रावण विद्या अध्याय 9 — अर्क प्रकाश, चौथा शतक: त्रिफला, त्रिकुटा, दशमूल, राजवारुणी और ऋतु के अनुसार अर्क
अध्याय नौ
अब तक हर अर्क एक चीज़ से बनता था। चौथे शतक में रावण पूरी टोली बनाते हैं: एक नाम, कई औषधियाँ।
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तीसरे शतक में हमने एक-एक वनस्पति का अर्क देखा। चौथा शतक एक कदम आगे बढ़ता है। इसमें वर्ग आते हैं: तीन फलों की जोड़ी, तीन तीखे मसालों की जोड़ी, पाँच जड़ों की जोड़ी, दस जड़ों की जोड़ी। हर वर्ग का एक नाम है, और वह नाम सुनते ही वैद्य जान लेता है कि भीतर क्या-क्या है। आज भी आयुर्वेद की दवाओं में यही नाम चलते हैं।
शतक की शुरुआत स्वाद से होती है: षड्रस पदार्थ, यानी छह स्वाद वाली चीज़ों की टोली। फिर एक के बाद एक वर्ग आते हैं। उनके बाद फूलों, अनाज, शहद, गन्ने और खट्टे फलों से बनने वाले अर्क आते हैं, और अन्त में ऐसा सूत्र है जो पूरे साल के लिए काम का है: ऋतु के अनुसार अर्क।
पिछले अध्यायों की याद
पहचान, तैयारी, एक-एक अर्क, अब समूह
पिछले अध्याय में एक-एक वनस्पति का अर्क था। आठवाँ अध्याय फिर से पढ़ें।
कुछ शब्द, जो इस अध्याय में आएँगे
- गण या वर्ग — औषधियों की टोली, जिसका एक नाम होता है।
- पल — पुराना तौल, लगभग पैंतालीस ग्राम का।
- भावना — चूर्ण को किसी रस में बार-बार भिगोकर सुखाना।
- पिधान — यंत्र के मुँह पर फूल रखकर ढकना। वासना — सुगन्ध देना।
पहली सीढ़ी: छह स्वाद वाली टोली
श्लोक 1 · षड्रस का रोज़ का अर्क
एषामर्कः प्रत्यहं च पिबेत्पलयुगं प्रिये।
अरुचिं चैव मन्दाग्निं स्वप्नेऽपि स न पश्यति॥
हिन्दी अर्थ
प्रिये, इन (षड्रस पदार्थों) का अर्क जो प्रतिदिन दो पल पिए, वह स्वप्न में भी अरुचि और मन्दाग्नि को नहीं देखता।
आज के जीवन में
षड्रस की इस टोली में मिश्री, इमली, मिर्च, परवल, बहेड़ा और करेला गिने गए हैं, यानी मीठा, खट्टा, तीखा, कड़वा और कसैला, सब एक साथ। पाठ इन्हें एक-दूसरे के विपरीत और बहुत बली कहता है। नियम है: रोज़ दो पल। आज इसका उपयोग यह है: थाली में सब स्वाद हों तो भूख और पाचन ठीक रहते हैं। जो व्यक्ति केवल मीठा या केवल तीखा खाता है, उसकी भूख जल्दी बिगड़ती है।
कड़ी: स्वाद की टोली देख ली → अब मसालों की तीन और चार वाली टोलियाँ।
दूसरी सीढ़ी: सुगन्ध की जोड़ियाँ और तीखे मसालों की टोलियाँ
पाठ पहले छोटी टोलियाँ गिनाता है। इनके नाम में ही गिनती छिपी है।
- त्रिसुगन्ध (तीन सुगन्ध): दालचीनी, इलायची और तेजपात बराबर मात्रा में। इसका अर्क मुँह की दुर्गन्ध मिटाता और पेट साफ़ करता है।
- चातुर्जात (चार जात): नागकेसर, इलायची, तेजपात और दालचीनी। इसके अर्क से भूख बढ़ती और विष का असर घटता है।
- त्रिफला: हरड़, बहेड़ा और आँवला। इसका अर्क प्रमेह, कुष्ठ, विषम ज्वर और पित्त पर।
- त्रिकुटा: सोंठ, पीपल और कालीमिर्च। इसका अर्क मोटापा, गाँठ, कफ, फीलपाँव और सर्दी-ज़ुकाम (प्रतिश्याय) पर।
- चतुरुषण: पीपल, पीपलामूल, कालीमिर्च और सोंठ। इसका अर्क भूख जगाता है।
- पंचकोल: पीपल, पीपलामूल, चव्य, चित्रक और सोंठ। गाँठ, प्लीहा और पेट-दर्द में।
