रावण विद्या अध्याय 11 — शिव-उपासना (भाग 1): पंचाक्षर मन्त्र, पाँच आवरणों का पूजन और शिवज्ञान
अध्याय ग्यारह
रावण की सबसे गहरी पहचान शिवभक्त की है। यह अध्याय उसी भक्ति की विधि खोलता है: क्या जपना है, कितना जपना है, कैसे पूजना है और अन्त में क्या मिलता है।
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पाँचवें अध्याय में हमने मन्त्र का अनुशासन देखा: जप कैसे, कितना और किस मन से हो। अब वही अनुशासन उस मन्त्र पर लगता है जिसके पाँच अक्षरों से पाठ के अनुसार भोग और मोक्ष दोनों सधते हैं: नमः शिवाय। यह भाग शिव-उपासना का पहला हिस्सा है। इसमें गुरु शुक्राचार्य रावण को पूजा का क्रम बताते हैं, और आगे का स्तोत्र-भाग अगले अध्याय में आएगा।
इस अध्याय में क्या-क्या मिलेगा
- पाँच कृत्य: सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह, और उनके पाँच मुख।
- ओंकार और पंचाक्षर: अर्थ, जप की संख्याएँ, पुरश्चरण, लिंग-स्थापना और पार्थिव पूजन।
- तीन शिवयोगी: क्रियायोगी, तपोयोगी और जपयोगी।
- पाँच आवरणों का पूजन: कमल, पाँच मुख, हर आवरण के देवता और भोग।
- शिवज्ञान: कर्म-लोक और ज्ञान-लोक का भेद, और मुक्ति का अर्थ।
पिछले अध्यायों की याद
शान्ति, ठहराव, जप का अनुशासन, शिव में स्थिरता
जप का नियम, संख्या और शुद्धि वहीं टिकती है जहाँ मन पहले से तैयार हो। पाँचवाँ अध्याय फिर से पढ़ें।
कुछ शब्द, जो इस अध्याय में आएँगे
- प्रणव — ओंकार। पंचाक्षर — पाँच अक्षरों वाला “नमः शिवाय”।
- पुरश्चरण — किसी मन्त्र को सिद्ध करने के लिए तय संख्या में जप, होम और दान का अनुष्ठान।
- आवरण — देवता के चारों ओर परतों में बना पूजन-घेरा।
- चरु — पकाया हुआ भोग। आढक — लगभग चार सेर का तौल।
पहली सीढ़ी: शिव के पाँच कृत्य और पाँच मुख
ब्रह्मा और विष्णु ने शिव से पूछा कि सृष्टि आदि पाँच कृत्य क्या हैं। उत्तर में शिव ने बताया: सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह। संसार की रचना का आरम्भ सृष्टि है। उसका सुस्थिर रहना स्थिति है। उसका विनाश संहार है। प्राणों का उत्क्रमण तिरोभाव है। और इन सबसे छूट जाना ही अनुग्रह है, यानी मोक्ष का कारण। चार कृत्य संसार को फैलाते हैं, पाँचवाँ उससे बाहर निकालता है।
भक्त इन पाँचों को पाँच भूतों में देखते हैं: सृष्टि पृथ्वी में, स्थिति जल में, संहार अग्नि में, तिरोभाव वायु में और अनुग्रह आकाश में। इन कृत्यों का भार उठाने के लिए शिव के पाँच मुख हैं, चार दिशाओं में चार और बीच में पाँचवाँ। ब्रह्मा और विष्णु को सृष्टि और स्थिति मिलीं, रुद्र और महेश्वर को संहार और तिरोभाव, और अनुग्रह को कोई दूसरा नहीं पा सकता।
श्लोक 1 · पाँच मुख, पाँच नाम
शुद्धस्फटिकसंकाशमीशानाख्यं सदाशिवम्।
बालसूर्यप्रतीकाशं पुरुषाख्यं पुरातनम्॥
हिन्दी अर्थ
शुद्ध स्फटिक के समान उजला मुख ईशान कहलाता है। बाल-सूर्य के समान अरुण पूर्व का मुख पुरुष (तत्पुरुष) कहलाता है।
आज के जीवन में
अञ्जन के समान श्याम दक्षिण मुख को अघोर कहा गया है। कुंकुम के समान लाल उत्तर मुख वामदेव है। शंख, कुन्द और चन्द्रमा के समान उजला पश्चिम मुख सद्योजात है। पाँच दिशाएँ, पाँच रंग, पाँच तत्त्व: एक ही शिव पाँच रूपों में पूरी सृष्टि को थामे हैं। पाँच दिशाओं में ध्यान लगाने वाला अपना मन चारों ओर फैलाना सीखता है।
