रावण विद्या अध्याय 10 — कुमार तंत्र: शिशु और माता की देखभाल, बारह मातृकाएँ और बच्चों के रोग
अध्याय दस
औषधि-विद्या का अगला पड़ाव घर के सबसे छोटे सदस्य तक पहुँचता है। रावण के नाम से चला यह खण्ड बताता है कि नवजात और उसकी माँ को कैसे सँभाला जाए।
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पहले यह पंक्ति पढ़ लीजिए: शिशु की कोई भी दवा अनुभवी चिकित्सक से पूछकर ही। इस अध्याय में जो भी नुस्ख़े, मात्राएँ और उपाय आए हैं, वे केवल पुराने पाठ में जैसे लिखे हैं वैसे बताए गए हैं। पाठ ख़ुद भी यही कहता है कि बच्चे का रोग पहचानकर और उम्र देखकर ही दवा दी जाए।
पिछले चार अध्यायों में हमने जड़ी-बूटी की पहचान, छह रस, पाँच कल्प और अर्क बनाने का पूरा तरीक़ा देखा। वह सब बड़ों की औषधि-विद्या थी। अब पाठ उसी ज्ञान को घर के भीतर ले जाता है और बच्चे के पास रख देता है। इस खण्ड का नाम कुमार तंत्र है, यानी बालक की चिकित्सा। इसमें तीन बातें साथ-साथ चलती हैं: जन्म के बाद बारह तरह की मातृकाओं से होने वाली बीमारी के लक्षण और घर पर किया जाने वाला शान्ति-कर्म, माता और धाय के आहार से दूध का बिगड़ना, और बच्चों के बुखार, दस्त, खाँसी, आँख, कान और मुँह के रोगों के योग।
अर्क प्रकाश का नियम था कि दवा से पहले लक्षण देखा जाए। यहाँ वही नियम सबसे नाज़ुक जगह लगता है: बच्चा बोल नहीं सकता, इसलिए रोने, सोने और दूध पीने के ढंग से ही रोग पढ़ना पड़ता है।
इस अध्याय में क्या-क्या मिलेगा
- बारह मातृकाएँ: किस दिन, महीने या वर्ष में कौन-सी पकड़ती है, बच्चे में क्या लक्षण दिखते हैं।
- रोग के कारण: माँ और धाय का आहार, दूध का दोष, दाँत निकलना।
- मात्रा का नियम: पाठ के अनुसार उम्र के साथ दवा कैसे बढ़ती और घटती है।
- रोगों के योग और अष्टमंगल घृत: बुखार, दस्त, खाँसी, उल्टी, आँख, कान, मुँह, नाभि, चेचक और बल-बुद्धि के योग।
पिछले अध्यायों की याद
पहचान, रस और गुण, कल्प, अर्क
जड़ी-बूटी का ज्ञान वहीं सार्थक है जहाँ वह घर के सबसे कमज़ोर व्यक्ति के काम आए। छठा अध्याय, सातवाँ, आठवाँ और नौवाँ अध्याय फिर से देख सकते हैं।
कुछ शब्द, जो इस अध्याय में आएँगे
- मातृका — पाठ में वह शक्ति, जिसकी पकड़ से बच्चे को बुखार और बेचैनी होती मानी गई है।
- बलि — यहाँ शान्ति के लिए रखी जाने वाली भेंट: भात, फूल, दीप, ध्वज आदि।
- शान्त्युदक — शान्ति-जल: कलश में पीपल के पत्ते डालकर तैयार किया गया जल।
- क्वाथ, अवलेह — काढ़ा, और शहद या घी में मिली चटनी।
- रत्ती, माशा — पुराने तौल: रत्ती छोटा दाना, माशा उससे बड़ा।
पहली सीढ़ी: बारह मातृकाएँ और उनके लक्षण
पाठ का आरम्भ यूँ होता है: जन्म के पहले दिन, पहले महीने या पहले वर्ष में नन्दना नाम की मातृका बच्चे को पकड़ती है। दूसरे दिन, दूसरे महीने या दूसरे वर्ष में सुनन्दा, और इसी क्रम से बारहवें दिन, महीने या वर्ष तक बारह मातृकाएँ गिनाई गई हैं। हर एक के लिए एक ही साँचा चलता है: पहले बुखार, फिर कुछ ख़ास लक्षण, फिर शान्ति का उपाय।
श्लोक 1 · नन्दना मातृका
प्रथमदिवसे मासे वर्षे वा गृह्णाति नन्दना नाम मातृका।
तया गृहीतमात्रेण प्रथमं भवति ज्वरः॥
हिन्दी अर्थ
