रावण विद्या

रावण विद्या अध्याय 6 — अर्क प्रकाश: रावण का औषधि-ज्ञान, छह रस, पाँच कल्प और अर्क का पूरा यंत्र

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राणा सिकंदर सिंह 08 Nov 2026

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रावण विद्या अध्याय 6 — अर्क प्रकाश: रावण का औषधि-ज्ञान, छह रस, पाँच कल्प और अर्क का पूरा यंत्र

अध्याय छह

लंका का राजा सिर्फ़ योद्धा नहीं था। वह वैद्य भी था, और उसकी औषधि-पुस्तक में हर बात नाप-तौल के साथ लिखी है।

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सुबह की रोशनी में मिट्टी और ताँबे के आसवन-यंत्र से भाप उठती हुई, पास में जड़ी-बूटियों की टोकरियाँ और काँच की बोतल में गिरती बूँदें
अर्क बनाने का पुराना यंत्र: नीचे पात्र, ऊपर गुम्बद और हाथी की सूँड जैसी नली

पहले पाँच अध्यायों में हमने मन, वाणी, ठहराव और जप का अनुशासन पढ़ा। अब हम उस हिस्से में चलते हैं जिसके बारे में लोग सबसे कम जानते हैं: रावण की औषधि-विद्या। शिव-पार्वती के संवाद के बाद रावण का सबसे बड़ा ज्ञान-भण्डार यही माना जाता है, और उसका नाम है अर्क प्रकाश।

इस अध्याय में आप जानेंगे कि पुराने वैद्य जड़ी-बूटी को किन पाँच रूपों में पहचानते थे, पौधे का कौन-सा अंग सबसे ताक़तवर माना गया, छह रस और पाँच गुण क्या हैं, जगह बदलने से दवा का असर क्यों बदलता है, और अर्क यानी भाप से खींचा गया सार कैसे बनता था। यंत्र की बनावट, छह तरह की आँच, समय और बर्तन तक सब कुछ यहाँ है।

इस अध्याय में क्या-क्या मिलेगा

  • कथा: मन्दोदरी का प्रश्न और पार्वती का उत्तर, जहाँ से यह विद्या शुरू होती है।
  • जड़ी-बूटी का वर्गीकरण: पाँच रूप, पाँच अंग और कौन-सा अंग कितना बलवान।
  • छह रस और पाँच गुण: हर रस शरीर में क्या करता है, पुराने पाठ के अनुसार।
  • जगह का असर: जंगल, जल-प्रदेश, दक्षिण और उत्तर की जड़ी-बूटी में फ़र्क़।
  • पाँच कल्प: कल्क, चूर्ण, रस, तेल और अर्क, और अर्क को श्रेष्ठ क्यों कहा गया।
  • अर्क-यंत्र: पात्र की बनावट, धातुएँ, छह आँचें, समय, लकड़ी और बर्तन।
  • जाँच: अच्छा अर्क कैसे पहचानें और ख़राब हो तो क्या करें।
  • वैद्य की परख: रोगी का हाल जानने के नियम, और "दूत-विचार" की पुरानी परम्परा।

पिछले अध्यायों की याद

शान्ति, भरोसा, ठहराव, जप का अनुशासन

शरीर और मन साथ चलते हैं। पाँचवें अध्याय का अनुशासन तभी टिकता है जब शरीर स्वस्थ हो। पाँचवाँ अध्याय फिर से पढ़ें।

कुछ शब्द, जो इस अध्याय में आएँगे

  • अर्क — जड़ी-बूटी को पानी के साथ गर्म करके भाप से खींचा गया साफ़ सार, जैसे आज का गुलाब-जल।
  • कल्प — दवा तैयार करने का तरीक़ा: कल्क, चूर्ण, रस, तेल या अर्क।
  • रस — स्वाद: मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कसैला।
  • विपाक — पचने के बाद दवा का असली असर।
  • पंचांग — पौधे के पाँच अंग: पत्ता, फूल, छाल, फल और जड़।
  • प्रहर — दिन-रात का आठवाँ हिस्सा, लगभग तीन घण्टे।

