विज्ञान भैरव तन्त्र अध्याय 10 — देवी की पहचान
अध्याय दस
श्लोक 139 से 163 — संवाद का चरम और शिव का अन्तर्धान
❖ ❖ ❖
"देवी ने पूछा था — उपाय।
शिव ने 112 दिए। अब देवी क्या कहती हैं?"
श्लोक 138 तक शिव ने सारी 112 धारणाएँ बता दीं। अब अन्तिम 25 श्लोक हैं। यहाँ शिव कुछ अन्तिम बातें कहते हैं — कर्मकाण्ड का स्थान, अजपा गायत्री, पात्र-कुपात्र का विवेक। फिर देवी अपना अन्तिम वाक्य बोलती हैं। और संवाद समाप्त।
पर "समाप्त" शब्द सही नहीं। संवाद रुकता नहीं। वह "घूम" जाता है — और हमारे जीवन में आता है।
· · ·
श्लोक 139-150
कर्मकाण्ड किसके लिए?
शिव कहते हैं — जप, होम, पूजा, याग, तीर्थाटन — ये सब क्रियाएँ उन साधकों के लिए हैं जो अभी स्थूल-शरीर के स्तर पर हैं। जिन्हें आन्तर-अनुभूति नहीं हुई। उनके लिए ये साधन सीढ़ी हैं।
पर जो आत्म-ज्ञानी हैं, जो अद्वैत में स्थित हो चुके हैं, जिन्हें परम तत्त्व का बोध हो गया है — उनके लिए इन कर्मकाण्डों की आवश्यकता नहीं रह जाती।
यैरेव पूज्यते द्रव्यैस्तर्प्यते वा परापरः ।
यश्चैव पूजकः सर्वः स एवैकः क्व पूजनम् ॥ १४२ ॥
अर्थ: "जिन द्रव्यों से पूजन होता है, जिनसे तर्पण होता है, जो पूजा करने वाला है — सब वही (एक चैतन्य) ही है। तब पूजा कहाँ?"
यानी जब साधक को यह बोध हो जाये कि पूजा-सामग्री, पूज्य देवता और पूजक — तीनों एक ही चैतन्य के रूप हैं — तब पूजा करने वाला और कौन बचा? यही अद्वैत की पराकाष्ठा है।
वास्तु की ओर एक झलक
यही सिद्धान्त वास्तु में भी है। एक नौसिखिये साधक के लिए — दिशा, मुहूर्त, पूजा-विधि सब आवश्यक है। पर जो "घर की आत्मा" को महसूस कर चुका है — उसके लिए हर ईंट पूजा है, हर दीवार मन्दिर है। बाह्य कर्मकाण्ड स्वतः छूट जाते हैं।
· · ·
श्लोक 151-154
हंस-मन्त्र — प्रकृति का दिया हुआ जप
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः ।
हंस-हंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति नित्यशः ॥ १५३ ॥
षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः ।
जपो देव्याः समुद्दिष्टः प्राणस्यान्ते सुदुर्लभः ॥ १५४ ॥
अर्थ: "श्वास बाहर जाती है 'स' के साथ। फिर भीतर आती है 'ह' के साथ। यही 'हंस-हंस' मन्त्र जीव दिन-रात अपने आप जपता है। दिन-रात में 21,600 बार — यही देवी का जप है। मृत्यु के अन्तिम क्षण में स्मरण रहना अति-दुर्लभ है।"
भावार्थ
यह अजपा-गायत्री की मूल घोषणा है। शिव कहते हैं — आपको कोई "नया" जप शुरू नहीं करना। प्रकृति ने पहले से ही आपको एक मन्त्र दिया है। हर साँस के साथ वह चल रहा है। 24 घंटे, 1,440 मिनट, औसतन 15 साँस प्रति मिनट — कुल 21,600 जप प्रतिदिन।
आपको "जप" नहीं शुरू करना — आपको "देखना" शुरू करना है कि जो पहले से चल रहा है, वही जप है। यही तन्त्र की अनुपाय-शैली है। बिना प्रयास का जप।
पर सावधानी — मृत्यु के अन्तिम क्षण में इस "हंस" का स्मरण रहना अति-दुर्लभ है। उसके लिए वर्षों का अभ्यास चाहिए।
· · ·
श्लोक 155-158
पात्र-कुपात्र, गोपनीयता, और मूल्य
इत्येतत् कथितं देवि परमामृतमुत्तमम् ।
एतच्च नैव कस्यापि प्रकाश्यं तु कदाचन ॥ १५५ ॥
परशिष्ये खले क्रूरे चाभक्ते गुरुपादयोः ।
निर्विकल्पमतीनां तु वीराणामुन्नतात्मनाम् ॥ १५६ ॥
भक्तानां गुरुवर्यस्य दातव्यं निर्विशङ्कया ॥