पहले दिन, पहले महीने या पहले वर्ष में नन्दना नाम की मातृका पकड़ती है। उसके पकड़ते ही सबसे पहले बुखार होता है।
पाठ के अनुसार लक्षण
बच्चा अशुभ-सा स्वर निकालता है, चीख़ता है और माँ का दूध नहीं लेता। शान्ति-कर्म के लिए नदी के दोनों किनारों की मिट्टी की पुतली बनाई जाती है। सफ़ेद चावल, सफ़ेद फूल, सफ़ेद रंग के सात ध्वज, सात दीप, सात स्वस्तिक, सात वड़े, सात पूरियाँ और सात जामुन रखे जाते हैं। भेंट पूर्व दिशा में, चौराहे पर, दोपहर के समय रखी जाती है।
बाक़ी ग्यारह का सार पाठ से इस तरह उतरता है:
- सुनन्दा (दूसरा): आँखें खुली रखना, शरीर काँपना, न सोना, रोना, दूध न पीना। पश्चिम दिशा, तीन दिन शाम को; चावल-दही-गुड़-घी का सकोरा, पीले फूल, सात पीले ध्वज, दस स्वस्तिक।
- पूतना (तीसरा): काँपना, दूध न लेना, मुट्ठी बाँधना, रोना, ऊपर देखना। दक्षिण दिशा, अपराह्न; लाल चन्दन, लाल फूल, लाल ध्वज, सात दीप; मन्त्र के अन्त में “हासय हासय”, यानी बच्चा फिर मुस्कुराए।
- मुखमुण्डिका (चौथा दिन, महीना या वर्ष): गर्दन झुकाना, आँखें खुली रखना, दूध न पीना, कभी रोना कभी सोना, मुट्ठी बाँधना। उत्तर दिशा, अपराह्न; सफ़ेद कमल, तेरह स्वस्तिक।
- कटपूतना (पाँचवाँ): काँपना और मुट्ठी बाँधना। कुम्हार के चाक की मिट्टी की पुतली, ईशान कोण; पाँच ध्वज, पाँच दीप, पाँच वड़े।
- शकुनिका (छठा): शरीर कटता-सा लगना, दिन-रात जागना, ऊपर देखना। आटे की पुतली, आग्नेय कोण, दोपहर के बाद; हर चीज़ दस-दस।
- शुष्करेवती (सातवाँ): काँपना, मुट्ठी बाँधना, रोना। गाँव से बाहर पश्चिम में, पेड़ के नीचे, अपराह्न; लाल चावल की खिचड़ी।
- अर्यका (आठवाँ): बदबू-सी गन्ध, खाना न लेना, शरीर काँपना। सुबह, गाँव के भीतर; लाल-पीले ध्वज, पूरी और पापड़ी।
- भूसूतिका (नौवाँ): बुखार के साथ बार-बार छींक या उल्टी, अंग-ऐंठन और मुट्ठी। गाँव के बाहर उत्तर में; सफ़ेद वस्त्र में लिपटी पुतली, तेरह-तेरह ध्वज और दीप।
- निर्ऋता (दसवाँ): काँपना, रोना, मल-मूत्र में गड़बड़ी। समुद्र की मिट्टी की पुतली, वायव्य कोण; पाँच रंग के ध्वज।
- पिलिपिच्छिका (ग्यारहवाँ): खाना न लेना, आँखें ऊपर, अंग टूटना। आटे की पुतली का मुख लाल चन्दन से रंगकर दूध में भिगोना; पूर्व दिशा; आठ वड़े, आठ पूरियाँ।
- कामुका (बारहवाँ): बहुत हँसकर फिर रोना, हाथ पटकना, बार-बार सुबकना, खाना न लेना। दूध के खोए की पुतली, सफ़ेद फूल, सफ़ेद ध्वज, सात पूरियाँ और दही-भात।
श्लोक 2 · हर विधि का वचन
बलिं तस्य प्रवक्ष्यामि येन सम्पद्यते शुभम्।
चतुर्थे दिवसे ब्राह्मणं भोजयेत्। ततः सम्पद्यते शुभम्॥
हिन्दी अर्थ
उसकी बलि का विधान कहता हूँ, जिससे शुभ हो। (तीन दिन विधि करके) चौथे दिन ब्राह्मण को भोजन कराए, तब शुभ फल होता है।
आज के जीवन में
बारहों विधियों का अन्त एक ही है: तीन दिन लगातार शान्ति-कर्म, चौथे दिन भोजन और दान। यह ढाँचा बताता है कि पुराना घर बच्चे की बीमारी में घबराता नहीं था। तीन दिन तक नियम से बैठना, सफ़ाई, धूप, स्नान और आख़िर में कुछ बाँटना, इससे माँ-पिता का मन भी स्थिर होता था और बच्चे के आसपास शान्त वातावरण बनता था।
श्लोक 3 · सब विधियों का मन्त्र
ॐ नमो नारायणाय अमुकस्य व्याधिं हन हन मुञ्च मुञ्च ह्रीं फट् स्वाहा।