पहली सीढ़ी: कथा का आरम्भ

अर्क प्रकाश एक संवाद के रूप में लिखा गया है। रावण की पत्नी मन्दोदरी गर्भवती हैं और कमज़ोरी से परेशान हैं। वे पूजा के बाद पति से पूछती हैं कि गर्भवती स्त्री के लिए क्या उपाय है, जिससे गर्भ और बल दोनों बढ़ें। उत्तर में रावण वह बात सुनाते हैं जो उन्होंने माँ पार्वती से सीखी थी।

पार्वती ने रावण को बताया था कि प्रकृति ने उनके शरीर के रोम-रोम से अनेक औषधियाँ पैदा की हैं, और जो इन औषधियों का ज्ञान रखता है वह बड़े से बड़े संकट में टिकता है। यही ज्ञान लेकर रावण ने मन्दोदरी को समझाना शुरू किया। ग्रन्थ का आरम्भ मंगलाचरण से होता है।

श्लोक 1 · मंगलाचरण

औषधीपतिनेत्राय पद्मनीपतिमूर्तये।
कालकालाय नीलाय पार्वतीपतये नमः॥

हिन्दी अर्थ

जिनके नेत्र में औषधियों के पति चन्द्रमा विराजते हैं, जिनका रूप निर्मल है, जो काल के भी काल और नीलकण्ठ हैं, उन पार्वतीपति शिव को नमस्कार।

आज के जीवन में

पुराना वैद्य चिकित्सा को पूजा से अलग नहीं मानता था। उसके लिए जड़ी-बूटी तोड़ना भी एक विनम्र काम था। आज इसका उपयोग यह है: दवा या घरेलू उपचार लेते समय जल्दबाज़ी नहीं, आदर और ध्यान चाहिए। जो चीज़ शरीर में जाती है, उसे सोच-समझकर ही डालिए।

दूसरी सीढ़ी: औषधि के पाँच रूप और पाँच अंग

रावण कहते हैं कि औषधियाँ पाँच रूपों में मिलती हैं। इनकी पहचान ऐसे बताई गई है:

  • लता — बेल की तरह चढ़ने वाली, जैसे गिलोय (गुड़ूची)।
  • गुल्म — झाड़ी की तरह फैलने वाली, जैसे पित्तपापड़ा (पर्पट)।
  • शाखी — शाखाओं वाला पेड़, जैसे आम।
  • पादप — बड़े और घने वृक्ष, जैसे बरगद और पीपल।
  • प्रसरा — ज़मीन पर फैलने वाली, जैसे भटकटैया (कण्टकारी)।

श्लोक 2 · औषधि के पाँच रूप

ओषध्यः पञ्चधा ख्याता लता गुल्माश्च शाखिनः।
पादपाः प्रसराश्चेति तेषां वक्ष्यामि लक्षणम्॥

हिन्दी अर्थ

औषधियाँ पाँच प्रकार की प्रसिद्ध हैं: लता, गुल्म, शाखी, पादप और प्रसरा। अब मैं उनके लक्षण बताता हूँ।

आज के जीवन में

यह वर्गीकरण आज भी काम का है। जड़ी-बूटी लेने से पहले पौधे को पहचानना सीखिए। बाज़ार में एक ही नाम से कई पौधे बिकते हैं। नाम के साथ पौधे का रूप, यानी बेल है, झाड़ी है या पेड़, जानने से धोखा कम होता है।

इसके बाद पौधे के पाँच अंगों की बात आती है, जिन्हें पंचांग कहा गया है: पत्ता, फूल, छाल, फल और जड़। पाठ का क्रम बहुत रोचक है, क्योंकि इसके अनुसार पौधे का हर अगला अंग पिछले से अधिक बलवान माना गया है।

श्लोक 3 · पौधे के पाँच अंग

पत्रं पुष्पं वल्कलं च फलं मूलं क्रमेण च।

हिन्दी अर्थ

पत्ता, फूल, छाल, फल और जड़, यह क्रम है (अगला अंग पिछले से अधिक बलवान)।

आज के जीवन में

पाठ के अनुसार पत्ते से अधिक फूल, फूल से अधिक छाल, छाल से अधिक फल, और सबसे अधिक जड़ में शक्ति है। उदाहरण भी दिए गए हैं: तालीस के पत्ते, धातकी के फूल, बरगद की छाल, त्रिफला के फल और पंचांगुल की जड़ अधिक उपयोगी हैं। जिस दवा के अंग का नाम न लिखा हो, वहाँ पौधे का सार लिया जाए, जैसे खदिर का सार।

