रावण विद्या

रावण विद्या अध्याय 8 — अर्क प्रकाश, तीसरा शतक: हरड़ से तुलसी तक एक-एक जड़ी-बूटी का अर्क और उसके गुण

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राणा सिकंदर सिंह 08 Nov 2026

रावण विद्या अध्याय 8 — अर्क प्रकाश, तीसरा शतक: हरड़ से तुलसी तक एक-एक जड़ी-बूटी का अर्क और उसके गुण

अध्याय आठ

विधि पीछे रह गई। इस शतक में रावण नाम गिनाते हैं: कौन-सी वनस्पति का अर्क किस काम का माना गया।

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सुबह की रोशनी में लकड़ी की अलमारी पर क़तार से रखी छोटी काँच की शीशियाँ, हर शीशी के पास एक जड़ी-बूटी: हरड़, आँवला, सोंठ, सौंफ, तुलसी और ब्राह्मी की टहनी
एक शीशी, एक वनस्पति: तीसरे शतक का ढाँचा ऐसा ही है

सातवें अध्याय में हमने देखा कि द्रव्य को कैसे तैयार किया जाए, कितना पानी डाला जाए और कैसे सुगन्ध दी जाए। अब तीसरा शतक आता है, और इसका स्वभाव बिलकुल अलग है। यहाँ विधि की जगह सूची है। रावण एक-एक वनस्पति का नाम लेते हैं और एक श्लोक में बता देते हैं कि केवल उसका अर्क किन तकलीफ़ों में काम का माना गया है।

शतक की शुरुआत इन्हीं शब्दों से होती है: प्रिये, अब मैं अर्कों के गुण बताऊँगा। यह अध्याय उसी सूची को विषय के हिसाब से समेटता है, ताकि आप देख सकें कि पुराने वैद्य रसोई के मसालों, जंगल की जड़ों और बाग़ के फूलों में कितना फ़र्क़ करते थे। सारे दावे पाठ के अनुसार और पारम्परिक मत हैं। इन्हें जानकारी की तरह पढ़िए।

पिछले अध्यायों की याद

पहचान, रस, कल्प, द्रव्य की तैयारी

पहले शतक में पहचान, दूसरे में तैयारी। सातवाँ अध्याय फिर से पढ़ें।

कुछ शब्द, जो इस अध्याय में आएँगे

  • दीपन — भूख जगाने वाला।
  • पाचन — भोजन पचाने में मदद करने वाला।
  • ग्राही — मल को बाँधने वाला।
  • वृष्य — बल और पुष्टि बढ़ाने वाला।
  • शोथ — सूजन। व्रण — घाव। कृमि — पेट के कीड़े। कुष्ठ — त्वचा के पुराने रोग।

पहली सीढ़ी: शुरुआत त्रिफला के तीन फलों से

पाठ पहले उन तीन फलों के अर्क गिनाता है जिनसे त्रिफला बनता है। यह क्रम बहुत पुराना है, क्योंकि घर-घर में रखे जाने वाले ये फल सबसे आसान और सबसे भरोसेमन्द माने गए।

श्लोक 1 · हरड़ का अर्क

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि केवलार्कगुणान् प्रिये।
हरीतक्याः शूलकृच्छ्रकामलानाहनाशनः॥

हिन्दी अर्थ

प्रिये, अब मैं केवल अर्कों के गुण बताऊँगा। हरड़ का अर्क शूल, मूत्र की रुकावट, कामला और पेट के अफारे का नाशक है।

आज के जीवन में

पाठ की पहली पंक्ति में हरड़ का नाम आता है। इसका एक कारण यह माना जा सकता है कि हरड़ पेट की सफ़ाई और सहज पाचन की जड़ है। आज भी जिन घरों में त्रिफला रखा जाता है, वहाँ यही कहा जाता है कि पेट साफ़ तो दिन हल्का। पर किसी भी चूर्ण या अर्क को रोज़ लेने से पहले जानकार से पूछ लें।

श्लोक 2 · बहेड़ा और आँवला

बिभीतकस्य तृट्छर्दिकफकासविनाशनः।
आमलस्य त्रिदोषास्रपित्तमेहान्विनाशयेत्॥

हिन्दी अर्थ

बहेड़े का अर्क प्यास, उल्टी, कफ और खाँसी को शान्त करता है। आँवले का अर्क तीनों दोष, रक्त-पित्त और प्रमेह को घटाता है।

आज के जीवन में

तीनों फलों का काम बँटा हुआ है: हरड़ पेट के लिए, बहेड़ा कफ और गले के लिए, आँवला सारे शरीर की गर्मी-सर्दी के सन्तुलन के लिए। इसीलिए त्रिफला एक साथ लिया जाता है। पाठ में आगे इन तीनों के मिश्रित अर्क का भी ज़िक्र चौथे शतक में आएगा।