हिन्दी अर्थ
ॐ, नारायण को नमस्कार। अमुक (यहाँ बालक का नाम) की व्याधि को हटाओ, हटाओ; छोड़ो, छोड़ो। स्वाहा।
पाठ के अनुसार
मन्त्र का रूप हर मातृका के साथ थोड़ा बदलता है। कटपूतना और शकुनिका के लिए “चूर्णय चूर्णय हन हन स्वाहा” है, अर्यका के लिए “चतुर्दिशमोक्षणाय” जुड़ता है, भूसूतिका के लिए “चतुर्भुजाय”। “अमुक” की जगह बच्चे का नाम लिया जाता है। लक्ष्य हर बार एक है: बच्चे की व्याधि का हटना।
कड़ी: मातृकाओं का ढाँचा समझ आया → अब वह बात, जिससे आज का वैद्य भी सबसे पहले शुरू करता है: बच्चे का रोग माँ के आहार से कैसे जुड़ता है।
दूसरी सीढ़ी: रोग के कारण — माँ का आहार और दूध
मातृका-विधियों के बाद पाठ सीधे कारणों पर आता है, और यहाँ भाषा बिलकुल व्यावहारिक हो जाती है। बच्चे के रोग का पहला कारण माँ या धाय का भोजन बताया गया है। यही हिस्सा आज भी सबसे ज़्यादा काम का है।
श्लोक 4 · दूध का बिगड़ना
धात्र्यास्तु गुरुभिर्भोज्यैर्विषमैर्दोषलैरपि।
दोषा देहे प्रकुप्यन्ति ततः स्तन्यं प्रदुष्यति॥
हिन्दी अर्थ
दूध पिलाने वाली स्त्री अगर बहुत भारी, बेमेल और दोष बढ़ाने वाला भोजन करे, तो उसके शरीर में दोष कुपित हो जाते हैं, और तब दूध बिगड़ता है।
आज के जीवन में
पाठ आगे कहता है कि बेकार के खान-पान और रहन-सहन से भी माँ के वात आदि दोष बिगड़ते हैं, और उसके दूध से बच्चे के रोग उठते हैं। सीधा नियम: बच्चे को सँभालना हो तो पहले माँ की थाली और नींद सँभालिए। पाठ यह भी कहता है कि सब कुछ रोका जा सकता है, पर बच्चे का माँ का दूध नहीं; और दूध पिलाने वाली माँ के भोजन में कमी करना ही बच्चे के लिए “लंघन” (हल्का आहार) माना गया है।
श्लोक 5 · दाँत निकलने का समय
दन्तोद्भवश्च रोगाणां सर्वेषामेव कारणम्।
विशेषाज्ज्वरविड्भेदकार्श्यच्छर्दिशिरोरुजाम्॥
हिन्दी अर्थ
दाँत निकलना भी बच्चे के प्रायः सभी रोगों का कारण है, ख़ासकर बुखार, पतले दस्त, दुबलापन, उल्टी और सिर-दर्द का।
पाठ के अनुसार
आगे पाठ आश्वासन देता है कि दाँत निकलने के समय की बीमारियाँ दाँत निकल आने पर अपने आप शान्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका कारण वही था। इसका मतलब यह है कि इस दौर में बुखार या दस्त देखकर दवाओं की झड़ी लगाने के बजाय धैर्य और सावधानी चाहिए।
कड़ी: कारण पता चले → अब बच्चे के लक्षण से दूध का दोष पहचानने की बारी।
तीसरी सीढ़ी: दूध के दोष और बच्चे के लक्षण
पाठ तीन दोषों के हिसाब से बताता है कि बिगड़ा हुआ दूध पीने वाला बच्चा कैसा दिखता है।
श्लोक 6 · वात-दोष वाला दूध
वातदुष्टे शिशुः स्तन्यं पिबन् वातगदातुरः।
क्षामस्वरः कृशाङ्गश्च बद्धविण्मूत्रमारुतः॥
हिन्दी अर्थ
वात से बिगड़ा दूध पीने वाला बच्चा वात-रोग से पीड़ित होता है: कमज़ोर आवाज़, दुबला शरीर, मल, मूत्र और अधोवायु का रुकना।
पाठ के अनुसार
पित्त से बिगड़े दूध वाला बच्चा पसीने से भरा, पतले दस्त वाला, पीलिया या पित्त के रोगों से ग्रस्त, प्यासा और सभी अंगों में गर्म रहता है। पाठ में पित्त-दूषित दूध की यही पहचान लिखी है।
श्लोक 7 · कफ-दोष वाला दूध
कफदुष्टे पिबन् क्षीरं लालालुः श्लेष्मरोगवान्।