इसका सीधा मतलब यह है कि जड़ी-बूटी के नुस्ख़े में अंग का नाम बहुत मायने रखता है। "अर्जुन" लिखा हो तो उसकी छाल, "बिल्व" लिखा हो तो फल या जड़, यह पूछकर ही लीजिए। जड़ और छाल ज़्यादा ताक़तवर हैं, इसलिए उनमें मात्रा का ध्यान और ज़्यादा ज़रूरी है।

धूप वाले कमरे में लकड़ी की मेज़ पर पाँच तरह के औषधीय पौधे और सामने पत्ता, फूल, छाल, फल और जड़ की कतार
एक ही पौधे के पाँच अंग, और हर अंग का अलग बल

तीसरी सीढ़ी: छह रस और पाँच गुण

पाठ कहता है कि दवा वही है जिसमें रस, गुण, वीर्य (बल), विपाक और शक्ति, इन पाँचों का मेल हो। इनमें सबसे पहले रस आता है, जो स्वाद है।

श्लोक 4 · छह रस

स्वाद्वम्लो लवणस्तिक्तः कटुकश्चैव कषायकः।

हिन्दी अर्थ

मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और कषाय, ये छह रस प्रसिद्ध हैं। (प्रकृति में ये क्रम से आगे वाले से कुछ कम बलवान माने गए हैं।)

आज के जीवन में

आज की भाषा में ये छह स्वाद हैं: मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कसैला। आयुर्वेद का सीधा नियम है कि दिन के भोजन में छहों स्वाद किसी न किसी रूप में हों। जिस थाली में कड़वा और कसैला स्वाद छूट जाता है, वहाँ पाचन और भूख अक्सर बिगड़ती है।

हर रस का काम (पुराने पाठ के अनुसार)

  • मधुर (मीठा): ठण्डा और चिकना है। शरीर की धातुएँ बढ़ाता है और माँ के दूध की तरह पोषण देता है। आँखों के लिए अच्छा, पर कीड़े और मल बढ़ाने में सहायक।
  • अम्ल (खट्टा): भीतर से गर्म, बाहर से ठण्डा। रुचि बढ़ाता है और रुके हुए मल-मूत्र और अफारे को खोलता है, पर आँख, दाँत और भौंहों के लिए हानिकारक।
  • लवण (नमकीन): शोधन करता है, भूख बढ़ाता है और पाचन में मदद करता है। शरीर को ढीला और नरम करता है।
  • तिक्त (कड़वा): ठण्डा। प्यास, बेहोशी, बुख़ार, पित्त और कफ घटाता है। गले और छाती के रोग दूर करता है।
  • कटु (तीखा): रूखा और गर्म। छाती के रोगों, कफ, खुजली और विष में लाभदायक। पाचक भी, रेचक भी।
  • कषाय (कसैला): कीड़े, खुजली, कफ और वात के रोगों में लाभकारी। ज़्यादा लेने पर आँखों को हानि, इसलिए थोड़ा ही।

रस के बाद गुण आते हैं। पाठ में पंचभूत के पाँच गुण गिनाए गए हैं।

श्लोक 5 · पाँच गुण

गुरुः स्निग्धस्तीक्ष्णरूक्षो लघुरेते गुणाः स्मृताः।

हिन्दी अर्थ

गुरु (भारी), स्निग्ध (चिकना), तीक्ष्ण, रूक्ष (रूखा) और लघु (हल्का), ये पाँच गुण माने गए हैं।

आज के जीवन में

पाठ के अनुसार गुरु पदार्थ वात को शान्त करता है, कफ बढ़ाता है और देर से पचता है। स्निग्ध वात हरता है पर कफ बढ़ाता है। तीक्ष्ण पित्त बढ़ाता है। रूक्ष वात बढ़ाता है और कफ घटाता है। लघु पथ्य है, यानी हल्का और आसानी से पचने वाला। यही कारण है कि बीमारी में हल्का भोजन दिया जाता है और भारी, चिकना भोजन टाला जाता है।