- षडूषण: पीपलामूल, पीपल, कालीमिर्च, चव्य, चित्रक और सोंठ। इसका अर्क उष्ण है, भूख जगाता है।
- चतुर्बीज: मेथी, चन्द्रसूर, काला जीरा और अजवायन। शूल, अफारा और वायु पर।
श्लोक 2 · त्रिसुगन्ध
त्वगेलापत्रकैस्तुल्यैस्त्रिसुगन्धमिति स्मृतम्।
तदर्को मुखदौर्गन्ध्यच्छेदनो मलभेदनः॥
हिन्दी अर्थ
दालचीनी, इलायची और तेजपात बराबर लेने पर त्रिसुगन्ध कहलाता है। उसका अर्क मुँह की दुर्गन्ध मिटाता और मल को खोलता है।
आज के जीवन में
यह वही मिश्रण है जो रोज़ की चाय के मसाले में मिलता है, और पान के बीड़े में भी। पाठ बताता है कि पुराने लोगों ने इसे मुँह की सफ़ाई के लिए चुना था। भारी भोजन के बाद इलायची और दालचीनी का एक टुकड़ा आज भी वही काम करता है।
श्लोक 3 · त्रिफला और पंचकोल
पथ्या बिभीतको धात्री त्रिफलैषा प्रकीर्तिता।
… पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरैः।
पञ्चकोलमिदं गुल्मप्लीहानाहोदरापहम्॥
हिन्दी अर्थ
हरड़, बहेड़ा और आँवला त्रिफला कहे जाते हैं। पीपल, पीपलामूल, चव्य, चित्रक और सोंठ पंचकोल हैं, जो गाँठ, प्लीहा, अफारा और उदर रोगों को हरता है।
आज के जीवन में
ध्यान दीजिए कि गिनती का नाम ही नुस्ख़ा है। त्रिफला कहते ही तीन फल, पंचकोल कहते ही पाँच जड़ें और मसाले, पूरी सूची याद आ जाती है। पुराने वैद्य इसी तरह बहुत-सी सामग्री एक नाम में रखते थे। आज यही तरीक़ा हमें दवा की पर्ची पढ़ना सिखाता है: नाम देखिए, फिर पूछिए कि उसमें क्या-क्या है।
कड़ी: मसालों की टोलियाँ पूरी हुईं → अब जड़ों और कन्दों के बड़े वर्ग: अष्टवर्ग, पंचमूल और दशमूल।
तीसरी सीढ़ी: जड़ों के बड़े वर्ग — अष्टवर्ग, पंचमूल और दशमूल
- अष्टवर्ग (आठ): जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि। इसका अर्क कटे घावों को भरकर जोड़ने वाला माना गया।
- बृहत्पंचमूल: बेल, अरणी, सोनापाठा, पाटला और गम्भारी (गंगेरन)। इसके अर्क से भूख तेज़ होती है।
- लघु पंचमूल: शालपर्णी, प्रश्निपर्णी, बड़ी कटेली, छोटी कटेली और गोखरू। इसका अर्क पथरी में।
- दशमूल: ऊपर के दोनों पंचमूल मिलाकर।
- जीवनीय गण: जीवन्ती, मुलहठी (मधुक), मूँग-पर्णी, माषपर्णी और शालपर्णी के साथ पूरा अष्टवर्ग।
श्लोक 4 · दशमूल
उभाभ्यां पञ्चमूलाभ्यां दशमूलमुदाहृतम्।
तदर्कः सूतिकारोगत्रिदोषज्वरशोथहा॥
हिन्दी अर्थ
दोनों पंचमूल मिलाकर दशमूल कहा गया है। उसका अर्क प्रसव के बाद के रोगों, तीनों दोषों के ज्वर और सूजन को हरता है।
आज के जीवन में
दशमूल आज भी प्रसव के बाद की माताओं के लिए एक जाना-पहचाना नाम है। पाठ में जीवनीय गण का अर्क सब रोगों का नाश करने वाला कहा गया है, यह पुराना सामान्य कथन है। इसे जीवन भर की शक्ति का आदर्श मानिए, चिकित्सा का वादा नहीं।
कड़ी: जड़ों के वर्ग हो गए → अब सुगन्ध का वह बड़ा वर्ग, जिसमें पूरे चालीस नाम हैं।
चौथी सीढ़ी: सुगन्ध गण और वीरण
पाठ ने सुगन्धित द्रव्यों का एक बड़ा वर्ग बनाया है, जो ऊपर के मसालों से अलग है। इसमें कपूर, कस्तूरी, लता-कस्तूरी, श्वेत और पीला चन्दन, काला अगर, रक्तचन्दन, देवदार, चीड़, तगर, महुआ, गूगल, राल, लोबान, लौंग, जावित्री, जायफल, दोनों इलायची, दालचीनी, तेजपात, नागकेसर, केसर, गोरोचन, नखी, खस, नेत्रबाला, जटामांसी, कचूर और मुलहठी आदि गिने गए हैं।
