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स्पन्दन अध्याय 3 — वास्तु-शान्ति के 73 देवता

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VastuGuruji Team 21 Jun 2026

स्पन्दन अध्याय 3 — वास्तु-शान्ति के 73 देवता

अध्याय तीन

पुराण-कर्म-दर्पण से — हर पद का देवता और मन्त्र

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वास्तु-मण्डल में 73 देवताओं की व्यवस्था ब्रह्मा केन्द्र में ब्रह्मा (9 पद) · 64 बाह्य देवता
73 देवता — 9 आन्तरिक + 32 अन्त-स्तर + 32 बाह्य-स्तर

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"आवाहयामि देवेश ब्रह्ममूर्तिं पितामहम्।
हंसपृष्ठसमारूढ़! देवतागणवन्दित!"

गृह-निर्माण से पहले देवताओं का आवाहन — यह केवल अनुष्ठान नहीं, एक चेतना-संरेखण है। शास्त्र कहता है — कोई भी राजा अपने प्रासाद की रचना ऐसी करना चाहता है जिसमें निवास और कार्यालय — दोनों भवन समाहित हो सकें। फिर वह राजा अपनी राजधानी (मुख्य शहर) भी ऐसी बनाना चाहता है।

गृह, महल या नगर के भवनों को संस्कृत में वास्तु कहते हैं। निर्माण से पहले देवताओं का आवाहन आवश्यक है। इस विधि के लिए जो चित्र खींचा जाता है उसे वास्तु-मण्डल कहते हैं — और मण्डल में जो असंख्य चौकोर खण्ड होते हैं, उन्हें पद या कोष्ठ कहते हैं।

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73 देवताओं की त्रिस्तरीय व्यवस्था

केन्द्र, मध्य-स्तर और बाह्य-स्तर

किसी भी वास्तु-मण्डल में ब्रह्मा का स्थान मध्य-गृह (पद) में होता है। बाह्य-स्तर पर जिन दिशाओं में आठ लोकपालों का स्थान होता है। 49 से अधिक गृहों वाले वास्तु-मण्डल की सभी दिशाओं में मध्य-भाग के अतिरिक्त दो स्तर होते हैं।

बाह्य-स्तर पर 32 देवता, अन्त-स्तर के खूणों में 8 देवता, और मुख्य दिशा की ओर अन्तःस्तर पर 4 देवता होते हैं। आम तौर पर 45 देवताओं का वास्तु-मण्डल में निर्देश किया जाता है।

पर पुराण-कर्म-दर्पण के अनुसार — पूर्ण मण्डल में 73 देवता होते हैं — हर एक का स्थान, मन्त्र और भूमिका निर्दिष्ट।

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केन्द्रीय देवता (9 पद)

मण्डल के मध्य-गृह में ब्रह्मा। उनके चारों ओर मूलाधार देवता —

ब्रह्मा — मण्डल के केन्द्र में, चार-मुख, हंस पर बैठे
अर्यमा — पूर्व-दिशा में, नीलकमल जैसी कान्ति
विवस्वान् — पश्चिम-दिशा में, सूर्य का प्रकाशमान रूप
मित्र — पश्चिम-दिशा में, मित्रता का देवता
आपवत्स — ईशान-कोण में, हिमालय के पुत्र
महीधर — चार-हाथ, पृथ्वी के धारक
सावित्र — सूर्य की मूर्ति, सर्व-कल्याण के कारक
आप — जल-तत्व के अधिपति
रुद्र — विनाश और नवनिर्माण के देवता

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आठ दिशाओं के लोकपाल

हर दिशा का एक रक्षक

पूर्वइन्द्र — देवों के राजा, वज्र-धारी, हज़ार आँखों वाले
दक्षिणयम — भयंकर शरीर, कड़ी आँखें, धर्मराज
पश्चिमवरुण — जलाधिपति, मकर पर बैठे, श्वेत-छत्र वाले
उत्तरकुबेर / सोम — नक्षत्रों के राजा, गदा-धारी
ईशान (NE) — ईश / शिव — त्रिशूल-धारी, त्रिलोक के अधिपति
आग्नेय (SE) — अग्नि — सर्व-तेजोमय, लाल वर्ण, महाबल
नैऋत्य (SW) — निर्ऋति — प्रेतों के राजा, नील रंग
वायव्य (NW) — वायु — प्राणाधिपति, मृग पर बैठे

