रावण विद्या

रावण विद्या अध्याय 7 — अर्क प्रकाश, दूसरा शतक: पाँच तरह के द्रव्य से अर्क, पिधान, धूप और सुगन्ध की विधि

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राणा सिकंदर सिंह 08 Nov 2026

रावण विद्या अध्याय 7 — अर्क प्रकाश, दूसरा शतक: पाँच तरह के द्रव्य से अर्क, पिधान, धूप और सुगन्ध की विधि

अध्याय सात

पहले शतक में यंत्र और आँच थी। दूसरे शतक में रावण बताते हैं कि हर चीज़ को यंत्र में डालने से पहले कैसे तैयार किया जाए।

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धूप में रखे मिट्टी के घड़े और पास की थाली में कुटी हुई जड़ी-बूटियाँ, पीछे आँगन में चाँदनी में रखे वैसे ही घड़े और ताँबे का आसवन-यंत्र
दिन में सूरज की गर्मी, रात में चाँद की ठण्डक: अर्क की तैयारी का पुराना क्रम

छठे अध्याय में हमने अर्क का यंत्र, छह तरह की आँच और अच्छे अर्क की पहचान देखी थी। वहाँ एक बात अधूरी रह गई थी: यंत्र में डाला क्या जाए, और किस हाल में? सूखी जड़ और गीली पत्ती को एक ही तरह से नहीं सँभाला जा सकता। दूधवाला पौधा और बिना रस वाला पेड़ भी अलग हैं। दूसरा शतक इसी सवाल का उत्तर है।

रावण मन्दोदरी से कहते हैं कि वैद्य को पाँच तरह के द्रव्यों से अर्क निकालना आना चाहिए। इस अध्याय में पानी का हिसाब, धूप-चाँदनी का समय, फूलों से ढकना, गन्ध हटाना और अन्न-मांस के अर्क, सब एक-एक करके आएँगे।

पिछले अध्यायों की याद

जड़ी-बूटी की पहचान, छह रस, पाँच कल्प, अर्क-यंत्र

यंत्र, आँच और समय की बात पहले शतक में आई थी। छठा अध्याय फिर से पढ़ें।

कुछ शब्द, जो इस अध्याय में आएँगे

  • द्रव्य — वह वस्तु जिससे अर्क निकले: जड़, पत्ता, फल, फूल, लकड़ी या रस।
  • पिधान — यंत्र के मुँह पर फूल या पत्ते रखकर ढकना, ताकि भाप में सुगन्ध मिले।
  • वासना — सुगन्ध देना: पात्र को धूनी देना या अर्क में सुगन्ध मिलाना।
  • प्रहर — लगभग तीन घण्टे। घड़ी — लगभग चौबीस मिनट।

पहली सीढ़ी: पाँच तरह के द्रव्य

दूसरा शतक रावण की इस घोषणा से शुरू होता है कि अब अर्क निकालने की विधि सुनो। पहले शतक में बताया गया था कि अर्क क्या है और यंत्र कैसा है। अब वैद्य के हाथ का काम आता है, यानी द्रव्य की तैयारी।

श्लोक 1 · अर्क निकालने की घोषणा

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि … पञ्चप्रकारद्रव्यस्य कुर्यान्निष्कासनं बुधः॥

हिन्दी अर्थ

रावण बोले: प्रिये, अब मैं अर्क निकालने की विधि बताता हूँ। समझदार वैद्य को पाँच तरह के द्रव्यों से अर्क निकालना चाहिए।

आज के जीवन में

पुराना ज्ञान यहाँ सबसे पहले वर्ग बनाता है। जब तक पता न हो कि सामने की चीज़ किस श्रेणी की है, उसके साथ कोई विधि नहीं चलती। आज इसका उपयोग यह है: रसोई में भी हर चीज़ का अलग मिज़ाज होता है। सूखा मसाला, हरी पत्ती और गीली सब्ज़ी एक ही तरह से नहीं पकतीं। पहले पहचानिए, फिर पकाइए।

श्लोक 2 · पाँच द्रव्य कौन-से हैं

अत्यन्तकठिनं चाद्यं कठिनं च द्वितीयकम्।
आर्द्रं तृतीयमुद्दिष्टं चतुर्थं पल्लवं भवेत्॥

हिन्दी अर्थ

पहला द्रव्य बहुत कठिन है, दूसरा कठिन, तीसरा आर्द्र यानी गीला, चौथा पल्लव यानी कोमल पत्ते जैसा, और पाँचवाँ तरल (द्रव) द्रव्य है।

आज के जीवन में

पाँच श्रेणियाँ इस तरह समझिए: बहुत कठिन (चन्दन जैसी कड़ी लकड़ी और जड़ें), कठिन (अजवायन, जीरा, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, चिरायता जैसे सूखे बीज और मसाले), गीला (हरे डण्ठल, पत्तियाँ, दूधवाले पौधे, फल), कोमल पल्लव (नई कोंपलें और फूल) और तरल (दूध, दही, छाछ, घी जैसी बहने वाली चीज़ें)। आगे हर श्रेणी के अपने नियम हैं।

