अध्याय 1 — 45 वास्तु देवता = 45 शक्तियाँ
वास्तु पुरुष मंडल के 45 देवता 45 मूर्तियाँ नहीं हैं। हर देवता घर या दफ़्तर में काम करने वाली एक शक्ति है — कोई ग्राहक लाती है, कोई अनुशासन रखती है, कोई रोकती है। जिस जगह वह शक्ति बैठी है वह जगह बिगड़ी हो तो वही काम बिगड़ता है। नीचे हर देवता का काम एक पंक्ति में है, फिर साफ़-साफ़ यह कि इसमें कौन-सी बात शास्त्र की है और कौन-सी आज की व्याख्या, और अंत में वे संस्कृत ग्रंथ जहाँ यह सब लिखा है।
45 देवता और उनकी शक्ति (Vastu Devta Powers Chart)
क्रम 1–45 मंडल के भीतर से बाहर की ओर है: केंद्र, फिर चारों दिशाओं के लंबे देवता, फिर भीतरी आठ, फिर बाहरी घेरे के 32 (पूर्व से घड़ी की दिशा में)। “द्वार शुभ” = इस पद पर मुख्य द्वार शुभ माना गया है।
| # | पद (Pada) | देवता | शक्ति / काम | Power | वर्ग | टिप्पणी |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | केंद्र | ब्रह्मा Brahma |
लक्ष्य और संतुलन | Goal | ब्रह्मा | |
| 2 | N (पूरा) | भूधर / पृथ्वीधर Bhudhar |
व्यवस्था की नींव | System architecture | वसु | |
| 3 | E (पूरा) | अर्यमा Aryama |
जोड़ने वाला, संपर्क | Liaison | आदित्य | |
| 4 | S (पूरा) | विवस्वान Vivaswan |
राजा, मुखिया | King | आदित्य | |
| 5 | W (पूरा) | मित्र Mitra |
लोगों का प्रबंध | HR / people | आदित्य | |
| 6 | N7–N8 | आपः Aapaha |
पोषण | Nutrients | वसु | |
| 7 | E1–E2 | आपवत्स Apahvatsa |
शक्ति-तत्व | Vitamin | रुद्र | |
| 8 | E7–E8 | सविता Savita |
प्रायोजक, प्रेरक | Sponsor | आदित्य | |
| 9 | S1–S2 | सावित्र Savitra |
बाँटने वाला | Distributor | आदित्य | |
| 10 | S7–S8 | इन्द्र Indra |
मुख्य कार्यपालक | Chief executor | आदित्य | |
| 11 | W1–W2 | जय Jaya |
रणनीतिकार | Strategist | रुद्र | |
| 12 | W7–W8 | रुद्र Rudra |
नियंत्रक | Controller | रुद्र | |
| 13 | N1–N2 | राजयक्ष्मा Rajyakshma |
गला घोंटने वाला (अवरोध) | Choker | असुर | |
| 14 | E1 | शिखी (अग्नि) Shikhi |
दूरदृष्टि, नए विचार | Visionary | रुद्र | |
| 15 | E2 | पर्जन्य Parjanya |
सींचकर बढ़ाना | Fertiliser | आदित्य | |
| 16 | E3 | जयन्त Jayant |
कर दिखाने वाला | Go-getter | रुद्र | द्वार शुभ |
| 17 | E4 | महेन्द्र Mahendra |
नेतृत्व, प्रबंधक | Manager / leader | आदित्य | द्वार शुभ |
| 18 | E5 | सूर्य Surya |
नियामक | Regulator | वसु | |
| 19 | E6 | सत्य Satya |
न्यायाधीश | Judge | रुद्र | |
| 20 | E7 | भृश Bhrisha |
पीसने वाला, घर्षण | Grinder | असुर | |
| 21 | E8 | अन्तरिक्ष Antriksh |
विस्तार | Expander | वसु | |
| 22 | S1 | अनिल (वायु) Anil |
ऊपर उठाने वाला | Uplifter | वसु | |
| 23 | S2 | पूषा Pusha |
मार्गदर्शक | Navigator | आदित्य | |
| 24 | S3 | वितथ Vitatha |
कुतरने वाला, क्षरण | Cruncher | असुर | चक्र पर “Vitasta” |
| 25 | S4 | गृहक्षत Grihakshat |
बाँधने वाला | Binder | असुर | चक्र पर “GrihaSpatya” |
| 26 | S5 | यम Yama |
अनुशासन | Discipliner | आदित्य | |
