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अध्याय 2 — 45 देवताओं के मूल श्लोक

जो 45 देवता पहले अध्याय की तालिका में हैं, वे यहाँ उन्हीं ग्रंथों के शब्दों में हैं जहाँ से वे आते हैं — वराहमिहिर की बृहत्संहिता (वास्तुविद्या अध्याय) और मत्स्य पुराण (अध्याय 253)। हर श्लोक के नीचे सरल हिंदी और अंग्रेज़ी अर्थ है। अनुवाद हमारे अपने हैं; संस्कृत पाठ ज्यों का त्यों है।

अध्याय-संख्या पर एक बात: बृहत्संहिता के कुछ संस्करणों में वास्तुविद्या 52वाँ अध्याय है (Wikisource का पाठ, जो यहाँ है) और कुछ में 53वाँ (सुधाकर द्विवेदी और रामकृष्ण भट के संस्करण)। श्लोक वही हैं, गिनती में एक का अंतर है।

क. बृहत्संहिता — 81 पद और 45 देवता

एकाशीतिविभागे दश दश पूर्वोत्तरायता रेखाः ।
अन्तस्त्रयोदश सुरा द्वात्रिंशद्बाह्यकोष्ठस्थाः ॥

— बृहत्संहिता, वास्तुविद्या 52.42 (भट संस्करण 53.42)

अर्थ: इक्यासी पदों के विभाग में पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण दस-दस रेखाएँ खींची जाती हैं। भीतर तेरह देवता हैं और बत्तीस देवता बाहरी कोष्ठों में।

English: In the division into eighty-one squares, ten lines run east–west and ten north–south. Thirteen gods are within; thirty-two occupy the outer squares.

शिखिपर्जन्यजयन्तैन्द्रसूर्यसत्या भृशोऽन्तरिक्षश्च ।
ऐशान्यादिक्रमशो दक्षिणपूर्वेऽनिलः कोणे ॥

— बृहत्संहिता 52.43

अर्थ: ईशान कोण से क्रम से — शिखी (अग्नि), पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश और अन्तरिक्ष; फिर आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) कोण में अनिल (वायु)।

English: Beginning at the north-east corner, in order: Shikhi (Agni), Parjanya, Jayanta, Indra, Surya, Satya, Bhrisha and Antariksha; then Anila (the wind) in the south-east corner.

पूषा वितथबृहत्क्षतयमगन्धर्वाख्यभृङ्गराजमृगाः ।
पितृदौवारिकसुग्रीवकुसुमदन्ताम्बुपत्यसुराः ॥

— बृहत्संहिता 52.44

अर्थ: (दक्षिण में) पूषा, वितथ, बृहत्क्षत (गृहक्षत), यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृग; (पश्चिम में) पितृ, दौवारिक, सुग्रीव, कुसुमदन्त (पुष्पदन्त), अम्बुपति (वरुण) और असुर।

English: (South) Pusha, Vitatha, Brihatkshata (Grihakshata), Yama, Gandharva, Bhringaraja, Mriga; (West) the Pitris, Dauvarika, Sugriva, Kusumadanta (Pushpadanta), Ambupati (Varuna) and Asura.

बृहत्क्षत और कुसुमदन्त वही हैं जिन्हें मत्स्य पुराण गृहक्षत और पुष्पदन्त कहता है।

शोषोऽथ पापयक्ष्मा रोगः कोणे ततोऽहिमुख्यौ च ।
भल्लाटसोमभुजगास्ततोऽदितिर्दितिरिति क्रमशः ॥

— बृहत्संहिता 52.45

अर्थ: फिर शोष, पापयक्ष्मा, और वायव्य कोण में रोग; उसके बाद अहि (नाग) और मुख्य; फिर भल्लाट, सोम, भुजग, और क्रम से अदिति और दिति।

English: Then Shosha, Papayakshma, and Roga in the north-west corner; after them Ahi (the serpent) and Mukhya; then Bhallata, Soma, Bhujaga, and in order Aditi and Diti.