ये आठ लोकपाल — हर दिशा से वास्तु की रक्षा करते हैं। निर्माण से पहले हर एक का यथाविधि आवाहन और पूजन होता है।

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देवताओं के वर्ण

किस देवता का कौन सा रंग

हर देवता का अपना वर्ण (रंग) निर्दिष्ट है। पूजा-अनुष्ठान में, मण्डल की रचना में, और मूर्ति-निर्माण में यह वर्ण-अनुक्रम महत्त्वपूर्ण है।

श्वेत (सफेद) — ईश, सत्य, सावित्र, मित्र, गन्धर्व, सोम, अर्यमा
लाल — पर्जन्य, सूर्य, वितथ, गृहक्षत, भृशा, अग्नि, मुख्य
पीला — जयन्त, महेन्द्र, बृषा, पूषा, मृग, इन्द्र, सविता
काला (कृष्ण) — यम, अन्तरिक्ष, सोम, अदिति, नाग, असुर, रोग
नीला / धूम्र — वायु, अन्तरिक्ष, राजयक्ष्मा

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पद-अनुसार भवन-व्यवस्था

राजा के प्रासाद में किस देवता के स्थान पर क्या भवन

समराङ्गण-सूत्रधार ने राजा के प्रासाद में हर देवता-पद पर एक विशिष्ट भवन निर्दिष्ट किया है। उदाहरण —

अग्नि-पद — मन्दिर
पर्जन्य — ज्योतिषी का घर
रवि / सूर्य — अतिथि-गृह
सत्य — न्यायालय / मजिस्ट्रेट कोर्ट
भृशा — गोदाम / भण्डार
अन्तरिक्ष — पक्षीगृह (aviary)
अनिल / वायु — पाकगृह (kitchen)
पूषा — भोजन-गृह (dining hall)
वितथ — शस्त्रागार (armoury)
गृहक्षत — सोनी का कारखाना (goldsmith)
यम — गोदाम
गन्धर्व — रंगभूमि / theatre
भृङ्गराज — स्त्रियों के लिए रमणस्थल
मृग — अन्तःपुर (harem)
पितृ — शौचगृह (toilet)
दौवारिक — स्नानगृह (bathroom)
सुग्रीव — अन्तःपुर
पुष्पदन्त — बाग / उद्यान
वरुण — कूआँ

यह सूची दिखाती है — हर पद का अपना उद्देश्य है। केवल "एक देवता का चित्र वहाँ लगाना" काफी नहीं — उस पद के अनुकूल कार्य ही वहाँ होना चाहिए। तभी वास्तु पूर्ण फल देता है।

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वास्तुपुरुष का अर्थ

वास्तु-मण्डल के प्रत्येक पद को एक देवता दिया जाता है। इसके पीछे एक पुरानी कथा है —

प्राचीन काल में देव और दानवों के बीच युद्ध हुआ। दानवों की हार हुई। दानवों के गुरु भृगु ऋषि ने पवित्र अग्नि में बकरी की बलि दी। तब अग्नि से "छागासुर" नामक एक अति-शक्तिशाली असुर प्रकट हुआ।

देवता घबरा गए। तब सब देवताओं ने एक साथ उस असुर पर पीठ-पीछे आक्रमण किया और उसका मुख ज़मीन की ओर करके भूमि पर पटक दिया। ज़मीन पर पटके हुए असुर के सीधे शरीर पर देवता बैठ गए।

असुर ने सहमति दे दी कि गृह-निर्माण से पहले उसे ही पहले भाग दिया जाएगा। तभी से उस असुर का नाम "वास्तुपुरुष" पड़ा — और हर वास्तु-निर्माण से पहले उसकी पूजा अनिवार्य हो गई।

"विभिन्न ग्रन्थों के अनुसार मण्डल में वास्तुपुरुष के विभिन्न अंगों के स्थान-निर्देश दिए गए हैं — पर सब का सिद्धान्त एक है : उसे प्रसन्न करो, और वास्तु में शान्ति होगी।"

॥ इति शुभम् ॥

अगले अध्याय में — वास्तु-पद-मण्डल की पूरी ज्यामिति। 1, 4, 9, 16, 25, 36, 49, 64, 81, 100 और 1024 पदों के मण्डल — हर एक का अपना उद्देश्य।

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