रावण विद्या

रावण विद्या अध्याय 14 — ज्योतिष के विशेष योग: नक्षत्र, राशि, नौ ग्रह, लग्न, महादशा और योग

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राणा सिकंदर सिंह 08 Nov 2026

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रावण विद्या अध्याय 14 — ज्योतिष के विशेष योग: नक्षत्र, राशि, नौ ग्रह, लग्न, महादशा और योग

अध्याय चौदह

तेरहवें अध्याय में मन्त्र लेने के लिए भी नक्षत्र, तिथि और लग्न देखे गए थे। अब रावण की पुस्तक का वह भाग, जो समय को पढ़ना सिखाता है।

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रात के साफ़ आकाश के नीचे प्राचीन ताड़पत्र और दीपक के साथ बैठा ज्योतिषी, ऊपर नक्षत्रों का सुनहरा घेरा
काल को पढ़ने की विद्या: नक्षत्र, राशि, ग्रह और दशा

पिछले अध्याय में मन्त्र-दीक्षा के लिए शुभ मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र और लग्न की गिनती आई थी। पाठ ने वहीं कहा था कि यह तंत्र-ज्योतिष का विषय है। पुस्तक का पाँचवाँ भाग उसी ज्योतिष को पूरा खोलता है: 28 नक्षत्र, बारह राशियाँ, नौ ग्रह, बारह भाव, महादशाओं के नियम और विशेष योग।

एक बात पहले ही रख दें। इस अध्याय की हर बात "पाठ के अनुसार" या "ज्योतिष का पारम्परिक मत" है। इसे गणित और परम्परा की तरह पढ़िए, नियति की घोषणा की तरह नहीं।

इस अध्याय में क्या-क्या मिलेगा

  • कथा: रावण और ज्योतिष; अरुण का उपदेश; अनदेखे शकुन।
  • समय की इकाइयाँ: 28 नक्षत्र और उनके देवता, तिथि, वार।
  • बारह राशियाँ: नक्षत्रों का मेल, दिशा, स्वामी, रत्न, शुभ दिन और अंक।
  • नौ ग्रह: प्रकृति, दिशा और पाठ में लिखे प्रभाव।
  • लग्न और बारह भाव: हर भाव से क्या देखा जाता है।
  • दशा: विंशोत्तरी, अष्टोत्तरी और योगिनी; दशा-फल के नियम; ग्रहों की महादशा।
  • विशेष योग: पंच-महापुरुष, गज-केसरी, बुधादित्य, राज योग, धन और निर्धनता के योग।

पहली सीढ़ी: रावण और ज्योतिष की कथा

पाठ में 1 · ज्योतिष क्या देता है

“ज्योतिष वह शास्त्र है जिसके द्वारा काल के निरन्तर घटनाचक्र की सटीक विवेचना हो सकती है। इसके द्वारा अतीत के बारे में भी जाना जा सकता है और भविष्य के बारे में भी।”

आज के जीवन में

आज इसका उपयोग यह है: ज्योतिष को समय का नक़्शा समझिए। नक़्शा बताता है कि आगे पहाड़ है या मैदान, पर चलना आपको ही पड़ता है।

पाठ में 2 · अरुण का उपदेश

“ग्रहों के स्वामी सूर्य हैं। सूर्य के सारथी अरुण ने रावण को ज्योतिष, हस्तरेखा और सामुद्रिक शास्त्र का उपदेश दिया था।”

आज के जीवन में

रावण को पाठ दैवज्ञ यानी भविष्य जानने वाला भी कहता है। आज इसका उपयोग यह है: जो विद्या सूर्य के सारथी से सीखी गई थी, उसका आधार प्रकाश था, भय नहीं।

पाठ में 3 · अहंकार और गणना की चूक

“राम-रावण का युद्ध शस्त्र और शास्त्र दोनों का युद्ध था। दोनों शास्त्र-ज्ञाता थे और दोनों ने समय की गणना करके क़दम उठाया। रावण की पराजय का कारण था उसका अहंकारी होना। अभिमान उपेक्षा कराता है, और उपेक्षा से गणना में त्रुटि होती है। दैवज्ञ यदि धर्म का आचरण न करे तो विद्या प्रतिफलित नहीं होती।”

आज के जीवन में

आज इसका उपयोग यह है: जानकारी अकेली काफ़ी नहीं, उसके साथ विनम्रता चाहिए। अहंकारी जानकार भी ग़लत पढ़ता है।

पाठ में 4 · अनसुने शकुन

“सीता-हरण के बाद लंका में अपशकुन हुए। मन्दोदरी ने रावण से उनकी चर्चा की, पर रावण ने उन्हें नारी-मन की कमज़ोरी कहकर टाल दिया। यह शास्त्र की उपेक्षा थी।”

आज के जीवन में

पाठ यह भी जोड़ता है कि ग्रहों की स्थितियाँ ज्ञानी की भी बुद्धि हरकर उससे मूर्खता भरे कर्म करा देती हैं। आज इसका उपयोग यह है: अपने किसी भी निर्णय पर घर के समझदार लोगों की चेतावनी को हँसी में मत उड़ाइए।