चौथी सीढ़ी: जगह और देश का असर

रावण बताते हैं कि एक ही औषधि जगह बदलने से अलग असर करती है। इसमें कुछ बहुत दिलचस्प नियम हैं।

श्लोक 6 · जंगल और जल-प्रदेश

सर्वं जाङ्गलसम्भूतं प्रायो भवति पित्तहृत्।
अनूपसम्भवं सर्वं प्रायः कफकरं स्मृतम्॥

हिन्दी अर्थ

जंगल (सूखे प्रदेश) में उगी औषधियाँ प्रायः पित्त का नाश करती हैं, और अनूप (जल वाले दलदली प्रदेश) में उगी औषधियाँ प्रायः कफ बढ़ाती हैं।

आज के जीवन में

पाठ में आगे लिखा है कि दक्षिण से आई औषधियाँ पाते समय गर्म, पर असर में ठण्डी होती हैं, और उत्तर से आई औषधियाँ पाते समय ठण्डी, पर असर में गर्म। मध्य प्रदेश की औषधियों में कहे गए पूरे गुण मिलते हैं। अच्छी जगह औषधि को अधिक बलवान और मध्यम जगह कम बलवान बनाती है।

यह आज के खान-पान का भी सूत्र है: अपने इलाक़े में उगी मौसमी चीज़ें आपके शरीर से सबसे ज़्यादा मेल खाती हैं। दूर से आई या बेमौसम चीज़ का असर अलग हो सकता है।

पाठ विपाक के बारे में भी बताता है, यानी पकने या पचने के बाद का असर। मधुर रस पचने पर कफ बनाता है और वात-पित्त घटाता है। अम्ल रस पचकर पित्त बनाता है। कटु रस पचकर वात बढ़ाता है और कफ-पित्त घटाता है। यानी स्वाद और अन्त का असर हमेशा एक जैसा नहीं होता।

कुछ चीज़ें अपने "प्रभाव" से काम करती हैं, जो रस-गुण से समझ नहीं आता। जैसे वज्रदन्ती और चित्रक का रस एक जैसा लगे तो भी चित्रक विरेचन करता है। सहदेई की जड़ सिर पर बाँधने से बुख़ार उतरता बताया गया है, और पुष्य नक्षत्र में धारण की गई मूली से शरीर में लौह की कमी दूर होती है। ऐसे दावे पुराने अनुभव और परम्परा हैं, इन्हें इलाज की तरह नहीं, जानकारी की तरह पढ़िए।

पाँचवीं सीढ़ी: पाँच कल्प और अर्क की श्रेष्ठता

श्लोक 7 · पाँच कल्प

द्रव्यकल्पः पञ्चधा स्यात्…
तैलमर्कं क्रमाज्ज्ञेयं यथोत्तरगुणं प्रिये॥

हिन्दी अर्थ

द्रव्य (दवा) का कल्प पाँच प्रकार का होता है: कल्क, चूर्ण, रस, तेल और अर्क। ये क्रम से आगे वाले अधिक गुण वाले हैं।

आज के जीवन में

पाँच कल्प ये हैं: कल्क (पिसी हुई लुगदी), चूर्ण (सूखा पाउडर), रस (निचोड़ा हुआ रस), तेल और अर्क। पाठ कहता है कि पहले में सब गुण हैं, दूसरे में कुछ कम, तीसरा जल्दी असर करता है, चौथा बिना दोष का है, और पाँचवाँ सबसे उत्तम। सन्निपात, मिले-जुले रोग और कठिन रोगों में इन्हें क्रम से और काल व अग्नि देखकर दिया जाता था।

श्लोक 8 · अर्क की श्रेष्ठता

पञ्चमं दोषरहितं गुणसङ्घप्रकाशकम्।

हिन्दी अर्थ

पाँचवाँ कल्प (अर्क) दोषरहित है और सब गुणों को प्रकट करने वाला है।

आज के जीवन में

पाठ में लिखा है कि अर्क की शक्ति स्वयं महादेव ने बताई है, और पार्वती कहती हैं कि अर्क-कल्प का वर्णन हज़ार वर्ष भी करती रहें तो पूरा न हो। इसमें एक व्यावहारिक सच छिपा है: भाप से खींचा हुआ सार हल्का, साफ़ और जल्दी पचने वाला होता है। इसीलिए आज भी गुलाब-जल, सौंफ का अर्क और अजवाइन का अर्क घरों में चलते हैं।