श्लोक 2 · पाँच मुख का वर्णन
पञ्चवक्त्रो दशभुजः शुद्धस्फटिकसन्निभः।
वर्णब्रह्मकलादेहो देवः सकलनिष्कलः॥
हिन्दी अर्थ
पाँच मुख, दस भुजाएँ, शुद्ध स्फटिक जैसी आभा वाले, वर्णमाला और पाँच कलाओं का जिनका शरीर है, वे देव सकल भी हैं और निष्कल भी।
पाठ के अनुसार
दाएँ हाथों में शूल, परशु, वज्र, खड्ग और अग्नि हैं। बाएँ हाथों में नाग, बाण, घण्टा, पाश और अंकुश। पैरों से घुटनों तक का भाग निवृत्ति कला का है, नाभि तक प्रतिष्ठा कला का, कण्ठ तक विद्या कला का, ललाट तक शान्ति कला का और उसके ऊपर शान्त्यतीत कला का।
कड़ी: पाँच मुख समझ आए → अब उस एक अक्षर की बात, जिससे पंचाक्षर निकला: ओंकार।
दूसरी सीढ़ी: ओंकार से पंचाक्षर तक
शिव कहते हैं कि सबसे पहले उनके मुख से ओंकार प्रकट हुआ। ओंकार वाचक है और शिव वाच्य। उत्तर मुख से अकार, पश्चिम से उकार, दक्षिण से मकार, पूर्व से बिन्दु और मध्य मुख से नाद प्रकट हुए। पाँच अंगों से बना यह एक अक्षर “ओम्” है। इसी से पंचाक्षर निकला, जो शिव के सगुण रूप का बोध कराता है। पाठ कहता है कि पंचाक्षर से पाँच-पाँच वर्णों के पाँच वर्ग, स्वर और गायत्री, और गायत्री से वेद प्रकट हुए। करोड़ों मन्त्रों से अलग-अलग काम सधते हैं, पर प्रणव और पंचाक्षर से हर मनोरथ सधता है।
“प्रणव” शब्द का अर्थ: “प्र” यानी प्रकृति से उत्पन्न संसार-सागर, और “नव” यानी नाव। प्रणव उस सागर को पार कराने की नाव है। दूसरा अर्थ: “प्र” प्रपंच, “न” नहीं, यानी जपने वाले के लिए प्रपंच नहीं रहता।
प्रणव के भेद: एक अक्षर वाला ओम् सूक्ष्म है और पाँच अक्षर वाला नमः शिवाय स्थूल। सूक्ष्म के भी दो रूप हैं: अ, उ और म वाला ह्रस्व, जिसमें अ शिव है, उ शक्ति है और म दोनों की एकता; और बिन्दु, नाद, शब्द, काल और कला वाला दीर्घ, जो योगियों के हृदय में रहता है। पाठ के अनुसार जो भोग की आशा से कर्म करता है, वह ह्रस्व जपे, और निष्काम व्यक्ति दीर्घ जपे।
श्लोक 3 · पंचाक्षर और उसका स्वरूप
नमः शिवाय शान्ताय नमः शिवतराय ते।
नमः परमदेवाय नमः परमहेतवे॥
हिन्दी अर्थ
शान्त शिव को नमस्कार, शिव से भी अधिक कल्याणकारी को नमस्कार, परम देव को नमस्कार, परम कारण को नमस्कार।
आज के जीवन में
“नमः” के बाद चतुर्थी में “शिव” आए तो पंचतत्त्वमय “नमः शिवाय” बनता है। यही स्थूल प्रणव है, और इसके आदि में ओंकार लगाकर जपना चाहिए। इससे सीख यह है कि मन्त्र के साथ उसका अर्थ भी साथ चले। पाठ कहता है कि जो अर्थ का अनुसन्धान किए बिना केवल जप करता है, उसे भी योग मिलता है, पर अर्थ के साथ जप ज़्यादा गहरा बैठता है।
जप की संख्याएँ और समय (पाठ के अनुसार)
- रोज़ का जप: दस हज़ार, या दोनों सन्ध्याओं में एक-एक हज़ार।
- रीति: समाधि में मानसिक जप, बाक़ी समय उपांशु (होंठ हिलें, आवाज़ न निकले)।
- करोड़ की गिनती: एक, दो, तीन और चार करोड़ पर क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश्वर का पद; पाँच करोड़ पर सदाशिव के समान।
- दस लाख: एक हज़ार दिन तक रोज़ एक हज़ार जप और रोज़ भोजन-दान, तब अभीष्ट सधने लगता है।
- तत्त्व-विजय की गिनती: प्रणव नौ-नौ करोड़ बार: पहले शुद्धि, फिर पाँच भूतों, पाँच तन्मात्राओं और अहंकार पर जय, कुल एक सौ आठ करोड़।
- पुण्य तिथियाँ: आर्द्रा की चतुर्दशी का प्रणव-जप अक्षय फल देता है; सूर्य की संक्रान्ति पर महा-आर्द्रा में किया जप करोड़ गुना।