दूसरी सीढ़ी: रसोई के मसाले और पाचन

तीसरे शतक की आधी सूची पेट और भूख के इर्द-गिर्द है। जो चीज़ें आज हर रसोई में मिलती हैं, उन्हें पाठ ने अलग-अलग रखकर गिना है।

  • सोंठ: अजीर्ण, कब्ज़, आँव और शूल। अदरक: ज्वर, दाह, भूख बढ़ाना।
  • पीपल: श्वास, खाँसी, बवासीर, ज्वर और शूल। कालीमिर्च: श्वास और कृमि।
  • पीपलामूल: प्लीहा, गाँठ, कफ और वात। चव्य: भूख बढ़ाना, गुदा के रोग। गजपीपल: वात, कफ और मन्दाग्नि।
  • चित्रक: अग्नि बढ़ाना, खाँसी, संग्रहणी और कृमि।
  • अजवायन: भूख, पाचन, कमर और जोड़ों की पीड़ा। अजमोद: वात, खाँसी और पेडू की सफ़ाई। खुरासानी अजवायन: भूख और पाचन।
  • जीरा: भोजन पचाना और पेट साफ़ रखना। काला जीरा: आँखों के लिए हितकारी, गाँठ, उल्टी और अतिसार में। कलौंजी: बल, ज्वर और पाचन।
  • धनिया: प्यास, दाह, उबकाई और श्वास। सौंफ: ज्वर, वात, कफ, घाव, शूल, आँख के रोग, मन्दाग्नि और कृमि।
  • मेथी: कफ, वात और ज्वर। चन्द्रसूर (हालो): हिचकी, रक्त-दोष, वात और पुष्टि। हींग: भूख, पाचन, पेट-दर्द और कृमि।
  • बायबिडंग: पेट, कफ और कृमि, अफारा। तुम्बरू: शरीर का भारीपन, श्वास और कृमि। वंशलोचन: प्यास, खाँसी, ज्वर और क्षय।
  • वच: अग्नि बढ़ाना, अफारा और शूल। कुलिंजन: स्वर, हृदय, कण्ठ और मुख की शुद्धि। हाऊबेर: प्लीहा और प्रमेह; बड़ा हाऊबेर: बवासीर, संग्रहणी और शूल।

श्लोक 3 · पीपल और कालीमिर्च

पिप्पल्याः श्वासकासामवातार्शोज्वरशूलहृत्।
मरीचस्य श्वासकृमीन्हरेत्सर्वान्गदानपि॥

हिन्दी अर्थ

पीपल का अर्क श्वास, खाँसी, आमवात, बवासीर, ज्वर और शूल हरता है। कालीमिर्च का अर्क श्वास और सब कृमियों को हरता है।

आज के जीवन में

सोंठ, पीपल और कालीमिर्च वही तीन तीखे द्रव्य हैं जिनसे त्रिकुटा बनता है, और चौथे शतक में उसका मिश्रित अर्क आएगा। यहाँ पाठ अलग-अलग गिनाकर बता रहा है कि हर एक का मिज़ाज अलग है। पीपल में साँस और खाँसी पर ज़ोर है, कालीमिर्च में कृमि पर। जिस रसोई में एक ही मसाला हर चीज़ में डलता हो, वहाँ यह पाठ एक सुझाव देता है: विविधता रखिए।

श्लोक 4 · धनिया और सौंफ

धान्यार्कस्य तृषादाहवमिश्वासत्रिदोषहृत्।
मिश्र्या ज्वरानिलश्लेष्मव्रणशूलाक्षिरोगहृत्॥

हिन्दी अर्थ

धनिये का अर्क प्यास, जलन, उबकाई, श्वास और तीनों दोषों को हरता है। सौंफ का अर्क ज्वर, वात, कफ, घाव, शूल और आँख के रोगों को दूर करता है।

आज के जीवन में

धनिया और सौंफ दोनों ठण्डक के मसाले हैं, और आज भी गर्मी में इन्हीं का शर्बत पिया जाता है। पाठ का ज़ोर प्यास और जलन पर है। भोजन के बाद की सौंफ, जो हर थाली के साथ आती है, इसी परम्परा का रूप है।

तीसरी सीढ़ी: ठण्डक, बुख़ार और पित्त

पाठ में ऐसे अर्कों की बड़ी सूची है जिनका काम पित्त की गर्मी को शान्त करना बताया गया है।