छठी सीढ़ी: अर्क-यंत्र, आँच और समय

यहाँ पुरानी तकनीक का पूरा ब्योरा है। इसे पढ़कर आप समझेंगे कि हज़ारों साल पहले का आसवन कैसा था।

यंत्र की बनावट (पाठ के अनुसार)

  • दो पात्र उलटे-सीधे मिलाकर दृढ़ खाम (मिट्टी की पट्टी) से बन्द किए जाते हैं। खाम लगभग दो अंगुल चौड़ी होती है।
  • नीचे का पात्र चौड़ा और पेट वाला, लगभग तीन अंगुल ऊँचा होता है। ऊपर का पात्र गुम्बद जैसा, सूर्य-मण्डल के आकार का।
  • ऊपर के पात्र में बीच में छेद करके हाथी की सूँड़ जैसी नली लगाई जाती है, जो भीतर तीन अंगुल तक जाती है।
  • ऊपर का सिर चार अंगुल ऊँचा रखा जाता है, ताकि वहाँ जल ठहरे और भाप ठण्डी होकर बूँद बने।
  • पात्र पर पुरानी अस्थि और मिट्टी का लेप, या श्वेत काँच का लेप, लगाने की बात है, ताकि सब दोष दूर रहें। यह मिश्रण कुम्हार तैयार करता था।

बर्तन किस धातु का हो: यदि विष जैसी चीज़ों का अर्क निकालना हो तो पात्र लोहे का रखें। सोने या चाँदी का पात्र भी चलता है। ताँबे का पात्र हो तो उसमें कलई ज़रूर कराएँ, ताकि अर्क कसैला या कड़वा न हो जाए। यह आज भी रसोई का नियम है: ताँबे के बर्तन में खट्टी चीज़ें बिना कलई के न रखी जाएँ।

स्त्री और पुरुष के लिए अलग दिन: पाठ के अनुसार पुल्लिंग वार (रवि, मंगल, गुरु) और पुरुष नक्षत्र में दोपहर में बना अर्क स्त्री को दिया जाए, और स्त्री वार (सोम, बुध, शुक्र, शनि) व स्त्री नक्षत्र में बना अर्क पुरुष को। यह ज्योतिष से जुड़ी परम्परा है।

श्लोक 9 · अर्क निकलने का समय

कुत्सितार्कस्तु यामे स्यात् द्वियामाभ्यां तु मध्यमः।

हिन्दी अर्थ

जो अर्क एक प्रहर में निकले वह कम गुण वाला, दो प्रहर में निकले वह मध्यम, और तीन प्रहर में निकले वह सर्वोत्तम माना जाता है।

आज के जीवन में

सीख साफ़ है: धीमी, लगातार आँच पर निकला अर्क सबसे अच्छा। जल्दबाज़ी में तेज़ आँच देकर निकाला हुआ अर्क कमज़ोर और अक्सर जला हुआ होता है। रसोई में भी यही नियम चलता है। जो चीज़ धीमे पकती है, उसका स्वाद और गुण दोनों बेहतर रहते हैं।

श्लोक 10 · छह प्रकार की आँच

धूमाग्निश्चैव मन्दाग्निर्दीपाग्निर्मध्यमस्तथा।

हिन्दी अर्थ

धूमाग्नि, मन्दाग्नि, दीपाग्नि, मध्यमाग्नि (और आगे खराग्नि तथा भटाग्नि): ये छह प्रकार की आँचें हैं।

आज के जीवन में

पाठ में हर आँच की पहचान दी गई है: धूमाग्नि बिना ज्योति के, ऊँचा धुआँ देने वाली। दीपाग्नि उसकी दो-चार गुनी। मन्दाग्नि धीमी, बराबर जलने वाली। मध्यमाग्नि मन्द से दोगुनी। खराग्नि बाक़ी पाँच के आधे के बराबर तेज़। भटाग्नि वह, जिसकी लपटें पात्र के ऊपर तक चारों ओर फैलें।

कौन-सी आँच कितनी देर (पाठ के अनुसार)

  • पहली आँच: डेढ़ प्रहर तक।
  • दूसरी आँच: दो प्रहर तक।
  • तीसरी आँच: आधे प्रहर तक।
  • चौथी आँच: ढाई घड़ी तक।
  • पाँचवीं आँच: दो घड़ी तक।

