रावण विद्या अध्याय 13 — तंत्र: एक समग्र साधना, भक्ति, जप की विधि, माला, मुद्राएँ और सिद्धियाँ
अध्याय तेरह
पिछले अध्याय में शिव नाचे और बारह ज्योतिर्लिंग खड़े हुए। इस अध्याय में वह रास्ता है, जिस पर चलकर साधक उन शिव तक पहुँचता है।
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बारहवें अध्याय में हमने शिव का ताण्डव पढ़ा। अब सवाल है कि शिव तक पहुँचा कैसे जाए? रावण की पुस्तक का तीसरा भाग इसी का उत्तर है: तंत्र-मंत्र साधना। पाँचवें अध्याय में जप का अनुशासन आ चुका है। यह अध्याय उसके आगे की बात करता है: तंत्र का अर्थ, भक्ति की सीढ़ियाँ, मन्त्र को जगाने के उपाय, माला, मुद्राएँ और सिद्धियों की पूरी सूची।
इस अध्याय में क्या-क्या मिलेगा
- तंत्र और भक्ति: तंत्र का अर्थ, भक्ति की दो बाधाएँ और तीन सीढ़ियाँ, भाव की नौ पहचान।
- दृष्टियाँ और योग: भेद और अभेद, तीन मल, शरीर-शुद्धि के कर्म, मन को "अमन" करना।
- जप की विधि: तीन जप, मन्त्र-चैतन्य, बीज-मन्त्रों के अर्थ, आठ दोष, दस संस्कार, मन्त्र-जाँच।
- माला और मुद्राएँ: तीन माला, 108 दाने, माला-संस्कार; पच्चीस और दस मुद्राओं के नाम।
- उपासना और सिद्धि: पाँच कारण, गोपनीयता के नियम, आठ महा, दस गौण और पाँच क्षुद्र सिद्धियाँ।
पिछले अध्यायों की याद
जप का अनुशासन, शिव की उपासना, ताण्डव
पाँचवाँ, ग्यारहवाँ और बारहवाँ अध्याय इस अध्याय की नींव हैं।
पहली सीढ़ी: तंत्र का अर्थ — तंतु से शिव तक
शब्दकोश में तंत्र का अर्थ है तंतु और सूत, और साथ ही एक पक्की व्यवस्था। पाठ इसे यों खोलता है: संसार एक कपड़ा है, तंत्र उसके हर धागे का क्या, क्यों और कैसे के साथ पूरा ज्ञान है। इसमें शिव और शक्ति बराबर हैं और तंत्र इन्हें अलग मानता ही नहीं। आदर्श प्रतीक अर्धनारीश्वर है। पाठ के अनुसार शक्ति के बिना शिव शव के समान हैं, इसीलिए साधिकाओं का विशेष महत्त्व माना गया। तंत्र उन चीज़ों को भी साधन की तरह बरतता है जिन्हें सात्त्विक साधना अछूत मानती है, ताकि साधक अपने भीतर का वह तत्त्व पहचाने जिस पर बाहर की चीज़ें असर करती हैं।
श्लोक 1 · धीर कौन है
विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः।
हिन्दी अर्थ
विकार के कारण सामने होने पर भी जिनका मन नहीं डोलता, वे ही धीर हैं।
आज के जीवन में
पाठ कहता है कि सच्चा तांत्रिक इसी अर्थ में धीर होता है, और आज की छवि इससे बिलकुल अलग है। आज इसका उपयोग यह है: परीक्षा तब नहीं होती जब सब शान्त है, तब होती है जब गुस्सा या लालच भड़काने वाली स्थिति सामने हो और आप फिर भी स्थिर रहें।
पाठ की दो बातें: तंत्र भोग में डूबे मन को झटके से त्याग की ओर नहीं धकेलता, उसकी स्वाभाविक चाल को धीरे-धीरे त्याग की ओर मोड़ देता है। और जीव में जड़ (देह, मन, बुद्धि) तथा चेतन (आत्मा) दोनों हैं। जब वह जान लेता है कि "मैं शुद्ध, मुक्त आत्मा हूँ", तब वह शिव हो जाता है, और भीतर देखता है कि कुण्डलिनी छह चक्र भेदकर सहस्रदल कमल में शिव से मिल गई। यही लीलानन्द है। रावण की साधनाओं को पाठ तंत्र का मायिक पक्ष कहता है: उनमें दिव्यता थी, पर साधक के उद्देश्य के कारण वह सबसे ऊँची भूमि से भटक गया।
कड़ी: तंत्र का अर्थ साफ़ हुआ → अब वह नींव, जिसके बिना यह इमारत खड़ी नहीं होती: भक्ति।
दूसरी सीढ़ी: भक्ति और शुद्ध सत्त्व