दूसरी सीढ़ी: बहुत कठिन द्रव्य की तैयारी

क्रम, जैसा पाठ में है

  • द्रव्य को भूसे जैसा महीन पीसिए।
  • उसमें दोगुना जल डालिए और पात्र को छाया में रखिए।
  • जब मिश्रण गाढ़ा हो जाए, तब उतना ही जल फिर से डालिए जितना पहली बार डाला था।
  • इसे आठ प्रहर तक दिन में धूप की गर्मी और रात में चाँद की ठण्डक में रखिए। आठ प्रहर यानी लगभग एक पूरा दिन और रात।
  • फिर गणेश, सूर्य, भैरव और कुलदेवता को प्रणाम करके द्रव्य को अर्क-यंत्र में डालिए और अर्क खींच लीजिए।

श्लोक 3 · पीसना, भिगोना, धूप और चाँदनी

द्विगुणे निक्षिपेत्तोये छायायां स्थापयेत्तु तत्।
कृत्वाष्टप्रहरैस्तप्तं सूर्यचन्द्रकरैरलम्।
सम्पूज्य गणपं सूर्यं भैरवं कुलदेवताम्॥

हिन्दी अर्थ

दोगुना जल डालकर उसे छाया में रखें। फिर आठ प्रहर तक सूर्य और चन्द्रमा की किरणों से भली-भाँति तपाएँ और ठण्डा करें। इसके बाद गणेश, सूर्य, भैरव और कुलदेवता की पूजा करके उसे यंत्र में डालें।

आज के जीवन में

जड़ी-बूटी को एक ही दिन में नहीं निचोड़ा जाता। उसे धूप और चाँदनी में बारी-बारी रखकर धीरे-धीरे खुलने का समय दिया जाता है। पाठ के अनुसार इसी से अर्क में पूरा सार आता है। आज भी रातभर भिगोया काढ़ा जल्दी के काढ़े से अधिक गुणी माना जाता है।

श्लोक 4 · जिस द्रव्य से अर्क न निकालें

कीटैर्भुक्ते घुणैर्भुक्ते यच्च गन्धविवर्जितम्।
रहितं च रसेनापि नार्ककर्मणि योजयेत्॥

हिन्दी अर्थ

जो द्रव्य कीड़ों ने या घुन ने खा लिया हो, जिसकी गन्ध चली गई हो, और जिसका रस सूख गया हो, उसे अर्क के काम में न लें।

आज के जीवन में

पाठ यह भी कहता है कि एक वर्ष से पुराना और अत्यन्त कठोर द्रव्य, जैसे चन्दन, अर्क के लिए ठीक नहीं। और सबसे सीधी बात: अर्क के लिए सदा ताज़ा औषधि लीजिए। मसाले का डिब्बा हर कुछ महीने में सूँघकर परखिए।

तीसरी सीढ़ी: कठिन द्रव्य

श्लोक 5 · कठिन द्रव्य की सूची

यवान्यजाजीत्रिकटुभूनिम्बादिकमौषधम्।
ज्ञेयं तत्कठिनं द्रव्यं तदर्कस्य विधिं शृणु॥

हिन्दी अर्थ

अजवायन, जीरा, त्रिकुटा (सोंठ, कालीमिर्च, पीपल) और भूनिम्ब (चिरायता) जैसी औषधियाँ कठिन द्रव्य जानी जाती हैं। अब इनका अर्क निकालने की विधि सुनो।

आज के जीवन में

इन्हें दोगुने जल में डालिए और आठ प्रहर सूर्य-चन्द्र की किरणों में रखिए। पाठ यह छूट भी देता है कि देश और मौसम देखकर समय सोलह प्रहर तक बढ़ाया जाए। फिर यंत्र में डालकर धीरे-धीरे अर्क निकालिए।

आँगन में दिन की धूप में रखे मिट्टी के घड़े और रात की चाँदनी में रखे वैसे ही घड़े, बीच में कुटी हुई जड़ी-बूटी और पानी का कलश
भिगोई हुई जड़ी-बूटी को धूप और चाँदनी में बारी-बारी रखा जाता है

चौथी सीढ़ी: गीले द्रव्य के तीन भेद

गीले द्रव्य तीन तरह के हैं: रसदार, रसहीन और दूधवाले। रावण हर एक का नियम अलग-अलग बताते हैं।

रसदार गीले द्रव्य

  • कौन-से: बथुआ, सरसों का साग, निर्गुण्डी, अरण्ड और भांगरा जैसे हरे, रस वाले पौधे।
  • डण्ठल: नालों को पीसिए, चूर्ण के बीस भाग जल मिलाइए, लगभग दो मुहूर्त (डेढ़-दो घण्टे) धूप में रखिए, फिर अर्क निकालिए।
  • सिर्फ़ पत्ते: उन्हें सौ भाग जल में डालकर एक घड़ी (लगभग चौबीस मिनट) धूप में रखिए, फिर धीमे-धीमे अर्क लीजिए।