मध्ये ब्रह्मा नवकोष्ठकाधिपोऽस्यार्यमा स्थितः प्राच्याम् ।
एकान्तरात्प्रदक्षिणमस्मात्सविता विवस्वांश्च ॥

— बृहत्संहिता 52.46

अर्थ: बीच में नौ कोष्ठों के स्वामी ब्रह्मा हैं; उनके पूर्व में अर्यमा है; उससे एक-एक पद छोड़कर प्रदक्षिणा-क्रम में सविता और विवस्वान।

English: In the middle is Brahma, lord of nine squares; to his east stands Aryaman; from him, leaving one square each time in clockwise order, Savita and Vivasvan.

विबुधाधिपतिस्तस्मान्मित्रोऽन्यो राजयक्ष्मनामा च ।
पृथिवीधरापवत्सावित्येते ब्रह्मणः परिधौ ॥

— बृहत्संहिता 52.47

अर्थ: उसके बाद विबुधाधिपति (इन्द्र), मित्र, फिर राजयक्ष्मा नामक देवता, पृथिवीधर और आपवत्स — ये ब्रह्मा के घेरे में हैं।

English: Then the lord of the gods (Indra), Mitra, the one named Rajayakshma, Prithvidhara and Apavatsa — these stand around Brahma.

आपो नामैशाने कोणे हौताशने च सावित्रः ।
जय इति च नैरृते रुद्र आनिलेऽभ्यन्तरपदेषु ॥

— बृहत्संहिता 52.48

अर्थ: भीतरी पदों में — ईशान कोण में आप, आग्नेय में सावित्र, नैर्ऋत्य में जय और वायव्य में रुद्र।

English: In the inner squares: Apa in the north-east corner, Savitra in the south-east, Jaya in the south-west and Rudra in the north-west.

आपस्तथापवत्सः पर्जन्योऽग्निर्दितिश्च वर्गोऽयम् ।
एवं कोणे कोणे पदिकाः स्युः पञ्च पञ्च सुराः ॥

— बृहत्संहिता 52.49

अर्थ: आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि और दिति — यह ईशान कोण का वर्ग है। इसी तरह हर कोण में एक-एक पद वाले पाँच-पाँच देवता होते हैं।

English: Apa, Apavatsa, Parjanya, Agni and Diti — this is the group of the north-east corner. In the same way each corner has five gods of one square each.

बाह्या द्विपदाः शेषास्ते विबुधा विंशति समाख्याताः ।
शेषाश्चत्वारोऽन्ये त्रिपदा दिक्ष्वर्यमाद्यास्ते ॥

— बृहत्संहिता 52.50

अर्थ: बाकी बाहरी बीस देवता दो-दो पद के कहे गए हैं; शेष चार — अर्यमा आदि — चारों दिशाओं में तीन-तीन पद के हैं।

English: The remaining twenty outer gods hold two squares each; the other four — Aryaman and his peers in the four directions — hold three squares each.

ख. बृहत्संहिता — वास्तुपुरुष के अंगों पर देवता

यही श्लोक बताते हैं कि नक्शे पर औंधा लेटा वास्तुपुरुष किस अंग पर किस देवता को रखता है — इसी से “मर्म” और “शल्य” का विचार आता है।

पूर्वोत्तरदिग्मूर्धा पुरुषोऽयमवाङ्मुखोऽस्य शिरसि शिखी ।
आपो मुखे स्तनेऽस्यार्यमा ह्युरस्यापवत्सश्च ॥

— बृहत्संहिता 52.51

अर्थ: यह वास्तुपुरुष ईशान की ओर सिर किए, मुँह नीचे किए लेटा है। इसके सिर पर शिखी, मुख पर आप, स्तन पर अर्यमा और छाती पर आपवत्स हैं।

English: This Purusha lies face down with his head towards the north-east. On his head is Shikhi, on his mouth Apa, on his breast Aryaman and on his chest Apavatsa.

पर्जन्याद्या बाह्या दृक्श्रवणोरःस्थलांसगा देवाः ।
सत्याद्याः पञ्च भुजे हस्ते सविता च सावित्रः ॥

— बृहत्संहिता 52.52

अर्थ: पर्जन्य आदि बाहरी देवता आँख, कान, छाती और कंधे पर हैं; सत्य आदि पाँच भुजा पर, और सविता तथा सावित्र हाथ पर।

English: Parjanya and the outer gods after him are on the eyes, ears, chest and shoulders; Satya and the next four on the arm; Savita and Savitra on the hand.