श्लोक 5 · सुगन्ध गण का अर्क
विधिनिष्कासितो योऽर्को रुच्यः पाचनदीपनः।
मुखदौर्गन्ध्यहन्नेत्र्यो लेपान्मेदश्रमापहः॥
हिन्दी अर्थ
विधि से निकाला गया (सुगन्ध गण का) अर्क रुचि जगाने वाला, पाचक और भूख बढ़ाने वाला है। यह मुँह की दुर्गन्ध हरता है, आँखों को हित देता है, और इसका लेप मोटापे और थकान को दूर करता है।
आज के जीवन में
इस वर्ग से सीख मिलती है कि सुगन्ध भी औषधि का रूप है। पाठ के अनुसार वही अर्क जिसे पिया जाए, उसे लेप के रूप में भी लगाया जा सकता है, थकान और भारीपन मिटाने के लिए। गर्मी की थकान में चन्दन और खस के लेप और शर्बत की आदत इसी की याद दिलाती है।
इसके बाद वीरण वर्ग आता है: कुश, काश, दर्भ (दाभ), दूसरी घासें, श्वेत दूब, नील दूब और गण्डदूब। पाठ के अनुसार इनका अर्क शूल हरता है, भूख बढ़ाता है, घाव जोड़ता है और बल देता है। पूजा में काम आने वाली कुश और दूब को यहाँ औषधि के रूप में देखा गया है।
उसके बाद दुग्ध-कन्द वर्ग है: अश्वगन्धा, मूसली, विदारीकन्द, शतावरी और क्षीर-वाराही। पाठ के अनुसार इनका अर्क बालक को पुष्ट करता है और वृद्ध को भी ताक़त लौटाने वाला माना गया। एक और वर्ग लघु और बृहद दन्ती, इन्द्रवारुणी और नील का है, जिसे सुगन्धित करके राजाओं के योग्य सौम्य विरेचन कहा गया।
कड़ी: वर्ग पूरे हुए → अब फल और फूल, जिन्हें कमल और केतकी के पर्दे में रखा जाता था।
पाँचवीं सीढ़ी: फल और फूल के अर्क
- बड़ के फल: दूध में मिलाकर, कमल से ढककर अर्क। पाठ के अनुसार शीतल है, उदर के विकार दूर करता है, त्वचा को चिकना रखता है।
- पीपल के फल: कमल की जड़, नाल, पत्ते, फल और फूल के आच्छादन में। स्त्रियों के रोगों के लिए बताया गया।
- कमल के कोमल बीज: नए, कोमल बीजों का अर्क पाँच दिन एक मण्डल की तरह लिया जाए। पारम्परिक मत है कि यह स्त्रियों के लिए पुष्टिकारक है।
- तिन्दुक (तेंदू) का अर्क: कमल के फूलों का पिधान देकर। पाठ के अनुसार बल और नेत्र-ज्योति बढ़ती है, और प्रसव के समय पीड़ा कम होती है।
- पुष्पार्क: सेवन्ती, कमल, माधवी, गुलदाउदी, चमेली, जूही, चम्पा, अशोक और कदम्ब के फूल एक साथ, केतकी के पत्तों से ढककर। कालीमिर्च के साथ पिया जाए। पाठ के अनुसार वर्ष भर लेने से क्षय से बचाव होता है।
श्लोक 6 · पाँच दूधिया वृक्ष
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थ … पञ्चैते क्षीरिणो वृक्षास्तेषामर्को व्रणप्रणुत्॥
हिन्दी अर्थ
बड़ (न्यग्रोध), गूलर, पीपल, कदम्ब और प्लक्ष, ये पाँच दूधवाले वृक्ष हैं। इनके अर्क से घाव ठीक होते हैं।
आज के जीवन में
पाठ आगे कहता है कि इस अर्क से नहाने पर भूख जगती है, लेप से व्रण और चर्म-रोग घटते हैं, और सेंक से कटे अंग भी जुड़ते हैं। पाँच वृक्ष, जो भारत में हर गाँव में मिल जाते हैं, उन्हें पुराने वैद्य ने घाव की औषधि माना। इनकी छाया, फल और छाल, तीनों काम की मानी गई हैं। यह वही चीज़ है जो आप अपने गाँव या शहर के पुराने पेड़ों में देख सकते हैं।