दूसरी सीढ़ी: नक्षत्र, तिथि और वार

पाठ में नक्षत्र 28 गिने गए हैं (अभिजित के साथ): अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती और अभिजित। हर नक्षत्र का एक देवता है और जातक के स्वभाव को उसी से देखा जाता है।

नक्षत्रों के स्वामी (पाठ की सूची)

अश्विनी: अश्विनी कुमार · भरणी: काल · कृत्तिका: अग्नि · रोहिणी: ब्रह्मा · मृगशिरा: चन्द्रमा · आर्द्रा: रुद्र · पुनर्वसु: अदिति · पुष्य: बृहस्पति · आश्लेषा: सर्प · मघा: पितर · पूर्वाफाल्गुनी: भग · उत्तराफाल्गुनी: अर्यमा · हस्त: सूर्य · चित्रा: विश्वकर्मा · स्वाति: पवन · अनुराधा: मित्र · ज्येष्ठा: इन्द्र · मूल: निर्ऋति · पूर्वाषाढ़ा: जल · उत्तराषाढ़ा: विश्वेदेव · श्रवण: विष्णु · धनिष्ठा: वसु · शतभिषा: वरुण · पूर्वाभाद्रपद: अजैकपाद · उत्तराभाद्रपद: अहिर्बुध्न्य · रेवती: पूषा · अभिजित: ब्रह्मा।

पाठ में हर नक्षत्र के नाम-अक्षर भी दिए हैं: बच्चे का नाम जन्म-नक्षत्र के अक्षर से रखा जाता है।

तिथि चन्द्रमा की कलाओं से बनती है। चन्द्रमा दिखे तो शुक्ल पक्ष, न दिखे तो कृष्ण पक्ष, हर पक्ष में पन्द्रह दिन: प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा; कृष्ण पक्ष में पन्द्रहवीं तिथि अमावस्या, जिसे 30 लिखा जाता है। नया वर्ष चैत्र से शुरू माना गया। वार सात ग्रहों के नाम पर हैं: रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, और इनका समूह सप्ताह है।

तीसरी सीढ़ी: बारह राशियाँ

राशियाँ बारह हैं: मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन। राशियों और नक्षत्रों का गहरा सम्बन्ध है, और हर राशि के चरणाक्षर भी हैं। पाठ में हर राशि का परिचय ऐसा है:

  • मेष: अश्विनी, भरणी, कृत्तिका; पूर्व दिशा; लाल-पीला; रत्न मूँगा, माणिक्य; शुभ दिन मंगल, गुरु, रवि; अंक 9।
  • वृष: रोहिणी, मृगशिरा, कृत्तिका; दक्षिण; श्वेत; स्थिर, भूमि तत्त्व; रत्न हीरा; शुभ दिन शुक्र, बुध, शनि।
  • मिथुन: स्वामी बुध; मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु; पश्चिम; हरा; पन्ना; बुध, सोम, शुक्र; अंक 5।
  • कर्क: स्वामी चन्द्रमा; पुष्य, आश्लेषा, पुनर्वसु; उत्तर; जल राशि; शरीर में वक्ष; मोती; सोमवार; अंक 7।
  • सिंह: स्वामी सूर्य; मघा और दोनों फाल्गुनी; पूर्व; शरीर में हृदय; माणिक्य; रवि, गुरु।
  • कन्या: स्वामी बुध; हस्त, चित्रा, उत्तराफाल्गुनी; दक्षिण; पृथ्वी तत्त्व; पन्ना-पुखराज; बुध, शनि; अंक 5।
  • तुला: स्वामी शुक्र; चित्रा, स्वाति, विशाखा; पश्चिम; हीरा-मोती; शनि, बुध; अंक 6।
  • वृश्चिक: स्वामी मंगल; विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा; उत्तर; मूँगा, माणिक्य; सोम, गुरु, रवि।
  • धनु: स्वामी बृहस्पति; मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा; पूर्व; अग्नि तत्त्व; पुखराज; रवि, गुरु; अंक 3।
  • मकर: स्वामी शनि; उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा; पृथ्वी तत्त्व; शरीर में घुटने; नीलम; बुध, शुक्र, शनि; अंक 8।
  • कुम्भ: स्वामी शनि; धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद; पश्चिम; वायु तत्त्व; शरीर में पेट; नीलम; रवि, शनि; अंक 8।
  • मीन: स्वामी बृहस्पति; पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती; उत्तर; जल राशि; पुखराज; गुरु, शनि; अंक 3।

इनके साथ स्वभाव की रेखाएँ भी हैं: मेष का साहस और जल्दबाज़ी, वृष की स्थिरता और कृषि, मिथुन की तकनीकी चतुराई, कर्क की दया, सिंह की निर्भयता, कन्या की शर्मीली कोमलता, तुला की मेहनत और मध्यस्थता, वृश्चिक की दृढ़ प्रतिज्ञा, धनु की ईश्वर-भक्ति और अध्यापन, मकर की गम्भीरता और सेवा, कुम्भ की नई खोजें और मीन की भावुकता और कला।