पाठ में भक्ति का अर्थ है: चित्त का लगातार इष्ट में लगे रहना, बिना कामना का प्रेम। उसकी दो बाधाएँ हैं: अन्य अभिलाषा (भोग की या मोक्ष की कामना) और कर्म-ज्ञान-योग का मिश्रण (भजन के बिना हठयोग, भक्ति के बिना यज्ञ)। एक भी रहे तो प्रेम नहीं मिलता। भोग या यश के लिए की गई भक्ति राजसी है, हिंसा और दिखावे वाली तामसी, मोक्ष की कामना वाली सात्त्विकी। इनसे ऊपर उत्तमा भक्ति की तीन सीढ़ियाँ हैं:
- साधन भक्ति: सुनना, गाना, स्मरण। यह क्लेश (पाप, वासना, अविद्या) मिटाती और शुभ देती है। चौंसठ अंग गिनाए गए। शास्त्र की आज्ञा से चलने वाली वैधी है, भीतर की प्यास से चलने वाली रागानुगा।
- भाव भक्ति: साधन के दोनों गुण, और जुड़ते हैं दो: मुक्ति भी छोटी लगना, और इसका बहुत दुर्लभ होना।
- प्रेम भक्ति: चार गुण पहले के और दो नए: गाढ़ा आनन्द, और प्रभु को अपनी ओर खींच लेना। कुल छह।
भाव और प्रेम हृदय में पहले से बैठे हैं; साधन उन्हें पैदा नहीं करता, ढके हुए को खोलता है। भाव की पहचान के लिए पाठ नौ अंकुर गिनाता है: क्षान्ति (हानि और निन्दा में भी न डोलना), अव्यर्थ-कालत्व (समय न गँवाना), विरक्ति, मानशून्यता, आशाबन्ध (प्रभु मिलने की पक्की आशा), समुत्कण्ठा, नाम-गान में रुचि, गुण-कथन में आसक्ति और निवास-स्थान में प्रीति (शिव के लिए काशी और कैलास)।
ये लक्षण कभी कर्मियों और ज्ञानियों में भी दिख जाते हैं, पर वह रत्याभास है, यानी परछाईं। भाव पकने पर प्रेम बनता है, फिर स्नेह (चित्त पिघलना), राग और प्रणय (गाढ़ा विश्वास)। रति के पाँच रस हैं: शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर। आठ सात्त्विक लक्षण हैं: जड़ता, पसीना, रोमांच, स्वर का टूटना, कम्पन, रंग बदलना, आँसू और मूर्च्छा।
कड़ी: भक्ति के स्तर देख लिए → अब वह नक़्शा, जो बताता है कि शिव, शक्ति और संसार कैसे जुड़े हैं।
तीसरी सीढ़ी: भेद और अभेद, और योग
पाठ पहले यह कहता है: किसी साधना को परखने से पहले उसकी दृष्टि जानें, क्योंकि दृष्टि से लक्ष्य तय होता है, और बिना लक्ष्य की साधना बड़बड़ाहट जैसी है। परम्परा के अनुसार शिव के पाँच मुखों से मूल तंत्र प्रकट हुए: दस शिव-तंत्र (भेद पर टिके, शिव-शक्ति-बिन्दु तीन रत्न), अठारह रुद्र-तंत्र (भेद और अभेद का मेल) और चौंसठ भैरव-तंत्र (अभेद, शिव-शक्ति एक)। शाक्त मुख्य रूप से अद्वैतवादी हैं, शैवों में दोनों दृष्टियाँ हैं।
श्लोक 2 · शब्द के तीन स्तर
स्थूलं शब्द इति प्रोक्तं सूक्ष्मं चिन्तामयं भवेत्।
चिन्तया रहितं यत्तु तत्परं परिकीर्तितम्॥
हिन्दी अर्थ
जो कान से सुना जाए, वह स्थूल शब्द है। जो चिन्तन में हो, वह सूक्ष्म। और जो चिन्तन से भी परे हो, वह पर (सबसे ऊँचा) कहा गया है।
आज के जीवन में
जप इसी सीढ़ी पर चढ़ता है: बोलकर, होंठों में, मन में, फिर मौन में। वाणी के चार रूप भी गिनाए गए: परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी। आज इसका उपयोग यह है: देखिए कि आपका पाठ आज किस स्तर पर है, कान तक या उससे भीतर।
बन्धन के तीन मल हैं: आणव ("मैं अधूरा हूँ"), माया ("मैं दुबला या मोटा हूँ") और कर्म ("मैं यज्ञ आदि करने वाला हूँ")। साधना-पथ को पाठ यन्त्र की भाषा में भी समझाता है: बाहर का चौकोर घेरा भूपुर है, और किसी दिशा से घुसकर भीतर बढ़ना साधना का उत्कर्ष, केन्द्र का बिन्दु अन्तिम भूमि। एक शैव व्याख्या के अनुसार आगम सभी के लिए है।