| 27 | S6 | गन्धर्व Gandharva |
कला | Artist | रुद्र | |
| 28 | S7 | भृंगराज Bhringraj |
सफ़ाई | Cleaner | असुर | |
| 29 | S8 | मृग Mriga |
खोजी, शिकारी | Hunter | असुर | |
| 30 | W1 | पितृ Pitra |
पूर्वज | Ancestors | वसु | |
| 31 | W2 | दौवारिक Dauwarik |
द्वारपाल, रक्षक | Guardian | रुद्र | |
| 32 | W3 | सुग्रीव Sugreev |
पकड़, ग्रहण | Grasper | रुद्र | |
| 33 | W4 | पुष्पदन्त Pushpdant |
गुरु | Guru | रुद्र | द्वार शुभ |
| 34 | W5 | वरुण Varun |
संचालक | Chief operator | आदित्य | द्वार शुभ |
| 35 | W6 | असुर Asur |
छिपा हुआ | Under cover | असुर | |
| 36 | W7 | शोष Shosha |
सुखाने वाला | Drier | असुर | |
| 37 | W8 | पापयक्ष्मा Papyakshma |
लत | Addiction | असुर | |
| 38 | N1 | रोग Roga |
कमज़ोरी | Weakener | असुर | |
| 39 | N2 | अहि / नाग Ahi (Naga) |
आक्रामक | Attacker | असुर | |
| 40 | N3 | मुख्य Mukhya |
रचनाकार, डिज़ाइनर | Designer | आदित्य | द्वार शुभ |
| 41 | N4 | भल्लाट Bhallat |
ग्राहक और व्यापार | Merchandiser | वसु | द्वार शुभ |
| 42 | N5 | सोम Soma |
समाधान | Solution | वसु | द्वार शुभ |
| 43 | N6 | भुजग (सर्प) Bhujag |
चिकित्सक | Doctor | रुद्र | |
| 44 | N7 | अदिति Aditi |
देखभाल, माता | Caretaker | देवमाता | |
| 45 | N8 | दिति Diti |
सीमा, रोक | Restrainer | देवमाता |
मंडल पर कौन कहाँ है — टैप करें
किसी देवता पर टैप करने से अध्याय 5 में उसका कार्ड खुलता है — पद, अंग, उपाय और Field Booster के साथ।
शास्त्र क्या कहता है, और व्याख्या क्या है
दोनों को अलग रखना ज़रूरी है, वरना पाठक को लगता है कि सब कुछ ग्रंथों में लिखा है। ऐसा नहीं है।
✅ यह शास्त्र में लिखा है
- 45 देवताओं के नाम और उनके पद — शिखी से दिति तक बाहरी 32, भीतर के 12, केंद्र में ब्रह्मा (बृहत्संहिता 52/53, मत्स्य पुराण 253, मयमत 7, समराङ्गण सूत्रधार 11–14)।
- द्वार-फल — किस पद पर मुख्य द्वार शुभ, किस पर अशुभ (बृहत्संहिता, विश्वकर्मा प्रकाश)।
- अदिति बारह आदित्यों की माता हैं और दिति उनकी बहन (ऋग्वेद 10.72, भागवत 6.6, विष्णु पुराण 1.15)।
- अदिति पुनर्वसु नक्षत्र की देवी हैं (तैत्तिरीय ब्राह्मण 3.1.1)।
- शिखी = अग्नि; पर्जन्य = वर्षा के देवता (ऋग्वेद 5.83) — इसलिए “सींचकर बढ़ाना” ठीक बैठता है।
🟡 यह आधुनिक व्याख्या है
- “Visionary”, “Merchandiser”, “Grinder” जैसे काम के नाम — किसी ग्रंथ में नहीं; यह आज के वास्तु-शिक्षण का ढंग है, जिसे ऊपर हमने हिंदी में अपने शब्दों में रखा है।
- आदित्य / रुद्र / वसु / असुर का वर्ग जैसा कई चार्ट देते हैं — ग्रंथों के 12 आदित्यों में भग, त्वष्टा, धाता, विधाता, अंश, विष्णु हैं; यम और मुख्य आदित्य नहीं हैं। वर्ग को संकेत समझें, प्रमाण नहीं।
- हर देवता का तत्व और गुण-दोष का प्रतिशत, और धातु या सामग्री से “फ़ील्ड” बनना — व्याख्या और अनुभव, शास्त्र नहीं।
- प्लास्टिक की मूर्ति से आसुरी प्रवृत्ति, नायलॉन की मौली से नसों पर असर — यह स्वास्थ्य-दावे हैं जिनका कोई ग्रंथीय या चिकित्सकीय आधार नहीं है। सूती कलावा की परंपरा ज़रूर पुरानी है।