चौथी सीढ़ी: नौ ग्रह और उनकी प्रकृति

  • सूर्य: पाप संज्ञक, पूर्व दिशा, पुरुष, पीला। पाठ में प्रभाव: पिता का कम सुख, हृदय और पाचन की तकलीफ़, पर शुभ कामों में ख्याति।
  • चन्द्रमा: शुभ, पश्चिम, स्त्री ग्रह। पाठ में: भाग्य, धन, माता-पिता का सुख, विनम्रता।
  • मंगल: पाप संज्ञक, दक्षिण, पुरुष, अग्नि तत्त्व। शुभ में ज़मीन-जायदाद, भाई-बहन का सुख, शारीरिक बल; अशुभ में गृहस्थ जीवन में कष्ट।
  • बुध: नपुंसक संज्ञा। शुभ में उच्च शिक्षा, मनचाही सन्तान, व्यवसाय में लाभ।
  • बृहस्पति: शुभ, पूर्व दिशा, सूर्य के बाद सबसे बड़ा। शुभ में दानी, सुखी, धैर्यवान और सन्तान वाला।
  • शुक्र: शुभ, दक्षिण-पूर्व, जल तत्त्व। काव्य, संगीत, वाहन और नेत्र का कारक; शुभ में सुख और धन।
  • शनि: पाप संज्ञक, क्रूर प्रकृति, पश्चिम, वायु तत्त्व। शुभ में अन्न-धन से पूर्ण और कष्ट-मुक्त; अशुभ भाव में रोग, निर्धनता, तनाव और नौकरी की मुश्किल।
  • राहु: पाप संज्ञक, दक्षिण, काला, धीमी चाल। दुर्भाग्य का सूचक, पर कभी अचानक सौभाग्य भी देता है।
  • केतु: पाप संज्ञक, उत्तर, नीला-काला, धीमी चाल। कुछ ज्योतिषी इसे संयमी, विनम्र और उदार भी बताते हैं।

पाठ में पृथ्वी से हर ग्रह की दूरी मीलों में भी दी गई है, जैसे चन्द्रमा की लगभग 2,38,000 मील। यह पुराने गणित का हिस्सा है, जो इस पाठ के लेखन-काल की जानकारी दिखाता है।

पाँचवीं सीढ़ी: लग्न और बारह भाव

जन्म के समय आकाश में जो राशि उदय हो रही हो, वही लग्न है। कुण्डली के बारह भाव हैं, और पाठ हर भाव का विषय यों बताता है:

  • पहला (तनु): स्वभाव, शरीर, आचार-विचार, कार्य-कुशलता।
  • दूसरा (धन): धन, वाणी, परिवार, मित्रता।
  • तीसरा (सहज): पराक्रम, साहस, धैर्य, स्वास्थ्य।
  • चौथा (सुख): सम्पत्ति, वाहन, माता-पिता, उदारता।
  • पाँचवाँ (सुत और विद्या): सन्तान, विद्या, यश, व्यवसाय।
  • छठा (रिपु): शत्रु, भूमि, मामा, रोग।
  • सातवाँ (जाया): विवाह, गृहस्थ सुख, दैनिक जीवन, मित्र, झगड़े।
  • आठवाँ (आयु): जीवन, संकट, मानसिक चिन्ता, आयु।
  • नौवाँ (भाग्य): धर्म, तप, दान, विद्या, प्रवास, भाग्योदय।
  • दसवाँ (कर्म): कर्म, राज्य, नेतृत्व, सम्मान, अधिकार।
  • ग्यारहवाँ (लाभ): आय के स्रोत, लाभ, सम्पत्ति।
  • बारहवाँ (व्यय): खर्च, व्यसन, दान, बाहरी सम्बन्ध, यात्रा।

पाठ में 5 · जन्म-कुण्डली और गोचर

“जन्मकुण्डली के ग्रह जीवन पर स्थायी प्रभाव डालते हैं, पर जन्म के बाद चलने वाले गोचर के ग्रह भी समय-समय पर अस्थायी प्रभाव डालते हैं।”

आज के जीवन में

पाठ उदाहरण देता है: मेष लग्न में सूर्य दूसरे भाव में हो तो वह जन्म-कुण्डली का स्थायी प्रभाव है। जब वह गोचर में मिथुन में चले तो उस दौरान का अस्थायी प्रभाव अलग देखा जाता है। आज इसका उपयोग यह है: स्वभाव और मौसम में फ़र्क़ कीजिए। स्वभाव जन्म का है, मौसम बदलता रहता है।

पाठ में 6 · कुण्डली की शुद्धता

“फलादेश करते समय पहले जन्मकुण्डली की शुद्धता देखनी चाहिए। अधकचरे ज्योतिषी जन्म-स्थान के रेखांश-अक्षांश और स्थानीय समय तय किए बिना ही कुण्डली बनाकर दे देते हैं। इष्टकाल की शुद्धि न होने से फलादेश ठीक नहीं बैठता।”

आज के जीवन में

आज इसका उपयोग यह है: कुण्डली बनवाने से पहले जन्म का सही समय, तारीख़ और जगह जुटाइए। पाठ के अनुसार चूक वहीं से शुरू होती है। फलादेश की विधि भी बताई गई: लग्न और ग्रह से कुण्डली चुनिए, हर बात काग़ज़ पर लिखते जाइए और अन्त में निष्कर्ष निकालिए।