- दर्शन का समय: प्रातः और मध्याह्न से पहले; चतुर्दशी निशीथ या प्रदोष में।
कड़ी: संख्या और समय साफ़ हुए → अब पाठ का पूरा पुरश्चरण-क्रम, पाँच लाख जप का।
तीसरी सीढ़ी: पाँच लाख का पुरश्चरण
गुरु के मुख से पंचाक्षर पाकर साधक सुखद स्थान पर जप शुरू करे। पाठ में समय बताया है: माघ और भाद्रपद के महीने श्रेष्ठ हैं; शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तक लगातार जप। नियम: दिन में एक बार भोजन, मौन, इन्द्रियों पर संयम, और माता-पिता तथा स्वामी की सेवा। हृदय या सूर्य-मण्डल में पहले मानसिक पूजा, फिर पूर्वमुख होकर जप।
पाठ के अनुसार कुल पाँच लाख जप होता है और समाप्ति कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की सुबह। उस दिन बारह हज़ार जप, फिर पाँच शिवभक्त दम्पति और एक आचार्य का वरण: पाँचों ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात के रूप में, आचार्य शिव के रूप में। फिर कपिला गाय के घी से ग्यारह, एक सौ एक या एक हज़ार एक आहुतियों का होम, गुरु को दक्षिणा, सबके चरण धोकर चरणोदक सिर पर, दशांश अन्न, रुद्राक्ष, वस्त्र और भरपूर भोजन। इतने से मन्त्र सिद्ध माना गया है; आगे हर पाँच लाख पर ऊँचे फल, और बीच में अनुष्ठान टूटे तो अगले जन्म में पूरा होता है।
श्लोक 4 · ध्यान का श्लोक
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
हिन्दी अर्थ
रोज़ महेश का ध्यान करे: चाँदी के पर्वत जैसे गौर, सुन्दर चन्द्र-मुकुट वाले, रत्नों से चमकते अंगों वाले, हाथों में परशु, मृग, वर और अभय लिए, प्रसन्न, कमल पर बैठे, देवगणों से घिरे, बाघम्बर पहने, विश्व के आदि और बीज, सब भय हरने वाले, पाँच मुख और तीन नेत्रों वाले।
आज के जीवन में
ध्यान-श्लोक का काम है मन को एक तस्वीर पर टिकाना। यहाँ तस्वीर में वर और अभय, दोनों हैं: देने वाला हाथ और डर हटाने वाला हाथ। जप शुरू करने से पहले एक मिनट इस तस्वीर को देखिए, फिर जप कीजिए। पाँचवें अध्याय का अनुशासन यहीं काम आता है।
कड़ी: जप की रीति पूरी हुई → अब स्थान और प्रतिमा: लिंग कैसे स्थापित होता है।
चौथी सीढ़ी: लिंग-स्थापना, पार्थिव पूजन और अग्नि-कार्य
शुक्राचार्य रावण को लिंग-स्थापना का क्रम बताते हैं। शुभ समय और नक्षत्र देखकर पवित्र स्थान या नदी-तट पर, जहाँ रोज़ पूजा हो सके, उत्तम लक्षणों वाला लिंग बने। चल प्रतिष्ठा के लिए छोटा, अचल के लिए स्थूल। पीठ गोल, चौकोर, त्रिकोण या खाट के पाए जैसी (ऊपर-नीचे मोटी, बीच में पतली), और लिंग-पीठ एक ही द्रव्य के। लिंग की ऊँचाई यजमान की बारह अंगुल हो; कम हो तो फल कम, अधिक हो तो दोष नहीं। गर्भगृह दर्पण-सा स्वच्छ, पूर्व-पश्चिम में दो द्वार। स्थापना पर सद्योजात से ईशान तक पाँच मन्त्र, गड्ढे में सोना और नौ रत्न, और ओंकार के साथ लिंग-पीठ का जोड़। मूर्ति (वेर) पंचाक्षर से प्रतिष्ठित हो।
दो प्रकार के लिंग: पाठ के अनुसार वृक्ष-लता स्थावर लिंग हैं और कृमि-कीट जंगम लिंग। स्थावर की सेवा सींचने से और जंगम की सेवा आहार-जल से हो। जीवों को सुख पहुँचाना ही शिव का पूजन है।
सोलह उपचार: आह्वान, आसन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती, नमस्कार और विसर्जन। मिट्टी, आटे, गोबर, फूल, फल, गुड़, मक्खन, भस्म या अन्न से भी लिंग बन सकता है।