  • चिरायता: प्यास, कुष्ठ, ज्वर, घाव और कृमि।
  • नीम: पसीना, प्यास, खाँसी, अरुचि और कृमि।
  • पित्तपापड़ा: रक्तपित्त, चक्कर, प्यास, कफ और ज्वर।
  • गिलोय: भूख जगाना, अतिसार, खाँसी, पाण्डु और ज्वर।
  • लोध: ठण्डक, मल बाँधना, आँखों के लिए हितकारी, कफ-पित्त।
  • कमल का नाल: पेडू और योनि की पीड़ा, जलन, पित्त और घाव।
  • मुलहठी: ज्वर, उल्टी, कुष्ठ और अतिसार।
  • पुनर्नवा: रक्त-विकार, पेट साफ़ रखना। श्वेत पुनर्नवा: सब नेत्र रोग।
  • अमलतास: पित्त, रक्त, शूल, खुजली, प्रमेह, खाँसी, कृमि और ज्वर।
  • खंभारी: पित्त, रक्त-विकार और कृमि। बकायन: गाँठ।
  • श्वेत निशोथ: पित्त, सूजन और उदर रोग।
  • कुटज: अग्नि जगाना, कफ और प्यास। बेल: कफ घटाना, बल और पाचन।
  • कुंभेर: चक्कर, शूल, बवासीर और जलन।
  • कुहुन्दरा और सुदर्शन: ज्वर और कफ। पाठ के अनुसार सुदर्शन का अर्क बहुत उष्ण होता है।

श्लोक 5 · गिलोय और बेल

गुडूच्या दीपनो ग्राही कासपाण्डुज्वरापहः।
बैल्वः श्लेष्महरो बल्यो लघू रूक्षश्च पाचनः॥

हिन्दी अर्थ

गिलोय का अर्क भूख जगाने वाला, मल बाँधने वाला और खाँसी, पाण्डु तथा ज्वर को दूर करने वाला है। बेल का अर्क कफ हरने वाला, बल देने वाला, हल्का, रूखा और पाचन में सहायक है।

आज के जीवन में

गिलोय और बेल आज भी घरेलू उपचारों के सबसे जाने-पहचाने नाम हैं। बुख़ार के बाद कमज़ोरी में गिलोय, और पेट की गड़बड़ी में बेल का शर्बत, दोनों नानी-दादी के नुस्ख़ों में मिलते हैं। पर पाठ ने ख़ुद एक बात सिखा दी है: दोनों के काम अलग हैं। एक भूख जगाता है, दूसरा हल्का और रूखा है। बिना जाने दोनों को एक-सा मत समझिए।

रसोई की लकड़ी की मेज़ पर रखे मसालों के छोटे कटोरे: सौंफ, जीरा, अजवायन, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल और हल्दी, बीच में काँच की बोतल में साफ़ अर्क
रसोई के मसाले: तीसरे शतक की आधी सूची यहीं रखी है

चौथी सीढ़ी: साँस, खाँसी और स्वर

  • भारंगी: कफ, वायु और श्वास के दोष, पीनस और ज्वर।
  • वासा (अडूसा): ज्वर, उल्टी, प्रमेह, कुष्ठ और क्षय।
  • कायफल: खाँसी, श्वास, प्रमेह, बवासीर और अरुचि।
  • कटेली (छोटी और काँटेदार): कफ, सूजन, अरुचि और खाँसी। बड़ी कटेली (वार्ता): ज्वर, आलस्य और शूल।
  • तेजबल: खाँसी, कफ, भूख बढ़ाना। मालकाँगनी: अग्नि बढ़ाना और बुद्धि-स्मृति को पुष्ट करना।
  • कूठ: वायु, रक्त, खाँसी और कफ। पोहकरमूल: अरुचि, श्वास और पसली का दर्द।
  • काकड़ासींगी: डकार, हिचकी और स्वर के दोष। स्थूलग्रन्थि: कफ और खाँसी।
  • मेढ़ासींगी: श्वास, खाँसी, घाव, कफ और आँख के रोग।
  • तुलसी: घाव, और पारम्परिक मत से विष-रक्षा।

श्लोक 6 · तेजबल और मालकाँगनी

तेजस्विन्याः श्वासकासकफहृद्वह्निदीपनः।
ज्योतिष्मत्या वान्तिकारो वह्निबुद्धिस्मृतिप्रदः॥

हिन्दी अर्थ

तेजबल का अर्क श्वास, खाँसी और कफ को हरने वाला और भूख जगाने वाला है। मालकाँगनी का अर्क वमनकारी है और भूख, बुद्धि तथा स्मृति देने वाला है।

आज के जीवन में

मालकाँगनी का नाम पुराने ग्रन्थों में बुद्धि और याददाश्त के साथ बार-बार आता है। यह वही बात है जो ब्राह्मी और शंखपुष्पी के साथ आगे आएगी। गले, फेफड़े और दिमाग़ को एक ही दृष्टि से देखना पुराने वैद्य की आदत थी, क्योंकि उनके लिए साँस और मन आपस में जुड़े थे। यही बात आप साँस के विज्ञान में भी पाएँगे।

पाँचवीं सीढ़ी: त्वचा, घाव, खुजली और कृमि

यह तीसरे शतक का सबसे लम्बा हिस्सा है। पाठ ने हल्दी की ही चार तरह की क़िस्में गिनाई हैं, यानी वैद्य एक नाम के भीतर भी फ़र्क़ करते थे।