ताड़पत्र पर खिंची चौकोर जन्म-कुण्डली के बारह खाने, पास में पीतल की दिशा-सूचक और जलता दीपक
कुण्डली के बारह भाव: हर घर का अपना विषय

छठी सीढ़ी: दशा, यानी कब

"कौन-सी घटना कब होगी", इसका सर्वमान्य तरीक़ा ग्रहों की महादशा है, और उसके भीतर अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा, सूक्ष्म दशा और प्राणदशा। पाठ के अनुसार महादशाओं के 42 भेद हैं, पर विंशोत्तरी और अष्टोत्तरी ही अधिक चलती हैं। विंशोत्तरी उत्तर भारत में और अष्टोत्तरी दक्षिण भारत में अधिक चलन में है। स्वरशास्त्र के मत से शुक्ल पक्ष में जन्मे के लिए अष्टोत्तरी और कृष्ण पक्ष में जन्मे के लिए विंशोत्तरी देखी जाती है।

तीन दशा-पद्धतियाँ (पाठ + पारम्परिक मान)

  • विंशोत्तरी (कुल 120 वर्ष, 9 ग्रह): क्रम सूर्य (6), चन्द्र (10), मंगल (7), राहु (18), गुरु (16), शनि (19), बुध (17), केतु (7), शुक्र (20)। जन्म के नक्षत्र से तय होता है कि पहली महादशा किस ग्रह की चलेगी। हर महादशा में पहली अन्तर्दशा उसी ग्रह की, फिर इसी क्रम में बाक़ी। प्रत्यन्तर, सूक्ष्म और प्राण में भी यही नियम।
  • अष्टोत्तरी (कुल 108 वर्ष, 8 ग्रह, केतु नहीं): सूर्य (6), चन्द्र (15), मंगल (8), बुध (17), शनि (10), गुरु (19), राहु (12), शुक्र (21)।
  • योगिनी (कुल 36 वर्ष): मंगला (1 वर्ष, चन्द्र), पिंगला (2, सूर्य), धान्या (3, गुरु), भ्रामरी (4, मंगल), भद्रिका (5, बुध), उल्का (6, शनि), सिद्धा (7, शुक्र), संकटा (8; पहले चार वर्ष राहु, बाद के केतु)। अन्तर्दशा के वर्ष = योगिनी-वर्ष × दशा-वर्ष ÷ 36। कुछ ज्योतिषी इसका असर 36 वर्ष तक मानते हैं, दूसरे इसकी पुनरावृत्ति।

पाठ की संख्याओं में छपाई की चूक है; ऊपर के मान पारम्परिक पद्धति के हैं और कुल 120, 108, 36 से मिलते हैं।

पाठ में 7 · सब दशाएँ सबको नहीं

“प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में प्रत्येक ग्रह की दशा आए ही, यह आवश्यक नहीं। ऐसे सौभाग्यशाली लोग कम होते हैं जो लगभग 120 वर्ष जीवित रहकर सभी ग्रहों की दशाओं का भोग कर पाते हों।”

आज के जीवन में

पाठ यह भी कहता है कि ग्रहों का पूरा फल उनकी महादशा और अन्तर्दशा के काल में ही मिलता है। आज इसका उपयोग यह है: किसी एक ग्रह के बारे में पढ़ी हुई हर बात आपके जीवन पर हर समय लागू नहीं होती।

दशा-फल के कुछ नियम (पाठ के अनुसार):

  • उच्च, स्वराशि या मूल-त्रिकोण का, पापी ग्रह से मुक्त ग्रह अपनी दशा में शुभ फल देता है; नीच या शत्रु-राशि का अशुभ; मिश्रित स्थिति में मिला-जुला।
  • तीसरे, छठे, ग्यारहवें भाव के शुभ ग्रह बचपन में शुभ फल देते हैं; इन्हीं भावों के पापी ग्रह अन्तिम अवस्था में सुख देते हैं।
  • गुरु लग्न में, उच्च राशि में या लग्न से तीसरे, दसवें, ग्यारहवें हो तो कुल के अनुरूप उच्च पद और सुख।
  • नीच राशि से आगे की छह राशियों में ग्रह की दशा "आरोहिणी" (शुभ); उच्च राशि से आगे की छह में "अवरोहिणी" (अशुभ)।
  • दशा के आरम्भ में चन्द्रमा दशापति से 3, 5, 6, 7, 9, 10 या 11वें में हो तो शुभ।
  • मार्गी ग्रह की दशा में धन, सम्मान, यश; वक्री की दशा में सुख और सम्मान की हानि, परदेश-वास।
  • ग्रह प्रथम द्रेष्काण में हो तो दशा के आरम्भ में, दूसरे में मध्य में, तीसरे में अन्त में फल देता है; वक्री हो तो उलटा।
  • भावेशों की दशा: चौथे के स्वामी की दशा में विद्या, भूमि, भवन, वाहन; पाँचवें के स्वामी की दशा में विद्या-बुद्धि और सम्मान; नवें के स्वामी की दशा में भाग्योदय, दान-पुण्य और राज्य से लाभ; ग्यारहवें के स्वामी की दशा में व्यवसाय से प्रचुर लाभ।
नौ रंगों के नौ वृत्तों वाला गोल कालचक्र, बीच में सूर्य, पास में रेत-घड़ी और खुली पोथी
दशा: समय का चक्र, जिसमें हर ग्रह की अपनी बारी है