एक प्रहर लगभग तीन घण्टे और एक घड़ी लगभग चौबीस मिनट की होती है।

लकड़ी: ईंधन की लकड़ी सार वाली, भारी और अच्छी तरह सूखी हो, जैसे खदिर आदि की, और इतनी मोटी कि एक मुट्ठी में आ जाए। अर्क किसमें लें: पुराना अस्थि-पात्र, काँच या पत्थर का पात्र। ये न हों तो मिट्टी का पात्र चलता है।

साफ़ काँच की बोतलों में पारदर्शी अर्क, पास में जड़ी-बूटी की टहनियाँ, चमेली के फूल, ताँबे का प्याला और शंख, खिड़की की रोशनी में बोतल देखता हाथ
अच्छा अर्क शंख की तरह उजला और साफ़ होता है

सातवीं सीढ़ी: अर्क की जाँच और सेवन

अच्छे अर्क की पहचान (पाठ के अनुसार)

  • सुगन्ध: जिस जड़ी-बूटी का अर्क है, उसी की सुगन्ध आए।
  • रंग: शंख, कुन्द के फूल और चन्द्रमा जैसा उजला। दूसरे पात्र में डालने पर भी वैसा ही रहे।
  • स्वाद: जीभ पर रखने से उसी द्रव्य का स्वाद आए।
  • जो इनमें खरा न उतरे, वह पानी के बराबर समझा जाए।

दुर्गन्ध वाला अर्क: उसमें कोई सुगन्धित अर्क या फूल मिलाकर ही प्रयोग करें। पाठ चेतावनी देता है कि लालच या मोह में दुर्गन्ध वाला अर्क पीने से ग्लानि, उल्टी और आलस्य होता है। ऐसे में सावधान होकर उल्टी कर लें, और दुर्गन्ध मिटाने के लिए खिली हुई चमेली के फूलों का जल पिएँ।

पीने के बाद: अर्क पीकर तुरन्त ताम्बूल यानी पान खाएँ। पान न हो तो लौंग खाएँ। तेल और अर्क का फ़र्क़: मालिश के लिए औषधि का तेल, और खाने-पीने में केवल अर्क, तेल नहीं। पाठ यह भी कहता है कि तेल और अर्क निकालने में निपुण व्यक्ति की सेवा करनी चाहिए, क्योंकि रोगों को दूर रखने वाला वही है।

आठवीं सीढ़ी: वैद्य की परख और "दूत-विचार"

श्लोक 11 · पहले लक्षण, फिर दवा

ज्ञात्वा तल्लक्षणं दद्यादन्यथा ब्रह्महा भवेत्।

हिन्दी अर्थ

रोगी के लक्षण जानकर ही अर्क दें, नहीं तो वैद्य पाप का भागी होता है।

आज के जीवन में

यह पूरे ग्रन्थ का सबसे ऊँचा नियम है, और आज के लिए सबसे काम का। पाठ कहता है कि बिना रोगी की जाँच-पड़ताल के दवा देना ब्रह्महत्या के बराबर पाप है। इसीलिए आज भी जानकार वैद्य कहता है: कोई दवा, अर्क या घरेलू नुस्ख़ा बिना किसी जानकार से पूछे, सिर्फ़ किसी के कहने पर शुरू न करें। इस पाठ में शिशुओं की दवा के बारे में तो ख़ास चेतावनी दी गई है, क्योंकि बच्चा अपनी तकलीफ़ बता नहीं सकता।

इसी जगह ग्रन्थ में एक पुरानी परम्परा आती है जिसे दूत-विचार कहा गया है। जब रोगी ख़ुद न आ पाए और किसी को वैद्य के पास भेजे, तो वैद्य उस दूत के बोले हुए अक्षर गिनता था।

श्लोक 12 · दूत के अक्षरों की गिनती

वर्णस्वराणां प्रमितिं दूतोक्तानां हि कारयेत्।

हिन्दी अर्थ

दूत के मुँह से निकले वर्ण और स्वरों को पहले गिनें (फिर उसके दोगुने को तीन से भाग दें)।