रसहीन गीले द्रव्य

  • कौन-से: वट (बरगद), पीपल और बाँस जैसे पेड़, जिनमें हरा रस नहीं भरा होता।
  • विधि: उन्हें बीस भाग जल में डालिए, एक प्रहर धूप में रखिए, फिर पहले बताई आँच क्रम से बढ़ाते हुए अर्क निकालिए।

श्लोक 6 · रसदार और रसहीन

वास्तुकं सार्षपं शाकं निर्गुण्ड्यैरण्डमार्कवम्।
वटाश्वत्थकरीराद्यमार्द्रद्रव्यं तु नीरसम्॥

हिन्दी अर्थ

बथुआ, सरसों का साग, निर्गुण्डी, अरण्ड और भांगरा रसदार गीले द्रव्य हैं। वट, पीपल और बाँस जैसे गीले द्रव्य रसहीन हैं।

आज के जीवन में

नियम निकलता है: जितना कम रस, उतना अधिक पानी और उतनी अधिक देर। सूखी दाल को घण्टों भिगोना पड़ता है, पालक को नहीं।

दूधवाले द्रव्य (जिनके तने से सफ़ेद रस निकलता है)

  • तीखे दूधवाले: वज्र, शातला, सेंहुड़ और शौरिणी आदि। इनके छोटे टुकड़े करके गरम जल में डालिए। तीन दिन बाद उसमें जल डालकर पीसिए। जब दूध का अंश दिखना बन्द हो जाए, तब दसवाँ भाग जल डालकर धीरे-धीरे अर्क निकालिए। इसे तीक्ष्ण अर्क कहते हैं।
  • मृदु दूधवाले: दुग्धिका (दुद्धी), आक और क्षीरी आदि। इनमें चार गुना जल मिलाकर धूप में रखिए। जल गरम हो जाए तो यंत्र में डालकर धीमे अर्क लीजिए। इसे मृदु अर्क कहते हैं।

पाँचवीं सीढ़ी: फल, फूल और लकड़ी

कौन-सा द्रव्य कैसे

  • कच्चे-पक्के नरम फल और आम: उन्हें बिना जल मिलाए ही अर्क के लिए लिया जाए। ये स्वयं रसयुक्त हैं।
  • बहुत पके हुए फल: इनका अर्क भी बिना पानी के लिया जाए।
  • गूलर, आम और देवदार की लकड़ी: छोटे टुकड़े करके अस्सी भाग जल मिलाइए। उसमें सज्जीखार और सेंधा नमक को चार-चार बार अलग-अलग डालिए। ख़ूब मसलकर चालीसवाँ भाग जल और डालिए। इसे घड़े (कलश) में रखकर धूप में गरम होने दीजिए। फिर यंत्र से उत्तम अर्क लीजिए।
  • फूल: फूलों में सोलहवाँ भाग जल मिलाकर अर्क निकालिए।
  • कायफल और चीड़ की लकड़ी: इनकी बुरी गन्ध हटाने के लिए पहले पानी में भिगोकर सुखा लीजिए। फिर चालीसवाँ भाग जल डालकर अर्क निकालिए।

इस हिस्से में सबसे दिलचस्प बात है पानी का हिसाब। फूल में सबसे कम पानी (सोलहवाँ भाग), लकड़ी में सबसे ज़्यादा (अस्सीवाँ भाग), और रस वाले फल में कुछ भी नहीं। जिस चीज़ में अपना रस जितना ज़्यादा, उसे उतना ही कम बाहर का पानी चाहिए।

छठी सीढ़ी: ढकना (पिधान) और रोकने वाले द्रव्य

पाठ में कहा गया है कि गीले और तरल द्रव्यों में कई अड़चनें आती हैं। इन्हें दूर करने के लिए पिधान, यानी ऊपर से ढकने की अनेक युक्तियाँ हैं और उनका कोई अन्त नहीं। उदाहरण के रूप में कुछ मुख्य बताए गए हैं।

श्लोक 7 · फूलों से ढकना

शतपत्रप्रसूनैर्वा जात्युत्थैर्मालतीभवैः।
पारिजातैः केतकिजैर्वा पिधानं समाचरेत्॥

हिन्दी अर्थ

कमल, चमेली, मालती, पारिजात अथवा केतकी के फूलों से पिधान करना (ढकना) उत्तम है।

आज के जीवन में

पाठ के अनुसार दूध, दही, छाछ, शहद, तेल, घी, गोमूत्र या साफ़ जल के अर्क में चमेली का पिधान करना चाहिए। यानी भाप के रास्ते में फूल रखे जाते थे, ताकि अर्क में उनकी सुगन्ध आए। यह गुलाब-जल और केवड़ा-जल की परम्परा का ही पुराना रूप है।

श्लोक 8 · तरल की रोक

अथ च स्तम्भकं द्रव्यं दध्नो हि नवनीतकम्।
… गोकण्टकस्तु दुग्धस्य तथा मद्यस्य कीचकम्॥

हिन्दी अर्थ

दही का स्तम्भक (रोकने या थामने वाला साथी) मक्खन है। दूध का स्तम्भक गोखरू के काँटे और मद्य का स्तम्भक बाँस है।