अर्थ: "हे देवी! यह उत्तम परम अमृत मैंने तुझे बताया। पर यह किसी को भी कभी प्रकाशित न किया जाये — अन्य सम्प्रदाय के शिष्य को, धूर्त-क्रूर को, गुरु-चरणों में अश्रद्धालु को। केवल निर्विकल्प-बुद्धि वाले, उन्नत-आत्मा वीरों को, और गुरु-भक्त शिष्यों को निःशंक भाव से देना चाहिए।"
ग्रामं राज्यं पुरं देशं पुत्र-दार-कुटुम्बकम् ।
सर्वमेतत् परित्यज्य ग्राह्यमेतन्मृगेक्षणे ॥ १५७ ॥
किमेभिरस्थिरैर्देवि स्थिरं परमिदं धनम् ।
प्राणा अपि प्रदातव्या न देयं परमामृतम् ॥ १५८ ॥
अर्थ: "ग्राम, राज्य, नगर, देश, पुत्र, पत्नी, कुटुम्ब — सब त्याग कर भी यह ज्ञान ग्रहण करने योग्य है। हे देवी! इन अस्थिर वस्तुओं का क्या मूल्य? यह स्थिर परम धन है। प्राण भी देने पड़ें — पर यह परम अमृत किसी अपात्र को मत देना।"
वास्तु से जोड़ — आचार्य परम्परा
यही सिद्धान्त वास्तु आचार्य परम्परा में भी रहा है। सच्चा आचार्य पैसा नहीं देखता — पात्रता देखता है। जो केवल "जल्दी समाधान" चाहता है, उसे बाहरी नियम मिलते हैं। पर जो सच्ची जिज्ञासा से पूछता है — "इस घर की आत्मा क्या है?" — उसके लिए रहस्य खुलते हैं।
· · ·
श्लोक 159-161
देवी का अन्तिम वाक्य — संवाद का चरम
देव-देव महादेव परितृप्तास्मि शङ्कर ।
रुद्र-यामल-तन्त्रस्य सारमद्यावधारितम् ॥ १५९ ॥
सर्व-शक्ति-प्रभेदानां हृदयं ज्ञातमद्य च ।
इत्युक्त्वाऽऽनन्दिता देवी कण्ठे लग्ना शिवस्य तु ॥ १६१ ॥
— श्री देव्युवाच —
अर्थ
"हे देवों के देव, हे महादेव, हे शंकर! मैं परम तृप्त हूँ। आज मैंने रुद्र-यामल तन्त्र के सार को धारण कर लिया। सर्व-शक्ति के सभी भेदों के हृदय (रहस्य) को भी आज जान लिया।"
"यह कहकर आनन्दित देवी शिव के कण्ठ से लग गयीं।"
भावार्थ — पूरे ग्रन्थ की कुञ्जी
देवी ने पहले अध्याय में कहा था — "मेरा संशय नहीं मिटा।" अब वे कहती हैं — "मैं परम-तृप्त हूँ।" यह यात्रा है — संशय से तृप्ति तक।
तीन शब्द ध्यान देने योग्य हैं —
"देव-देव महादेव शङ्कर" — चार सम्बोधन। देवी ने हर सम्बोधन में अपनी श्रद्धा का गहराव बढ़ाया।
"परितृप्तास्मि" — मैं परम-तृप्त हूँ। "सन्तुष्ट" नहीं। "परि-तृप्त" — चारों ओर से तृप्त।
"अवधारितम्" — "धारण कर लिया।" समझ ही नहीं — आत्म-सात कर लिया। यह सिर्फ़ बौद्धिक "जान लेना" नहीं — हृदय में बैठाना है।
और फिर वह क्षण — "कण्ठे लग्ना शिवस्य तु" — देवी शिव के कण्ठ से लग गयीं। यह सिर्फ़ स्नेह का दृश्य नहीं। यह संवाद के दो ध्रुवों का एकाकार होना है। शिव और शक्ति की भेद-प्रतीति — जो संवाद के आरम्भ में थी — अब अद्वय-रूप में प्रतिष्ठित हो गयी। शास्त्र समाप्त।
· · ·
पूरे ग्रन्थ का त्रिविध सन्देश
1. कोई भी एक विधि पर्याप्त है
शिव की एक स्पष्ट घोषणा —
"इन 112 धारणाओं में से किसी एक की भी पूर्ण साधना करने वाला साधक
साक्षात् भैरव बन जाता है। यह ध्रुव सत्य है।
वह अजर-अमर हो जाता है, अष्ट-सिद्धियों से युक्त हो जाता है।
जीवन्मुक्त होकर रहता है — कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।"
यानी — चुनिए एक विधि। बस एक। और उसे जीवन-भर पकड़े रहिए। बाक़ी 111 अपने आप खुलती जाएँगी।
2. अष्ट सिद्धियाँ — मार्ग के उपहार
पूर्ण-साधक में आठ सिद्धियाँ अपने आप प्रकट होती हैं —
1. अणिमा — सूक्ष्म-रूप धारण की शक्ति।
2. महिमा — विशाल-रूप धारण की शक्ति।
3. गरिमा — अत्यन्त भारी होने की शक्ति।
4. लघिमा — अत्यन्त हल्के होने की शक्ति।
5. प्राप्ति — कहीं भी पहुँचने की शक्ति।