योग पर पाठ का पहला तर्क सीधा है: तन-मन स्वस्थ न हों तो कोई साधना पूरी नहीं होती। इसीलिए तंत्र ने योग अपनाया। शरीर शुद्ध करने के छह कर्म (षट्कर्म) गिनाए गए: धौति, नेती, न्योली, कपालभाति, त्राटक, गजकर्म, वस्ति आदि। नियम: योग्य गुरु से सीखकर ही, सुन्दर और सुरक्षित जगह, हल्का सात्त्विक भोजन (दूध, घी, बादाम, मिश्री), एकान्त और कम बोलना।
मन के बारे में पुराने सिद्धों की बात पाठ में सुन्दर है: चित्त तभी भागता है जब राग से जकड़ा हो। इसलिए उसे "अमन" करना है, जैसे रुई धुनकर बारीक रेशा बनाते हैं।
पाठ में 1 · दर्पण क्यों खोजें
“बोधि सदा निकट है, उसे लंका (कहीं दूर) जाने की आवश्यकता नहीं। हाथ में ही कंकण है, दर्पण ढूँढ़ते फिरने से कोई लाभ नहीं होगा।”
आज के जीवन में
आज इसका उपयोग यह है: शान्ति को बाहर की जगहों, चीज़ों या लोगों में मत खोजिए। रोज़ पाँच मिनट की चुप्पी उसे पहचानने का पहला क़दम है।
कड़ी: योग और मन की बात हो गई → अब पाँचवें अध्याय के आगे की बात: जप को जगाने की विधि।
चौथी सीढ़ी: जप की पूरी विधि
सब यज्ञों में पाठ जप-यज्ञ को श्रेष्ठ कहता है, क्योंकि उसमें न सामग्री चाहिए, न हिंसा। फल का क्रम: वाचिक (बोलकर) आधार; उपांशु (होंठ हिलें, आवाज़ अपने कान तक) सौ गुना; मानस (अर्थ-चिन्तन के साथ मन में) हज़ार गुना। तीनों में इष्ट का चिन्तन ज़रूरी है। एक तंत्र-वचन में शंकर कहते हैं: मन एक जगह, शिव दूसरी, शक्ति तीसरी, प्राण चौथी जगह हों तो सिद्धि कैसे? सबको एक साथ बाँधकर जपना चाहिए।
मन्त्र-चैतन्य यानी मन्त्र को जगाने के चार उपाय: (1) कल्पना करें कि मन्त्र के वर्ण चक्रों के कमलों में हैं और कुण्डलिनी उन्हें चैतन्य में लीन करके फिर जीवित रूप में प्रकट करती है; (2) अक्षर हृदय से सहस्रार तक जाते और वाणी में उतरते हैं; (3) मन्त्र के आगे-पीछे तीन बीज और अ से क्ष तक के वर्ण बोलकर जप; (4) बारह कलाओं वाले सूर्य-मण्डल में मन्त्र, गुरु और उनकी शक्ति का ध्यान। पाठ का निष्कर्ष: बिना मन्त्र-चैतन्य के सिद्धि कठिन है।
बीज-मन्त्रों के अर्थ पाठ ने खोले हैं: हौं (शिव-सदाशिव की कृपा से दुःख मिटें), दूं (माँ दुर्गा, रक्षा करो), क्रीं (काली माता दुःख हरें), ह्रीं (विश्वमाता महामाया दुःख दूर करें), श्रीं (धन-तुष्टि की देवी महालक्ष्मी), ऐं (सरस्वती), क्लीं (कृष्ण सुख-शान्ति दें), हूं (भयंकर रूप वाले शिव), गं और ग्लौं (गणेश), क्षौं (नृसिंह) और स्त्रीं (संकट से तारने वाली माँ)।
श्लोक 3 · मन्त्र का असली अर्थ
ध्यानेन परमेशानि यद्रूपं समुपस्थितम्।
तदेव परमेशानि मन्त्रार्थं विद्धि पार्वति॥
हिन्दी अर्थ
हे पार्वती! ध्यान से जो रूप स्वयं सामने आ जाए, वही मन्त्र का अर्थ जानो।
आज के जीवन में
आज इसका उपयोग यह है: जिस मन्त्र को जपते हैं, पहले उसका शब्द-अर्थ जानिए, फिर कुछ दिन उसी अर्थ के साथ बैठिए।
जप से ठीक पहले: मुखशोधन (जीभ पर भोजन, झूठ और झगड़े का मैल रहता है; इसलिए ओंकार दस बार), सेतु (हृदय में प्रणव), प्राणयोग और दीपनी (मन्त्र को माया-बीज या प्रणव से सम्पुटित कर सात-सात बार)।
मन्त्र के आठ दोष: अभक्ति (मन्त्र को अक्षरों का ढेर या दूसरे को बड़ा समझना), अक्षर-भ्रान्ति, लुप्त (वर्ण छूटना), छिन्न (संयुक्त वर्ण का अंश छूटना), ह्रस्व, दीर्घ, कथन (जागते में मन्त्र बता देना) और स्वप्न-कथन। पहले छह में गुरु से फिर से मन्त्र लें; अन्तिम दो में गुरु का बताया प्रायश्चित्त करें।