कड़ी: फल और फूल हो गए → अब अनाज, तेल के बीज, शहद और गन्ना।
छठी सीढ़ी: अनाज, तेल के बीज, शहद और गन्ना
अब पाठ अनाज की ओर जाता है। यहाँ चावल की पन्द्रह क़िस्मों के नाम गिनाए गए हैं: रक्तशालि, सकलम, पाण्डुक, शकुनाहत, सुगन्धक, कर्दमक, महाशालि, अदूषक, पुष्पाण्डक, पुण्डरीक, माहिषमस्तक, दीर्घशूक, काञ्चनक, हायन और लोध्रपुष्पक। ये अलग-अलग देशों में उगते थे। इनकी पिट्ठी में आठ गुना पानी डालकर रखा जाता है। जब उसमें जीव उत्पन्न होकर मरने लगें, यानी ख़मीर उठकर उतर जाए, तब यंत्र से उसका पेय निकाला जाता है। पाठ के अनुसार यह स्वादिष्ट, मीठा, बल देने वाला, स्निग्ध और तीनों दोष घटाने वाला होता है।
दालों से भी ऐसा ही पेय बनता है। मूँग, उड़द, राजमा, मटर, मोठ, चना, अरहर, मसूर, खेसारी और केराव जैसी दालों को दलकर चूर्ण बनाया जाता है और पहले की तरह साधा जाता है। पाठ के अनुसार पन्द्रह दिन तक उसका असर उग्र रहता है, और अगले पन्द्रह दिन में वह गुणकारी हो जाता है। छह महीने ज़मीन में दबाकर रखी जाए तो और भी गुणी मानी गई।
तेल वाले बीजों की सूची भी है: अलसी, तिल, तोरी, तीनों तरह की सरसों, दोनों राई, खसखस और कुसुम के बीज। इन्हें कूटकर (खल-मूसल में) रस निकाला जाता है। पाठ कहता है कि मालिश से मनुष्यों, हाथी और घोड़ों के रोग दूर होते हैं, कान में डालने से कान के विकार घटते हैं, और उबटन की तरह लगाने से दाद घटता है और बाल, त्वचा और बल बढ़ते हैं।
मीठे द्रव्यों की गिनती
- शहद की आठ जातियाँ: माक्षिक, भ्रामर, क्षौद्र, पौतिक, छात्र, औद्दालक, दाढ्य और दाल।
- गन्ने की बारह क़िस्में: पौण्ड्रक, भीरुक, वंशक, शतपोरक, कान्तार, तापसेक्षु, काण्डेक्षु, सूचिपत्रक, नेपाल, दीर्घपत्र, नीलपोर और कोशकृत।
- गन्ने से बनी छह चीज़ें: फाणित (राब), मत्स्यण्डी, गुड़, खण्ड, सिता (मिश्री) और सितोपला।
श्लोक 7 · शहद की आठ जातियाँ
माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौतिकं छात्रमित्यपि।
… इत्यष्टौ मधुजातयः॥
हिन्दी अर्थ
माक्षिक, भ्रामर, क्षौद्र, पौतिक और छात्र आदि मिलाकर शहद की आठ जातियाँ हैं।
आज के जीवन में
पुराने वैद्य के लिए शहद एक ही चीज़ नहीं थी। मधुमक्खी, भँवरे और अलग-अलग छत्तों से मिलने वाले शहद का स्वभाव अलग माना जाता था। आज बाज़ार में बिकने वाला शहद एक-सा दिखता है। इसलिए असली, ताज़ा और बिना मिलावट का शहद ही लीजिए, और जिस दुकान पर भरोसा हो वहीं से।
कड़ी: मीठे द्रव्य गिन लिए → अब खट्टे फलों का बड़ा वर्ग और उससे बनने वाली राजवारुणी।
सातवीं सीढ़ी: खट्टे फल और राजवारुणी
पाठ पहले अम्ल वर्ग गिनाता है: आम, आम्रातक (अमड़ा), आँवला, बड़हल, नारंगी, कैथ, दोनों जामुन, करौंदा, पियार, बिजौरा, जम्बीरी नीबू, अम्लबेत, इमली, अनार, मुनक्का, दोनों बेर, शहतूत, चूक, हरमन्थ और चांगेरी। इसके बाद इसी वर्ग से बनने वाले एक पेय की विधि है, जिसे राजवारुणी कहा गया।
राजवारुणी की विधि (पाठ के अनुसार)
- सोंठ, पीपल, पीपलामूल, अजवायन और कालीमिर्च बराबर-बराबर लीजिए।