निद्रार्दितो जडः शूनः शुक्लाक्षश्छर्दनः शिशुः॥
हिन्दी अर्थ
कफ से बिगड़ा दूध पीने वाले बच्चे के मुँह से लार बहती है, कफ के रोग रहते हैं, नींद भरी रहती है, सुस्ती और सूजन होती है, आँखों में सफ़ेदी दिखती है और उल्टी होती है।
आज के जीवन में
तीनों लक्षण-सूचियाँ एक ही सीख देती हैं: बच्चा अपनी बीमारी का हाल अपने शरीर से बताता है। पसीना, दस्त, प्यास, लार, सूजन और नींद का ढंग, इन्हें रोज़ देखिए और चिकित्सक को पूरी बात बताइए। पाठ का एक और छोटा रोग भी इसी से जुड़ा है: गर्भवती माँ का दूध पीने वाले शिशु को “पारिगर्भिक” रोग बताया गया है, जिसमें खाँसी, भूख की कमी, उल्टी, तन्द्रा, दुबलापन, अरुचि और चक्कर दिखते हैं। उसका उपाय पाचन की आग को जगाने वाली दवा है।
कड़ी: लक्षण पहचानना सीख लिया → अब पाठ का सबसे नाज़ुक नियम: बच्चे की दवा की मात्रा कैसे गिनी जाती थी।
चौथी सीढ़ी: उम्र के साथ मात्रा का नियम
बच्चों का इलाज इसलिए कठिन है कि उनके लिए मात्रा बहुत छोटी और सटीक होती है। पुराना पाठ इसका एक पूरा हिसाब देता है। इसे यहाँ केवल पाठ का ढंग समझाने के लिए रखा गया है, किसी बच्चे के लिए सलाह के तौर पर नहीं।
श्लोक 8 · औषधि की मात्रा
प्रथमे मासि बालस्य देया भेषजरक्तिका।
अवलेह्या तु कर्तव्या मधुक्षीरसिताघृतैः॥
हिन्दी अर्थ
पहले महीने में बालक को एक रत्ती दवा देनी चाहिए, और वह शहद, दूध, मिश्री और घी के साथ चटनी बनाकर दी जाए।
पाठ के अनुसार आगे का हिसाब
हर अगले महीने के साथ एक-एक रत्ती बढ़ती है, जब तक एक वर्ष न हो जाए। एक वर्ष के बाद सोलह वर्ष तक हर साल एक माशा बढ़ती है। सत्रहवें से सत्तरवें वर्ष तक मात्रा एक-सी रहती है, उसके बाद धीरे-धीरे घटती है। यह मात्रा चूर्ण, कल्क और चटनी की है; काढ़े की मात्रा इससे चार गुनी बताई गई है।
इससे सीख यह है कि दवा की मात्रा उम्र, वज़न और रोग तीनों देखकर तय होती है। इसीलिए घर पर अन्दाज़े से कुछ देना सबसे बड़ी भूल है।
कड़ी: मात्रा का सिद्धान्त साफ़ हुआ → अब बुखार से लेकर कान-आँख तक के योग, जैसे पाठ में आए हैं।
पाँचवीं सीढ़ी: बच्चों के रोग और पाठ के योग
अब पाठ रोग-दर-रोग चलता है। नीचे हर रोग के साथ वही औषधियाँ गिनाई हैं जो पाठ में लिखी हैं। इन सबके साथ वही एक नियम है जो ऊपर ही लिखा है।
श्लोक 9 · तालुकण्टक
तालुमांसे कफः क्रुद्धः करोति तालुकण्टकम्।
हरीतकी वचा कुष्ठकल्कं माक्षिकसंयुतम्।
पीत्वा कुमारः स्तन्येन मुच्यते तालुकण्टकात्॥
हिन्दी अर्थ
बिगड़ा कफ तालु के मांस में तालुकण्टक करता है। हरड़, वच और कूठ का कल्क शहद के साथ माँ के दूध के संग पीकर बालक इस रोग से छूटता है।
लक्षण
पाठ के अनुसार तालु नीचे को धँस जाता है, बच्चा दूध नहीं पी पाता या कष्ट से पीता है, उसे पतले दस्त, प्यास, आँख, कण्ठ और मुँह का कष्ट, गर्दन में पीड़ा और उल्टी होती है।
श्लोक 10 · ज्वर का एक योग
द्राक्षापटोलत्रिफलापिचुमन्दवृषैः कृतः।
क्वाथ ऐकाहिकं हन्ति परार्थमिव दुर्जनाः॥
हिन्दी अर्थ
मुनक्का, परवल, त्रिफला, नीम की छाल और अडूसे से बना काढ़ा इकतरा बुखार को वैसे ही नष्ट करता है, जैसे दुष्ट लोग दूसरों के धन को।
पाठ में ज्वर के और योग