श्लोक 5 · आठ नाम, आठ क्रियाएँ
हरो महेश्वरः शम्भुः शूलपाणिः पिनाकधृक्।
शिवः पशुपतिश्चैव महादेव इति क्रमात्॥
हिन्दी अर्थ
हर, महेश्वर, शम्भु, शूलपाणि, पिनाकधृक, शिव, पशुपति और महादेव, ये क्रम से शिव के आठ नाम हैं।
पार्थिव पूजन का क्रम
पाठ के अनुसार हर नाम से एक क्रिया जुड़ती है। “ॐ हराय नमः” से मिट्टी लाएँ। “महेश्वराय नमः” से लिंग बनाएँ। “शम्भवे नमः” से प्रतिष्ठा करें। “शूलपाणये नमः” से आह्वान। “पिनाकधृषे नमः” से स्नान। “शिवाय नमः” से पूजन। “पशुपतये नमः” से क्षमा-प्रार्थना। और “महादेवाय नमः” से विसर्जन। मिट्टी का रंग वर्ण के अनुसार बताया गया है; पर जहाँ जो मिट्टी मिल जाए, उसी से लिंग बन सकता है। पूजा से पहले स्नान, सन्ध्या, तर्पण, भस्म और रुद्राक्ष धारण करें।
श्लोक 6 · क्षमा की प्रार्थना
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर॥
हिन्दी अर्थ
अनजाने में या जानकर मैंने जो भी जप और पूजा की हो, हे शंकर, आपकी कृपा से वह सफल हो।
आज के जीवन में
इसी प्रार्थना में आगे आता है: वेदों, ऋषियों और शास्त्रों ने भी आपको पूरा नहीं जाना, फिर मैं कैसे जानूँ; जैसा हूँ, पूरे भाव से आपका हूँ, मेरी रक्षा कीजिए। पूजा की सबसे छोटी बात यही है: जो कर पाए, उसे पूरे मन से अर्पित कर देना। कमी की चिन्ता में पूजा न छोड़ें।
अग्नि-कार्य: कुण्ड या वेदी एक-दो हाथ की (एक हाथ चौबीस अंगुल), कुण्ड में अष्टदल कमल और मेखलाएँ। अग्नि की सात जिह्वाएँ हैं: बहुरूपा (बीच की, तीन शिखाओं वाली), हिरण्या, कनका, रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा और मरुत। समिधा पलाश या गूलर की, बारह अंगुल लम्बी, सीधी और बिना टूटी। घी की धारा दूर्वा-दल जैसी पतली और चार अंगुल लम्बी, अन्न का ग्रास सोलह माशे का। स्रुक-स्रुवा धातु या यज्ञ-काष्ठ के हों, कांसे, लोहे या सीसे के नहीं।
भस्म: कपिला गाय का वह गोबर, जो गिरते समय हाथों पर रोक लिया गया हो, उत्तम है। उसका पिण्ड शिवाग्नि में पकाकर श्वेत भस्म बनाई जाए और धन की तरह सुन्दर पात्र में रखी जाए। अपवित्र के हाथ में न दी जाए, और शास्त्रोक्त समय पर मन्त्र के साथ ललाट पर लगाई जाए।
कड़ी: स्थापना और अग्नि-कार्य का ढाँचा देख लिया → अब तीन प्रकार के शिवयोगी, फिर पाँच आवरणों का पूजन।
पाँचवीं सीढ़ी: तीन शिवयोगी
पाठ में क्रिया, तप और जप के योग से तीन तरह के शिवयोगी गिनाए गए हैं।
- क्रियायोगी: जो धन से पूजा की सामग्री जुटाकर हाथ-पैर आदि अंगों से नमस्कार और सेवा की क्रियाएँ करते हुए इष्टदेव की पूजा में लगा रहता है।
- तपोयोगी: जो पूजा में लगा रहकर परिमित भोजन करता है, बाहरी इन्द्रियों और मन को वश में रखता है और दूसरों से द्रोह से दूर रहता है।
- जपयोगी: जो इन गुणों के साथ, काम आदि दोषों से रहित, शान्त चित्त से निरन्तर जप करता है।
जो सोलह उपचारों से ऐसे शिवयोगियों की पूजा करता है, वह शुद्ध होकर उत्तरोत्तर श्रेष्ठ मुक्ति पाता है। शिवभक्तों का पूजन भी शिव का पूजन है: पाँच लाख जप के बाद महाभिषेक, नैवेद्य और पाँच, दस या सौ भक्त दम्पतियों को भोजन, क्योंकि पाठ के अनुसार भक्त और शिव में भेद नहीं।
छठी सीढ़ी: पाँच आवरणों का पूजन