आज के जीवन में

पूरी सूची: दही के साथ मक्खन, जल के साथ बेल, घी के साथ शहद (या मोम), दूध के साथ गोखरू का काँटा, मद्य के साथ बाँस और तेल के साथ खली। बाक़ी जगह अपने विवेक से काम लें।

श्लोक 9 · किस पात्र में

कान्तायससत्त्वस्य कृतं पात्रमनुत्तमम्।
निष्कासयेदेवमर्कं द्रवद्रव्यस्य नान्यथा॥

हिन्दी अर्थ

कान्त-लौह, लोहे और पत्थर के सत्त्व से बने पात्र में ही गीले (द्रव) द्रव्य का अर्क निकालें। दूसरे पात्रों में यह करना ठीक नहीं।

आज के जीवन में

इसके बाद द्रव से भरी ऊँचे किनारे वाली थाली यंत्र के भीतर रखी जाती है और यंत्र के किनारे भली-भाँति ढक दिए जाते हैं। अर्क निकलते समय झाग उठे तो पाठ के अनुसार वह श्रेष्ठ अर्क का लक्षण है।

सातवीं सीढ़ी: दुर्गन्ध हटाना और सुगन्ध देना (वासना)

कई औषधियाँ और विशेषकर मांस जैसी चीज़ें तीखी गन्ध छोड़ती हैं। रावण यहाँ दो काम बताते हैं: पहले गन्ध हटाना, फिर मनचाही सुगन्ध देना।

दुर्गन्ध हटाने की विधि (पाठ के अनुसार)

  • हींग, जीरा, मेथी और राई को घी में भूनिए।
  • एक नया पात्र लीजिए और उसमें इन्हें डालकर बार-बार धूनी दीजिए।
  • उस पात्र में अर्क डालिए। जब तक दुर्गन्ध न जाए, यही क्रिया दोहराइए।
  • पाठ कहता है कि इस तरह अर्क में रुचि जगाने वाली गन्ध आ जाती है और वह जठराग्नि, यानी भूख को जगाने वाला बनता है।

इसके बाद रोग के हिसाब से सुगन्ध की बात आती है। यह पूरा क्रम इतना व्यवस्थित है कि इसे सारणी की तरह पढ़ना ठीक रहेगा।

कौन-सी सुगन्ध किस प्रकृति के लिए

  • वात के रोगों में: भैंसा-गूगल और उसके साथी: राल, चीड़ का निर्यास (गोंद), काला अगर और लौंग। इन पाँचों को महिषाक्ष पंचक कहा गया।
  • पित्त के रोगों में: चन्दन आदि की सुगन्ध।
  • कफ के रोगों में: जटामांसी आदि की सुगन्ध।
  • जटामांसी वर्ग की सात चीज़ें: जटामांसी, नख, तेजपात, लौंग, तगर, कपूर और बकुची आदि। चन्दन, खस, इलायची और कचूर भी इसी परिवार की सुगन्धों में गिने गए हैं।

श्लोक 10 · रोग के हिसाब से सुगन्ध

सर्वेषु पित्तरोगेषु चन्दनादि च वासनम्।
सर्वेषु कफरोगेषु जटामांस्यादिवासनम्॥

हिन्दी अर्थ

सब पित्त के रोगों में चन्दन आदि की सुगन्ध (वासना) दें, और सब कफ के रोगों में जटामांसी आदि की।

आज के जीवन में

गर्मी और पित्त में चन्दन, खस और गुलाब जैसी ठण्डी सुगन्ध अच्छी लगती है, और कफ के मौसम में कपूर, इलायची और लौंग जैसी खुली गन्ध। पाठ आगे कहता है कि बारह अंग वाली धूप अर्क को सुवासित करने के लिए जलाई जाए। पारम्परिक मत है कि उसकी धूनी से बुरे प्रभाव दूर रहते हैं।

दस अंग की धूप (दशांग धूप) के भाग

  • भैंसा-गूगल: पाँच भाग।
  • चन्दन और जटामांसी: चार-चार भाग।
  • सज्जीखार और राल: तीन-तीन भाग।
  • खस: दो भाग।
  • इनके बाद नख, घी, कपूर और कस्तूरी भी थोड़े-थोड़े भाग में मिलाए जाते हैं।

पाठ कहता है कि यह दशांग धूप शिव का भी मन हर लेती है। यानी इसकी सुगन्ध अत्यन्त मोहक मानी गई है।

नए मिट्टी के पात्र के नीचे धूप-दान से उठता धुआँ, पास में घी में भुने मसाले, चमेली और कमल के फूल रखे हुए
नए पात्र को धूनी देना और चमेली-कमल के फूलों से ढकना

आठवीं सीढ़ी: प्याज़ और लहसुन का अर्क

रावण मन्दोदरी से कहते हैं: ध्यान से सुनो, अब मैं लहसुन की दुर्गन्ध हटाने का उपाय बताता हूँ। यह क्रम पूरे शतक में सबसे विस्तृत उदाहरण है, इसलिए इसे सीढ़ी-दर-सीढ़ी देखिए।