वात-ज्वर में मुलहठी, बंसलोचन, धान की खील, रसौत और मिश्री की चटनी, या पंचमूल का काढ़ा। पित्त-ज्वर में नागरमोथा, पित्तपापड़ा, गिलोय, चिरायता और सोंठ का काढ़ा। पुराने ज्वर के लिए नीम के पत्ते, गिलोय, जवासा, परवल और इन्द्रजौ का काढ़ा।
दो योगों के नाम पाठ ने ख़ुद रखे हैं। अमृताष्टक: गिलोय, इन्द्रजौ, नीम की छाल, परवल, कुटकी, सोंठ, चन्दन और नागरमोथा का काढ़ा, पीपल के चूर्ण के साथ। चातुर्भद्रक: चिरायता, नागरमोथा, गिलोय और सोंठ। पथ्य के रूप में मूँग और चावल का पानी या मोठ का रस लिखा है।
लोक-उपाय भी दर्ज है: इकतरा बुखार में अविवाहित कन्या के काते सूत से अपामार्ग की जड़ बच्चे की शिखा पर बाँधना।
इसके बाद पाठ पेट के रोगों पर आता है।
दस्त और ग्रहणी (पाठ के अनुसार)
- दस्त: बेलगिरी, धाय के फूल, नेत्रबाला, लोध और गजपीपल का काढ़ा शहद के साथ। धान की खील, सेंधा नमक और आम की गुठली का चूर्ण शहद के साथ, जो उल्टी और दस्त दोनों में बताया गया है। आम की गुठली, लोध और आँवला भैंस के छाछ के साथ। खूनी दस्त के लिए मोचरस, मंजीठ, धाय के फूल और कमल-केशर का काढ़ा।
- ग्रहणी: अजवायन, जीरा, कालीमिर्च, पीपल, इन्द्रजौ और सोंठ का चूर्ण शहद के साथ; पीपल, सोंठ, बेलगिरी, नागरमोथा और अजवायन का चूर्ण शहद-घी के साथ।
साँस, खाँसी, हिचकी, उल्टी और प्यास (पाठ के अनुसार)
- खाँसी: जवासा, पीपल, मुनक्का और हरड़ का चूर्ण शहद में तीन या पाँच रात। पोहकरमूल, अतीस, काकड़ासींगी, पीपल और जवासा का चूर्ण पाँचों तरह की खाँसी में।
- हिचकी: पिसी हुई गेरू शहद के साथ। पीपल और रेणुका का काढ़ा हींग और शहद के साथ, जिसे पाठ ने धन्वन्तरि का वचन बताया है। कुटकी का चूर्ण शहद के साथ।
- उल्टी: हरड़ का चूर्ण शहद के साथ। पीपल की सूखी छाल जलाकर उसकी राख का पानी। जो बच्चा दूध पीकर उल्टी कर देता है, उसके लिए दोनों कटेली के फल का रस, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चित्रक और सोंठ घी-शहद के साथ।
पेट-दर्द, भूख, कृमि और बलवर्धन (पाठ के अनुसार)
- वायु-शूल और अफरा: सेंधा नमक, सोंठ, इलायची, हींग और भारंगी का चूर्ण घी और पानी से। जो बच्चा लगातार रोता रहे, उसके लिए पीपल और त्रिफला का चूर्ण घी-शहद के साथ।
- बल, बुद्धि और शरीर: चार अवलेह, जिनमें वच, कूठ, शंखपुष्पी, गूलर का फल, सफ़ेद दूब, घी और शहद अलग-अलग मेल में आते हैं। असगंध के कल्क में आठ गुना दूध डालकर सिद्ध किया घी बल बढ़ाता है। लाख का काढ़ा, तेल और दही का पानी रास्ना, चन्दन, कूठ, नागरमोथा, असगंध, हल्दी और अन्य जड़ी-बूटियों के कल्क से पकाया तेल शरीर की मालिश के लिए बताया गया है।
श्लोक 11 · अष्टमंगल घृत
वचा कुष्ठं तथा ब्राह्मी सिद्धार्थकमथापि च।
सारिवा सैन्धवं चैव पिप्पली घृतमष्टमम्॥
दृढा स्मृतिः क्षिप्रं मेधा कुमारो बुद्धिमान् भवेत्॥
हिन्दी अर्थ
वच, कूठ, ब्राह्मी, सरसों, सारिवा, सेंधा नमक और पीपल के साथ घी सिद्ध किया जाता है। इसके सेवन से स्मरण-शक्ति दृढ़ होती है, बुद्धि तेज़ होती है और बालक बुद्धिमान बनता है।
पाठ के अनुसार
पाठ ने इसे प्रातःकाल रोज़ पीने वाला योग बताया है और कहा है कि इसे पीने वाले कुमारों पर पिशाच, राक्षस, भूत और मातृकाएँ अपना बल नहीं जमा पातीं। यानी जो काम बारह विधियाँ रोग आने के बाद करती हैं, वही काम यह घृत पहले से रोककर करता है: बच्चे की याददाश्त, पाचन और मन को मज़बूत रखना।