सातवीं सीढ़ी: ग्रहों की महादशा के सामान्य फल

  • सूर्य: पूर्णबली हो तो भूमि, औषध और राजा से लाभ, परदेश-वास; मध्यम बली हो तो वाक्पटुता और प्रसिद्धि; हीनबली हो तो ऋण, चिन्ता, दाँत और पेट की पीड़ा। मेष में उच्च हो तो धर्म-कर्म में रुचि और धन-लाभ; सिंह में यश, धन और सुख।
  • चन्द्रमा: पूर्णबली हो तो धन, यश, लाभ; मध्यम बली में सद्गुण और बुद्धि; हीनबली में चित्त की चंचलता और आलस्य। वृष में पद और यश; धनु में वाहन और सौभाग्य।
  • मंगल: पूर्णबली में यश-धन; मध्यम में युद्ध-विजय और साहस; हीनबली में गृह-क्लेश। मेष में सुख-सम्मान और विजय; दसवें भाव में सर्वोच्च पद और व्यवसाय में लाभ।
  • बुध: पूर्णबली हो तो विवेक, नए भवन, स्त्री-पुत्र का सुख; कन्या में शत्रुओं पर विजय और ग्रन्थ-लेखन; पहले भाव में सम्मान और संतोष।
  • शुक्र: पूर्णबली हो तो वाहन, रत्नाभूषण और क्रय-विक्रय में दक्षता।
  • शनि: पूर्णबली हो तो वाहन, घर, पराक्रम, दान-धर्म, उच्च अधिकार और कला-कुशलता।
  • राहु और केतु: सामान्य रूप से कष्ट और विषाद की दशा; पर उच्च राशि में या शुभ ग्रह से दृष्ट होने पर राहु शुभ फल भी देता है।

आठवीं सीढ़ी: विशेष योग

पाठ कहता है कि जब कुण्डली के किसी भाव में एक से अधिक ग्रह होते हैं, तब विभिन्न योग बनते हैं। सबसे प्रसिद्ध पंच-महापुरुष योग हैं, जो तब बनते हैं जब मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि अपनी राशि, मूल-त्रिकोण या उच्च राशि में लग्न से केन्द्र (1, 4, 7, 10) में बैठे हों:

  • रुचक: मंगल से। उत्साही, साहसी, शक्तिशाली।
  • भद्र: बुध से। महापुरुष योगों में दूसरा।
  • हंस: बृहस्पति से (मीन, धनु या कर्क में, केन्द्र में)।
  • मालव्य: शुक्र से (वृष, तुला या मीन में)।
  • शश: शनि से (मकर, कुम्भ या तुला में); यह पंच-महापुरुष समूह का अन्तिम योग है।

पाठ में 8 · हंस योग

“यदि बृहस्पति अपनी राशि, मूल-त्रिकोण या उच्च राशि में केन्द्रीय भाव में हो तो हंस योग कहलाता है। इस योग वाला व्यक्ति गुणवान, धनवान, सुखी और राजपुरुषों या शासन द्वारा सम्मानित होता है।”

आज के जीवन में

आज इसका उपयोग यह है: पाठ के सब योग गुणों के नाम हैं: विद्या, उदारता, साहस, विनय। पढ़ते समय सोचिए कि इनमें से कौन-सा गुण आप अपने काम में अभी पाल सकते हैं।

पाठ में 9 · गज-केसरी और बुधादित्य

“चन्द्रमा से केन्द्र में बृहस्पति हो तो गज-केसरी योग है। उसका जातक विनम्र, उदार और मृदु स्वभाव का होता है। सूर्य और बुध एक ही भाव में बैठें तो बुधादित्य योग है; बुध सूर्य से 28 अंश से अधिक दूर नहीं जाता।”

आज के जीवन में

पाठ के अनुसार बुधादित्य योग वाला व्यक्ति बुद्धिमान, कार्य-कुशल और प्रतिष्ठित माना जाता है, और बुध सूर्य के निकट होकर भी दग्ध नहीं माना जाता, यह इस योग का अपवाद है। आज इसका उपयोग यह है: विनम्रता और बुद्धि का साथ, दोनों योगों की साझा बात है।

पाठ में 10 · सिंहासन योग

“लग्न से चौथे भाव का स्वामी दसवें में और दसवें का स्वामी चौथे में बैठा हो तो सिंहासन योग कहलाता है। यह अति दुर्लभ और अत्यन्त प्रभावशाली योग है।”

आज के जीवन में

चौथा भाव सुख और घर का है, दसवाँ कर्म और अधिकार का। दोनों के स्वामियों का आपस में बदलना, यानी घर और कर्म का तालमेल। आज इसका उपयोग यह है: काम और घर में सन्तुलन ही असली राजगद्दी है।