- इनके कुल भाग से दोगुना खट्टे फलों का रस लीजिए।
- उसमें शहद और बारह तरह के गन्ने का रस मिलाइए, और इन सबसे भी दोगुना मीठा पदार्थ रखिए।
- मिश्रण को एक महीने रखा रहने दीजिए, फिर यंत्र से अर्क निकालिए। इसे आठ प्रहर रोज़ साधने की बात भी आती है।
- इसे एक महीने ज़मीन में गड्ढा खोदकर दबाइए, फिर बाहर निकालकर काम में लाइए।
श्लोक 8 · राजवारुणी की स्थापना
मासं भूमौ निखातव्या तत ऊर्ध्वं च भक्षयेत्।
मया महेश्वरमुखाच्छ्रुत्वा तस्यै समर्पिताम्॥
हिन्दी अर्थ
इसे एक मास भूमि में गाड़कर रखें, उसके बाद ही सेवन करें। मैंने यह विधि शिव के मुख से सुनी थी।
आज के जीवन में
पाठ राजवारुणी को शीतल, हल्की, स्वादिष्ट, चिकनी और बहुत-से रोगों में हितकारी बताता है: अरुचि, खाँसी, पित्त, प्रमेह, थकान, कृमि, मोटापा, प्यास, उल्टी, श्वास, हिचकी, अजीर्ण, जलन और क्षय। साथ ही यह रंग निखारने, बुद्धि बढ़ाने और रोम-छिद्र साफ़ करने वाली कही गई है। कथा के अनुसार रावण ने इसे भैरव को भी दिया था। इससे ज़्यादा काम की बात विधि की है: सब्र। एक महीने का इन्तज़ार, और ज़मीन के भीतर की ठण्डी, स्थिर जगह। अचार और सिरके की हर घरेलू विधि में आज भी यही नियम चलता है।
छोटे अनाज की वारुणी (क्षुद्र वारुणी)
- सामग्री: कंगनी, चीना, कोदों, सावाँ, वन-कोदों, सन के बीज, बाँस के बीज और गडहेडुआ।
- विधि: भूसी उतारकर कूटिए, फिर छाछ या खट्टे द्रव में रख दीजिए। रखा रहने दीजिए जब तक कीड़े न पड़ जाएँ, फिर यंत्र से पेय निकालिए।
- पाठ के अनुसार असर: पर्वत पर चढ़ने वाले और भूख, प्यास, चिन्ता में कठोर श्रम करने वालों को कष्ट कम लगता है। प्रसूता को प्रसव की पीड़ा में कमी महसूस होती है।
कड़ी: खट्टे और मीठे का बड़ा खेल देख लिया → अब पशु-पक्षियों के रसों का वर्गीकरण।
आठवीं सीढ़ी: जीव-वर्ग के रस और अण्डे का अर्क
चौथे शतक का अगला भाग जीवों के रस की श्रेणियाँ बताता है। यह पूरा हिस्सा वर्गीकरण की मिसाल है: हर श्रेणी के साथ उसका असर लिखा गया है।
- जंगली हिरण-वर्ग (हरिण, कुरंग, बारहसिंगा): पित्त और कफ घटाने वाला, बल देने वाला।
- बिल में रहने वाले जीव (गोह, ख़रगोश): वात हरने वाला, बल बढ़ाने वाला।
- गुफा में रहने वाले जीव: बलकारक, आँखों और गुप्त रोगों के लिए हितकारी।
- पर्णमृग (वृक्ष पर चढ़ने वाले): बल, आँखों के लिए हितकारी, श्वास और खाँसी में।
- विष्किर पक्षी (बटेर, तीतर, बत्तख): बलदायक, त्रिदोषनाशक।
- प्रतुद पक्षी (कबूतर, कोयल, तोता): कफ-पित्त घटाने वाले, मल बाँधने वाले।
- प्रसह पक्षी (कौआ, गिद्ध, उल्लू, चील): भोजन जल्दी पचाने वाले, मोटापे के लिए।
- ग्राम्य पशु (बकरा, बैल, मेढ़ा, घोड़ा): भूख जगाने वाले, वात घटाने वाले, बल बढ़ाने वाले।
- पानी के किनारे के पशु (भैंसा, सूअर, गाय, हाथी): बलदायक, कफ बढ़ाने वाले।
- प्लव पक्षी (हंस, सारस, चकवा, बगुला): बल देने वाले, चिकने, त्रिदोषनाशक।
- कोष वाले जीव (शंख, सीप, घोंघा, केकड़ा): पुष्टि और बल। पादी जीव (कछुआ, मगर, घड़ियाल): वात घटाने वाले।
- मछलियाँ: रुचि जगाने और बल देने वाली।
