स्पन्दन अध्याय 4 — वास्तु-पद-मण्डल का स्वरूप
अध्याय चार
1 से 1024 पद — हर मण्डल का अपना उद्देश्य
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"वास्तु-पद-मण्डल केवल देवताओं की सूची नहीं — एक जीवित ऊर्जा-संरचना है।"
वास्तु-मण्डल का आकार — गृह, प्रासाद, मन्दिर या नगर — जैसा हो, वही रखना चाहिए। सामान्यतः चौरस या लम्बचौरस ही चुना जाता है। पर कई बार त्रिकोण, वृत्त, अर्ध-वृत्त, अष्टकोण जैसे आकार भी देखे जाते हैं।
भरत-मुनि ने नाट्यशास्त्र में त्रिकोणीय रंगभूमि का निर्देश दिया है। नदी-किनारे या समुद्र-किनारे के नगर अर्ध-वृत्ताकार (धनुष-आकार) निर्दिष्ट किए हैं। पद्म-नगर का आकार अष्टकोणीय बताया गया है।
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मण्डल का चित्रण
स्थल के मध्य में सबसे पहले भूमि को साफ़ करके समतल किया जाता है। फिर वास्तु-मण्डल खींचा जाता है। चन्दन या कुनकू-केसर से रेखाएँ खींची जाती हैं — कभी सोने या चाँदी की सलियों से भी।
रेखाएँ शतरंज की तरह एक-दूसरे को काटती हुई — समान्तर, ऊर्ध्व और तिर्यक — खींची जाती हैं। आड़ी-तिरछी रेखाओं की संख्या हमेशा खानों की संख्या से एक अधिक होती है। जैसे, आठ खाने बनाने के लिए नौ रेखाएँ चाहिए।
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रेखाओं के नाम
64-पद वास्तु-मण्डल की पूर्व-पश्चिम रेखाओं के नाम — श्री, यशोमती, कान्ता, सुप्रिया, परा, शिवा, सुयोग, साधना, इला।
उत्तर-दक्षिण रेखाओं के नाम — धन्या, धरा, विशाला, स्थिरा, रुपा, गदा, निशा, निभवा, प्रलया।
विश्वकर्म-प्रकाश और अन्य ग्रन्थों में इन नामों का उल्लेख है। अलग-अलग ग्रन्थ अलग-अलग नाम देते हैं — पर सब का एक ही उद्देश्य है : हर रेखा को एक नाम, एक चेतना देना।
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ग्यारह मण्डलों का संक्षिप्त परिचय
अपराजित-पृच्छा से
1×1 = 1 पद · स्वस्तिक — विद्यारंभ के लिए
2×2 = 4 पद · पुष्पक — तीर्थस्थान जाने के समय
3×3 = 9 पद · नन्द — जंगल में जाते समय
4×4 = 16 पद · योद — लतिन, स्तूप जैसी आकृतियों के लिए
5×5 = 25 पद · कुलतिलक — मण्डप-निर्माण के लिए
6×6 = 36 पद · सुमक — शुभ कार्य प्रारम्भ करते समय
7×7 = 49 पद · मरीचिगण — जीर्णोद्धार के लिए
8×8 = 64 पद · भद्रक — शहर, खेड़ा, बस्ती, नगर बसाने के लिए
9×9 = 81 पद · कामद — निवास के लिए
10×10 = 100 पद · भव्य — मन्दिर और मण्डप के लिए
32×32 = 1024 पद · सर्वतोद्रष्य — मेरु जैसे विशाल प्रासाद के लिए
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किस मण्डल का कब प्रयोग
प्राचीन मन्दिरों के जीर्णोद्धार में 49 पद वाला मण्डल प्रयुक्त होता है। ग्राम, खेड़ा, पुर और नगर — सब प्रकार की बस्तियों की रचना के लिए 64, 81, 100 पद वाले मण्डल काम आते हैं।
राजा के महल और बड़े मन्दिरों के लिए 1024 पद वाला सर्वतोद्रष्य मण्डल उपयुक्त है। मेरु या कैलास जैसे विशाल निर्माण के लिए हज़ार पद वाला मण्डल चाहिए।