रावण के अपने शब्दों में इस विधि को योगेश्वर नामक योग कहा गया है। पाठ का वचन है कि इससे बड़ा योग नहीं, पर किसी क्षुद्र फल के लिए इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि महान से लघु फल चाहने वाला स्वयं लघुतर हो जाता है। जो रोज़ पवित्र होकर स्तोत्र पढ़े, उसे अभीष्ट का आठवाँ अंश मिलता है; जो अर्थ समझकर पूर्णिमा, अष्टमी या चतुर्दशी को उपवास के साथ एक मास पाठ करे, उसे पूरा।
आधार: पूजा-स्थान परखी हुई भूमि पर, ऊपर चँदोवा, दर्पण जैसा लिपा-पुता। वहाँ रत्न या सोने के चूर्ण से कर्णिका सहित अष्टदल कमल: आठ दलों में आठ सिद्धियाँ और आठ रुद्र, कर्णिका में वैराग्य, कन्द में धर्म, नाल में ज्ञान, ऊपर अग्नि, सूर्य और चन्द्र के मण्डल। उस पर माता पार्वती के साथ शिव, जिनका पूर्व मुख प्रातः-सूर्य जैसा, दक्षिण नील मेघ जैसा, उत्तर मूँगे जैसा, पश्चिम पूर्ण चन्द्र जैसा और पाँचवाँ स्फटिक जैसा उजला है।
श्लोक 7 · आवरण-स्तुति का आरम्भ
जय जय जगदेकनाथ शम्भो प्रकृतिमनोहर नित्यचित्स्वभाव।
अतिगतकलुषप्रपञ्चवाचामपि मनसां पदवीमतीततत्त्वम्॥
हिन्दी अर्थ
जय हो, जगत के एकमात्र नाथ शम्भु की, जो प्रकृति में भी मनोहर हैं और नित्य चेतन-स्वभाव हैं। जिनका तत्त्व मन और वाणी की पहुँच से भी परे है।
आज के जीवन में
स्तुति के सत्तासी श्लोक हैं, जिनमें हर आवरण के देवता का नाम लेकर कहा गया है कि शिव-शिवा की आज्ञा से वे मुझे वांछित दें। जो माँग रहा हूँ, वह भी उनके शासन से ही मिलेगा। इस सोच से अहंकार घटता है और कृतज्ञता बढ़ती है।
पाँच आवरण (पाठ के अनुसार)
- पहला: गणेश और कार्तिकेय शिव-शिवा के दाएँ-बाएँ; चारों ओर ईशान आदि पाँच ब्रह्म-मूर्तियाँ शक्ति सहित; छह अंग (हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र)।
- दूसरा: आठ विद्येश्वर, यानी अनन्त, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ और शिखण्डी, आठ दिशाओं में।
- तीसरा: आठ मूर्तियाँ (भव, शर्व, ईशान, रुद्र, पशुपति, उग्र, भीम, महादेव) और ग्यारह मूर्तियाँ; वृषभराज, नन्दीश्वर, महाकाल, शास्ता, मातृकाएँ, गणेश, कार्तिकेय, गौरी, चण्ड, भृंगीश, वीरभद्र और दुर्गा; रुद्रगण, प्रमथगण और पार्वती की सखियाँ।
- चौथा: पूर्व में सूर्य, दक्षिण में ब्रह्मा, पश्चिम में रुद्र और उत्तर में विष्णु, हर एक के अपने आवरण। सूर्य के साथ आदित्य और ग्रह (या बारह आदित्य और बारह राशियाँ), ब्रह्मा के साथ सनकादि, ग्यारह प्रजापति और चारों वेद, विष्णु के साथ वासुदेव आदि चार व्यूह, अवतार, चक्र, शंख और धनुष, और इन्द्र आदि दिक्पाल।
- पाँचवाँ: महेश्वर के आयुध (त्रिशूल, वज्र, परशु, बाण, खड्ग, पाश, अंकुश, पिनाक), क्षेत्रपाल, नन्दिकेश्वर, और बाहर पूरा संसार: ऋषि, नाग, नदियाँ, पर्वत, पशु-पक्षी, वृक्ष, कीट और मनुष्य, सब हाथ जोड़े शिव-शिवा के दर्शन करते हुए।
आवरण-पूजा के बाद पंचाक्षर का जप और पार्वती-शिव के सामने महाचरु का भोग: बत्तीस आढक (लगभग तीन मन आठ सेर) का हो तो उत्तम, एक आढक का हो तो सबसे छोटा। पाठ कहता है कि वैभव होते हुए कंजूसी न करें, क्योंकि कृपणता से अंग-हीन कर्म फल नहीं देता। फिर आरती, प्रणाम, स्तुति और जप: कम से कम एक सौ आठ बार, हो सके तो एक हज़ार से ऊपर। अन्त में विद्या और गुरु का पूजन, शिव का विसर्जन, और सारा मण्डल गुरु या शिवभक्तों को दे देना।
श्लोक 8 · स्तुति का समापन