इसके बाद एक सरल अर्क आता है: अण्डार्क। दालचीनी, इलायची, कालीमिर्च, कपूर, लौंग और जावित्री को महीन पीसकर अण्डों पर लेप किया जाता है, फिर बीसवाँ भाग घी मिलाकर रस निकाला जाता है। पाठ के अनुसार यह बलकारक, वात घटाने वाला और वीर्य बढ़ाने वाला है।
कड़ी: जीवों की श्रेणियाँ और अण्डा देख लिया → अब सबसे काम का हिस्सा: ऋतु के अनुसार अर्क।
नौवीं सीढ़ी: छह ऋतुओं के छह अर्क
चौथे शतक का अन्तिम श्लोक-समूह पूरे साल का कार्यक्रम बना देता है। हर ऋतु के साथ एक या दो औषधियों के अर्क का नाम जुड़ा है।
- वसन्त: आम के कोमल पत्तों के साथ नीबू का रस।
- ग्रीष्म: सेवन्ती और कमल (पद्मिनी) का रस।
- वर्षा: त्रिफला का रस।
- शरद्: पारिजात और कश्मीरी (गम्भारी) के फूलों का रस।
- हेमन्त: अजवायन और गुलदाउदी का रस।
- शिशिर: नीबू और अजवायन का रस।
श्लोक 9 · ऋतु के अनुसार अर्क
… वर्षायां त्रिफलाभवः।
पारिजातकाश्मीरीजातोऽर्कः शरदि स्मृतः॥
हिन्दी अर्थ
वर्षा में त्रिफला का अर्क लिया जाए, और शरद् में पारिजात तथा कश्मीरी (गम्भारी) के फूलों का अर्क।
आज के जीवन में
पाठ का अन्तिम कथन है: इन ऋतु-अर्कों का सेवन करने वाले को रोग का भय कहाँ? यह पूरे चौथे शतक की सबसे पुरानी और आज भी सबसे उपयोगी सीख है। गर्मी में ठण्डे फूलों का शर्बत, बरसात में त्रिफला, सर्दी में अजवायन, यह वही घरेलू कैलेण्डर है जो हमारे बुज़ुर्ग बिना पुस्तक के चलाते थे। इसे अपनी रसोई में उतारने के लिए किसी अर्क-यंत्र की ज़रूरत नहीं है।
ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध
बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के पास समय कम और ज़िम्मेदारी अधिक होती है। इसलिए उसे हर चीज़ अलग से नहीं, टोली और नियम की तरह चाहिए। चौथा शतक यही देता है: वर्ग का नाम, उसकी सामग्री और ऋतु का नियम। नियम बन जाए तो रोज़ सोचना नहीं पड़ता, और स्वास्थ्य किसी संकट का इन्तज़ार नहीं करता। जो नेता अपने स्वास्थ्य को ऋतु और नियम पर रखता है, वह अपने साथ के लोगों को भी उसी अनुशासन में रखता है।
इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)
- टोली का नाम याद रखिए। त्रिफला, त्रिकुटा, पंचकोल, दशमूल: नाम में ही सामग्री है।
- थाली में छहों स्वाद। मीठा, खट्टा, तीखा, कड़वा और कसैला, एक साथ।
- सुगन्ध भी औषधि है। इलायची, दालचीनी, चन्दन और खस को रोज़ की आदत में रखिए।
- सब्र का फल। जो चीज़ पकने या ठहरने में एक महीना माँगे, उसे वह समय दीजिए।
- ऋतु के साथ चलिए। हर मौसम की अपनी चीज़ है, उसी को बदल-बदलकर लीजिए।
7 दिन का अभ्यास
- दिन 1: आज की चाय या दूध में इलायची और दालचीनी का एक छोटा टुकड़ा डालिए।
- दिन 2: घर में त्रिफला, सोंठ-पीपल-मिर्च और जीरा-मेथी-अजवायन के डिब्बे अलग-अलग पहचानकर रखिए।
- दिन 3: दिन के भोजन में छहों स्वाद गिनिए और जो छूटा हो उसे जोड़िए।
- दिन 4: अपने इलाक़े के पाँच पुराने पेड़ों के नाम खोजिए: बड़, पीपल, गूलर और बाक़ी।
- दिन 5: घर के बुज़ुर्ग से पूछिए कि इस ऋतु में घर में क्या पिया-खाया जाता था।