आँख, कान, मुँह, नाभि और त्वचा (पाठ के अनुसार)
- कुकूणक (पलकों का रोग): माँ के दूध की गड़बड़ी से आँखों में तेज़ खुजली होती है, बच्चा माथा, आँख और नाक रगड़ता है और रोशनी नहीं सह पाता। हरड़, बहेड़ा, आँवला, लोध, पुनर्नवा, अदरक और दोनों कटेली को पीसकर थोड़ा गर्म करके पलकों पर लेप।
- कान-दर्द: आक का पीला पत्ता तेल लगाकर गर्म करके उसका रस; या रसौत को स्त्री के दूध में घिसकर शहद के साथ, कान बहने और बदबू में।
- मुँह के छाले: जावित्री, मुनक्का, पाठा और त्रिफला का ठण्डा काढ़ा शहद के साथ कुल्ले के लिए। सारिवा, चिरायता, लोध और मुलहठी का काढ़ा शहद मिलाकर मुँह धोने के लिए।
- नाभि का पकना या फूलना: हल्दी, लोध, मेहँदी और मुलहठी से सिद्ध तेल; तपे मिट्टी के गोले को दूध में बुझाकर उसकी भाप से सिंकाई।
- दाँत निकलते समय: धाय के फूल, पीपल और आँवले का रस शहद के साथ मसूड़ों पर।
- पेशाब में कष्ट: नागरमोथा, गिलोय, सोंठ, असगंध, आँवला और गोखरू का काढ़ा शहद के साथ।
- गर्मी और जलन: पद्माख, चन्दन, खस और नेत्रबाला का महीन चूर्ण दूध के साथ, और कोमल पत्तों का ठण्डा बिछौना। पूरे पाठ में ठण्डक, सुगन्ध और शान्त कमरा बार-बार आते हैं, यानी कमरे की हवा और माँ-बाप की शान्ति भी चिकित्सा का हिस्सा है।
- चेचक (माता): गधी का दूध, तुलसी के पत्ते, ठण्डा जल और शीतला का स्तोत्र-पाठ। चन्दन, अडूसा, नागरमोथा, गिलोय और मुनक्का का ठण्डा काढ़ा बुखार के लिए। फुंसियों में कीड़े पड़ने के भय से बिछौने पर राख बिछाना और सम्भालू तथा वन-तुलसी की धूनी देना।
कड़ी: रोगों के योग देख लिए → अब वह भाग, जिसे पाठ बड़े-छोटे सभी के लिए जोड़ देता है: घर की रोज़ की सावधानी और ऊँचे पद की ज़िम्मेदारी।
छठी सीढ़ी: बड़ों के लिए भी इसी खण्ड के योग
भूमिका के अनुसार इस खण्ड में बड़ों के कुछ रोगों का उपचार भी जुड़ा है। अर्श में अजवायन, सोंठ, पाठा, अनार की छाल और इन्द्रजौ का चूर्ण गुड़ और छाछ के साथ; खूनी अर्श में मक्खन और तिल का रोज़ सेवन। अपच में सोंठ-धनिया के काढ़े में कालीमिर्च, पीपल, चित्रक और जीरा। नकसीर में अनार के फूल या दूब का रस नाक में। मिरगी में कच्चे कुम्हड़े का रस मुलहठी के साथ सात दिन। और नियम वही: दवा रोगी की उम्र से तौलकर दी जाती है।
ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध
जो घर, दफ़्तर या समाज का मुखिया है, उसकी पहली परीक्षा यही है कि सबसे कमज़ोर सदस्य कितना सुरक्षित है। पाठ का सार यही है: बड़े पद वाला व्यक्ति पहले घर के सबसे छोटे और सबसे कोमल व्यक्ति को देखे।
इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)
- शिशु की कोई भी दवा अनुभवी चिकित्सक से पूछकर ही, चाहे वह घर का कोई पुराना योग क्यों न हो।
- माँ का आहार, नींद और मन बच्चे की सेहत का पहला आधार है। दूध पिलाने वाली माँ भारी, बेमेल और बासी भोजन से बचे।
- बच्चे का माँ का दूध बन्द न करें। पाठ भी सब कुछ रोकने की छूट देता है, पर यह नहीं।