गन्ध हटाने का क्रम (प्याज़ और लहसुन)

  1. उन्हें अच्छी तरह छीलिए और गूदा छाछ में डाल दीजिए।
  2. छाछ खट्टी होनी चाहिए। उसमें गूदा आठ प्रहर (एक दिन-रात) पड़ा रहने दीजिए।
  3. निकालकर द्रोणपुष्पी के फूलों के रस से या मूर्वा के पत्तों के रस से तीन बार धोइए।
  4. फिर क्रम से हल्दी के जल में और राई के जल में रखिए।
  5. उसके बाद गुनगुने जल से धोइए।
  6. इसे कमल के फूल या पत्ते की धूनी दीजिए।
  7. फिर दशांग धूप की धूनी और पाँच भाग की सुगन्ध (वासना) दीजिए।
  8. ऐसा करके इसे एक प्रहर खुली धूप में रखिए।
  9. अन्त में चमेली के फूलों का पिधान लगाकर अर्क निकालिए।

श्लोक 11 · लहसुन का सुगन्धित अर्क

तस्यार्कस्य सुगन्धेन एकदा मोहितो हरः।
को जानाति रसोनस्य ह्यर्कोऽयमिति भूतले॥

हिन्दी अर्थ

उस अर्क की सुगन्ध से एक बार शिव भी मोहित हो गए थे। पृथ्वी पर कौन जान सकेगा कि यह लहसुन का अर्क है?

आज के जीवन में

पाठ के अनुसार इस अर्क में लहसुन की गन्ध नहीं मिलती। सीख यह है कि धैर्य से हर चीज़ निखर सकती है। छाछ की खटास, हल्दी का रंग और राई की धार, तीनों गन्ध को बाँधकर खींच लेते हैं।

नौवीं सीढ़ी: रावण की कथा, तीन तरह के मांस और उनके अर्क

रावण एक कथा सुनाते हैं। स्वर्ग जीतकर उन्होंने अमृत पाया, पर देवताओं ने उसे चुरा लिया। निराश होकर वे शिव के सामने अपना शीश चढ़ाने को तैयार हुए। शिव प्रसन्न हुए, देवताओं से अवध्य रहने का वर दिया और कहा कि अमृत से भी अधिक रुचिकर वस्तुओं की विधि सुनो: मांस का अर्क और मद्य का अर्क।

पाठ मांस को तीन भेदों में बाँटता है।

  • कोमल (कबूतर, बटेर, गौरैया, ख़रगोश, छोटी मछलियाँ): चालीस भाग मांस के बड़े टुकड़े धोकर साठ भाग गन्ने का रस (न हो तो दूध) मिलाइए। फिर लौंग, तेजपात, इलायची, जायफल, नागकेसर, कालीमिर्च, कस्तूरी और कपूर की अष्टगन्ध डालिए, फूलों का पिधान कीजिए और अर्क निकालिए।
  • कठिन (मृग, हिरण, बड़ी मछलियाँ, झींगे): छोटे टुकड़े करके खारा नमक मिलाइए, काँजी के जल से तीन बार और गुनगुने पानी से सात बार धोइए, फिर पहले की तरह अर्क लीजिए।
  • घना (हाथी, मगर, गाय, घोड़ा, भैंस): बहुत महीन टुकड़ों में शंख द्रव मिलाइए, जल या दूध से धोइए, सात बार नमक देकर धोइए और पूर्व विधि से अर्क लीजिए।

सीख सीधी है: जितनी कठोर वस्तु, उतनी अधिक सफ़ाई और उतने अधिक चरण।

दसवीं सीढ़ी: शंख द्रव, आठ क्षार और आठ नमक

घने मांस के लिए जिस शंख द्रव का नाम आया, उसके घटक हैं आठ क्षार (सज्जीखार, जवाखार, सुहागा, आक, सेंहुड, पलाश और अपामार्ग के क्षार आदि) और आठ नमक (सेंधा, सोंचर, विड, समुद्र, उद्भिद, रोमक, गड और खारी)। इन्हें मिलाकर नीबू के रस में इक्कीस बार भिगोया-सुखाया जाता है, फिर काँच की कुप्पी में मिट्टी का लेप करके चूल्हे में रखा जाता है। ऊपर जल में रखी दूसरी लम्बी कुप्पी जोड़ी जाती है, ताकि काँच की गर्मी जल तक न पहुँचे। पाँच प्रहर क्रम से आँच देने पर क्षार का अर्क मिलता है। पाठ का दावा है कि इसमें हड्डी या सीप का अंश भी गल जाता है। यानी यह द्रव बहुत तेज़ माना गया है।

ग्यारहवीं सीढ़ी: अन्न से निकले अर्क और उनके नाम

अन्त में रावण अन्न आदि से बनने वाले अर्क, यानी मद्य, का परिचय देते हैं। पाठ इसकी शुरुआत इस नियम से करता है कि अन्न को पतला करके ही उसमें से अर्क निकाला जाए, और उसकी गन्ध को दूर करने के लिए अष्टगन्ध और पहले बताई धूनी दी जाए। अष्टगन्ध तब डालें जब आधा जल मिला दिया गया हो।