मूल श्लोक अनुवाद सहित अगले अध्यायों में हैं:अध्याय 2 — 45 देवताओं के मूल श्लोक · अध्याय 3 — अदिति, दिति, आदित्य, रुद्र · अध्याय 4 — द्वार-फल
कौन-सी संस्कृत किताब पढ़ें
मंडल और देवताओं के लिए पहले ये दो:
- बृहत्संहिता (वराहमिहिर), वास्तुविद्या अध्याय (संस्करण के अनुसार 52 या 53) — 45 देवताओं की सबसे पुरानी पूरी सूची और द्वार-फल। संस्कृत-हिंदी: अच्युतानन्द झा (चौखम्बा)। संस्कृत-अंग्रेज़ी: एम. रामकृष्ण भट (मोतीलाल, 2 खंड)। भट्टोत्पल की टीका सहित: सुधाकर द्विवेदी संस्करण।
- समराङ्गण सूत्रधार (राजा भोज), अध्याय 11–14 — पद-देवताओं का सबसे विस्तृत वर्णन। संस्कृत-अंग्रेज़ी: सुदर्शन कुमार शर्मा (परिमल)।
फिर, उपयोगिता के क्रम में:
- मत्स्य पुराण अध्याय 252–257 (253 में देवता-सूची) — गीता प्रेस का हिंदी अनुवाद सुलभ है।
- मयमत अध्याय 7 — ब्रूनो दाजाँ (Bruno Dagens) का संस्कृत-अंग्रेज़ी संस्करण (IGNCA / मोतीलाल)।
- विश्वकर्मा प्रकाश — खेमराज श्रीकृष्णदास, हिंदी टीका सहित।
- मानसार अध्याय 7 (पी. के. आचार्य) · अग्नि पुराण अध्याय 93 · राजवल्लभ (मण्डन सूत्रधार) अध्याय 1।
अदिति, दिति, आदित्य और रुद्र के लिए: श्रीमद्भागवत 6.6, 6.18 और 3.12; ऋग्वेद 10.72 और 2.27; विष्णु पुराण 1.15 और 1.21।
इस अध्याय का उपयोग कैसे करें
- जिस जीवन-क्षेत्र में दिक्कत है, उसकी शक्ति ऊपर तालिका में ढूँढें — जैसे ग्राहक नहीं आ रहे तो भल्लाट (N4), फ़ैसले नहीं हो पाते तो जयन्त (E3)।
- फिर अपने नक्शे पर वह पद देखें — Vastu Grid टूल नक्शे पर 45-देवता जाल बिछा देता है।
- उस पद में क्या रखा है, क्या हटाना है — इसके लिए 45 देवता हब पर उस देवता का पन्ना पढ़ें, या परामर्श लें।
- पूरी सूची दिशा-वार तालिका में: 45 Vastu Devta Chart।
Frequently Asked Questions
क्या 45 वास्तु देवताओं के ये काम (powers) शास्त्र में लिखे हैं?
देवताओं के नाम और उनकी जगह बृहत्संहिता (वास्तुविद्या अध्याय) और मत्स्य पुराण (अध्याय 253) में हैं। 'Visionary', 'Merchandiser' जैसे काम के नाम आधुनिक वास्तु-शिक्षण की व्याख्या हैं — उपयोगी संकेत, पर ग्रंथ-वचन नहीं।
45 वास्तु देवताओं की मूल संस्कृत किताब कौन-सी है?
वराहमिहिर की बृहत्संहिता का वास्तुविद्या अध्याय सबसे पुरानी पूरी सूची देता है। विस्तार के लिए राजा भोज का समराङ्गण सूत्रधार (अध्याय 11–14) और मत्स्य पुराण (अध्याय 252–257) पढ़ें।
क्या वास्तु के 45 देवता 12 आदित्य, 11 रुद्र, 8 वसु और असुर हैं?
यह वर्ग-विभाजन आधुनिक चार्टों में मिलता है, पर ग्रंथों के 12 आदित्यों की सूची (भागवत 6.6) से पूरी तरह नहीं मिलता — यम और मुख्य आदित्य नहीं हैं, और भग, त्वष्टा, धाता जैसे आदित्य मंडल में नहीं हैं। इसे संकेत की तरह लें।
रुद्र दिति के पुत्र हैं या नहीं?
नहीं। इन्द्र ने दिति के गर्भ के जो टुकड़े किए उनसे 49 मरुत बने (भागवत 6.18, रामायण बालकाण्ड 46–47)। एकादश रुद्र ब्रह्मा के ललाट से उत्पन्न रोते हुए बालक से हैं (भागवत 3.12)।