- दाँत निकलने के समय धैर्य रखें। पाठ के अनुसार उस समय के कई रोग दाँत आने पर अपने आप शान्त हो जाते हैं।
- रोग से पहले मज़बूती: बल, याददाश्त और पाचन को रोज़ की देखभाल से सँभालिए, जैसा अष्टमंगल घृत की बात में कहा गया है।
7 दिन का अभ्यास
- दिन 1: घर की किसी माँ से पूछिए कि दूध पिलाने के दिनों में उसने क्या खाया-छोड़ा था। नोट कीजिए।
- दिन 2: घर के बच्चे के सोने, रोने और दूध पीने का ढंग देखकर एक पन्ने पर लिखिए। यही रोग पढ़ने का पहला अभ्यास है।
- दिन 3: बच्चे का कमरा देखिए: हवा, रोशनी, शोर और सफ़ाई। एक चीज़ सुधारिए।
- दिन 4: घर की दवाओं की अवधि देखिए। उपयोग अनुभवी चिकित्सक से पूछकर ही तय करें।
- दिन 5: अपने बाल-चिकित्सक का नाम और नम्बर एक जगह लिख लीजिए, जहाँ सब देख सकें।
- दिन 6: घर की माँ के लिए आज एक आराम का घण्टा तय कीजिए और उसे पूरा निभाइए।
यही बात और जगह कैसे समझाई गई है
- रावण का औषधि-ज्ञानछठा अध्याय: रस, गुण, कल्प और अर्क की बुनियाद।
- शान्ति-कर्मदूसरा अध्याय: तनाव और क्रोध में शान्ति का अर्थ।
- ध्यान योगसंयमित आहार-विहार और स्थिर मन का महत्त्व।
- सन्तोष और स्थितिजो है, उसमें स्थिर रहने की सीख।
घर की बनावट, शिशु के कमरे की दिशा और रसोई की जगह जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।
और रहस्य: जो इस अध्याय में छिपे हैं
रहस्य 1: बारह नामों के पीछे तीन एक-से संकेत
पाठ के अनुसार बारहों मातृकाओं के लक्षण अलग-अलग गिनाए गए हैं। पर उनमें बार-बार वही बातें लौटती हैं: दूध छोड़ना, नींद बिगड़ना और रोने का ढंग बदलना। हमारा पाठ-निष्कर्ष: नाम से ज़्यादा ज़रूरी बदलाव को पकड़ना है। जैसे हर रात तुरन्त सो जाने वाला बच्चा एक रात देर तक कसमसाए, तो यही पहला इशारा है।
रहस्य 2: तीन दिन का स्थिर क्रम
पाठ के अनुसार हर विधि तीन दिन चलती है और चौथे दिन भोजन और बाँटना होता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: असली ताक़त इस तय क्रम में है। घबराहट में घर बिखरता है, क्रम में घर टिकता है। जैसे बच्चे की तबीयत बिगड़ने पर सब बड़े आपस में काम बाँट लें: एक नाप-तौल देखे, एक भोजन और एक चिकित्सक से बात करे।
रहस्य 3: उम्र ही पैमाना है
पाठ में दवा की गिनती जन्म के महीने से शुरू होकर साल-दर-साल बदलती है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: बच्चा बड़े का छोटा रूप नहीं है। इसीलिए बड़े की दवा बच्चे को देना सबसे भारी चूक है। यही बात पढ़ाई पर भी लागू होती है: आठ साल के बच्चे से पन्द्रह साल वाले का बोझ मत उठवाइए।
रहस्य 4: पहले पथ्य, फिर कुछ और
पाठ के अनुसार बुखार के योग के साथ पथ्य भी लिखा है: मूँग, चावल का पानी, मोठ का रस। हमारा पाठ-निष्कर्ष: हल्का खाना, पानी और आराम दवा का पहला साथी है। जैसे बीमार बच्चे को तला-मसालेदार न देकर पतली दाल-चावल देना, यह चिकित्सक के कहने से पहले का समझदार कदम है।
रहस्य 5: पूरा हाल बताइए
पाठ के अनुसार दूध के दोष की पहचान पसीना, दस्त, प्यास, लार और नींद जैसे छोटे संकेतों से होती है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: चिकित्सक के पास जाकर सिर्फ़ "बुखार है" कहना अधूरा है। जैसे माँ कागज़ पर लिखकर ले जाए कि कब से, कितनी बार और क्या खाया। इलाज अक्सर साफ़ हो जाता है।