श्लोक 4 · दोष जाने बिना जप
दोषानिमानविज्ञाय यो मन्त्रान् भजते जडः।
सिद्धिर्न जायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि॥
हिन्दी अर्थ
इन दोषों को जाने बिना जो अज्ञानी मन्त्रों का जप करता है, उसे सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी सिद्धि नहीं मिलती।
आज के जीवन में
रावण स्वयं यहाँ कहते हैं कि शास्त्र से लिए मन्त्र के दस संस्कार ज़रूरी हैं, क्योंकि कोई मन्त्र पचास दोषों से बचा नहीं; गुरु से मिले सिद्ध मन्त्र को यह ज़रूरत नहीं। आज इसका उपयोग यह है: किसी भी अभ्यास से पहले उसकी बुनियादी चूकें जान लीजिए।
दस संस्कार पाठ में ये हैं: मन्त्र-उद्धार (यन्त्र पर लिखकर धोना), दीपन (हंस-सम्पुट, 1000 जप), बोधन (हूं-सम्पुट, 5000), ताडन (फट्-सम्पुट, 1000), अभिषेक (भोजपत्र पर लिखे मन्त्र का, जप किए जल से), विमलीकरण (1000), जीवन (स्वधा-वषट्-सम्पुट, 1000), तर्पण (दूध-जल-घी से सौ बार), गोपन (माया-बीज, 1000) और आप्यायन (हौं-बीज, 1000)।
कड़ी: जप की विधि हो गई → अब देखिए कि पुराने आचार्य मन्त्र और साधक का मेल कैसे जाँचते थे।
पाँचवीं सीढ़ी: मन्त्र की जाँच और गुरु की कृपा
- कुलाकुल चक्र: साधक के नाम का पहला अक्षर और मन्त्र का पहला अक्षर एक तत्त्व-कोष्ठ में पड़ें तो मन्त्र अपने कुल का। जल-भूमि और वायु-अग्नि में मेल है, आकाश सबका मित्र; शत्रु तत्त्व वाला न लें।
- राशि-चक्र: अपनी राशि से मन्त्र की राशि तक गिनें। छठा, आठवाँ, बारहवाँ ठीक नहीं; 1, 5, 9 मित्र; 2, 6, 10 हितकारी; 3, 7, 11 पुष्टि देने वाले।
- नक्षत्र-चक्र: देव, मनुष्य या राक्षस गण का मेल; नौ नाम: जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र, परम मित्र।
- अकडम चक्र: पहला कोष्ठ सिद्ध, दूसरा साध्य, तीसरा सुसिद्ध, चौथा अरि (त्याज्य)।
- ऋणी-धनी चक्र: नाम और मन्त्र के अंक जोड़कर आठ से भाग दें। मन्त्र का शेष अधिक हो तो ऋणी (शीघ्र सिद्धि); कम हो तो धनी (देर); शून्य हो तो अशुभ।
पाठ का अपवाद: सपने में मिला मन्त्र, स्त्री-गुरु से मिला, तीन अक्षर का, बीज-मन्त्र और सारे वैदिक मन्त्र, इनके लिए ये जाँचें नहीं चाहिए। दीक्षा के उत्तम मास: वैशाख, श्रावण, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन; मलमास वर्जित। सम्पत्ति चाहने वाले को शुक्ल पक्ष, मोक्ष चाहने वाले को कृष्ण पक्ष। पर सबके ऊपर पाठ एक वाक्य रखता है: "शुभ मुहूर्त वही है, जब गुरुदेव की कृपा हो; वही मन्त्र शुभ है, जो वे दे दें।"
श्लोक 5 · गुरु, देव और मन्त्र एक
यथा देवे तथा मन्त्रे यथा मन्त्रे तथा गुरौ।
यथा गुरौ तथा स्वात्मन्येवं भक्तिक्रमः स्मृतः॥
हिन्दी अर्थ
जैसी श्रद्धा देवता में, वैसी मन्त्र में; जैसी मन्त्र में, वैसी गुरु में; और जैसी गुरु में, वैसी अपने भीतर के आत्मा में। यही भक्ति का क्रम है।
आज के जीवन में
आज इसका उपयोग यह है: शिक्षक, अभ्यास और अपने आप, तीनों का आदर कीजिए। एक भी कमज़ोर हो तो सीख अधूरी रहती है।
श्लोक 6 · गुरु-पूजा के बिना
गुरुपूजां विना देवि स्वेष्टपूजां करोति यः।
मन्त्रस्य तस्य तेजांसि हरते भैरवः स्वयम्॥
हिन्दी अर्थ
हे देवी! जो गुरु-पूजा के बिना अपने इष्ट की पूजा करता है, उसके मन्त्र का तेज स्वयं भैरव हर लेते हैं।
आज के जीवन में
आज इसका उपयोग यह है: किसी भी विद्या में पहले शिक्षक के प्रति कृतज्ञता, फिर अभ्यास।