  • हल्दी: प्रमेह, सूजन, त्वचा-दोष, घाव और पाण्डु।
  • वन हल्दी: कुष्ठ, वात और रक्त-विकार।
  • कपूर हल्दी: हर प्रकार की खुजली।
  • दारुहल्दी: लेप से आँख और कान के रोग। रसौत: आँख के दोष और घाव।
  • मजीठ: कफ, रक्त, अतिसार और कुष्ठ। लाख: कृमि, विसर्प, घाव और कुष्ठ।
  • बाकुची: कृमि, पाण्डु, सूजन और कफ। पँवाड़: दाद-खाज।
  • कचनार: गण्डमाला और घाव। करंज: कफ, बवासीर, घाव और कृमि। घृतकरंज: बादी बवासीर, कृमि और घाव।
  • निर्गुण्डी: जन्तुओं के काटने के घाव और अरुचि। ग्वारपाठा: कुष्ठ, शूल, सूजन और घाव।
  • अतीस: कफ, पित्त और अतिसार। चिरपोटा: आँख, उदर और सूजन। वेत: जलन, सूजन, मस्से और घाव।
  • सहिजन: रुचि और भूख। मीठा सहिजन: दाद-खाज और कृमि। श्वेत सहिजन: आँख और सिर-दर्द, नस्य के रूप में।
  • हंसपदी: मकड़ी के काटे और पुराने रक्त-दोष में।

श्लोक 7 · हल्दी का अर्क

हरिद्राया मेहशोथत्वग्दोषव्रणपाण्डुनुत्।
आरण्यकहरिद्राया कुष्ठवाताख्रनाशनः॥

हिन्दी अर्थ

हल्दी का अर्क प्रमेह, सूजन, त्वचा के दोष, घाव और पाण्डु को हरता है। जंगली हल्दी का अर्क कुष्ठ, वात और रक्त-विकार को नष्ट करता है।

आज के जीवन में

आज भी घर में चोट लगते ही हल्दी की ओर हाथ जाता है। पाठ में इसकी चर्चा अलग-अलग क़िस्मों के साथ है, और यह सोचने की बात है कि वैद्य ने कपूर हल्दी को खुजली और जंगली हल्दी को कुष्ठ से अलग क्यों जोड़ा। नाम के साथ क़िस्म जानना, यह उस समय की परख थी। बाज़ार की सामान्य हल्दी हर काम के लिए नहीं होती।

सुबह की धूप में आँगन की क्यारियों में तुलसी, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, भांगरा और हल्दी के पौधे, पास में मिट्टी का घड़ा और ताँबे का लोटा
घर के आँगन की क्यारी: तुलसी, ब्राह्मी, शंखपुष्पी और भांगरा

छठी सीढ़ी: आँख, कान, बाल और सिर

  • काला जीरा, दारुहल्दी और रसौत: आँख के दोष।
  • मकोय: आँखों की रोशनी, उल्टी और हृदय की तकलीफ़।
  • तालमखाना: सेंकने से सूजन और घाव में जल्दी लाभ।
  • भांगरा: पाठ के अनुसार बाल बढ़ाने वाला, रुचि जगाने वाला, सिर-दर्द हरने वाला।
  • मुलहठी (मधुपर्णी): बाल और स्वर के लिए। कपास: सिर, कनपटी और कान के रोग।
  • लोध और चिरपोटा: दृष्टि के लिए हितकारी।
  • अस्थिसंहार: टूटे अंग जोड़ने में सहायक।

श्लोक 8 · भांगरा और मुलहठी

भृङ्गराजस्य जातोऽर्कः केश्यो रुच्यः शिरोर्तिहृत्।
मधुपर्ण्याः केशकरः स्वर्यः पित्तानिलास्रजित्॥

हिन्दी अर्थ

भांगरे का अर्क बालों के लिए हितकारी, रुचिकर और सिर-दर्द हरने वाला है। मुलहठी (मधुपर्णी) का अर्क केश और स्वर बढ़ाने वाला तथा पित्त, वात और रक्त के विकार जीतने वाला है।

आज के जीवन में

भांगरा और मुलहठी आज भी तेलों और चूर्णों में बाल और गले के लिए मिलते हैं। यहाँ स्वर यानी आवाज़ का ज़िक्र ख़ास है। गायक, वक्ता, शिक्षक और पुजारी जैसे लोग गले की देखभाल के लिए मुलहठी चूसते हैं। पाठ का यह नियम तीसरे शतक में सैकड़ों साल से जी रहा है।

सातवीं सीढ़ी: स्त्री, दूध, पुष्टि और बल

इस हिस्से के सारे दावे पारम्परिक मत हैं। गर्भवती स्त्री या स्तनपान कराने वाली माँ के लिए कोई भी अर्क अपनी मर्ज़ी से शुरू न करें।