6. प्राकाम्य — इच्छानुसार सब प्राप्त करने की शक्ति।
7. ईशित्व — सब पर शासन की शक्ति।
8. वशित्व — सब को वश में करने की शक्ति।
पर सच्चा साधक इनका प्रयोग नहीं करता। ये उसका लक्ष्य नहीं — मार्ग के सहायक उपहार हैं। वह केवल समाधि में लीन रहता है।
3. तान्त्रिक शब्दावली — एक संक्षिप्त शब्दकोश
आगे की यात्रा के 12 मूल शब्द —
गुरु — सिद्धि का मूल देवता; देवता का मूल मन्त्र; मन्त्र का मूल दीक्षा; दीक्षा का मूल गुरु।
शिष्य — शुद्ध-चित्त, इन्द्रिय-जयी और पुरुषार्थी ही तान्त्रिक साधना का योग्य अधिकारी।
मन्त्र — हर मन्त्र में तीन तत्त्व — प्रणव, बीज और देवता।
बीज — हर देवता का अपना बीज। काली का "क्रीं", माया का "ह्रीं", वाक् का "ऐं"।
मन्त्र-चैतन्य — मन्त्र, मन्त्रार्थ और मन्त्र-देवता तीनों का एकीकरण।
दीक्षा — गुरु द्वारा शिष्य को मन्त्र-संस्कार। 11 प्रकार की शास्त्र में बताई गई हैं।
नाड़ी — साढ़े तीन करोड़ शक्ति-स्रोत; इडा, पिङ्गला, सुषुम्ना प्रमुख।
षट्-चक्र — मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा; सहस्रार सबसे ऊपर।
ग्रन्थी — ब्रह्म-ग्रन्थी (पुत्रैषणा), विष्णु-ग्रन्थी (वित्तैषणा), रुद्र-ग्रन्थी (लोकैषणा)।
बिन्दु — सृष्टि के पूर्व शिव-शक्ति की साम्यावस्था।
ब्रह्म-पुर — मानव शरीर ही ब्रह्म का नगर।
सामरस्य — जीव-शिव की एकता; तान्त्रिक साधना का परम लक्ष्य।
❖ ❖ ❖
पहले दस अध्यायों की यात्रा
अध्याय 1-3: देवी का प्रश्न, शिव का उत्तर। भैरव का स्वरूप स्पष्ट हुआ।
अध्याय 4-9: 112 धारणाएँ — श्वास, शरीर, शून्य, ध्वनि, इन्द्रिय, "मैं" — हर द्वार से प्रवेश।
अध्याय 10: देवी की पूर्णता। शिव-शक्ति का एकाकार। संवाद का चरम।
पर यह 163 श्लोकों का संवाद आज भी जारी है। हर बार जब आप साँस को देखते हैं — देवी फिर पूछ रही है। हर बार जब आप "खाली पल" को पकड़ते हैं — शिव फिर उत्तर दे रहे हैं।
विज्ञान भैरव कोई "पढ़कर रख देने" की पुस्तक नहीं है। यह जीवनभर का साथी है।
· · ·
वास्तु साधक के लिए अन्तिम सूत्र
जब आप अपना घर बनाते हैं — यह केवल ईंट-पत्थर का काम नहीं। यह संवाद है।
भूमि कहती है — "मुझमें यह बनाओ।" आप पूछते हैं — "क्यों?" वह बताती है। आप पूछते हैं — "और कैसे?" वह सिखाती है।
विज्ञान भैरव की भाषा में — हर ज़मीन एक शक्ति-स्वरूप है। हर वास्तु-कार एक शिव-संकल्प है। संवाद में बनी इमारत = जीवित घर। बिना संवाद की = केवल structure।
जैसे भैरवी ने 162 श्लोकों के बाद घोषणा की — "परितृप्तास्मि" — वैसे ही एक वास्तु-साधक भी अपने घर के लिए घोषणा कर सकता है — "यह घर सम्पूर्ण है।" पर यह घोषणा तब आती है जब घर सिर्फ़ ईंट-पत्थर न रह जाये — वह एक संवाद का साक्षी बन जाये।
विज्ञान भैरव का अन्तिम सन्देश एक ही वाक्य में — "मुझे सब प्राणियों में जानो, सब कर्मों में जानो, अपनी ही आत्मा में जानो। मैं ही भैरव हूँ — और मैं ही हर ईंट में हूँ, हर भवन में हूँ, हर दीवार में हूँ।"
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
॥ इति विज्ञान-भैरव-तन्त्रम् मूल-संवाद-समाप्तम् ॥
— मूल संवाद यहाँ समाप्त —
अगले अध्याय (11) से — रुद्र-यामल की पृष्ठभूमि, तीन दर्शनों की तुलना, गुरु-दीक्षा-मन्त्र, और सूक्ष्म शरीर की संरचना — पाँच गहन अध्यायों में।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।








Comments & Ratings
Login to leave a comment or rating.