पाठ में गिनाए गए अन्य योग

  • सुनफा: चन्द्र से दूसरे भाव में कोई ग्रह (सूर्य को छोड़कर)। अनफा: चन्द्र से बारहवें में। वसि: सूर्य से बारहवें में कोई ग्रह (चन्द्र को छोड़कर)।
  • चन्द्र-मंगल: दोनों एक भाव में या एक-दूसरे से केन्द्र-त्रिकोण में; उच्च राज योग, आर्थिक आधार मज़बूत।
  • सामाजिक: सब ग्रह पहले, दूसरे, तीसरे भाव में। कर्म योग: सब ग्रह सातवें, दसवें, ग्यारहवें भाव में; गरीब घर में जन्म, फिर भी सुकर्मों से प्रशासक। भाग्य योग: सब ग्रह पाँचवें, सातवें, नौवें में। ध्वज योग: सब ग्रह लग्न में और शनि आठवें में।
  • राज योग: तीन ग्रह अपनी राशि, मूल-त्रिकोण या उच्च में; या नीच राशि का वक्री ग्रह नौवें, दसवें, ग्यारहवें में; या अकेला चन्द्र लग्न या दसवें में अपनी या उच्च राशि का; या लग्न में नीच ग्रह नवांश में उच्च हो जाए।
  • लक्ष्मी योग: लग्न और लग्नेश मज़बूत, नवमेश उच्च या स्वराशि का होकर केन्द्र या त्रिकोण में।
  • सरस्वती योग: गुरु, शुक्र, बुध क्रम से दूसरे, चौथे, पाँचवें (या सातवें, नौवें, दसवें) भाव में, और गुरु स्वराशि, मित्र या उच्च में।
  • पारिजात योग: लग्नेश जिस भाव-राशि में हो, उसका स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में स्वराशि या उच्च में।
  • हरि योग: नवमेश के साथ दसवें का स्वामी दूसरे भाव में। हर योग: पाँचवें का स्वामी नवें में, नवें का दसवें में, दसवें का पाँचवें में। ब्रह्मा योग: गुरु और शुक्र नवमेश, एकादशेश के साथ केन्द्र में, बुध लग्नेश के साथ।
  • अंशावतार: लग्न चर राशि, शनि उच्च होकर केन्द्र में, गुरु-शुक्र भी केन्द्र में; दुर्लभ।
  • महाभाग्य: पुरुष दिन में जन्मा हो और लग्न, सूर्य, चन्द्र विषम राशि में हों; स्त्री रात में जन्मी हो और ये सम राशि में हों।
  • धन के योग: शुक्र, गुरु, शनि मित्र या उच्च राशि में शुभ दृष्टि के साथ; या मेष-वृश्चिक लग्न में मंगल के साथ चन्द्र और शुक्र; या तीसरे, छठे, आठवें, बारहवें में चार शुभ ग्रह।
  • कठिन योग: ग्यारहवें का स्वामी तीसरे, छठे, आठवें या बारहवें में हो तो दिवालिया होने की सम्भावना; बारहवें का स्वामी आठवें में हो तो तंगहाली।

पाठ ने कुछ योग व्यवसाय से भी जोड़े हैं। अकेला सूर्य दसवें भाव में स्वराशि या उच्च में हो तो सरपंच, मंत्री, न्यायाधीश, चिकित्सक जैसे पद। सूर्य-चन्द्र का दसवें से सम्बन्ध पत्रकार या लेखक बनाता है, सूर्य-गुरु का सम्बन्ध बहुमुखी प्रतिभा, और सूर्य-शुक्र का सम्बन्ध कला और खेल में सफलता। चौथे भाव में शुभ ग्रह हो तो न्यायाधीश योग बताया गया।

ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध

जो बड़े पद पर है, उसके हाथ में समय का नक़्शा सबसे काम का औज़ार है, क्योंकि उसके निर्णय सैकड़ों लोगों पर असर डालते हैं। रावण की कथा यहीं चेतावनी देती है: शकुन, गणना और घर की सलाह, तीनों उसके पास थे, और अहंकार ने तीनों को अनसुना करवा दिया। पाठ का सूत्र यही है: गणना के साथ धर्म और विनम्रता चाहिए।

इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)

1
नक्षत्र 28 हैं, राशियाँ 12, ग्रह 9 और भाव 12; यही पूरे नक़्शे के पुर्ज़े हैं।
2
जन्म-कुण्डली स्थायी है, गोचर अस्थायी। स्वभाव और मौसम अलग हैं।
3
कुण्डली की शुद्धता पहले: सही समय, तारीख़ और जगह।
4
दशा बताती है "कब"। किसी ग्रह का पूरा फल उसकी दशा-अन्तर्दशा में ही बताया गया है।
5
शकुन और सलाह की उपेक्षा न करें। अहंकारी दैवज्ञ की गणना भी डगमगाती है।

7 दिन का अभ्यास

  • दिन 1: अपने जन्म का सही समय, तारीख़ और जगह घर के बड़ों से पूछकर लिखिए।
  • दिन 2: अपना जन्म-नक्षत्र और उसका देवता पता कीजिए।
  • दिन 3: अपनी राशि और उसका स्वामी ग्रह लिखिए।
  • दिन 4: आज की तिथि, पक्ष और वार लिखिए।
  • दिन 5: बारह भावों की सूची में अपने जीवन का कोई एक क्षेत्र चुनिए, जैसे दसवाँ (कर्म), और उसके लिए एक छोटा लक्ष्य रखिए।
  • दिन 6: किसी जानकार से पूछिए कि आपकी इस समय कौन-सी महादशा चल रही है।
  • दिन 7: घर के किसी बड़े की एक चेतावनी या सलाह, जिसे आपने टाल दिया था, फिर से सुनिए।