रहस्य 6: बाँटने से मन हल्का होता है
पाठ के अनुसार हर विधि का अन्त भोजन और दान से होता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: संकट के बाद कुछ बाँटना माँ-बाप के तनाव को उतार देता है। जैसे बच्चा ठीक होने पर पड़ोस के बच्चों में मिठाई बाँटना। इससे घर में आभार का माहौल बनता है।
आसान रास्ता: कोई भी कैसे करे
- बच्चे की सामान्य दिनचर्या लिखिए। तीन दिन तक सोना, दूध या भोजन और रोने का ढंग एक कॉपी में लिखें। रोज़ पाँच मिनट। आम तौर पर एक अपना-सा ढर्रा दिखने लगता है।
- ढर्रे से हटने पर पहला कदम चिकित्सक को फ़ोन। कुछ भी अलग दिखे तो नाम और नम्बर वाली पर्ची निकालें। शिशु की कोई भी दवा अनुभवी चिकित्सक से पूछकर ही दी जाती है।
- घर के बड़े काम बाँट लीजिए। एक व्यक्ति समय और लक्षण लिखे, दूसरा हल्का भोजन और पानी देखे, तीसरा माँ को आराम दे। दो मिनट की बैठक काफ़ी है। घर में हड़बड़ी घटती है।
- कमरा शान्त रखिए। रोशनी धीमी, शोर कम, हवा साफ़। फोन और टीवी बन्द। पाँच मिनट का काम है। बच्चा अक्सर जल्दी स्थिर होता है।
- पर्ची तैयार रखिए। कब से, कितनी बार, क्या खाया, कितनी नींद। चिकित्सक के सामने यही पढ़ दीजिए। बात छूटती नहीं।
- ठीक होने पर कुछ बाँटिए। पड़ोस में थोड़ी मिठाई या फल। किसी खर्च की ज़रूरत नहीं, घर का ही कुछ। घर का मन हल्का लगता है।
सबसे आम ग़लती
पड़ोसी के बताए नुस्ख़े या बड़े की बची हुई दवा बच्चे को दे देना। यह अध्याय पुराने पाठ को समझने के लिए है, घर पर आज़माने के लिए नहीं। बच्चे की दवा केवल अनुभवी चिकित्सक के माध्यम से ही जाती है।
आज की स्व-जाँच (2 मिनट)
- क्या आज मैंने घर की माँ के खाने और आराम की पूछ की?
- क्या मैंने बच्चे की कोई दवा या घरेलू योग बिना पूछे शुरू किया?
- क्या बच्चे के कमरे में हवा, रोशनी और शान्ति ठीक है?
- क्या मैंने बच्चे के रोने, सोने और दूध पीने के ढंग पर आज ध्यान दिया?
- क्या चिकित्सक का नम्बर मेरे पास अभी है?
जितने सवालों का उत्तर “हाँ” है, उतनी देखभाल आपने आज पूरी की। बाक़ी कल की कोशिश बनाइए।
आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)
- अध्याय 1 से 5: सही गुरु, शान्ति, वश्य, स्तम्भन और मन्त्र का अनुशासन। (पढ़ चुके)
- अध्याय 6 से 9: अर्क प्रकाश। (पढ़ चुके)
- अध्याय 10: कुमार तंत्र, शिशु और माता की देखभाल। (आप अभी यहाँ हैं)
- आगे: शिव-उपासना का रहस्य, स्तोत्र और ज्योतिर्लिंग, फिर ज्योतिष के विशेष योग।
पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।
अगले अध्याय में: शिव-उपासना का पहला भाग। पंचाक्षर मन्त्र, पाँच आवरणों में पूजन का क्रम, तीन प्रकार के शिवयोगी और शिवज्ञान के प्रकट होने की बात आएगी।
यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। शिशु और माता के स्वास्थ्य से जुड़ी हर बात में योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।
अंतिम प्रोफेशनल चेकलिस्ट
वास्तु प्लान या guidance page की समीक्षा करते समय हर बिंदु टिक करें ताकि मुख्य सत्यापन छूटे नहीं।









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