स्पन्दन अध्याय 12 — वडोदरा का प्राचीन वास्तु
अध्याय बारह
चन्द्रावती से वटपद्र — एक नगर की वास्तु-यात्रा
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"प्राचीन नगर — आज भी जीवित। पत्थर के साथ इतिहास भी जीवित।"
पाश्चिम भारत में नगर-योजना की परम्परा ई.स. पूर्व 5000 वर्ष पुरानी है। सिन्धु और सरस्वती संस्कृति — इन दोनों नदियों के तट किनारे अनेक नगर अस्तित्व में थे। सिन्धु नदी के एक कांठा करच्छना अखातमां ठलवाईने समुद्रने मलती हती। वेदकालीन सरस्वती हिमालयनी पर्वतमालामांथी निकलीने हरियाणा, पश्चिम पाकिस्तान, राजस्थान तथा कच्छना पूर्व विस्तार तरफ थईने अमदावाद ओरना नगरसरोवर माफ़र्त ते जमानाना भङ्गका (भङ्गुच) ना अखातमां मलती हती।
प्राचीन कालमां खंभातनुं अस्तित्व न होतुं। आथी उपरोक्त संस्कृतिनो व्यास गुजरात सुधी हतो। गुजरातमां ब्रह्माजीनी मूर्तिओ व्यापक प्रमाणमां होई उपरोक्त बाबतमां शङ्कानें स्थान नथी।
प्राचीन सरस्वतीने कुणप्रदेश एवा नगरो गाम्भोमांथी विश्वनी सौथी मोटी ब्रह्माजीनी मूर्ति, ब्रह्म परिवार सहित खंभातनी नजीक मली आवेल अवशेषो तेमज नगर आयोजननी व्यापक परम्परा इतिहास कालीन गुजरातमां जोवा मले छे ते ध्यानमां राखी जीवन जरूरीयात, अवलोकन तेमज अनुभवना आधारे वास्तुग्रन्थोनी रचना करी हती।
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गुजरात के प्राचीन नगर
द्रासावती (द्वारिका) · प्रभासपाटण (वेरावल) · भरुकच्छ (भरूच) · सूर्यपुर (सूरत) · वल्लभीपुर · अनहीलपुर पाटण (पाटण) · कर्णावती (अमदावाद) · चांपानेर · गिरीनगर · भृताम्बलीका (धुमली) · दर्भावती (डभोई) · वटपद्र (वडोदरा) · स्तम्भतीर्थ (खंभात) — गुजरात में जाणीते हैं।
प्राचीन साहित्यकों की नोंध मुजब घणी माहिती अन्य नगरों बाबत मने छे, ज्यारे केटलीक बाबते व्यापक संशोधन ज़रूरी छे।
वडोदरा अंगे इ.स. पूर्वनी बीजी सदीनी राख्आतथी इ.स. ८०० सुधीनो उल्लेख दशावि छे के राष्ट्रकूट राजवी दर्क सुवर्णवर्षनो ताम्र दानपत्रोना आधारे जाणवा मने छे। वटपद्र नामनुं गाम भानु नामना ब्राह्मणने दानमां मलेलुं हतुं।
तेनुं स्थान आज दिन सुधी शोधी शकायुं नथी। वटपद्र नामनुं अन्य गाम राजस्थानना डुङ्गरपुर पासे हतुं। आम एक सरखा नामोने कारणे घणी बधी विगतो सेलभेल थई गई छे।
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चन्द्रावती — पहली पहचान
गुजरातना वटपद्र गामनी बाबते उपरोक्त दानपत्रना आधारे आ गामनी चतु:सीमामां आवेलां स्थानोनी ओलख थई। कोई विस्तार गणाय। वडोदराना बहुमाली मकान "नर्मदापवन"ना पायामां ६ मीटर ऊँडा पायाना खोदकाम दरम्यान ते स्थानेथी "वगधाराछ" हतुं। ज्यारे पूर्व दिशामां "जम्बुवापीका" अत्यारनुं जाणीतुं नाम (जंबुबेट-दांडियाबजार) स्थान हतुं। वटपद्रनी दक्षिणमां महासेन सनिवेषे वटपद्रनी पश्चिम दिशामां बांधेलुं विशाल सरोवर जेनुं पुराण करी आजे आये (पोलो ग्राऊन्ड) तरीके जाणीतुं हतुं।