  • महामेदा: स्तन पुष्ट करने और दूध बढ़ाने वाला, कफ हरने वाला। क्षीरकाकोली: पुष्टि, जलन और वात।
  • सोमवल्ली और काकवल्लरी (स्वर्णवल्ली): त्रिदोष शान्त करना और स्तनों में दूध लाना।
  • ऋषभ, काकोली, जीवक, ऋद्धि और वृद्धि: इन्हें आगे अष्टवर्ग कहा गया है। इनके अर्क बल, शीतलता और पुष्टि के लिए गिनाए गए हैं।
  • लक्ष्मणा: पाठ के अनुसार सन्तान-प्राप्ति में सहायक।
  • बला (खिरैटी), अतिबला (बरियारा), महाबला, नागबला: क्रम से मल, मूत्र, घाव, मूर्च्छा और तन्द्रा के लिए।
  • कौंच, मांसरोहिणी, माषपर्णी, गोरखमुण्डी: बल, वीर्य और पुष्टि।
  • पाषाणभेद, गोखरू, वरवेल, कटेली: मूत्र की रुकावट और पथरी।
  • वटपत्री: योनि और मूत्र के रोग। नागपुष्पी: शूल, योनिदोष और कृमि।

आठवीं सीढ़ी: मन, स्मृति और दंश

श्लोक 9 · ब्राह्मी का अर्क

ब्राह्म्या बुद्धिप्रदश्चार्कः षण्मासाभ्यासतः कविः।
ब्रह्ममण्डूकिजः पाण्डुविषशोथज्वरान्हरेत्॥

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मी का अर्क बुद्धि देने वाला है। छह महीने के अभ्यास से मनुष्य कवि बन जाता है। ब्रह्ममण्डूकी का अर्क पाण्डु, विष, सूजन और ज्वर को हरता है।

आज के जीवन में

यहाँ पाठ में एक शब्द बहुत काम का है: अभ्यास। अर्क का फल छह महीने के लगातार प्रयोग से माना गया, एक बार के घूँट से नहीं। यह ध्यान के नियम जैसा है, जिसकी बात गीता के छठे अध्याय में है: ध्यान योग। बुद्धि भी रोज़ के छोटे अभ्यास से बनती है।

श्लोक 10 · शंखपुष्पी और अर्कपुष्पी

शङ्खपुष्प्या विषहरः स्मृतिकान्तिबलाग्निदः।
अर्कपुष्प्याः कृमिश्लेष्ममेहपित्तविकारनुत्॥

हिन्दी अर्थ

शंखपुष्पी का अर्क विष हरता है और स्मृति, कान्ति, बल तथा भूख देता है। अर्कपुष्पी का अर्क कृमि, कफ, प्रमेह और पित्त के विकार नष्ट करता है।

आज के जीवन में

शंखपुष्पी आज भी बच्चों और विद्यार्थियों के लिए दी जाने वाली जानी-पहचानी बूटी है। ब्राह्मी, शंखपुष्पी और मालकाँगनी, तीनों बार-बार याददाश्त से जुड़कर आई हैं। यानी पुराने वैद्य मन की थकान को शरीर की भूख और कान्ति से अलग नहीं देखते थे।

दंश और विष के लिए गिनाए गए अर्क (पारम्परिक मत)

  • नागदमन: साँप, कीड़े और चूहे के काटे का विष।
  • सरहटी: साँप और बिच्छू का दंश। बाँझककोड़ी: साँप के काटे के घाव।
  • काकजंघा: ज्वर, खुजली, कृमि और विष। बकायन: चूहे का विष।
  • निर्गुण्डी: जन्तुओं के काटने के घाव। तुलसी: विष से रक्षा।

आज साँप, बिच्छू या कुत्ते के काटने पर पहला काम तुरन्त अस्पताल पहुँचना है, घरेलू उपाय बाद की बात हैं।

श्लोक 11 · तुलसी का अर्क

वृन्दावृक्षोद्भवोऽर्कस्तु विषरक्षो व्रणापहः।

हिन्दी अर्थ

तुलसी (वृन्दा) के वृक्ष का अर्क विष से रक्षा करने वाला और घाव मिटाने वाला है।

आज के जीवन में

एक पंक्ति में तुलसी का सार: रक्षा और घाव भरना। घर के आँगन में तुलसी के होने का लाभ केवल पूजा तक सीमित नहीं माना गया। पाठ के अनुसार उसका अर्क रक्षा का साधन है। आज भी तुलसी की पत्ती चाय और काढ़े में डालना सबसे सरल और सबसे पुराना घरेलू नियम है।