वितथो बृहत्क्षतयुतः पार्श्वे जठरे स्थितो विवस्वांश्च ।
ऊरू जानु च जङ्घे स्फिगिति यमाद्यैः परिगृहीताः ॥

— बृहत्संहिता 52.53

अर्थ: वितथ और बृहत्क्षत बगल में, विवस्वान पेट में; जाँघ, घुटना, पिंडली और नितम्ब पर यम आदि देवता हैं।

English: Vitatha with Brihatkshata on the side, Vivasvan in the belly; the thigh, the knee, the shin and the hip are held by Yama and those after him.

एते दक्षिणपार्श्वे स्थानेष्वेवं च वामपार्श्वस्थाः ।
मेढ्रे शक्रजयन्तौ हृदये ब्रह्मा पितांघ्रिगतः ॥

— बृहत्संहिता 52.54

अर्थ: ये दाहिनी ओर के स्थान हैं; बाईं ओर भी इसी क्रम से देवता हैं। लिंग-स्थान पर इन्द्र और जयन्त, हृदय में ब्रह्मा, और पैरों में पितृ।

English: These are the places on the right side; the left side is the same. On the organ are Indra and Jayanta, in the heart Brahma, and the Pitris at the feet.

ग. मत्स्य पुराण — वही 45 देवता पुराण की वाणी में

मत्स्य पुराण का 253वाँ अध्याय यही सूची श्लोक-छंद में देता है। गिनती साफ़ है: “त्रिंशत् पञ्चदश” = 45 — बत्तीस बाहर, तेरह भीतर।

सर्ववास्तुविभागेषु विज्ञेया नवका नव ।
एकाशीतिपदं कृत्वा वास्तुवित्सर्ववास्तुषु ॥

— मत्स्य पुराण 253.21

अर्थ: सब वास्तु-विभागों में नौ-नौ के नौ खंड जानने चाहिए; वास्तुवेत्ता हर वास्तु में इक्यासी पद बनाकर (पूजा करे)।

English: In every division of a site, nine groups of nine are to be known; the knower of Vastu makes eighty-one squares in every building.

पदस्थान् पूजयेद्देवांस्त्रिंशत्पञ्चदशैव तु ।
द्वात्रिंशद्बाह्यतः पूज्याः पूज्याश्चान्तस्त्रयोदश ॥

— मत्स्य पुराण 253.22

अर्थ: पदों में स्थित पैंतालीस देवताओं की पूजा करे — बत्तीस बाहर पूज्य हैं और तेरह भीतर।

English: Let him worship the forty-five gods seated in the squares — thirty-two are to be worshipped outside and thirteen within.

नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि स्थानानि च निबोधत ।
ईशानकोणादिषु तान् पूजयेद्धविषा नरः ॥

— मत्स्य पुराण 253.23

अर्थ: उनके नाम और स्थान कहता हूँ, सुनो; ईशान कोण से आरम्भ करके मनुष्य हवि से उनकी पूजा करे।

English: I shall tell their names and places, listen; beginning from the north-east corner, let a man worship them with offerings.

शिखी चैवाथ पर्जन्यो जयन्तः कुलिशायुधः ।
सूर्यसत्यौ भृशश्चैव आकाशो वायुरेव च ॥

— मत्स्य पुराण 253.24

अर्थ: शिखी, पर्जन्य, जयन्त, कुलिशायुध (वज्रधारी इन्द्र), सूर्य, सत्य, भृश, आकाश और वायु।

English: Shikhi, Parjanya, Jayanta, the wielder of the thunderbolt (Indra), Surya, Satya, Bhrisha, Akasha (Antariksha) and Vayu.

पूषा च वितथश्चैव गृहक्षतयमावुभौ ।
गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगः पितृगणस्तथा ॥

— मत्स्य पुराण 253.25

अर्थ: पूषा, वितथ, गृहक्षत और यम दोनों, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृग और पितृगण।

English: Pusha, Vitatha, both Grihakshata and Yama, Gandharva, Bhringaraja, Mriga and the host of Pitris.

दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः ।
असुरः शोषपापौ च रोगोऽहिर्मुख्य एव च ॥

— मत्स्य पुराण 253.26

अर्थ: दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप (वरुण), असुर, शोष और पाप(यक्ष्मा), रोग, अहि और मुख्य।

English: Dauvarika, Sugriva, Pushpadanta, the lord of waters (Varuna), Asura, Shosha and Papa(yakshma), Roga, Ahi and Mukhya.

