूर्य के चारों ओर औसत 29.8 किमी प्रति सेकेण्ड की गति से घूमती है। सूर्य से दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर। सौर मण्डल का तीसरा ग्रह।
पृथ्वी अपनी उत्तर-दक्षिण धुरी पर 24 घण्टे में एक चक्कर लगाती है — दिन और रात। चन्द्रमा 3,84,000 किमी दूर, द्रव्यमान पृथ्वी का 1/81 — पर इसका गुरुत्व ज्वार-भाटा का कारण है।
पृथ्वी का सतह क्षेत्रफल 51 करोड़ वर्ग किमी — दो-तिहाई पानी से ढका, एक-तिहाई भूमि। बाक़ी तीन तत्त्व — वायु, अग्नि और आकाश — भूमि की सतह पर जीवन को सम्भव करते हैं।
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हर तत्त्व का सम्पूर्ण परिचय
दिशा, ग्रह, धातु, इन्द्रिय, अंग — सब एक साथ
अग्नि — दिशा: आग्नेय (SE) · ऊर्जा: सौर · देव: अग्नि · ग्रह: शुक्र · रंग: श्वेत · इन्द्रिय: दृष्टि · अंग: नेत्र · धातु: चाँदी · आकार: त्रिकोण
पृथ्वी — दिशा: नैऋत्य (SW) · ऊर्जा: गुरुत्व · देव: निरुति · ग्रह: राहु · रंग: नीला · इन्द्रिय: गन्ध · अंग: नासा · धातु: लोहा · आकार: वर्ग
वायु — दिशा: वायव्य (NW) · ऊर्जा: पवन · देव: वायु · ग्रह: चन्द्र · रंग: श्वेत · इन्द्रिय: स्पर्श · अंग: त्वचा · धातु: श्वेत-धातु · आकार: अर्ध-चन्द्र
जल — दिशा: ईशान (NE) · ऊर्जा: वर्षा · देव: ईश · ग्रह: बृहस्पति · रंग: पीला · इन्द्रिय: रस · अंग: जिह्वा · धातु: ताम्र / पीतल · आकार: वृत्त
आकाश — दिशा: केन्द्र · ऊर्जा: आकाश · देव: सूर्य · ग्रह: केतु · रंग: भूरा · इन्द्रिय: श्रवण · अंग: कर्ण · धातु: ढलवाँ लोहा · आकार: हीरा (समचतुर्भुज)
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तत्त्व, इन्द्रिय और शरीर
आयुर्वेद बताता है — मानव-शरीर में भी ये पाँच तत्त्व हैं — प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा के रूप में आन्तरिक ऊर्जा। और बाहर — ताप, प्रकाश, ध्वनि, हवा के रूप में बाह्य ऊर्जा। हर तत्त्व अलग कार्य करता है, पर मिलकर एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं।
अग्नि → दृष्टि → नेत्र → सूर्य ऊर्जा
पृथ्वी → गन्ध → नासा → गुरुत्व
वायु → स्पर्श → त्वचा → पवन
जल → रस → जिह्वा → वर्षा
आकाश → श्रवण → कर्ण → अन्तरिक्ष
आयुर्वेद का त्रिदोष सिद्धान्त इन तत्त्वों पर आधारित है —
- वात — वायु तत्त्व — दिशा वायव्य (NW)
- पित्त — अग्नि + जल — दिशा आग्नेय (SE) / नैऋत्य (SW)
- कफ — जल + पृथ्वी — दिशा ईशान (NE)
शरीर के अन्दर त्रिदोष का सन्तुलन और भवन में पञ्च-तत्त्व का सन्तुलन — दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं।
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त्रिगुण और मनोवृत्ति
त्रिगुण — सत्व, रजस, तमस — मनुष्य के तीन मूल स्वभाव। हर मनुष्य में ये तीनों होते हैं, पर अनुपात अलग-अलग।
- सत्व — बुद्धिमान, रचनात्मक, आध्यात्मिक, कोमल, दयालु
- रजस — द्रव-मनस्क, अहंकारी, मेहनती, भौतिकवादी, बहिर्मुखी
- तमस — आलसी, अज्ञानी, नकारात्मक, स्वार्थी, हानिकारक
त्रिगुण और त्रिदोष का असन्तुलन — शरीर के स्वास्थ्य को बिगाड़ता है। वास्तु-दोष भी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। प्राकृतिक तत्त्वों और मानव-अंगों में एक सहसम्बन्ध है।
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तत्त्व और रंगों का सम्बन्ध
पाँच तत्त्वों के साथ रंगों का एक निश्चित सम्बन्ध है। मैत्री-पूर्ण रंग तत्त्व के गुणों को बढ़ाते हैं — विरोधी रंग कम करते हैं।
अग्नि ↔ लाल
पृथ्वी ↔ पीला
वायु ↔ नीला
जल ↔ श्वेत
अग्नि और वायु, पृथ्वी और जल में मित्रता है। अग्नि और जल, पृथ्वी और वायु — विरोधी हैं। यही नियम रंगों पर भी लागू होते हैं।
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अग्नि — त्रिकोण