नौवीं सीढ़ी: बाक़ी नाम, एक-एक पंक्ति में

सूची अभी ख़त्म नहीं हुई। जो नाम ऊपर किसी समूह में नहीं आ सके, वे ये हैं।

  • पेट और भूख: हिंगुपत्री (बवासीर, कब्ज़), वंशपत्री (पाचन), स्योनाक या सोनापाठा (बवासीर और भूख), एरण्ड (शूल, सिर-दर्द), अरणी (सूजन, कृमि, पाण्डु), पाटल (उल्टी, सूजन, अरुचि), बाँस और कपास का अर्क अलग-अलग बताए गए।
  • पित्त, खून और ठण्डक: समुद्रफेन (ठण्डा, कफ हरने वाला), धातकी (प्यास और ठण्डक), कुसुम्भ (कफ-पित्त-रक्त), कोविदार (पित्त, प्रदर, खाँसी), आकाशवल्लरी (ठण्डा, आँव), माचिका (खूनी अतिसार), लाजवंती (योनि रोग, पित्त), जवास (चक्कर, कुष्ठ, खाँसी)।
  • साँस और कफ: एरण्डभेद (पुरानी खाँसी), जीवन्ती (श्वास, नेत्र), प्रश्निपर्णी (श्वास, दाह), शालपर्णी (घाव, ज्वर, उल्टी), मुद्गपर्णी (सूजन, संग्रहणी), रास्ना (वायु और शूल), मैनफल (उल्टी, चौथैया ज्वर), द्रोणपुष्पी (ज्वर, श्वास, पाण्डु), गोजिह्वा (प्रमेह, खाँसी)।
  • बल और पुष्टि: जीवक (वीर्य, कफ, बल), गोरखमुण्डी (बल, प्लीहा), पातालगरुड़ी (बल, वायु), दुद्धी (बल, कृमि), अपामार्ग (उल्टी, कफ, मेद), शरपुंखा (प्लीहा, गाँठ, घाव)।
  • त्वचा और कृमि: मूर्वा (प्रमेह, खुजली, कुष्ठ), सूर्यमुखी (घाव, कृमि), तुम्बी (कृमि, कफ), भूमिवल्लरी (खाँसी, प्यास), मत्स्याक्षी (कुष्ठ, पित्त), मार्कण्डिका (दुर्गन्ध और उदर), नकछिकनी (बवासीर, कुष्ठ, रुचि), काकनासा (उल्टी रोकना, सूजन)।
  • मन और रक्त: सारिवा (मन्दाग्नि, खाँसी), चोक (खुजली, उल्टी), देवदाली (शूल, गाँठ, कफ, वात)।

ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध

सौ के क़रीब नाम गिनाना आसान नहीं है, और रावण ने इन्हें भूख, साँस, त्वचा, मन और दंश तक फैला दिया। बड़े पद का अर्थ ही यह है कि एक व्यक्ति की चिन्ता में बहुत से लोगों की तकलीफ़ें शामिल होती हैं। जो राजा या मुखिया अपने लोगों के रोगों की सूची नहीं रखता, वह आपदा के समय असहाय रहता है। इसलिए इस शतक की पहली सीख है: अपने घर की छोटी-छोटी तकलीफ़ों की सूची बनाइए, और हर एक के लिए एक जानकार का नाम रखिए।

इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)

  1. हर वनस्पति का अपना काम है। एक ही दवा को हर रोग पर मत आज़माइए।
  2. रसोई सबसे पास की औषधि-शाला है। अदरक, सौंफ, जीरा, अजवायन और हल्दी की पहचान रखिए।
  3. क़िस्म जानिए। हल्दी की भी चार क़िस्में गिनी गई हैं, इसलिए नाम के साथ रूप भी देखिए।
  4. मन की बूटियों के लिए छह महीने का अभ्यास। एक दिन का घूँट काम नहीं करता।
  5. दंश पर पहले अस्पताल। घरेलू उपाय का नम्बर उसके बाद है।

7 दिन का अभ्यास

  • दिन 1: रसोई के पाँच मसालों के नाम लिखिए और एक-एक का काम बुज़ुर्ग से पूछिए।
  • दिन 2: भोजन के बाद आज सौंफ या अजवायन चबाइए और देखिए कि पेट कैसा लगा।
  • दिन 3: घर में रखी हल्दी, तुलसी और आँवला को पहचानकर एक कागज़ पर लिखिए।
  • दिन 4: आज की चाय या पानी में एक चुटकी सौंफ, धनिया या तुलसी डालकर पीजिए।
  • दिन 5: बाल या गले के लिए जो भी घरेलू चीज़ आप जानते हैं, उसकी विधि किसी जानकार से पूछिए।
  • दिन 6: अपने घर के पास की एक जड़ी-बूटी की दुकान देखिए और वहाँ तीन नाम पहचानिए।
  • दिन 7: सप्ताह की कोई एक आदत चुनिए, जिसे छह महीने चलाना है, जैसे रोज़ दस मिनट की शान्ति।

यही बात और जगह कैसे समझाई गई है

घर में रसोई, पूजा या तुलसी रखने की सही दिशा जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।