अन्न से बने अर्कों के नाम

  • तुषोदक: कच्चे जौ को भूसे सहित पीसकर बनता है।
  • सौवीर: बिना छिलके के जौ से बनता है। गेहूँ से बना सौवीर जौ वाले से हल्का होता है।
  • आरनाल: छिलका उतारे हुए गेहूँ से बनता है।
  • धान्याम्ल: चावल और कोदों जैसे अन्न से बनता है।
  • शण्डाकी: पत्तों सहित मूली को सरसों या राई के साथ मिलाकर, चावल की पिट्ठी डालकर बनता है।
  • सूक्त: कन्द, मूल और फलों में चिकनाई और नमक मिलाकर बनता है।
  • अरिष्ट: औषधियों को जल में पकाकर बनता है। यह सबसे अधिक गुण वाला और भारी माना गया है।
  • सुरा: चावल और पेठे से बनती है।
  • वारुणी: पुनर्नवा को पत्थर पर पीसकर, हरड़ और साठी चावल की पिट्ठी से, या ताड़ और खजूर के रस से बनती है।
  • सीधु: पके हुए गन्ने के रस से बनता है। कच्चे रस से बनी चीज़ शीतरस कहलाती है।

श्लोक 12 · तीन प्रकृतियाँ

पर्यायाद्यो भवेन्मद्यस्तामसो राक्षसप्रियः।
मण्डादी राजसो ज्ञेयस्ततो वै सात्त्विको भवेत्॥

हिन्दी अर्थ

जो मद्य बार-बार (कई पर्याय में) निकाला जाए वह तामसी है और राक्षसों को प्रिय है। माण्ड से बनने वाला राजसी है। बल और बुद्धि के लिए लाभकारी, कम मादक मद्य सात्त्विक है।

आज के जीवन में

पाठ का क्रम: गीत और हँसी में सात्त्विक, साहस के काम में राजस, और निद्रा में तामस। यह वही गिनती है जो गीता में आहार के तीन भेदों में मिलती है: आहार के तीन प्रकार।

ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध

जो व्यक्ति बहुत लोगों का भार उठाता है, उसके पास हर काम के लिए एक विधि होनी चाहिए। रावण का यह शतक कोई एक नुस्ख़ा नहीं देता, पूरी कार्य-विधि देता है: पहचान, वर्ग, अनुपात, समय, पात्र, सुगन्ध और जाँच। बड़े पद की समझ यही है कि अच्छा फल हड़बड़ी में नहीं आता। वह तैयारी, गिनती और धैर्य से आता है, और जो इन तीनों को निभाता है वही भरोसे का वैद्य, राजा या प्रबन्धक बनता है।

इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)

  1. पहले श्रेणी, फिर विधि। कठोर, कठिन, गीला, कोमल या तरल, श्रेणी पहचानकर ही आगे बढ़िए।
  2. जितना कम रस, उतना अधिक पानी और समय। रसदार चीज़ को कम, रसहीन को ज़्यादा।
  3. ताज़ा द्रव्य लीजिए। पुराना, घुना या गन्धहीन माल अर्क के काम नहीं आता।
  4. धूप और चाँदनी बारी-बारी। तैयारी को समय दीजिए, जल्दबाज़ी में निचोड़ने से सार नहीं मिलता।
  5. गन्ध भी औषधि का हिस्सा है। बुरी गन्ध हटाना और रोग के अनुसार सुगन्ध देना, दोनों उतने ही ज़रूरी हैं।

7 दिन का अभ्यास

  • दिन 1: रसोई के मसाले सूँघकर देखिए। जिसकी गन्ध चली गई हो, उसे बदलिए।
  • दिन 2: अजवायन या सौंफ रात में भिगोइए और सुबह उसका स्वाद देखिए।
  • दिन 3: एक सूखी और एक हरी चीज़ अलग-अलग पानी और समय से तैयार कीजिए। फ़र्क़ लिखिए।
  • दिन 4: बर्तन की गन्ध हटाने के लिए नीबू या हल्दी आज़माइए।
  • दिन 5: चन्दन, खस, इलायची या लौंग की एक हल्की सुगन्ध शाम को जलाइए।
  • दिन 6: किसी बुज़ुर्ग से पूछिए कि घर में गुलाब-जल या केवड़ा-जल कभी बनता था या नहीं।
  • दिन 7: जो काम जल्दबाज़ी में निपटाया हो, उसे आज धीरे और क्रम से दोहराइए।

यही बात और जगह कैसे समझाई गई है

घर में पूजा, रसोई या औषधि रखने की सही दिशा जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।

और रहस्य: जो इस अध्याय में छिपे हैं

रहस्य 1: सोते समय भी काम चलता रहता है

पाठ के अनुसार द्रव्य को आठ प्रहर, यानी पूरा दिन और रात, धूप और चाँदनी में रखा जाता है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: कुछ काम रात भर में पकते हैं। दाल रात को भिगोइए, और कल की तीन ज़रूरी बातें शाम को लिख लीजिए। सुबह सब हल्का मिलता है।