- दिन 6: शाम को कपूर, चन्दन या खस की एक हल्की सुगन्ध जलाइए और दस मिनट शान्त बैठिए।
- दिन 7: आने वाली ऋतु की एक चीज़ चुनिए और उसे सप्ताह में दो बार रखने का नियम बनाइए।
यही बात और जगह कैसे समझाई गई है
- अर्क प्रकाश: तीसरा शतकआठवाँ अध्याय: एक-एक वनस्पति का अर्क।
- अर्क प्रकाश: दूसरा शतकसातवाँ अध्याय: पाँच तरह के द्रव्य और पिधान।
- आहार के तीन प्रकारसात्त्विक, राजसिक और तामसिक भोजन।
- सन्तोष और स्थितिजो है, उसमें टिकने की सीख।
घर में रसोई या जड़ी-बूटी रखने की सही दिशा जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।
और रहस्य: जो इस अध्याय में छिपे हैं
रहस्य 1: चुपचाप छूटने वाले स्वाद
पाठ के अनुसार छह स्वाद एक-दूसरे के उलटे और बलवान हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: रोज़ की थाली में मीठा, खट्टा और तीखा अपने आप आ जाते हैं। कड़वा और कसैला सबसे पहले छूटते हैं। जैसे घर में महीनों से करेला, मेथी या जामुन न आए हों, तो भूख धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगती है।
रहस्य 2: गिनती की सीढ़ी
पाठ में टोलियाँ तीन से शुरू होती हैं, फिर चार, पाँच और छह तक जाती हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: यह सिखाने का क्रम भी है। पहले छोटी टोली पक्की करो, फिर एक चीज़ जोड़ो। जैसे नई दुकान वाला पहले तीन चीज़ें ठीक बेचना सीखे, फिर सूची बढ़ाए।
रहस्य 3: जो पिया, वही लगाया
पाठ के अनुसार सुगन्ध वर्ग का अर्क पिया भी जाता है और लेप की तरह भी लगाया जाता है। तेल वाले बीजों में भी यही दोहरा उपयोग है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: एक अच्छी चीज़ को दो रास्तों से काम में लीजिए। जैसे गर्मी में चन्दन का शर्बत पीना और शाम को माथे और गर्दन पर उसका ठण्डा लेप।
रहस्य 4: पहला पखवाड़ा उग्र होता है
पाठ के अनुसार दालों से बना पेय पन्द्रह दिन तक उग्र रहता है, फिर अगले पन्द्रह दिन में गुणकारी होता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: हर नई चीज़ शुरू में खुरदरी लगती है। जैसे सुबह की सैर या फोन बन्द करने की आदत पहले हफ़्ते भारी लगती है, और लोग वहीं छोड़ देते हैं।
रहस्य 5: जगह भी सामग्री है
पाठ में पेय को ज़मीन के भीतर, ठण्डी और स्थिर जगह में एक महीना रखने को कहा गया है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: सही चीज़ गलत जगह रखने से भी बिगड़ती है। जैसे मसाले चूल्हे के ऊपर वाले खाने में रखे हों तो महक जल्दी उड़ जाती है, और अलमारी के ठण्डे कोने में वही बरसों चलते हैं।
रहस्य 6: एक नाम, कई क़िस्में
पाठ में शहद की आठ जातियाँ, गन्ने की बारह और चावल की पन्द्रह क़िस्में गिनी गई हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: नाम एक होने से चीज़ एक नहीं हो जाती। जैसे बाज़ार में "शहद" लिखे दो डिब्बे अलग निकल सकते हैं, इसलिए भरोसे की दुकान और ताज़ी तारीख़ देखिए।
रहस्य 7: पास की चीज़ पहले