यही बात और जगह कैसे समझाई गई है

अपनी जन्म-कुण्डली के साथ घर या दुकान की दिशा जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।

और रहस्य: जो इस अध्याय में छिपे हैं

रहस्य 1: लिखते जाइए, निष्कर्ष अन्त में

पाठ के अनुसार फलादेश की विधि यह है कि हर बात काग़ज़ पर लिखते जाएँ और निष्कर्ष सबसे अन्त में निकालें। हमारा पाठ-निष्कर्ष: जल्दी का फ़ैसला अधूरी जानकारी पर टिकता है। जैसे नई दुकान किराए पर लेने से पहले किराया, भीड़, पार्किंग और पड़ोस सब लिखिए, तब ही हाँ या ना कहिए।

रहस्य 2: एक गुण के तीन दर्जे

पाठ में हर ग्रह का फल तीन तरह का है: पूर्णबली, मध्यम बली और हीनबली। एक ही ग्रह कहीं यश देता है, कहीं चिन्ता। हमारा पाठ-निष्कर्ष: गुण का नाम नहीं, उसकी मज़बूती मायने रखती है। जैसे बोलने की कला सधी हो तो प्रसिद्धि देती है, कच्ची हो तो झगड़ा करवा देती है।

रहस्य 3: ऊँचाई नहीं, दिशा

पाठ के अनुसार नीच राशि से आगे चलने वाली दशा आरोहिणी, यानी शुभ है, और उच्च से आगे चलने वाली अवरोहिणी, यानी अशुभ। हमारा पाठ-निष्कर्ष: कहाँ खड़े हैं से अधिक यह देखिए कि किस ओर जा रहे हैं। जैसे छोटी पर हर महीने बढ़ती बिक्री, बड़ी पर लगातार घटती बिक्री से अधिक आश्वस्त करती है।

रहस्य 4: फल का आरम्भ, मध्य और अन्त

पाठ के अनुसार ग्रह किस द्रेष्काण में है, इससे तय होता है कि फल दशा के आरम्भ, मध्य या अन्त में आएगा। हमारा पाठ-निष्कर्ष: नतीजे एक ही दिन नहीं आते। जैसे तीन साल की पढ़ाई में कुछ लाभ पहले वर्ष में मिलते हैं, कुछ बीच में और बड़े अन्त में।

रहस्य 5: हर चीज़ की अपनी उम्र

पाठ में कहा गया है कि तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव के शुभ ग्रह बचपन में फल देते हैं, और वहीं के पापी ग्रह अन्तिम अवस्था में सुख देते हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: कुछ मेहनत जल्दी फलती है, कुछ देर से। जैसे बचपन की आदतें तुरन्त दिखती हैं, पर बुढ़ापे की सेहत वाली बचत बरसों बाद काम आती है।

रहस्य 6: चेतावनी का अर्थ तैयारी

पाठ के अनुसार ग्यारहवें भाव का स्वामी तंग घरों में जाए तो दिवालिया होने की सम्भावना है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: ऐसी बात भविष्यवाणी नहीं, तैयारी का इशारा है। जैसे कमाई अस्थिर लगे तो आज से तीन महीने का खर्च अलग रखना और उधार टालना।

रहस्य 7: बुरे समय में अपनी बुद्धि पर भरोसा कम

पाठ कहता है कि ग्रहों की स्थितियाँ ज्ञानी की भी बुद्धि हर लेती हैं। हमारा पाठ-निष्कर्ष: मन थका या डरा हो, तो बड़ा फ़ैसला अकेले न लें। जैसे कर्ज़ लेने या नौकरी छोड़ने का फ़ैसला एक रात सोकर, एक भरोसेमन्द बड़े से बात करके करें।

आसान रास्ता: कोई भी कैसे करे

  1. अपना सही जन्म-समय और जगह घर के बड़ों से पूछकर लिखिए। दस मिनट। पूरी गणना से पहले यही आधार चाहिए।
  2. जीवन के बारह क्षेत्र एक पन्ने पर लिखिए। शरीर, धन, साहस, घर, पढ़ाई, रोग, साझेदारी, संकट, भाग्य, काम, आय, खर्च। पन्द्रह मिनट। अपनी कमज़ोर कड़ी अक्सर साफ़ दिखती है।
  3. बड़े फ़ैसले से पहले सारी बातें लिखिए। जो पक्ष में हैं और जो विपक्ष में। निष्कर्ष सबसे नीचे। बीस मिनट। मन की हड़बड़ी घटती है।
  4. हर महीने के अन्त में दिशा जाँचिए। आमदनी, पढ़ाई या सेहत का एक अंक पिछले महीने से मिलाइए। पाँच मिनट। ऊपर या नीचे की चाल दिख जाती है।
  5. कोई भी बड़ा निर्णय एक रात टालिए। सोकर उठें, फिर एक बड़े से पूछें। मुफ़्त है। अक्सर राय बदल जाती है।
  6. हर चेतावनी को तैयारी की सूची में बदलिए। जैसे "कमाई अस्थिर" से "बचत हर महीने पहले निकालना"। दस मिनट। मन का डर काम में बदलता है।
  7. किसी बड़े की एक पुरानी सलाह फिर सुनिए। जो आपने टाल दी थी। पाँच मिनट की बातचीत। कई बार उसमें दम निकलता है।

