अध्याय 4 — द्वार-फल: किस देवता के पद पर मुख्य द्वार क्या देता है
मुख्य द्वार मंडल के बाहरी घेरे के किसी एक पद पर पड़ता है, और उस पद का देवता ही उस द्वार का फल तय करता है। बृहत्संहिता चार श्लोकों में 32 पदों का फल एक-एक शब्द में दे देती है — पूर्व में शिखी से शुरू करके प्रदक्षिणा-क्रम में उत्तर में दिति तक। नीचे पहले मूल श्लोक, फिर 32 पदों की तालिका, फिर द्वार के सामान्य दोष।
क. मूल श्लोक
नवगुणसूत्रविभक्तान्यष्टगुणेनाथ वा चतुःषष्टेः ।
द्वाराणि यानि तेषामनलादीनां फलोपनयः ॥
अर्थ: नौ-नौ सूत्रों से (81 पद) या आठ-आठ से (64 पद) बाँटे गए वास्तु में जो द्वार हैं, उनका फल अनल (शिखी) आदि देवताओं के क्रम से कहा जाता है।
English: For the doors of a site divided by nine lines (81 squares) or by eight (64 squares), the results are stated in the order of the gods beginning with Anala (Shikhi).
अनिलभयं स्त्रीजननं प्रभूतधनता नरेन्द्रवाल्लभ्यम् ।
क्रोधपरतानृतत्वं क्रौर्यं चौर्यं च पूर्वेण ॥
अर्थ: पूर्व में (शिखी से अन्तरिक्ष तक क्रम से): अग्नि-वायु का भय, कन्याओं का जन्म, बहुत धन, राजा की कृपा, क्रोधी स्वभाव, झूठ, क्रूरता और चोरी।
English: On the east (from Shikhi to Antariksha in order): fear of fire and wind, birth of daughters, great wealth, the king's favour, a temper given to anger, falsehood, cruelty and theft.
अल्पसुतत्वं प्रैष्यं नीचत्वं भक्ष्यपानसुतवृद्धिः ।
रौद्रं कृतघ्नमधनं सुतवीर्यघ्नं च याम्येन ॥
अर्थ: दक्षिण में (अनिल से मृग तक): कम संतान, दासता, नीचता, अन्न-पेय-संतान की वृद्धि, उग्रता, कृतघ्नता, निर्धनता और पुत्रों के बल का नाश।
English: On the south (from Anila to Mriga): few sons, servitude, meanness, increase of food, drink and sons, fierceness, ingratitude, poverty, and loss of the sons' strength.
सुतपीडा रिपुवृद्धिर्न सुतधनाप्तिः सुतार्थफलसम्पत् ।
धनसम्पन्नृपतिभयं धनक्षयो रोग इत्यपरे ॥
अर्थ: पश्चिम में (पितृ से पापयक्ष्मा तक): संतान को कष्ट, शत्रुओं की वृद्धि, न पुत्र न धन, पुत्र-धन-फल की सम्पत्ति, धन-सम्पत्ति, राजा से भय, धन का क्षय और रोग।
English: On the west (from the Pitris to Papayakshma): trouble to the children, increase of enemies, neither sons nor wealth, sons, wealth and fruit, wealth, fear of the king, loss of wealth, and disease.
वधबन्धो रिपुवृद्धिः सुतधनलाभः समस्तगुणसम्पत् ।
पुत्रधनाप्तिर्वैरं सुतेन दोषाः स्त्रिया नैःस्वम् ॥
अर्थ: उत्तर में (रोग से दिति तक): वध-बंधन, शत्रुओं की वृद्धि, पुत्र-धन का लाभ, सब गुणों की सम्पत्ति, पुत्र-धन की प्राप्ति, पुत्र से वैर, स्त्री से दोष और दरिद्रता।
English: On the north (from Roga to Diti): killing and bondage, increase of enemies, gain of sons and wealth, all good qualities, sons and wealth, enmity with one's son, faults through women, and destitution.