और रहस्य: जो इस अध्याय में छिपे हैं

रहस्य 1: याददाश्त की जड़ भूख, नींद और चेहरे की चमक में है

पाठ के अनुसार शंखपुष्पी का नाम स्मृति, कान्ति, बल और भूख के साथ एक ही पंक्ति में आता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: पुराने वैद्य मन की थकान और शरीर की हालत को अलग नहीं देखते थे। परीक्षा के दिनों में भूखे रहकर पढ़ने वाला विद्यार्थी अक्सर कम याद रख पाता है।

रहस्य 2: आवाज़ भी पूँजी है

पाठ के अनुसार मुलहठी के साथ स्वर का ज़िक्र ख़ास तौर पर आता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: बोलकर कमाने वाले, जैसे शिक्षक, दुकानदार और गायक, गले को रोज़ आराम दें। गुनगुना पानी पीना, चिल्लाने से बचना और बीच-बीच में चुप रहना सबको मुफ़्त मिलता है।

रहस्य 3: दावे को तीन कॉलम में पढ़िए

पाठ के अनुसार सूची के सारे दावे पारम्परिक मत हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: आज के सन्देशों के दावे भी तीन कॉलम में रखिए। क्या लिखा है? किसने परखा? मैं किससे पूछूँ? जिस दावे का दूसरा कॉलम ख़ाली हो, उसे आगे मत भेजिए।

रहस्य 4: पहले भूख और पाचन

पाठ के अनुसार तीसरे शतक की आधी सूची भूख और पाचन के इर्द-गिर्द है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: सेहत की जड़ यहीं से शुरू होती है। रोज़ खाने का समय बाँधना, रात का भोजन हल्का रखना और बिना भूख के न खाना, ये बिना ख़र्च की आदतें हैं।

रहस्य 5: एक पौधा, कई काम; एक काम, कई पौधे

पाठ के अनुसार कई वनस्पतियाँ अलग-अलग सूचियों में बार-बार आती हैं, और एक ही काम के लिए कई नाम गिनाए गए हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: सारी उम्मीद एक चीज़ पर मत रखिए। खाँसी या थकान के लिए "बस यही चीज़" वाला भरोसा अक्सर निराश करता है।

रहस्य 6: एक बार में एक बदलाव

पाठ में हर वनस्पति का काम अलग-अलग गिनाया गया है, ताकि असर पहचाना जा सके। हमारा पाठ-निष्कर्ष: एक साथ पाँच नुस्ख़े शुरू करेंगे तो पता नहीं चलेगा कौन-सा काम आया या किससे दिक़्क़त हुई। एक बदलाव, तीन दिन देखिए। परेशानी लगे तो रुककर जानकार से पूछिए।

आसान रास्ता: कोई भी कैसे करे

  1. घर की तकलीफ़ों की सूची बनाइए। हर सदस्य की दो-दो पुरानी तकलीफ़ें लिखिए, और हर एक के आगे एक जानकार का नाम। बीस मिनट। मुसीबत में यही सूची समय बचाती है।
  2. रसोई के पाँच मसाले पहचानिए। नाम, रूप और घर में उसका उपयोग। किसी बुज़ुर्ग से पूछिए। दस मिनट। जानकारी अक्सर घर में ही मिल जाती है।
  3. एक सप्ताह खाने और सोने का समय बाँधिए। रोज़ लगभग एक ही घड़ी। कुछ दिन में भूख और नींद का ढर्रा बनता दिखता है।
  4. एक बदलाव चुनिए और तीन दिन देखिए। जैसे भोजन के बाद सौंफ़ या रात का हल्का खाना। रोज़ एक पंक्ति लिखिए कि कैसा लगा। एक बार में एक ही।
  5. आवाज़ को आराम दीजिए। दिन में दो बार पाँच मिनट चुप रहिए और गुनगुना पानी पीजिए। जिनका काम बोलने का है, उन्हें शाम तक गला हल्का लगता है।
  6. अगला फ़ॉरवर्ड तीन कॉलम में परखिए। क्या लिखा, किसने परखा, किससे पूछूँ। दो मिनट। फिर आगे भेजिए या मत भेजिए।

सबसे आम ग़लती

सूची में पढ़ा नाम देखकर ख़ुद ही मात्रा तय करके कुछ खाना-पीना शुरू कर देना। गर्भवती, दूध पिलाने वाली माँ, बच्चे और पुरानी बीमारी वाले व्यक्ति पहले डॉक्टर से पूछें। यहाँ कोई मात्रा नहीं दी गई है। साँप-बिच्छू के काटने पर पहले अस्पताल। नतीजे की कोई गारंटी नहीं।

आज की स्व-जाँच (2 मिनट)

  • क्या मैं रसोई के पाँच मसालों का नाम और काम जानता या जानती हूँ?
  • क्या मैंने आज अपनी थाली में कोई ठण्डक वाली चीज़ रखी: सौंफ, धनिया या मौसमी फल?
  • क्या मैंने कोई दवा या घरेलू नुस्ख़ा बिना पूछे शुरू किया?
  • क्या मैंने अपने मन की देखभाल के लिए आज कोई छोटा अभ्यास किया?
  • क्या मुझे पता है कि घर में किसी को काट लेने पर पहले कहाँ जाना है?