रहस्य 2: पानी किस्तों में डालिए

पाठ के अनुसार जब मिश्रण गाढ़ा हो जाए, तब उतना ही पानी दोबारा डाला जाता है, एक बार में नहीं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: कोई भी चीज़ किस्तों में बेहतर सधती है। आटा गूँधना हो या बच्चे को सुझाव देना, थोड़ा-थोड़ा करके देखिए।

रहस्य 3: ढीली चीज़ को थामने वाला साथी

पाठ में हर बहने वाली चीज़ का एक थामने वाला साथी बताया गया है, जैसे दही के साथ मक्खन। हमारा पाठ-निष्कर्ष: ढीले इरादे को भी थामने वाला चाहिए। पढ़ाई की योजना किसी मित्र को बता दीजिए। रोज़ एक पंक्ति पूछने वाला साथी होने से इरादे अक्सर टिकते हैं।

रहस्य 4: पहले बुराई हटाइए, फिर सुगन्ध डालिए

पाठ के अनुसार नए पात्र को धूनी देकर बुरी गन्ध तब तक हटाई जाती है जब तक वह जाए नहीं, उसके बाद सुगन्ध दी जाती है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: गन्दगी पर इत्र डालने से काम नहीं बनता। पहले अलमारी साफ़ कीजिए, फिर सजाइए। पहले ग़लती मानिए, फिर तारीफ़ कीजिए।

रहस्य 5: कड़े स्वभाव को कई नरम क़दम

पाठ में लहसुन की तेज़ गन्ध हटाने के नौ क़दम हैं: छाछ, धुलाई, हल्दी, राई, धूनी, धूप और आख़िर में फूलों का ढकना। हमारा पाठ-निष्कर्ष: कड़ी आदत एक झटके में नहीं जाती। कई छोटे, नरम क़दम मिलकर वह कर देते हैं जो एक कठोर क़दम नहीं कर पाता।

रहस्य 6: आख़िरी छुअन ही पहली छाप बनती है

पाठ के अनुसार अर्क निकालते समय ऊपर से फूलों का ढकना यानी पिधान लगाया जाता है, जिससे सुगन्ध भाप में मिलती है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: काम के आख़िर का दो मिनट का सलीक़ा याद रह जाता है। दुकान बन्द करते समय मुस्कान, या मेहमान को दरवाज़े तक छोड़ना।

आसान रास्ता: कोई भी कैसे करे

  1. शाम को कल का एक बड़ा काम चुनिए। उसे तीन छोटे हिस्सों में तोड़कर लिखिए। पाँच मिनट। रात भर में मन उन हिस्सों को चुपचाप सुलझाता है, और सुबह शुरू करना आसान लगता है।
  2. कामों को हल्का, मध्यम और भारी में बाँटिए। रसोई की तरह: पहले पहचान, फिर विधि। तीन मिनट। भारी को सबसे ताज़े समय में रखिए।
  3. भारी काम किस्तों में कीजिए। पच्चीस मिनट काम, पाँच मिनट विराम। जल्दबाज़ी वाला निचोड़ कम मिलता है, धीमा हो तो ज़्यादा साफ़ नतीजा आता है।
  4. पहले सफ़ाई। जिस जगह काम करना है, पाँच मिनट में साफ़ कीजिए। मेज़ का कचरा हटाइए, फ़ोन की बेकार सूचनाएँ बन्द कीजिए। फिर सजावट या नई शुरुआत।
  5. एक साथी चुनिए। किसी को बताइए कि आज क्या करेंगे। रात को एक वाक्य में बताइए कि हुआ या नहीं। अक्सर यह अकेले करने से ज़्यादा चलता है।
  6. आख़िर में दो मिनट का समापन कीजिए। जगह समेटिए, सामान ठीक रखिए, काम पूरा होने का धन्यवाद कहिए। अगली सुबह घर या दुकान सुथरी मिलती है।

सबसे आम ग़लती

तैयारी छोड़कर सीधे आख़िरी चरण पर कूद जाना। जैसे बिना भिगोए पकाना या बिना सोचे बोल देना। पाठ में सबसे ज़्यादा पन्ने तैयारी को मिले हैं। नतीजे की कोई गारंटी नहीं, पर तैयार काम में चूक अक्सर कम होती है। यहाँ अन्न-मांस या नशे की कोई विधि नहीं सिखाई गई है।

आज की स्व-जाँच (2 मिनट)

  • क्या मेरे मसाले ताज़ा हैं और उनमें अब भी अपनी गन्ध है?
  • क्या मैंने आज किसी काम में जल्दबाज़ी की जगह तैयारी को समय दिया?
  • क्या मैंने कोई चीज़ बनाने से पहले यह पहचाना कि वह कैसी है: सूखी, गीली या रसदार?
  • क्या मैंने अपने खाने के बर्तनों की गन्ध और सफ़ाई पर ध्यान दिया?
  • क्या मैंने किसी बड़े-बुज़ुर्ग से घर के पुराने उपाय की कोई एक विधि पूछी?