ख. 32 पदों की तालिका
श्लोक का क्रम = पदों का क्रम: पूर्व में E1 शिखी से E8 अन्तरिक्ष, फिर दक्षिण S1–S8, पश्चिम W1–W8, उत्तर N1–N8। पदों के नाम अध्याय 2 से।
| पद | देवता | श्लोक का शब्द | फल (हिंदी) | Result | शुभ? |
|---|---|---|---|---|---|
| E1 | शिखी (अग्नि) | अनिलभयम् | अग्नि/वायु का भय | fear of fire and wind | ✗ अशुभ |
| E2 | पर्जन्य | स्त्रीजननम् | कन्याओं का जन्म | birth of daughters | ✗ अशुभ |
| E3 | जयन्त | प्रभूतधनता | बहुत धन | great wealth | ✓ शुभ |
| E4 | इन्द्र (महेन्द्र) | नरेन्द्रवाल्लभ्यम् | राजा की कृपा | favour of the king | ✓ शुभ |
| E5 | सूर्य | क्रोधपरता | क्रोधी स्वभाव | a temper given to anger | ✗ अशुभ |
| E6 | सत्य | अनृतत्वम् | झूठ | falsehood | ✗ अशुभ |
| E7 | भृश | क्रौर्यम् | क्रूरता | cruelty | ✗ अशुभ |
| E8 | अन्तरिक्ष | चौर्यम् | चोरी | theft | ✗ अशुभ |
| S1 | अनिल (वायु) | अल्पसुतत्वम् | कम संतान | few sons | ✗ अशुभ |
| S2 | पूषा | प्रैष्यम् | दासता | servitude | ✗ अशुभ |
| S3 | वितथ | नीचत्वम् | नीचता | meanness | ✗ अशुभ |
| S4 | गृहक्षत | भक्ष्यपानसुतवृद्धिः | अन्न, पेय और संतान की वृद्धि | increase of food, drink and sons | ✓ शुभ |
| S5 | यम | रौद्रम् | उग्रता | fierceness | ✗ अशुभ |
| S6 | गन्धर्व | कृतघ्नम् | कृतघ्नता | ingratitude | ✗ अशुभ |
| S7 | भृङ्गराज | अधनम् | निर्धनता | poverty | ✗ अशुभ |
| S8 | मृग | सुतवीर्यघ्नम् | पुत्रों के बल का नाश | destroys the strength of sons | ✗ अशुभ |
| W1 | पितृ | सुतपीडा | संतान को कष्ट | trouble to the children | ✗ अशुभ |
| W2 | दौवारिक | रिपुवृद्धिः | शत्रुओं की वृद्धि | increase of enemies | ✗ अशुभ |
| W3 | सुग्रीव | न सुतधनाप्तिः | न पुत्र न धन | neither sons nor wealth | ✗ अशुभ |
| W4 | पुष्पदन्त | सुतार्थफलसम्पत् | पुत्र, धन और फल की सम्पत्ति | sons, wealth and fruit | ✓ शुभ |
| W5 | वरुण | धनसम्पत् | धन-सम्पत्ति | wealth | ✓ शुभ |
| W6 | असुर | नृपतिभयम् | राजा से भय | fear of the king | ✗ अशुभ |
| W7 | शोष | धनक्षयः | धन का क्षय | loss of wealth | ✗ अशुभ |
| W8 | पापयक्ष्मा | रोगः | रोग | disease | ✗ अशुभ |
| N1 | रोग | वधबन्धः | वध और बंधन | killing and bondage | ✗ अशुभ |
| N2 | अहि (नाग) | रिपुवृद्धिः | शत्रुओं की वृद्धि | increase of enemies | ✗ अशुभ |
| N3 | मुख्य | सुतधनलाभः | पुत्र और धन का लाभ | gain of sons and wealth | ✓ शुभ |
| N4 | भल्लाट | समस्तगुणसम्पत् | सब गुणों की सम्पत्ति | all good qualities | ✓ शुभ |
| N5 | सोम | पुत्रधनाप्तिः | पुत्र और धन की प्राप्ति | sons and wealth | ✓ शुभ |
| N6 | भुजग | वैरं सुतेन | पुत्र से वैर | enmity with one's son | ✗ अशुभ |
| N7 | अदिति | दोषाः स्त्रिया | स्त्री से दोष | faults through women | ✗ अशुभ |
| N8 | दिति | नैःस्वम् | दरिद्रता | destitution | ✗ अशुभ |
ग. द्वार के सामान्य दोष — वही अध्याय
पद के अलावा द्वार की बनावट और सामने की चीज़ों के भी फल कहे गए हैं। कुछ श्लोक:
मार्गतरुकोणकूपस्तम्भभ्रमविद्धमशुभदं द्वारम् ।
उच्छ्रायाद्द्विगुणमितां त्यक्त्वा भूमिं न दोषाय ॥
अर्थ: सामने से सड़क, पेड़, कोना, कुआँ, खंभा या चक्की (भ्रम) से बिंधा हुआ द्वार अशुभ है; पर द्वार की ऊँचाई से दुगुनी दूरी छोड़ देने पर दोष नहीं रहता।
English: A door struck (in line) by a road, a tree, a corner, a well, a pillar or a mill is inauspicious; but if a distance of twice the door's height is left, there is no fault.