सबसे आम ग़लती

किसी योग या दोष को अन्तिम फ़ैसला मान लेना, और पैसे देकर उसे "कटवाने" की जल्दी में पड़ जाना। पाठ इसे गणित और परम्परा की तरह पढ़ने को कहता है। नक़्शा रास्ता दिखाता है, चलना आपको ही है।

आज की स्व-जाँच (2 मिनट)

  • क्या मुझे अपने जन्म का सही समय और जगह पता है?
  • क्या मैंने आज किसी समझदार की सलाह टाली?
  • क्या मैं अपने स्वभाव और अपने मौसम में फ़र्क़ कर पा रहा हूँ?
  • क्या मैंने किसी ज्ञान को घमण्ड की जगह विनम्रता से बरता?

जितने सवालों में आपका उत्तर "हाँ" या "समझ गया" है, उतना आपने समय को पढ़ना सीखा। बाक़ी अगले सप्ताह की कोशिश बनाइए।

आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)

  • अध्याय 1 से 13: गुरु, शान्ति, जप, औषधि-ज्ञान, शिव-उपासना और तंत्र की साधना। (पढ़ चुके)
  • अध्याय 14: ज्योतिष के विशेष योग। (आप अभी यहाँ हैं)
  • आगे: रावण के पूरे जीवन से मिलने वाली सीख, यानी इस शृंखला का समापन।

पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।

अगले अध्याय में: रावण का जीवन-चरित। पुलस्त्य के वंश से लंका के पतन तक की कथा, उसके वरदान, उसकी भूलें, उसके शाप और वे सीखें जो इन चौदह अध्यायों का सार हैं।

यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। ज्योतिष के फल पारम्परिक मत हैं; बड़े निर्णय अपने विवेक और जानकारों की सलाह से लें।

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राणा सिकंदर सिंह

वास्तु गुरुजी राणा सिकंदर सिंह के मार्गदर्शन में • VastuGuruji संस्थापक • 10+ वर्षों का अनुभव • रायपुर, छत्तीसगढ़ • विशेषज्ञता: 45 देवता वास्तु + ज्योतिष • रायपुर में वास्तु सलाहकार

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पाठ के अनुसार नक्षत्र कितने हैं?
पाठ में नक्षत्र 28 गिने गए हैं, यानी 27 नक्षत्र और अभिजित। अश्विनी से रेवती तक सत्ताईस और अट्ठाईसवाँ अभिजित। हर नक्षत्र का एक देवता बताया गया है और जातक के स्वभाव को उसी से देखा जाता है।
विंशोत्तरी महादशा क्या है?
यह 120 वर्ष की दशा-पद्धति है जिसमें नौ ग्रहों की बारी आती है। क्रम सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु और शुक्र है, और पहली दशा जन्म के नक्षत्र से तय होती है। पाठ के अनुसार यह उत्तर भारत में अधिक चलती है।
अष्टोत्तरी और योगिनी दशा में क्या अन्तर है?
अष्टोत्तरी 108 वर्ष की है, उसमें आठ ग्रह हैं और केतु की दशा नहीं मानी जाती। योगिनी दशा 36 वर्ष की है और उसकी आठ दशाएँ मंगला, पिंगला, धान्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा और संकटा हैं।
पंच-महापुरुष योग कौन-से हैं?
रुचक (मंगल से), भद्र (बुध से), हंस (बृहस्पति से), मालव्य (शुक्र से) और शश (शनि से)। ये तब बनते हैं जब वह ग्रह अपनी राशि, मूल-त्रिकोण या उच्च राशि में लग्न से केन्द्र में बैठा हो।
गज-केसरी और बुधादित्य योग कैसे बनते हैं?
चन्द्रमा से केन्द्र में बृहस्पति बैठा हो तो गज-केसरी योग कहलाता है। सूर्य और बुध एक ही भाव या राशि में साथ बैठें तो बुधादित्य योग बनता है। पाठ के अनुसार बुध सूर्य से 28 अंश से अधिक दूर नहीं जाता।
जन्म-कुण्डली और गोचर में क्या फ़र्क़ है?
पाठ के अनुसार जन्म-कुण्डली के ग्रहों का प्रभाव स्थायी माना जाता है, जबकि जन्म के बाद चलने वाले गोचर के ग्रह समय-समय पर अस्थायी प्रभाव डालते हैं। इसीलिए दोनों को साथ देखने की बात कही गई है।
क्या ये फल निश्चित हैं?
नहीं। यह अध्याय पाठ में लिखे नियम और पारम्परिक मत प्रस्तुत करता है, फल की घोषणा नहीं। पाठ ख़ुद कहता है कि कुण्डली की शुद्धता, यानी सही जन्म-समय और स्थान, पहली शर्त है, और दैवज्ञ धर्म का आचरण न करे तो विद्या फलित नहीं होती।
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