जितने सवालों का उत्तर "हाँ" है, उतना तैयारी का अनुशासन आपने कमाया। बाक़ी अगले सप्ताह की कोशिश बनाइए।

आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)

  • अध्याय 1 से 5: सही गुरु, शान्ति, वश्य, स्तम्भन और मन्त्र का अनुशासन। (पढ़ चुके)
  • अध्याय 6: अर्क प्रकाश का पहला शतक। (पढ़ चुके)
  • अध्याय 7: पाँच तरह के द्रव्य से अर्क की विधि। (आप अभी यहाँ हैं)
  • आगे: एक-एक जड़ी-बूटी के अलग अर्क और उनके गुण, और फिर संयुक्त औषधि-समूहों के अर्क।

पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।

अगले अध्याय में: अर्क प्रकाश का तीसरा शतक। इसमें एक-एक जड़ी-बूटी के अलग अर्क और पाठ के अनुसार उनके गुण आएँगे: हरड़, आँवला, सोंठ, पीपल, जीरा, सौंफ, नीम, तुलसी, ब्राह्मी और बहुत-सी और।

यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। स्वास्थ्य से जुड़ी बातों में, ख़ासकर गर्भवती स्त्री और बच्चों के मामले में, योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

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राणा सिकंदर सिंह

वास्तु गुरुजी राणा सिकंदर सिंह के मार्गदर्शन में • VastuGuruji संस्थापक • 10+ वर्षों का अनुभव • रायपुर, छत्तीसगढ़ • विशेषज्ञता: 45 देवता वास्तु + ज्योतिष • रायपुर में वास्तु सलाहकार

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्क प्रकाश के दूसरे शतक में क्या है?
दूसरे शतक में रावण बताते हैं कि अर्क के लिए द्रव्य पाँच तरह के होते हैं: बहुत कठिन, कठिन, गीला, कोमल पल्लव और तरल। हर श्रेणी में कितना पानी डालना है, कितनी देर धूप और चाँदनी में रखना है और कैसे यंत्र में डालना है, यह क्रम से दिया गया है।
पाठ के अनुसार बहुत कठिन द्रव्य से अर्क कैसे निकालते हैं?
द्रव्य को भूसे जैसा महीन पीसकर उसमें दोगुना जल डालते हैं और पात्र को छाया में रखते हैं। गाढ़ा होने पर उतना ही जल फिर डालते हैं। फिर आठ प्रहर तक दिन में धूप और रात में चाँदनी में रखकर गणेश, सूर्य, भैरव और कुलदेवता को प्रणाम करके यंत्र में अर्क खींचा जाता है।
किस द्रव्य से अर्क नहीं निकालना चाहिए?
पाठ के अनुसार जो द्रव्य एक वर्ष से अधिक पुराना और अत्यन्त कठोर हो, जैसे चन्दन आदि, जिसे कीड़ों या घुन ने खाया हो, और जिसकी गन्ध या रस जा चुका हो, उससे अर्क नहीं निकालना चाहिए। अर्क के लिए सदा ताज़ा औषधि लेने की बात कही गई है।
पिधान क्या होता है?
पिधान का अर्थ ढकना है। अर्क निकालते समय यंत्र के मुँह पर कमल, चमेली, मालती, पारिजात या केतकी के फूल रखे जाते थे, ताकि भाप में उनकी सुगन्ध मिल जाए। दूध, दही, छाछ, शहद, तेल, घी या साफ़ जल के अर्क में चमेली का पिधान बताया गया है।
प्याज़ और लहसुन की गन्ध अर्क से कैसे हटाई जाती है?
पाठ के अनुसार छीला हुआ गूदा खट्टी छाछ में आठ प्रहर रखा जाता है, फिर द्रोणपुष्पी या मूर्वा के रस से तीन बार धोया जाता है। उसके बाद हल्दी और राई के जल में रखकर गुनगुने जल से धोते हैं, कमल की धूनी और दशांग धूप देते हैं, एक प्रहर धूप में रखते हैं और चमेली का पिधान लगाकर अर्क निकालते हैं।
दशांग धूप में क्या-क्या मिलाया जाता है?
पाठ के अनुसार भैंसा-गूगल पाँच भाग, चन्दन और जटामांसी चार-चार भाग, सज्जीखार और राल तीन-तीन भाग, खस दो भाग, और नख, घी, कपूर तथा कस्तूरी थोड़े-थोड़े भाग में मिलाए जाते हैं। पाठ कहता है कि यह धूप शिव का भी मन हर लेती है।
क्या ये विधियाँ घर पर आज़माने के लिए हैं?
ये विधियाँ पुरानी परम्परा समझने के लिए हैं। इसी ग्रन्थ का नियम है कि रोगी के लक्षण जानकर ही दवा दी जाए। गर्भवती स्त्री, बच्चों और किसी भी रोग में कोई अर्क या नुस्ख़ा शुरू करने से पहले योग्य वैद्य या डॉक्टर की सलाह लें।
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