अनुष्ठान के पाँच अंग हैं: जप, फिर जप का दसवाँ हिस्सा हवन, उसका दसवाँ तर्पण, उसका दसवाँ अभिषेक और भोजन-दान। जो अंग न हो सके, उसकी जगह और जप। अन्त में गुरु को दक्षिणा, क्योंकि उनके प्रसन्न हुए बिना परम रहस्य नहीं मिलता।
कड़ी: मन्त्र की जाँच समझ आई → अब वह साधन, जिसे पाठ "प्राणों जैसा प्रिय" कहता है: माला।
छठी सीढ़ी: माला और मुद्राएँ
पाठ का तर्क है: संख्या से जप हो तो मन भटकने पर माला रुक जाती है और याद दिला देती है। माला तीन तरह की है:
- करमाला: उँगलियों के पोरों पर गिनती। अनामिका के बीच से चलकर कनिष्ठिका, फिर तर्जनी के मूल तक दस की संख्या; मध्यमा के दो पोर सुमेरु की तरह छूटते हैं। सुमेरु पार न करें, पोरों की गाँठ न छुएँ, हाथ हृदय के सामने वस्त्र से ढककर, दाएँ हाथ से।
- वर्णमाला: अक्षरों से गिनती: अ वर्ग के सोलह, क से प तक पच्चीस, य से ह तक आठ, एक और, यानी पचास; लौटने पर सौ। "क्ष" सुमेरु है। भीतरी जप में काम आती है।
- मणिमाला: रुद्राक्ष, तुलसी, शंख, कमल-बीज, मोती, स्फटिक, मूँगा, चाँदी, चन्दन, कुश-मूल के दाने। शैव और शाक्त के लिए रुद्राक्ष, वैष्णव के लिए तुलसी उत्तम।
माला के नियम: एक चीज़ की माला में दूसरी न मिलाएँ; दाने बराबर हों; एक सौ आठ दानों की माला हर जप में चलती है; सूत तिगुना करके फिर तिगुना; हर दाना पिरोते समय प्रणव के साथ एक-एक अक्षर बोलें; संस्कार के लिए पीपल के नौ पत्ते अष्टदल कमल की तरह रखकर माला को पंचगव्य से नहलाते, जल से धोते और शिव के चार मुखों के मन्त्रों से चन्दन, धूप और लेप करते हैं। वर्जित: बाएँ हाथ से गिनना, दिखाते फिरना, जहाँ-तहाँ रख देना।
मुद्राएँ। पाठ में मुद्रा वह क्रिया है जिसमें आसन, प्राणायाम, धारणा और ध्यान सब मिले हैं। एक योग-ग्रन्थ के अनुसार पच्चीस हैं: महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डीयान, जालन्धर, मूलबन्ध, महाबन्ध, महावेध, खेचरी, विपरीतकरणी, योनि, वज्रोली, शक्तिचालिनी, ताड़ागी, माण्डवी, शाम्भवी, अधोधारणा, आम्भसी, वैश्वानरी, वायवी, नभोधारणा, अश्विनी, पाशिनी, काकी, मातंगी, भुजंगिनी। दूसरे ग्रन्थ में दस: महामुद्रा, महाबन्ध, महाभेद, खेचरी, जालन्धरबन्ध, मूलबन्ध, विपरीतकरणी, उड्डीयान, वज्रोली, शक्तिचालन। चार का स्वरूप: महामुद्रा (बायाँ टखना मूलाधार पर, दायाँ पैर फैलाकर पकड़ना, ठुड्डी छाती पर, कुम्भक); विपरीतकरणी (सिर टिकाकर पैर ऊपर); योनिमुद्रा (अँगूठों से कान, तर्जनियों से आँखें, मध्यमाओं से नासिका, अनामिकाओं से मुख बन्द); शाम्भवी (भौंहों के बीच दृष्टि, ध्यान)। पाठ का नियम: अनुभवी गुरु से सीखें।
कड़ी: माला और मुद्राएँ देख लीं → अब हर साधक का सबसे बड़ा सवाल: उद्देश्य, तड़प और गोपनीयता।
सातवीं सीढ़ी: उपासना का रहस्य
पाठ कहता है कि मनुष्य अपनी प्रकृति से उद्देश्य तय करता है, पर उपासना उसे कई बार कहीं और ले जाती है, और असफल होने पर वह दूसरों को दोष देता है। संसार के सारे उद्देश्य चार में आते हैं: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
श्लोक 7 · काम की सिद्धि के पाँच कारण
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥
हिन्दी अर्थ
आधार (जगह), करने वाला, साधन, अलग-अलग प्रयत्न और पाँचवाँ दैव (अनुकूलता)।
आज के जीवन में