नमः शिवाय साम्बाय ससुतायादिहेतवे।
पञ्चावरणरूपेण प्रपञ्चेनावृताय ते॥
हिन्दी अर्थ
पार्वती-सहित और पुत्र-सहित शिव को नमस्कार, जो सबके आदि कारण हैं और पाँच आवरणों के रूप में पूरे संसार से घिरे हैं।
आज के जीवन में
पाठ में यह दण्डवत प्रणाम के साथ पढ़ा जाता है, फिर एक सौ आठ बार पंचाक्षर का जप। पाँच आवरणों का सार: पूजा भीतर के घेरे से शुरू होकर बाहर पूरे संसार तक पहुँचती है; इसमें कोई छूटता नहीं, पशु, पक्षी, वृक्ष और कीट तक।
श्लोक 9 · फल-श्रुति
एतत्पुण्यतमं स्तोत्रं शिवयोर्हृदयङ्गमम्।
सर्वाभीष्टप्रदं साक्षाद्भक्तिमुक्त्येकसाधनम्॥
हिन्दी अर्थ
यह परम पुण्य का स्तोत्र शिव और शिवा को प्रिय है, सब अभीष्ट देने वाला है और भक्ति तथा मुक्ति का एकमात्र साधन है।
पाठ के अनुसार
आगे की पंक्तियों में आया है कि नित्य सुनने-गाने वाले के पाप कटते हैं, बुरे स्वप्न जैसे भय से बचाव होता है, और आयु, आरोग्य और ऐश्वर्य मिलता है। पूजन करके जपने का फल बिना पूजन के जपने से कहीं अधिक बताया गया है।
कड़ी: पूजा का ढाँचा पूरा हुआ → अब वह हिस्सा, जो विधि के पार जाता है: कर्म-लोक और ज्ञान-लोक।
सातवीं सीढ़ी: शिवज्ञान का प्रकट होना
गुरु शुक्राचार्य कहते हैं कि नित्य और नैमित्तिक कर्मों से देवताओं का यजन करने पर मन शिव की आराधना में लगता है। क्रिया आदि से शिवज्ञान सिद्ध किया जाए। जिन्होंने शिवतत्त्व का साक्षात्कार किया है, वे मुक्त हैं। पाठ की परिभाषा: आत्मा में स्थित रहना ही मुक्ति है। जैसे सूर्य अपनी किरणों से अशुद्धि हटा देता है, वैसे कृपालु शिव भक्त का अज्ञान मिटा देते हैं। अज्ञान की निवृत्ति होने पर शिवज्ञान अपने-आप प्रकट होता है, उससे आत्मारामत्व मिलता है, और मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
पाठ में लोकों का नक्शा है: नीचे कर्म का भोग और कर्ममाया का बन्धन है, जहाँ सकाम जीव अलग-अलग योनियों में घूमते हैं; ऊपर ज्ञान का भोग है, जहाँ निष्काम उपासक जाते हैं। काल-चक्र के ऊपर धर्म वृषभ के रूप में खड़ा है: सत्य, शौच, अहिंसा और दया उसके चार पाँव, क्षमा सींग, आस्तिकता नेत्र और विश्वास उसका मन। शिव उस पर आरूढ़ हैं, जहाँ न दिन-रात है, न जन्म-मृत्यु।
श्लोक 10 · सद्योजात-मन्त्र
सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः।
भवे भवेनातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥
हिन्दी अर्थ
सद्योजात की शरण लेता हूँ, उन्हें बार-बार नमस्कार। जन्म-जन्म में मुझे अपना बनाए रखिए, हे भव के उद्गम को नमस्कार।
पाठ के अनुसार
पार्थिव पूजन के संक्षेप में ऋचा “सद्योजात” से मिट्टी लाना, “वामदेव” से जल डालना, “अघोर” से लिंग बनाना, “तत्पुरुष” से आह्वान और “ईशान” से वेदी पर स्थापना बताई गई है। पाँच मुख, पाँच मन्त्र, पाँच क्रियाएँ, यही क्रम पूरे अध्याय का आधार है।
ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध
बड़े पद या बड़े परिवार वाले के लिए पाठ का सबसे काम का वाक्य: किसी क्षुद्र फल के लिए बड़ी साधना का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बड़ी शक्ति के चारों ओर परतें होती हैं: गुरु की आज्ञा, नियम, भेंट और सेवा। परतें मज़बूत हों तो शक्ति टिकती है।
इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)