Wikisource के पाठ में “सोषपाणौ” और “रोगो हिर्मुख्य” छपा है — यह टंकण की भूल है; मानक पाठ “शोषपापौ” और “रोगोऽहिर्मुख्य” है, जो बृहत्संहिता 52.45 से मिलता है।

भल्लाटः सोमसर्पौ च अदितिश्च दितिस्तथा ।
बहिर्द्वात्रिंशदेते तु तदन्तस्तु ततः शृणु ॥

— मत्स्य पुराण 253.27

अर्थ: भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति और दिति — ये बत्तीस बाहर हैं; अब भीतर के देवता सुनो।

English: Bhallata, Soma, Sarpa, Aditi and Diti — these thirty-two are outside; now hear those within.

ईशानादिचतुष्कोणसंस्थितान् पूजयेद्बुधः ।
आपश्चैवाथ सावित्रो जयो रुद्रस्तथैव च ॥

— मत्स्य पुराण 253.28

अर्थ: ईशान आदि चारों कोणों में स्थित आप, सावित्र, जय और रुद्र की बुद्धिमान पूजा करे।

English: The wise one worships those seated in the four corners beginning with the north-east: Apa, Savitra, Jaya and Rudra.

मध्ये नवपदे ब्रह्मा तस्याष्टौ च समीपगान् ।
साध्यानेकान्तरान् विद्यात्पूर्वाद्यान्नामतः शृणु ॥

— मत्स्य पुराण 253.29

अर्थ: बीच के नौ पदों में ब्रह्मा; उनके समीप, एक-एक पद के अंतर से, पूर्व से क्रम में आठ साध्य देवता हैं — उनके नाम सुनो।

English: In the nine central squares is Brahma; near him, at intervals of one square, beginning from the east, are eight Sadhya gods — hear their names.

अर्यमा सविता चैव विवस्वान् विबुधाधिपः ।
मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधरः स्मृतः ॥

— मत्स्य पुराण 253.30

अर्थ: अर्यमा, सविता, विवस्वान, विबुधाधिप (इन्द्र), मित्र, राजयक्ष्मा और पृथ्वीधर।

English: Aryaman, Savita, Vivasvan, the lord of the gods (Indra), Mitra, Rajayakshma and Prithvidhara.

अष्टमश्चापवत्सस्तु परितो ब्रह्मणः स्मृतः ।
आपश्चैवापवत्सश्च पर्जन्योऽग्निर्दितिस्तथा ॥

— मत्स्य पुराण 253.31

अर्थ: आठवाँ आपवत्स — ये आठ ब्रह्मा के चारों ओर कहे गए हैं। (और ईशान कोण का वर्ग:) आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि और दिति।

English: The eighth is Apavatsa — these eight are said to surround Brahma. (And the group of the north-east corner:) Apa, Apavatsa, Parjanya, Agni and Diti.

दोनों ग्रंथ एक ही बात कहते हैं

आगे: अध्याय 3 — अदिति, दिति, आदित्य, रुद्र और मरुत · अध्याय 4 — द्वार-फल

Frequently Asked Questions

बृहत्संहिता में वास्तु देवताओं के श्लोक किस अध्याय में हैं?

वास्तुविद्या अध्याय में — Wikisource के पाठ में अध्याय 52 (श्लोक 42–54), सुधाकर द्विवेदी और रामकृष्ण भट के संस्करणों में अध्याय 53। श्लोक वही हैं।

मत्स्य पुराण में 45 वास्तु देवताओं की सूची कहाँ है?

अध्याय 253, श्लोक 21 से 31 तक — पहले 32 बाहरी देवता (253.24–27), फिर 13 भीतरी (253.28–31)।

क्या इन श्लोकों के अनुवाद किसी ग्रंथ से लिए गए हैं?

नहीं। संस्कृत पाठ ग्रंथ का है; हिंदी और अंग्रेज़ी अर्थ Vastuguruji के अपने, सरल शब्दों में हैं। गहराई के लिए भट्टोत्पल की टीका (द्विवेदी संस्करण) देखें।