दैव के बिना पहले चार बेकार हो जाते हैं, और जो "सब मैं ही करता हूँ" मान बैठे, उसे पाठ दुर्मति कहता है। आज इसका उपयोग यह है: मेहनत पूरी कीजिए, पर नतीजे को मुट्ठी में समझने का घमण्ड मत पालिए।
श्लोक 8 · इच्छा आग की तरह
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥
हिन्दी अर्थ
कामनाओं के भोग से कामना कभी शान्त नहीं होती; जैसे आग में घी डालने से वह और बढ़ती है।
आज के जीवन में
पाठ यह बात ययाति के मुँह से कहलाता है। आज इसका उपयोग यह है: इच्छाओं का हल उन्हें खिलाना नहीं, समझना है।
साधना तीन रंग की है: सात्त्विक (आध्यात्मिक वातावरण में पलती है), राजसी (कभी मुरझाती, कभी खिलती) और तामसी (देखने में सबसे अच्छी, पर सबसे बुरी)। पाठ तड़प की कहानी देता है: शिष्य ने गुरु से पूछा, ईश्वर कैसे मिलते हैं? नदी में गुरु ने उसका सिर पानी में दबा दिया। छूटकर शिष्य बोला, डूबते समय सिर्फ़ बाहर निकलने की इच्छा थी। गुरु ने कहा, ईश्वर के लिए ऐसी ही तड़प हो तो वे मिलते हैं। साथ ही एकवृत्ति: तीर, धनुर्धर और निशाना एक सीध में।
श्लोक 9 · गोपनीयता का मूल्य
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः।
त्वयापि गोपितव्यं हि न देयं यस्य कस्यचित्॥
हिन्दी अर्थ
इसे बड़े प्रयत्न से गुप्त रखो, गुप्त रखो, गुप्त रखो। तुम भी इसे गुप्त रखना, और जिस-तिस को मत देना।
आज के जीवन में
कारण पाठ ने खोलकर गिनाए हैं: प्रकट होने पर यश आता है, यश से सम्मान, सम्मान से राग और अहंकार, फिर क्रोध। कामना लेकर आए लोगों को आशीर्वाद देने पर फल साधना में से कटता है। भेंट का अन्न खाने पर पाठ के अनुसार जप का आधा फल देने वाले को जाता है। स्वप्न और अनुभव बता देने पर फिर दिखते नहीं। आज इसका उपयोग यह है: अपनी साधना या सेवा का प्रदर्शन न करें: "बायाँ हाथ न जाने कि दायाँ क्या कर रहा है।"
कड़ी: उपासना के नियम खुल गए → अब आख़िरी हिस्सा: सिद्धियाँ क्या हैं और परम सिद्धि क्या है।
आठवीं सीढ़ी: सिद्धियों का स्वरूप
पाठ कहता है कि सिद्धियों की निश्चित संख्या नहीं जानी जा सकती; वे जल की तरंगों जैसी हैं। फिर भी तीन श्रेणियाँ हैं:
- आठ महासिद्धियाँ: अणिमा (परमाणु-सा छोटा), महिमा (जितना चाहे बड़ा), लघिमा (रुई-सा हल्का), प्राप्ति, प्राकाम्य (अदृश्य का ज्ञान), ईशिता, वशिता (भोगों में अनासक्ति) और ख्याति। ये ईश्वर में स्वाभाविक हैं, औरों को कठिन प्रयास से मिलती हैं।
- दस गौण: अनूर्मि (भूख-प्यास, शोक-मोह, बुढ़ापा-मृत्यु की लहरों से परे), दूरश्रवण, दूरदर्शन, मनोजव, कामरूप, परकाया-प्रवेश, इच्छा-मृत्यु, देवक्रीड़ा-दर्शन, यथासंकल्प-संसिद्धि और अप्रतिहत गति व आज्ञा।
- पाँच क्षुद्र: त्रिकालज्ञता, अद्वन्द्व (सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख के वश में न होना), परचित्ताभिज्ञता, प्रतिष्टम्भ (अग्नि, जल, शस्त्र, विष, सूर्य-ताप का असर न होना) और अपराजय।
सिद्धि पाँच रास्तों से आती है: जन्म से (मछली का तैरना, पक्षी का उड़ना, हंस का नीर-क्षीर विवेक), औषधि से, मन्त्र से, तप से और योगाभ्यास से। सबका भण्डार योगधारणा है।
श्लोक 10 · जिसने इन्द्रियाँ जीत लीं
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुने।
मद्धारणां धारयतः का सा सिद्धिः सुदुर्लभा॥
हिन्दी अर्थ
जिसने इन्द्रियाँ जीती हैं, जो संयमी है, जिसने साँस और मन को जीता है और जो मुझमें धारणा रखता है, उसके लिए कौन-सी सिद्धि दुर्लभ है?