- मन्त्र का अर्थ साथ रखिए। पंचाक्षर पाँच तत्त्वों का मन्त्र है; अर्थ के साथ जप गहरा होता है।
- संख्या से ज़्यादा नियम। पाठ का हर जप नियम, मौन, एक भोजन और माता-पिता की सेवा के साथ जुड़ा है।
- सेवा भी पूजा है। पौधे को पानी, कीड़े को दाना, मन्दिर में झाड़ू, सब शिव-पूजन गिने गए हैं।
- कंजूसी से कर्म अधूरा रहता है। जो करें, पूरे अंगों के साथ करें।
- बड़े काम के लिए बड़ी साधना, छोटे लाभ के लिए नहीं।
7 दिन का अभ्यास
- दिन 1: सुबह पाँच मिनट बैठकर शान्त मन से “ॐ नमः शिवाय” अपनी गिनती में जपिए। संख्या लिख लीजिए।
- दिन 2: पाँच अक्षरों के नाम (न, मः, शि, वा, य) काग़ज़ पर लिखकर उनके साथ पाँच तत्त्व जोड़िए।
- दिन 3: एक वृक्ष या पौधे को पानी दीजिए और उस सेवा को पूजा मानकर कीजिए।
- दिन 4: ध्यान का श्लोक पढ़कर आँखें बन्द करके शिव की तस्वीर बनाइए: वर और अभय के साथ।
- दिन 5: अपने भोजन का एक हिस्सा किसी ज़रूरतमन्द को दीजिए।
- दिन 6: माता-पिता या बड़ों की एक छोटी सेवा कीजिए, बिना बताए।
- दिन 7: रात को क्षमा की प्रार्थना पढ़िए और दिन की कमियों को उसमें समर्पित कर दीजिए।
यही बात और जगह कैसे समझाई गई है
- मन्त्र का अनुशासनपाँचवाँ अध्याय: जप की शुद्धि, संख्या और मन।
- गुरु, दीक्षा और मन्त्रगुरु से मन्त्र पाने का महत्त्व।
- मन्त्र-साधनातन्त्र की दृष्टि से जप का क्रम।
- भक्ति योगसेवा और भक्ति में कौन-सा भक्त प्रिय है।
- ध्यान योगस्थिर आसन और संयमित जीवन।
घर में पूजा-स्थान की सही दिशा और जगह जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।
और रहस्य: जो इस अध्याय में छिपे हैं
रहस्य 1: पाँचवाँ काम है छोड़ना
पाठ के अनुसार शिव के पाँच कृत्यों में चार संसार को फैलाते हैं और पाँचवाँ, अनुग्रह, उससे बाहर निकालता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: हर आदत में एक "निकलने का क्षण" भी होना चाहिए। जैसे फोन खोलना आसान है, पर "अब बस" कहना सीखे बिना घण्टे उड़ जाते हैं।
रहस्य 2: जो मिट्टी मिले, वही सही
पाठ के अनुसार जहाँ जो मिट्टी मिल जाए उसी से लिंग बन सकता है, और आटे, फूल, गुड़ या अन्न से भी। हमारा पाठ-निष्कर्ष: साधन की कमी टालने का कारण नहीं है। जैसे दुकान शुरू करने वाला महँगे फ़र्नीचर की राह न देखे, पहले ग्राहक को सही बात और सही तौल दे दे।
रहस्य 3: क्षमा, फिर विदाई
पाठ में पार्थिव पूजन के आठ चरण हैं। सातवाँ क्षमा-प्रार्थना है और आठवाँ विसर्जन। हमारा पाठ-निष्कर्ष: विदा करने से पहले कमियाँ स्वीकार की जाती हैं। जैसे दिन के अन्त में दुकानदार बही मिलाकर कहे, "आज यह चूक हुई", और तब शटर गिराए, तो कल का दिन हल्का शुरू होता है।
रहस्य 4: तीन सीढ़ियाँ, एक क्रम से
पाठ में तीन शिवयोगी हैं: क्रिया वाला, तप वाला और जप वाला। तप वाले के लिए परिमित भोजन और किसी से द्रोह न रखना कहा गया है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: पहले काम, फिर संयम, फिर गहराई। जैसे पढ़ाई में पहले रोज़ बैठना, फिर ध्यान भटकाने वाली चीज़ें दूर करना, तब जाकर लम्बी एकाग्रता आती है।
रहस्य 5: तय दिन और समझा हुआ पाठ
पाठ के अनुसार रोज़ पढ़ने वाले को अभीष्ट का आठवाँ अंश बताया गया है, और अर्थ समझकर तय तिथियों पर पढ़ने वाले को पूरा। हमारा पाठ-निष्कर्ष: हम कोई फल का वादा नहीं कर सकते, पर सीख साफ़ है कि बिना सोचे रटने से समझकर नियत दिन करना भारी पड़ता है। जैसे हर रविवार तय समय पर हिसाब देखना रोज़ की हड़बड़ी से बेहतर चलता है।