पाठ ने बड़, गूलर और पीपल जैसे पाँच पेड़ चुने, जो हर गाँव में मिल जाते हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: अच्छी चीज़ अक्सर दूर नहीं, आस-पास होती है। जैसे पढ़ाई के लिए महँगा कोना ढूँढने के बजाय घर की सबसे शान्त खिड़की चुन लेना।
आसान रास्ता: कोई भी कैसे करे
- आज की थाली के स्वाद गिनिए। खाना खाते हुए मीठा, खट्टा, तीखा, कड़वा, कसैला और नमकीन गिनें। दो मिनट लगते हैं। आम तौर पर दो-तीन स्वाद छूटे दिखते हैं।
- एक छूटा स्वाद चुनिए। कड़वा छूटा हो तो मेथी या करेला, कसैला हो तो जामुन या कच्चा केला। हफ़्ते में दो बार ही लें। दो हफ़्ते में थाली पहले से सन्तुलित लगने लगती है।
- रसोई के मसालों की जगह बदलिए। चूल्हे से दूर, ठण्डी और अँधेरी अलमारी चुनें। दस मिनट का काम है। महक अक्सर ज़्यादा दिन टिकती है।
- मौसम की एक चीज़ कागज़ पर लिखिए। रसोई के दरवाज़े पर चिपकाइए, जैसे गर्मी में शर्बत और बरसात में हल्का खाना। बुज़ुर्ग से पूछ लें कि घर में क्या चलता था। यह एक बार का काम है।
- पन्द्रह दिन तक फ़ैसला मत कीजिए। जो भी नई आदत लें, उसे पन्द्रह दिन बिना जाँचे चलाएँ। पहले हफ़्ते में खिंचाव लगे तो सामान्य है। तीसरे हफ़्ते तक वह अक्सर सहज हो जाती है।
- पास का एक पुराना पेड़ ढूँढिए। पाँच मिनट पैदल दूरी पर। उसके नीचे दस मिनट बैठें, फोन जेब में रखें। मन अक्सर शान्त होता है।
- रविवार को तीन पंक्तियाँ लिखिए। क्या जोड़ा, क्या छूटा, क्या अच्छा लगा। पाँच मिनट। अगले हफ़्ते की योजना अपने-आप साफ़ दिखती है।
सबसे आम ग़लती
पहले दिन सब कुछ एक साथ शुरू कर देना और तीसरे दिन सब छोड़ देना। एक ही चीज़ लीजिए और उसे पन्द्रह दिन दीजिए। यदि कोई रोग हो, तो घरेलू आदत के भरोसे मत रुकिए। योग्य वैद्य या चिकित्सक को दिखाइए।
आज की स्व-जाँच (2 मिनट)
- क्या मुझे त्रिफला, त्रिकुटा और पंचकोल में क्या-क्या है, यह याद है?
- क्या आज मेरी थाली में कम से कम पाँच स्वाद थे?
- क्या मैं इस ऋतु की कोई विशेष चीज़ ले रहा या रही हूँ?
- क्या मैंने किसी चीज़ को पूरा समय दिया, जैसे अचार या दही का जमना?
- क्या मैंने आज घर में कोई हल्की सुगन्ध रखी?
जितने सवालों का उत्तर "हाँ" है, उतना ऋतु-ज्ञान आपने कमाया। बाक़ी अगले सप्ताह की कोशिश बनाइए।
आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)
- अध्याय 1 से 5: सही गुरु, शान्ति, वश्य, स्तम्भन और मन्त्र का अनुशासन। (पढ़ चुके)
- अध्याय 6 से 8: अर्क प्रकाश के पहले तीन शतक। (पढ़ चुके)
- अध्याय 9: चौथा शतक, औषधि-समूह। (आप अभी यहाँ हैं)
- आगे: अर्क प्रकाश के और शतक: बुख़ार, दस्त, कामला, खाँसी, मूत्र और त्वचा के रोगों के लिए अलग-अलग अर्क।
पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।
अगले अध्याय में: अर्क प्रकाश का पाँचवाँ शतक। इसमें बुख़ार, दस्त, कामला, खाँसी, पथरी, प्रमेह और त्वचा के रोगों के लिए अलग-अलग अर्क के नुस्ख़े आएँगे।
यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। स्वास्थ्य से जुड़ी बातों में, ख़ासकर गर्भवती स्त्री और बच्चों के मामले में, योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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