आर्य संस्कृति में अग्नि ईश्वर रूप में पूज्य है। हवन, अग्निपूजा, सूर्य-नमस्कार — सब अग्नि-तत्त्व को सम्मान देते हैं। प्रकाश, जीवन, ऊर्जा का स्रोत।
अग्नि का गुण है — आकार बदलने की शक्ति, हर वस्तु को अपने में लीन कर लेना। शरीर में यह दृष्टि है, नेत्र इसका अंग।
अग्नि का प्रतीक त्रिकोण है। इसीलिए त्रिकोणीय कमरे या प्लॉट से बचना चाहिए — अनचाहे अग्नि-तत्त्व को आमन्त्रण देता है।
रसोई का स्थान आग्नेय कोण (SE) में होना चाहिए — क्योंकि वहीं अग्नि-तत्त्व प्रबल है। आग्नेय में पका भोजन स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।
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पृथ्वी — वर्ग
पृथ्वी, सकल या वसु — खेल का मैदान जिस पर तीन अन्य तत्त्व मिलकर काम करते हैं। पृथ्वी का प्रतीक गन्ध है — नासा इसकी इन्द्रिय।
सुगन्धित और मधुर गन्ध — जीवन के स्वाद को बढ़ाती है। फूल, पौधे, पेड़ — दक्षिण, पश्चिम या नैऋत्य में लगाने चाहिए। पृथ्वी का प्रतीक वर्ग है — सकल या ब्रह्माण्ड का गोलाकार पिण्ड।
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वायु — अर्ध-चन्द्र
वायु तत्त्व — वास्तुपुरुष की श्वास या भुजा। अग्नि का साथी, क्योंकि अग्नि वायु से ही जलती है। वायु में रजस गुण अधिक होता है — चञ्चल स्वभाव।
शरीर में यह स्पर्श है — उँगलियों से अनुभव। वायु के बिना जीवन सम्भव नहीं — श्वास अनिवार्य है।
वायु का प्रतीक अर्ध-चन्द्र है। उत्तर-पश्चिम के अधिपति — चन्द्र। यह दिशा — चञ्चल या अस्थिर स्वभाव की होती है। इसीलिए इस दिशा में अतिथि-कक्ष या पुत्री-कक्ष रखना चाहिए। संचार उपकरण — रेडियो, टेलीफोन, एंटीना — भी यहीं।
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जल — वृत्त
आप, जल, पानी या उदधि — संस्कृत में। जल आंशिक रूप से रजस गुण है, क्योंकि यह तरल और बहता है। ईशान क्षेत्र पर बृहस्पति और जल-तत्त्व का अधिकार है।
जल हमेशा बहता है — किसी भी दिशा में। गोलाकार कमरा या भवन — निवासियों में बेचैनी पैदा करता है। वास्तु शास्त्र ईशान कोण को ध्यान, पूजा, प्रार्थना या अध्ययन के लिए सुझाता है।
शरीर में यह रस है — जिह्वा इसकी इन्द्रिय। नाली का पानी, वर्षा का पानी — ईशान दिशा की ओर बहना चाहिए। दर्पण और काँच — उत्तर या पूर्व में।
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आकाश — हीरा
आकाश, गगन या एथर — आकाश का अर्थ अन्तरिक्ष। शरीर में श्रवण इसकी इन्द्रिय, कर्ण इसका अंग। इसीलिए घर में मधुर और शान्त ध्वनि होनी चाहिए — कलह नहीं।
आकाश का प्रतीक हीरा है — चार सतहें — चार अन्य तत्त्वों का प्रतिनिधित्व। वास्तु शास्त्र केन्द्रीय क्षेत्र को खुला और विशाल रखता है — ताकि कॉस्मिक किरणें भीतर आ सकें। यह ब्रह्मस्थान है — मानव शरीर का नाभि-केन्द्र।
आकाश का केन्द्र किसी एक दिशा-देवता का नहीं है। यह ब्रह्मा द्वारा शासित है — सृष्टि का कर्ता।
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शरीर-तत्त्व-दिशा का तालमेल
शरीर के अन्दर तत्त्वों का क्रम मानव-शरीर से जुड़ा है — सिर से पैर तक —
सिर से कन्धे तक — आकाश
कन्धे से नाभि तक — वायु (दोनों भुजाएँ सम्मिलित)
नाभि से जननांग तक — अग्नि
दोनों जाँघें और हथेलियाँ — जल
घुटनों से पैर के तले तक — पृथ्वी
इस तरह तत्त्व ही वास्तु की आत्मा हैं। एक जीवित आत्मा — जिसका मानव और निवास से गहरा सम्बन्ध है।
॥ इति शुभम् ॥
अगले अध्याय में — वास्तु में वैदिक चेतना। मन, समय और स्थान का त्रिक — और इस ब्रह्माण्ड को बनाने वाली चेतना का स्वरूप।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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