रहस्य 6: टूटी कड़ी फिर जोड़िए
पाठ में कहा गया है कि बीच में अनुष्ठान टूट जाए तो वह आगे पूरा हो जाता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: एक दिन छूटने से सब व्यर्थ नहीं होता। जैसे सैर के चार दिन छूट गए तो पाँचवें दिन फिर निकल पड़ना ही असली अनुशासन है।
रहस्य 7: साफ़ जगह भी साधन है
पाठ में गर्भगृह दर्पण जैसा स्वच्छ रखने को कहा गया है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: बैठने की जगह साफ़ हो तो मन भी जल्दी टिकता है। जैसे पढ़ने की मेज़ पर सिर्फ़ किताब और पानी रखना।
आसान रास्ता: कोई भी कैसे करे
- एक साफ़ कोना चुनिए। फ़र्श पोंछिए और एक तह किया कपड़ा बिछाइए। पाँच मिनट लगते हैं। बैठते ही मन अक्सर थोड़ा शान्त लगता है।
- रोज़ का समय तय कीजिए। सुबह या रात, जो आसान हो। पाँच मिनट। पहले तीन दिन में समय आदत बनने लगता है।
- धीरे-धीरे "ॐ नमः शिवाय" इक्कीस बार बोलिए। उँगलियों के पोरों पर गिनिए। हर अक्षर के साथ एक तत्त्व याद कीजिए। साँस अक्सर धीमी हो जाती है।
- एक छोटी सेवा कीजिए। किसी पौधे को पानी या पक्षी को दाना। दो मिनट। मन में हल्कापन आता है।
- अन्त में दो पंक्तियाँ अपने शब्दों में कहिए। "जो चूक हुई, क्षमा। अब मैं इसे छोड़ता या छोड़ती हूँ।" आधा मिनट। अगली सुबह का बोझ अक्सर कम लगता है।
- छूट जाए तो अगले दिन वहीं से शुरू कीजिए। पिछले दिनों का हिसाब मत लगाइए। कोई दण्ड नहीं।
- हर हफ़्ते एक सीढ़ी जोड़िए। पहला हफ़्ता सिर्फ़ बैठना, दूसरा हल्का भोजन उसी दिन, तीसरा गिनती बढ़ाना। धीरे चलने वाले को टिकने की संभावना अधिक रहती है।
सबसे आम ग़लती
इसे मनोकामना का सौदा बना लेना, या पहले ही हफ़्ते में गिनती बहुत बढ़ा देना। पाठ खुद कहता है कि छोटे फल के लिए बड़ी साधना न करें। नियम छोटा रखिए, पर रोज़ रखिए।
आज की स्व-जाँच (2 मिनट)
- क्या आज मैंने किसी मन्त्र का जप अर्थ याद रखकर किया?
- क्या मैंने आज किसी पौधे, पशु या ज़रूरतमन्द की छोटी सेवा की?
- क्या मेरी पूजा में जल्दबाज़ी या कंजूसी थी?
- क्या मैंने अपनी कमियों के लिए विनम्र क्षमा माँगी?
जितने सवालों का उत्तर “हाँ” है, उतना अनुशासन आपने कमाया। बाक़ी कल के लिए रख दीजिए।
आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)
- अध्याय 1 से 5: सही गुरु, शान्ति, वश्य, स्तम्भन और मन्त्र का अनुशासन। (पढ़ चुके)
- अध्याय 6 से 10: औषधि-ज्ञान और कुमार तंत्र। (पढ़ चुके)
- अध्याय 11: शिव-उपासना, पहला भाग। (आप अभी यहाँ हैं)
- आगे: शिव के स्तोत्र और ज्योतिर्लिंग, फिर ज्योतिष के विशेष योग।
पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।
अगले अध्याय में: शिव-उपासना का दूसरा भाग। श्री शिवपंचाक्षर स्तोत्र, शिवताण्डव स्तोत्र, बारह ज्योतिर्लिंगों का स्तोत्र और हर ज्योतिर्लिंग का परिचय आएगा।
यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। पूजा, जप और अनुष्ठान अपने गुरु और परिवार की परम्परा के अनुसार, अपनी सामर्थ्य देखकर करें।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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