आज के जीवन में

नियम इस प्रकार दिया है: अक्षरों की संख्या को दो से गुणा करें, फिर तीन से भाग दें। शेष एक बचे तो रोगी को जल्दी लाभ होगा। शेष दो बचे तो देर से लाभ होगा। शेष तीन बचे तो अशुभ माना जाता था। इसके आगे ग्यारह कोष्ठकों वाला एक अंक-चक्र भी दिया है, जिसमें रोगी और दूत के नाम के अक्षरों के अंक जोड़कर आठ से भाग दिया जाता है।

इसे इतिहास और परम्परा की तरह पढ़िए, चिकित्सा की तरह नहीं। असली बात इसके पीछे की सीख है: वैद्य को बीमार के बारे में हर छोटी बात जाननी चाहिए। आज यह जाँच, रिपोर्ट और डॉक्टर से पूरी बात बताना है। किसी अंक-गणना से इलाज तय नहीं होता।

ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध

जो व्यक्ति बड़े पद पर है, उसे अपने स्वास्थ्य के साथ-साथ अपने साथ के लोगों के स्वास्थ्य की भी फ़िक्र करनी पड़ती है। पाठ यहीं कहता है कि राजा को परम कल्याण के लिए अर्क जैसी हल्की, साफ़ और असरदार चीज़ों का सेवन करते रहना चाहिए, और जो वैद्य उसे ये दे, वह निपुण हो। रावण की पूरी कथा में भी यही दिखता है: जिसने बल और विद्या दोनों पाई, उसे शरीर और संयम की क़द्र भी करनी थी।

इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)

  1. पौधे को पहचानिए: लता, गुल्म, शाखी, पादप या प्रसरा, और कौन-सा अंग, पत्ता, फूल, छाल, फल या जड़।
  2. रोज़ की थाली में छहों स्वाद रखिए: मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कसैला।
  3. अपने इलाक़े की मौसमी चीज़ें आपके शरीर से सबसे ज़्यादा मेल खाती हैं।
  4. धीमी और लगातार आँच पर बनी चीज़ें, चाहे अर्क हो या भोजन, सबसे अच्छी रहती हैं।
  5. पहले लक्षण, फिर दवा। बिना जाने कोई दवा, अर्क या नुस्ख़ा शुरू न करें।

7 दिन का अभ्यास

  • दिन 1: आज की थाली में गिनिए कि कितने स्वाद आए। जो छूटे, एक छोटा हिस्सा जोड़िए।
  • दिन 2: किसी एक जड़ी-बूटी का नाम, रूप और काम का अंग घर के बुज़ुर्ग से पूछकर लिखिए।
  • दिन 3: अपने शहर की एक मौसमी सब्ज़ी या फल को आज के भोजन में रखिए।
  • दिन 4: घर में रखा गुलाब-जल या सौंफ का अर्क देखिए। उसकी सुगन्ध, रंग और स्वाद से जाँचिए।
  • दिन 5: ताँबे के बर्तनों की सफ़ाई और कलई की जाँच कीजिए। खट्टी चीज़ें उनमें न रखें।
  • दिन 6: एक चीज़ धीमी आँच पर पकाइए, बिना जल्दबाज़ी के, और स्वाद की तुलना कीजिए।
  • दिन 7: अपनी कोई एक छोटी तकलीफ़ लिखिए और जानकार वैद्य या डॉक्टर से पूरी बात बताकर पूछिए।

यही बात और जगह कैसे समझाई गई है

घर में रसोई, पूजा या जड़ी-बूटी रखने की सही दिशा जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।

आज की स्व-जाँच (2 मिनट)

  • क्या आज मेरी थाली में कम से कम चार स्वाद थे?
  • क्या मैंने कोई दवा या नुस्ख़ा बिना पूछे शुरू किया?
  • क्या मैंने कोई चीज़ जल्दबाज़ी की जगह धीमी आँच पर बनाई?
  • क्या मैंने आज अपने इलाक़े की मौसमी चीज़ खाई?
  • क्या मैंने किसी बड़े-बुज़ुर्ग से एक घरेलू उपाय का नाम और तरीक़ा पूछा?