आज के जीवन में
सब सिद्धियाँ ऐसे व्यक्ति की दासियाँ बनकर रहती हैं, पर वह इनका स्वार्थ में प्रयोग न करे।
श्लोक 11 · परमानन्द की ओर
निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः।
परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते॥
हिन्दी अर्थ
निर्गुण ब्रह्म में निर्मल मन लगाने वाला परमानन्द पाता है, जहाँ कामना का अन्त हो जाता है।
आज के जीवन में
आनन्द के तीन दर्जे हैं: इन्द्रियों का (पशु का), मन का (मनुष्य का) और बुद्धि से परे का (सन्त-भक्त का)। बड़ी सिद्धियों से मिला आनन्द शाश्वत नहीं; ऐसे योगी को पाठ कच्चा कहता है। यहीं शिव रावण से कहते हैं: "हे रावण, सुनो! जब तक परमानन्द नहीं मिलता, लाख उपाय करने पर भी काम की निवृत्ति नहीं होती।" यह वाक्य रावण की अपनी कथा पर भी लागू होता है।
ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध
बड़े पद पर साधन भी होते हैं और खुशामदी भी, इसलिए गोपनीयता, गुरु का आदर और संयम उसके लिए और ज़रूरी हैं। रावण के पास तप भी था और बल भी; पाठ के शब्दों में उसने तंत्र का मायिक पक्ष साधा और सबसे ऊँची भूमि से भटक गया। जो नेता, अफ़सर या घर का मुखिया है, उसके लिए सीख यही है: यश और सिद्धि सेवा के लिए लें, अहंकार के लिए नहीं।
इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)
- भक्ति नींव है। कामना और दिखावा हटते हैं तो भाव जागता है।
- जप तीन स्तर का है: बोलकर, होंठों में, मन में; हर स्तर पर इष्ट का चिन्तन।
- मन्त्र को शब्द नहीं, शक्ति मानिए; अर्थ जानिए, उच्चारण साफ़ रखिए।
- माला गिनती देती है और मन को लौटा लाती है।
- सिद्धि से बड़ी चीज़ संयम और परमानन्द है।
7 दिन का अभ्यास
- दिन 1: आज के सबसे जल्दबाज़ी वाले काम में पाँच कारण (जगह, करने वाला, साधन, प्रयत्न, दैव) लिखिए और कमज़ोर कड़ी देखिए।
- दिन 2: अपना नाम-जप तीनों स्तर पर कीजिए: दो मिनट बोलकर, दो मिनट होंठों में, दो मिनट मन में।
- दिन 3: अपने जप या पाठ का शब्द-अर्थ लिखिए और उसे लेकर पाँच मिनट बैठिए।
- दिन 4: माला साफ़ कपड़े में रखिए और 108 दाने सुमेरु पार किए बिना घुमाइए।
- दिन 5: आज अपना कोई अच्छा काम किसी को न बताइए।
- दिन 6: अपने शिक्षक या गुरु को धन्यवाद का संदेश दीजिए।
- दिन 7: पाँच मिनट मौन में बैठकर भौंहों के बीच ध्यान टिकाइए।
यही बात और जगह कैसे समझाई गई है
- मन्त्र का अनुशासनपाँचवाँ अध्याय: संकल्प, साफ़ आसन, बारह नियम।
- शिव-उपासनाग्यारहवाँ अध्याय: पंचाक्षर और पंचावरण।
- भक्ति योगभक्ति के प्रकार और भक्त के लक्षण।
- गुरु, दीक्षा और मन्त्रगुरु-कृपा का महत्त्व।
- मन्त्र-साधनाजप की विधि का दूसरा दृष्टिकोण।
- ध्यान योगआसन, साँस और मन की स्थिरता।
घर में पूजा या ध्यान का स्थान किस दिशा में हो, यह जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।
और रहस्य: जो इस अध्याय में छिपे हैं
रहस्य 1: पहले मुँह की सफ़ाई
पाठ के अनुसार जप से ठीक पहले मुखशोधन होता है, क्योंकि जीभ पर भोजन, झूठ और झगड़े का मैल रहता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: बैठने से पहले वाणी को शान्त करना ज़रूरी है। जैसे तेज़ बहस के तुरन्त बाद ध्यान लगाने बैठें तो मन उसी बहस में घूमता है, इसलिए बीच में दस साँसें और पानी का एक घूँट रखिए।
रहस्य 2: यश की फिसलन
पाठ ने गोपनीयता के कारण गिनाए हैं: प्रकट होने पर यश, यश से सम्मान, सम्मान से अहंकार और फिर क्रोध। हमारा पाठ-निष्कर्ष: दिखाने से अभ्यास की जड़ कमज़ोर होती है। जैसे रोज़ की सैर को सबको दिखाने लगें, तो सैर लाइक के लिए होने लगती है, सेहत के लिए नहीं।
रहस्य 3: असफलता की पाँच जाँचें
पाठ में किसी काम के पाँच कारण हैं: जगह, करने वाला, साधन, प्रयत्न और अनुकूलता। साथ में चेतावनी है कि असफल होने पर आदमी दूसरों को दोष देता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: पाँचों को एक-एक करके जाँचिए। जैसे बिक्री गिरे तो पूछिए: दुकान की जगह ठीक है? मैं ठीक हूँ? सामान ठीक है? मेहनत पूरी है? मौसम और बाज़ार साथ हैं?