जितने सवालों का उत्तर "हाँ" है, उतनी समझ आपने कमाई। बाक़ी अगले सप्ताह की कोशिश बनाइए।

आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)

  • अध्याय 1 से 5: सही गुरु, शान्ति, वश्य, स्तम्भन और मन्त्र का अनुशासन। (पढ़ चुके)
  • अध्याय 6 और 7: अर्क प्रकाश का पहला और दूसरा शतक। (पढ़ चुके)
  • अध्याय 8: तीसरा शतक, एक-एक वनस्पति का अर्क। (आप अभी यहाँ हैं)
  • आगे: मिले-जुले औषधि-समूह, यानी दशमूल, त्रिफला, त्रिकुटा, अष्टवर्ग और सुगन्ध-गण के अर्क।

पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।

अगले अध्याय में: अर्क प्रकाश का चौथा शतक। इसमें मिली हुई औषधियों के समूह आएँगे: छह रस वाले पदार्थ, त्रिसुगन्ध, त्रिफला, त्रिकुटा, पंचकोल, दशमूल और ऋतु के अनुसार अर्क।

यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। स्वास्थ्य से जुड़ी बातों में, ख़ासकर गर्भवती स्त्री और बच्चों के मामले में, योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

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राणा सिकंदर सिंह

वास्तु गुरुजी राणा सिकंदर सिंह के मार्गदर्शन में • VastuGuruji संस्थापक • 10+ वर्षों का अनुभव • रायपुर, छत्तीसगढ़ • विशेषज्ञता: 45 देवता वास्तु + ज्योतिष • रायपुर में वास्तु सलाहकार

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्क प्रकाश के तीसरे शतक में क्या है?
तीसरा शतक विधि से अधिक सूची है। इसमें रावण एक-एक जड़ी-बूटी का नाम लेते हैं और एक श्लोक में बताते हैं कि उसका अकेला अर्क पाठ के अनुसार किन तकलीफ़ों में काम का माना गया। हरड़, बहेड़ा और आँवले से शुरू होकर सूची लगभग सौ वनस्पतियों तक जाती है।
हरड़, बहेड़ा और आँवले के अर्क में क्या फ़र्क़ बताया गया है?
पाठ के अनुसार हरड़ का अर्क शूल, मूत्र की रुकावट, कामला और अफारे पर है। बहेड़े का अर्क प्यास, उल्टी, कफ और खाँसी पर है। आँवले का अर्क तीनों दोष, रक्तपित्त और प्रमेह पर माना गया है।
रसोई के कौन-से मसालों के अर्क इस शतक में आए हैं?
सोंठ, अदरक, पीपल, कालीमिर्च, अजवायन, जीरा, काला जीरा, कलौंजी, धनिया, सौंफ, मेथी और हींग के अर्क अलग-अलग गिनाए गए हैं। पाठ में इनका ज़्यादातर काम भूख जगाना, भोजन पचाना, प्यास-जलन घटाना और पेट के कृमि हटाना बताया गया है।
ब्राह्मी के अर्क के बारे में पाठ क्या कहता है?
पाठ के अनुसार ब्राह्मी का अर्क बुद्धि देने वाला है और छह महीने के लगातार अभ्यास से मनुष्य कवि बन सकता है। यहाँ मुख्य बात अभ्यास की है: फल एक दिन के घूँट से नहीं, छह महीने के नियम से माना गया है।
हल्दी की कौन-कौन सी क़िस्में इस शतक में हैं?
चार क़िस्में गिनी गई हैं: साधारण हल्दी, जंगली (वन) हल्दी, कपूर हल्दी और दारुहल्दी। पाठ के अनुसार साधारण हल्दी प्रमेह, सूजन, त्वचा-दोष और घाव पर, कपूर हल्दी खुजली पर, और दारुहल्दी का लेप आँख-कान के रोगों पर है।
क्या साँप-बिच्छू के काटे के लिए अर्क पर भरोसा किया जा सकता है?
नहीं। पाठ में नागदमन, सरहटी और निर्गुण्डी जैसे अर्क दंश के लिए गिनाए गए हैं, पर यह पारम्परिक मत है। आज साँप, बिच्छू या कुत्ते के काटने पर पहला काम तुरन्त अस्पताल पहुँचना है।
क्या ये अर्क अपने आप आज़माने चाहिए?
नहीं। यह अध्याय पुराने पाठ की जानकारी देता है। इसी ग्रन्थ का नियम है कि लक्षण जानकर ही दवा दी जाए। गर्भवती स्त्री, दूध पिलाने वाली माँ और बच्चों के मामले में विशेष सावधानी रखें और किसी भी अर्क को शुरू करने से पहले योग्य वैद्य या डॉक्टर से पूछें।
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