ध्यान देने योग्य बात — यह केवल "धार्मिक रस्म" नहीं है। यह नगर-योजना और प्रासाद के विभिन्न भागों के नियोजन के लिए भी लाभदायक है। इसलिए जितनी बड़ी रचना, उतना अधिक पद-संख्या वाला मण्डल चुनना चाहिए।
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वर्ण-योजना
मण्डल पर रंग कौनसे लगाएँ
किसी धार्मिक कार्य के लिए मण्डल खींचने के बाद चन्दन और केसर के चूर्ण से उसमें रंग पूरे जाते हैं।
विभिन्न ग्रन्थों में सफ़ेद, लाल, पीला और काला — चार वर्णों का वर्णन है। भूरा और धूम्र जैसे भूरे वर्ण का भी निर्देश है। एक ही वर्ण की अलग-अलग रंगछटाएँ शिल्परत्न में मिलती हैं —
श्वेत — श्वेत, शुक्ल, शंख, अमृत और मोती जैसा
कृष्ण — दूर्वा-घास, संध्यामेघ, धूमड़ जैसा
लाल — रक्त, जपा-पुष्प, तप्त-कांचन
पीला — पीत, सुवर्ण, हरिद्रा
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भवन-निर्माण योजना के लिए वास्तु-मण्डल
नगर में किसी प्रासाद का निर्माण होने वाला हो — तब नगर की योजना चतुष्षष्टि-पद-वास्तु-मण्डल (64 पद) के अनुसार वर्गीकृत होती है। राजा का प्रासाद मित्र-पद (पश्चिमी अन्तःस्तर) पर मुख्यतः रखा जाता है।
तत्पश्चात् प्रासाद की उस जगह को 81 पदों में विभाजित किया जाता है। निवास और कार्यालय भवन अलग-अलग पदों पर निश्चित किए जाते हैं।
इसी तरह, विभिन्न वर्णों के लोगों के निवास, विभिन्न कार्यकर्ताओं, नगर में अलग-अलग बाज़ारों — सब के लिए वास्तु-मण्डल के अलग-अलग पद निश्चित होते हैं।
वास्तु-पद-मण्डल में दर्शाए विभिन्न देवताओं के स्थान — प्रासाद, मन्दिर या नगर के वास्तु के प्रयोग्य अंगों को निश्चित करने में मार्गदर्शन देते हैं।
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देवताओं की प्रकृति के अनुसार स्थल
निवास, कार्यशाला, कार्यालय आदि के स्थल — नगर को घेर लेते हुए — विभिन्न पदों की देवताओं की प्रकृति पर आधारित होते हैं। परिणामतः देवताओं की व्यवस्था और विभिन्न प्रकार की मण्डल-आकृतियाँ — वास्तु-प्रतिष्ठा-विधि की शुरुआत में धार्मिक हेतु के लिए ही नहीं होतीं, बल्कि विभिन्न अंगों के निर्धारण के लिए मार्गदर्शक भी होती हैं।
हर पद का देवता शान्त या क्रोधित — कोमल या उग्र — हो सकता है। उसी के अनुसार वहाँ कैसा कार्य उपयुक्त है — यह निश्चित होता है।
वास्तु-मण्डल केवल "जगह बाँटने" का साधन नहीं है। यह चेतना का नक्शा है — जहाँ हर पद की अपनी ऊर्जा है, हर कोने की अपनी आवाज़।
॥ इति शुभम् ॥
अगले अध्याय में — वास्तु-पद्धति — संक्षिप्त शास्त्र, 56 श्लोकों में। गृह, प्रासाद, मठ, मण्डप, जल, देश और वृक्ष — सात प्रकार के वास्तु।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।
Common mistakes to avoid
- प्रवेश, zone और room logic verify किए बिना सीधे remedy पर जाना।
- Informational guidance को heavy sales intent के साथ mix करना।
- Measurable guidance की जगह fear-heavy language उपयोग करना।









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