रहस्य 4: सब कुछ एक जगह
पाठ के एक वचन में पूछा गया है कि मन एक जगह, शिव दूसरी, शक्ति तीसरी और प्राण चौथी जगह हो तो सिद्धि कैसे? हमारा पाठ-निष्कर्ष: शरीर, साँस, मन और इरादा एक ही काम पर हों। जैसे खाना खाते समय फोन देखते रहने से न स्वाद मिलता है, न पेट भरने का एहसास।
रहस्य 5: असली संकेत व्यवहार में दिखते हैं
पाठ ने भाव के नौ अंकुर गिनाए हैं, जिनमें हानि-निन्दा में भी न डोलना, समय न गँवाना और अभिमान का न रहना हैं। यह भी कहा कि ऐसे लक्षण कभी कर्मियों में परछाईं की तरह दिखते हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: भीतर की मिठास से नहीं, आचरण से परखिए। जैसे कोई सप्ताह भर में आलोचना सुनकर चिढ़ा नहीं, यही असली संकेत है।
रहस्य 6: कोई अंग छूटे तो मूल बढ़ाइए
पाठ में अनुष्ठान के कई अंग हैं और कहा गया है कि जो अंग न हो सके, उसकी जगह और जप करें। हमारा पाठ-निष्कर्ष: साधन कम पड़े तो छोड़ें नहीं, मूल को थोड़ा गहरा करें। जैसे व्यायाम का समय न मिला तो उस दिन पैदल चलना थोड़ा लम्बा कर लेना।
रहस्य 7: तीन झूठी पहचानें
पाठ के अनुसार बन्धन के तीन मल हैं: "मैं अधूरा हूँ", "मैं मोटा या दुबला हूँ" और "मैं ही करने वाला हूँ"। हमारा पाठ-निष्कर्ष: ये तीनों सोच रुकावट बनती हैं। जैसे "मैं गणित में कमज़ोर ही हूँ" कह देने के बाद कोशिश ही बन्द हो जाती है।
आसान रास्ता: कोई भी कैसे करे
- बैठने से पहले दस साँसें और एक घूँट पानी। दो मिनट। बहस या फोन के बाद का शोर अक्सर घट जाता है।
- एक शुभ शब्द चुनिए जिसका अर्थ आपको पता हो। जैसे "शान्ति" या घर में चलने वाला कोई नाम। अर्थ पर आधा मिनट सोचिए। जप तब सूखा नहीं लगता।
- पाँच मिनट सिर्फ़ यही कीजिए। सीधे बैठें, साँस धीमी, ध्यान शब्द पर। फोन दूसरे कमरे में। पहले हफ़्ते मन भागेगा; हर बार लौट आना ही अभ्यास है।
- इक्कीस दिन किसी को मत बताइए। न पोस्ट, न चर्चा। कुछ खर्च नहीं। प्रेरणा अपनी रहती है।
- रविवार को पाँच प्रश्न पूछिए। जगह, मैं, साधन, प्रयत्न, अनुकूलता। पाँच मिनट। गलती प्रायः एक जगह पकड़ में आती है।
- तीन असली संकेत गिनिए। क्या मैं आलोचना में स्थिर रहा, समय कम गँवाया, घमण्ड कम किया? एक से पाँच तक अंक दीजिए। हफ़्ते-दर-हफ़्ते धीमा सुधार दिख सकता है।
- छूटे दिन की भरपाई अगले दिन थोड़ी लम्बी बैठक से। पर दो मिनट से ज़्यादा नहीं बढ़ाइए। नियम टूटता नहीं।
सबसे आम ग़लती
अनुभव और शक्तियों के पीछे दौड़ना, या शरीर-शुद्धि की कठिन क्रियाएँ वीडियो देखकर करना। पाठ खुद कहता है कि ये अनुभवी गुरु से ही सीखी जाएँ। इस अध्याय की साधना केवल अपने मन को स्थिर करने के लिए है, किसी दूसरे पर असर डालने के लिए नहीं।
आज की स्व-जाँच (2 मिनट)
- क्या आज मैंने कोई अभ्यास दिखाने के लिए किया?
- क्या आज मेरा जप या पाठ मुँह से आगे मन तक पहुँचा?
जितने सवालों पर आप खरे उतरे, उतना आपने भीतर झाँका। बाक़ी अगले सप्ताह की कोशिश बनाइए।
आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)
- अध्याय 1 से 12: गुरु, शान्ति, वश्य, स्तम्भन, जप, औषधि-ज्ञान, बच्चों की देखभाल और शिव-उपासना। (पढ़ चुके)
- अध्याय 13: तंत्र-मंत्र साधना का आधार। (आप अभी यहाँ हैं)
- आगे: ज्योतिष के विशेष योग, और फिर रावण के पूरे जीवन की सीख।
पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।
अगले अध्याय में: ज्योतिष के विशेष योग। नक्षत्र, राशि, नौ ग्रह, लग्न के बारह भाव, महादशा और पाठ में गिनाए गए योगों की सूची।
यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। मुद्रा और योग-क्रिया जैसे अभ्यास किसी अनुभवी गुरु के साथ ही सीखें।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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