वडोदराना दक्षिणमां अन्नकोटा हालनुं (अकोटा गाम) वटपद्रथी पश्चिम दिशामां बांधेलुं विशाल सरोवर जेनुं पुराण करी आज आये (पोलो ग्राऊन्ड) तरीके जाणीतुं हतुं।
वडोदरा शहेरना नकशा पर आ चार स्थानो गोठवतां होवाथी आ स्थळे प्राचीन वडोदराना उत्खनन थयुं नथी, जमीन परथी प्राप्त थता अवशेषो परथी वटपद्र एक नानुं गाम हतुं। अन्नकोटो उत्तर जता घोरी मार्ग पर हतुं। व्यापार वाणीज्यनी प्रवृत्तिनुं स्थान हतुं। त्यांना श्रेष्ठीओ जैन धर्मना उपासको हता।
आ स्थलेथी प्राप्त धातुओनी अने पत्थरनी जैन तीर्थंकरोनी मूर्तिओथी अनुमान लगावी शकाय छे के जैन महाराजश्री आसपासना विस्तारमां धर्म अने ज्ञाननो प्रचार करता होय एवुं कही शकाय।
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वडोदरा — चन्द्रनाव और राणी मलयगिरी की कथा
ज्ञानी, तपस्वी जैन महाराजश्रीओए घणा बधा वास्तुग्रन्थोनी रचना करी। ज्यारे वटपद्रना स्थाननी अनिश्चितमां वडोदरानी ओलख अन्य नामोथी थती होवाओ उल्लेख जैन विद्वानोए पोताना साहित्य सर्जन दारा प्रस्तुत कर्यो। गुर्जर जैन कवि हर्षना रचेल रास "चन्दन मलयागिरी" द्वारा प्राचीन वडोदरानो उल्लेख चन्द्रनावती नगर तरीके मने छे।
आ रासनी रचना इसवीसनी आठमी सटीना संदर्भमां छे। आ कथाना पात्रोनुं अस्तित्व आठमी सदीमां होवानी शक्यता छे।
आ कथा वस्तु परथी जैन मुनि भर्तसेने पुनर्लेखन कर्यु। आ कथा परथी गुर्जर कवि लेमचन्द्रे फरीथी आ रास "चन्दन मलयागिरी" नी रचना करी। आम बे सदीना गाणामां आ कथावस्तुनी ण्ण वखत रचना थई ते वडोदरानी प्राचीन गौरवगाथानी लोकप्रियतानु सुचक छे।
कथा वस्तु ज्योतिष तथा कर्मना सिद्धान्त पर आधारीत छे। रासना मुख्यपात्रो एक दन्तकथाप्रमाणे राजा चन्द्रनसिंह अने राणी मलयगिरी छे। राजाने शाणितेव स्वप्नमां आवीने पूछना करी छे के हुं युवानीना समयमां तारे त्यां आवुं के वृद्धावस्थामां आवुं।
राजाराणी विचारीने बीजा दिवसना स्वप्नमां शाणितेवने (पनोतीने) युवानीना समयमां पधारवानुं कह्युं। राजा पनोतीना समय दरम्यान दु:ख भोगवे छे अने अन्ते सारावाणा थाय छे। राजा चन्द्रनसिंहे नेतृत्व खूणामां इ.स. ८१२मां चन्दननताव (सुरसागर तळाव)नुं निर्माण करावेल हतुं।
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मध्ययुगीन वडोदरा
वडोदरा युनिवर्सिटीना कॉमर्सनी मेडीकल कॉलेज ना पायाना खोदकाम वखते पुरातत्त्वी अन्वेषण करेल पर्न्तु आ स्थान अगाऊ वर्ण्या मुजब वटपद्रकनुं स्थान न हतुं। पुरातत्त्व विभाग तरफथी चन्द्रनावती नगरना संभवित स्थान पर कोईज कामगीरी करवामां आवीज नथी।
चन्द्रनावती नगरनुं संभवित स्थान वडोदरा शहेरना चांपानेर दरवाजानी उत्तरदिशामां हतेपुरा विस्तार छे। आ स्थानना पुरातत्त्वीय अन्वेषण दरम्यान भारतीय नगरोना इतिहासमां ऐतिहासिक नगरोमां जोवा मलतां सिगिनेल्स एटले कानेहावाला कुवाओना अवशेषो हतेपुराना खंडेरो तथा मकानना पायाना खोदकाम वखते दृष्टिगोचर थी प्राचीन नगर चन्द्रनावतीनुं स्थान हतेपुरा विस्तार प्रमाणीत थाय छे।