जितने सवालों का उत्तर "हाँ" है, उतना स्वास्थ्य-ज्ञान आपने कमाया। बाक़ी अगले सप्ताह की कोशिश बनाइए।

आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)

  • अध्याय 1 से 5: सही गुरु, शान्ति, वश्य, स्तम्भन और मन्त्र का अनुशासन। (पढ़ चुके)
  • अध्याय 6: अर्क प्रकाश, रावण का औषधि-ज्ञान। (आप अभी यहाँ हैं)
  • आगे: अर्क प्रकाश के और शतक, शिशु और माता की देखभाल, शिव-उपासना का रहस्य, और ज्योतिष के विशेष योग।

पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।

अगले अध्याय में: अर्क प्रकाश का अगला भाग। इसमें पाँच तरह की वस्तुओं से अर्क निकालने के तरीक़े और कई रोगों के लिए अलग-अलग अर्क के ब्योरे आएँगे।

यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। स्वास्थ्य से जुड़ी बातों में, ख़ासकर गर्भवती स्त्री और बच्चों के मामले में, योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

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राणा सिकंदर सिंह

वास्तु गुरुजी राणा सिकंदर सिंह के मार्गदर्शन में • VastuGuruji संस्थापक • 10+ वर्षों का अनुभव • रायपुर, छत्तीसगढ़ • विशेषज्ञता: 45 देवता वास्तु + ज्योतिष • रायपुर में वास्तु सलाहकार

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्क प्रकाश क्या है?
अर्क प्रकाश रावण का औषधि-ग्रन्थ माना जाता है, जो दस शतकों में है। इसकी शुरुआत मन्दोदरी के प्रश्न और रावण द्वारा माँ पार्वती से सीखी औषधि-विद्या से होती है। इसमें औषधियों की पहचान, रस-गुण, कल्प और अर्क बनाने की विधि दी गई है।
अर्क क्या होता है और कैसे बनता है?
अर्क जड़ी-बूटी को पानी के साथ गर्म करके भाप से खींचा गया साफ़ सार है, जैसे गुलाब-जल। पुराने पाठ के अनुसार दो पात्र उलटे-सीधे मिलाकर मिट्टी की पट्टी से बन्द किए जाते हैं, ऊपर के पात्र में हाथी की सूँड जैसी नली लगती है, और धीमी आँच पर तीन प्रहर में निकला अर्क सर्वोत्तम माना गया है।
पौधे का कौन-सा अंग सबसे बलवान माना गया है?
पाठ के अनुसार क्रम है: पत्ता, फूल, छाल, फल और जड़। हर अगला अंग पिछले से अधिक बलवान माना गया है, यानी जड़ सबसे अधिक। इसलिए नुस्ख़े में अंग का नाम और मात्रा दोनों का ध्यान रखना ज़रूरी है।
छह रस कौन-से हैं?
मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), तिक्त (कड़वा), कटु (तीखा) और कषाय (कसैला)। आयुर्वेद के अनुसार दिन के भोजन में छहों स्वाद किसी रूप में होने चाहिए।
अच्छे अर्क की पहचान क्या है?
पाठ के अनुसार अर्क से उसी जड़ी-बूटी की सुगन्ध आए, वह शंख और कुन्द के फूल जैसा उजला हो और दूसरे पात्र में डालने पर भी वैसा ही रहे, और जीभ पर उसी द्रव्य का स्वाद दे। जो इनमें खरा न उतरे, उसे पानी के बराबर माना गया है।
अर्क बनाने के लिए कौन-सी धातु का पात्र चाहिए?
पाठ के अनुसार लोहे का पात्र, या सोने-चाँदी का। ताँबे का पात्र हो तो उसमें कलई करानी चाहिए, ताकि अर्क कड़वा या कसैला न हो जाए। अर्क रखने के लिए काँच, पत्थर या मिट्टी का पात्र बताया गया है।
क्या ये नुस्ख़े अपने आप आज़माने चाहिए?
नहीं। इसी ग्रन्थ का नियम है कि रोगी के लक्षण जानकर ही दवा दी जाए, और शिशुओं तथा गर्भवती स्त्री के मामले में विशेष सावधानी रखी जाए। जानकार वैद्य या डॉक्टर से पूछे बिना कोई अर्क या घरेलू नुस्ख़ा शुरू न करें।
🪔 Next festival: करवा चौथ · 08 Nov 2026 · आज View Tips →