रथ्याविद्धं द्वारं नाशाय कुमारदोषदं तरुणा ।
पङ्कद्वारे शोको व्ययोऽम्बुनिःस्राविणि प्रोक्तः ॥
अर्थ: सड़क से बिंधा द्वार नाश करता है; पेड़ से बिंधा द्वार बच्चों को दोष देता है; कीचड़ वाले द्वार पर शोक, और जहाँ से पानी बहकर निकले वहाँ व्यय कहा गया है।
English: A door pierced by a street brings ruin; by a tree, harm to the children; a muddy door brings grief, and one from which water drains away, expense.
कूपेनापस्मारो भवति विनाशश्च देवताविद्धे ।
स्तम्भेन स्त्रीदोषाः कुलनाशो ब्राह्मणाभिमुखे ॥
अर्थ: कुएँ से बिंधे द्वार पर अपस्मार (मिर्गी), देवता (मंदिर) से बिंधे पर विनाश, खंभे से बिंधे पर स्त्री-दोष, और ब्राह्मण (के घर) के सामने खुलने पर कुल का नाश।
English: Pierced by a well, the door brings epilepsy; by a shrine, destruction; by a pillar, faults among the women; and facing a Brahmin's house, ruin of the family.
उन्मादः स्वयमुद्घाटितेऽथ पिहिते स्वयं कुलविनाशः ।
मानाधिके नृपभयं दस्युभयं व्यसनमेव नीचे च ॥
अर्थ: जो द्वार अपने-आप खुल जाए उससे उन्माद, अपने-आप बंद हो जाए उससे कुल का नाश; नाप से बड़े द्वार पर राजा का भय, और नीचे (छोटे) द्वार पर चोरों का भय और विपत्ति।
English: A door that opens by itself brings madness; one that shuts by itself, ruin of the family; a door larger than the measure brings fear of the king; a low one, fear of robbers and misfortune.
द्वारं द्वारस्योपरि यत्तन्न शिवाय सङ्कटं यच्च ।
आव्यात्तं क्षुद्भयदं कुब्जं कुलनाशनं भवति ॥
अर्थ: द्वार के ऊपर द्वार शुभ नहीं, और सँकरा द्वार भी नहीं; बहुत खुला (चौड़ा फैला) द्वार भूख का भय देता है, और टेढ़ा द्वार कुल का नाश करता है।
English: A door above a door is not for good, nor a narrow one; a gaping door brings fear of hunger, and a crooked one destroys the family.
इसे अपने घर पर कैसे लगाएँ
- अपने नक्शे पर 81 पदों का जाल बिछाएँ — Vastu Grid टूल यह कर देता है — और देखें कि मुख्य द्वार किस पद पर खुलता है।
- ऊपर की तालिका में वह पद देखें। शुभ आठ में है तो द्वार ठीक है; नहीं है तो यह अपने-आप विपत्ति नहीं, एक संकेत है जिस पर परामर्श में उपाय देखा जाता है — द्वार तोड़े बिना।
- द्वार “विद्ध” (सामने सड़क, पेड़, खंभा) है या नहीं, यह भी उतना ही ज़रूरी है — 52.74 की दूरी का नियम याद रखें।
पिछला: अध्याय 3 — अदिति, दिति, आदित्य, रुद्र और मरुत · शुरू से: अध्याय 1 — 45 देवता = 45 शक्तियाँ
Frequently Asked Questions
वास्तु में मुख्य द्वार के लिए कौन-से पद शुभ हैं?
बृहत्संहिता 52.70–73 के अनुसार आठ: जयन्त (E3), इन्द्र (E4), गृहक्षत (S4), पुष्पदन्त (W4), वरुण (W5), मुख्य (N3), भल्लाट (N4) और सोम (N5) — हर दिशा के बीच के पद।
द्वार-फल किस ग्रंथ में है?
वराहमिहिर की बृहत्संहिता के वास्तुविद्या अध्याय में (Wikisource पाठ में 52.69–79, द्विवेदी/भट संस्करण में 53)। विश्वकर्मा प्रकाश और समराङ्गण सूत्रधार में भी द्वार-विचार है।
अगर मेरा द्वार अशुभ पद पर है तो क्या तोड़ना पड़ेगा?
नहीं। पहले नाप पक्की करें — कई बार द्वार सीमा पर होता है। फिर 'विद्ध' दोष और दूरी का नियम देखें। उपाय बिना तोड़-फोड़ के भी होते हैं; परामर्श में यही तय किया जाता है।