हतेपुरा विस्तारमां आठमी सदीमां चन्द्रनावती नगरी हती, नगरनो राजा चन्द्रनसिंह हेरा जातीनो क्षत्रिय, अने मलयगिरी तेनी राणी हती। आ नगरी ढाङ्की प्रकारनी हती। जेमां उत्तरथी दक्षिण जतो मुख्य मार्ग हतो। आ मुख्यमार्गने कापकूणे छेदता अन्य मार्गो हता। नगर पागडीपटे विकसेलं हतुं।
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सूर्यदेव मन्दिर और गायकवाड
इ.स. ५०० थी इ.स. ६०० ना गुप्त राज्वीओना समय दरम्यान सूर्यदेवनी मूर्तिनुं मन्दिर हालनी सयाजी हॉस्पीटलना टेकरा पर हतुं जेनो नाश विधर्मिओ द्वारा थयो। आ स्थान उटचनारायण (सूर्यदेव) तरीके जाणीतुं हतुं। गायकवाड शासनकालमां आ खंडेर पर नवा मन्दिरनुं निर्माण थयुं तथा खण्डित मूर्तिने मन्दिरना प्राङ्गणमां मुक्ने नवा मन्दिरमां शिवलिङ्गनी स्थापना करवामां आवी। आ खण्डित मूर्ति टागोरो द्वारा गुम थई गई।
आजे आ उटचनारायणनी (सूर्यदेवनी मूर्ति) जर्मनीना म्युनिख शहेर म्युझीयममां रेकोर्डमां आ मूर्तिनी प्राप्ती स्थान, उटचनारायण मन्दिर वडोदरा गुजरात भारत दर्शावेल छे। वायुटेवतानुं मन्दिर वडोदराना बाजवाडा विस्तारमां आवेलं छे। वैदिक देवी देवताओमां वायुटेवनुं स्थान पण महत्त्वनुं छे।
पांचमी थी अग्यारमी सदीना जैन कास्य मूर्तिओ तथा आरसनी मूर्तिओ वडोदराना अकोटा विस्तारमांथी प्राप्त थई हती, जेमां शिल्पकलाना श्रेष्ठ नमूनारूप शिल्प आमरधारीजीनुं छे।
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वडोदरा कोट और चार द्वार
नूतन वडोदरानुं निर्माण थयुं हतुं। आ नगरनो आकार चौरस छे, नगरनी चारेय दिशाए चार दरवाजाना निर्माण थयेला छे। आ तमाम मुख्य मार्गो जे दक्षिण थी उत्तर अने पश्चिम थी पूर्व दिशामां होई केन्द्रस्थाने एकबीजाने काटकूणे कापे छे।
आ मुख्य मार्गोने कारणे नगर मुख्य चार खंडोमां विभाजते छे, नगरनी उत्तरे चांपानेर दरवाजे, पूर्वमां पाणी दरवाजे, दक्षिणमां गेन्डी दरवाजे तथा पश्चिममां लहरीपुरा दरवाजे आवेल छे। केन्द्रस्थाननो माण्डवी मोगल शासन दरम्यान निर्माण थयेलो हतो।
उत्तरथी दक्षिणे जतो सीधो रस्तो महाकाल मार्ग तरीके ओलखातो हतो। कोटनी अंदरना भागनी दिवालने अडीने जता मार्गने "मङ्गलवीथी / मङ्गलवीथी" तरीके वास्तुशास्त्रमां ओलखाय छे। आ रस्ते कटोकटीना समये पुरवठो तेमज सैन्य सहाय गोठवी शकाय माटे रहेतो हतो।
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"पोल" — गुजराती वास्तु-शब्द
मुख्य चार खण्डो, अन्य नाना खण्डोमां नाना मार्गोथी विभाजित थयेल छे। आ नाना मार्गो तथा खण्डो अनेक प्रतिथीओमां (पोलोमां) वर्हेंचायेल छे। बे प्रतिथीओ (पोलो) वच्चे वीहीनुं आयोजन छे। आ एक सर्विस लेन (छीडी) नो उपयोग मकानोना कचरानो निकास माटे रोजबरोज बध्या लोको ज प्रवेश करता।
भारतीय संस्कृतिनी वर्ष प्रथमां शुद्ध लोकोनुं कार्य अन्य त्रण वर्णोनी सेवा करवानुं सूचवेल छे। जे परम्परागत रीते नगर आयोजनमां जोवा मले छे। शहेरना कोट बहारना विस्तार गोलवाड (शुद्ध वस्तीनो रहेंशाक) जोवा मले छे। आ परम्परा गुजरातना प्राचीन नगरोमां पण जोवा मले छे।
भारतीय संस्कृतिना संस्कार जाणवानी परम्परामां पञ्चमहायज्ञ कर्मनुं पालन ते रोजिन्दी बाबत गणाती हती। जेमां पितृओ, भूतप्रेत चोनी, पशु, पक्षी, वनस्पति आ तमाम अन्येनुं कर्मकार्य पण निश्चित हतुं। परिणाम स्वरूपे शहेरनी पोणोमां चबुतरा, हवाडा, चाह पत्थरो, टीपमाण, खुल्ला चोक, चोतरा, ज़हेर कुवाओ, वाव वगेरेनी रचनाओ थई, जे पञ्चमहायज्ञना सांस्कृतिक प्रतीक समान छे।
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"घर" के संस्कृत शब्द
"घर" माटे प्राचीन संस्कृत साहित्यमां सदन, शाल, दुरोण, दम, शाला, हर्म्य, वेश्म, प्रासाद, सीधम, शरण, अड्ड, सौधम, गृह जेवा शब्दो प्रयोजना छे, "गृह" साधारण रीते चार दिवालो वच्चे रहेवानी जग्याने, मध्यम श्रेणीना घरोने "वेश्म" के "शाला", बे के त्रण मञ्जलाना आवासोने "अह्र" के "प्रासाद" अने अनेक मञ्जलोना सुन्दर विशाल भवनोने "हर्म्य", "बृहत्मान", "सौधम" के "सहस्रशृणु" कहेवामां आवे छे।
"जेमां परिवार अने एना पशु एक साथे रहेतां होय तेने 'गृह' कहेवामां आवे छे।" — ऋग्वेद
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वडोदरा — आज भी
वडोदराना कोटना भव्य प्रवेश द्वारो परना पत्थरो परनी नकशी कारीगरी पण नोंधपात्र छे। कमानवाणा दरवाजानी उपरनी डाबी तथा जमणी बाजुए कमलनी पांखडीओवाणा शिल्पोनुं आलेखन ए गुजरातना स्थापत्यनी विशिष्टता छे।
वेल, पांदडां अने कुलोनी नक्शीकाम, भौमितिक आकारोनुं नक्शीकाम, हीरा (डायमंड) तीर, आकारणी, मोतीनी झेरोनां नक्शीकाम, व्यालमुख, सर्पावेल, सहस्रदल पुष्प, तांत्रिक यन्त्रो, प्राणीओ, कुस्ती करता मल्लो, गायोचा तथा दुर्गानी योगमां बिराजेल मुर्तिओ वगेरे पत्थरोमांनी कलाकारीगरीनी नोंधपात्र बाबत छे।
लगभग १६मी सदीमां वडोदरा कोटनुं विस्तरण थयुं। जेमां पूर्व तरफनी दिवाल अगहना मेदानमांथी राउ करीने अजबडी तणाव वच्चे थईने जती लाल दरवाजने सांकळीने बादामन दरगाह पासे कांटखूणे वणी जती तथा तेनो एक भाग पश्चिम तरफ आवेल मूल कोटना अग्ने खूणे मणती हती।
"वडोदरा एक एवुं नगर छे जेना भूमि परना रस्तानां ३०% जेटला भूगर्भ मार्गो छे। जे नगरना एक खण्डमांथी बीजा खण्डने सांकलता होय तेवी रचना छे।"
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वास्तु शास्त्र के अनुसार वडोदरा
वास्तुशास्त्रोना सिद्धान्तो अनुसार वडोदरा नगर "सर्वतो भद्र" प्रकारना नगरोमां गणी शकाय। साम्राज्यनी "राजधानी" होवाथी वडोदरा शहेरनी श्रेणीमां गणी शकाय। अन्य वास्तुशास्त्रोना आधार मुजब तेने "खेट", "स्थानीय" अने "नगरक" प्रकारमां गणी शकाय।
कोटनी रचना जोतां वास्तुशास्त्र मुजब आ ऐतिहासिक वडोदराने "कतक" प्रकारनो दुर्ग छे तेम मानी शकाय।
आ नगर आजे पण जीवित छे। हर प्राचीन ईंट में इतिहास भी जीवित। हर दीवार पर वास्तु-शास्त्र की छाप। हर मार्ग — कोई कथा।
॥ इति शुभम् ॥
अगले अध्याय में — प्राचीन अमदावाद-कर्णावती। अहमद शाह से कर्णदेव सोलंकी तक — और पोल-वाड़ी-खाँचा-शेरी की कथा।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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