रावण विद्या

रावण विद्या अध्याय 12 — शिव-उपासना (भाग 2): शिवपंचाक्षर स्तोत्र, शिवताण्डव और बारह ज्योतिर्लिंग

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राणा सिकंदर सिंह 08 Nov 2026

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रावण विद्या अध्याय 12 — शिव-उपासना (भाग 2): शिवपंचाक्षर स्तोत्र, शिवताण्डव और बारह ज्योतिर्लिंग

अध्याय बारह

विधि के बाद वाणी की बारी है। इस अध्याय में तीन स्तोत्र हैं, जिनमें एक के अन्त में दशमुख रावण का नाम स्वयं आता है, और उसके बाद बारह ज्योतिर्लिंगों का परिचय।

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सुनहरी भोर में हिमालय की चोटी के सामने शिवलिंग पर जल की धारा, बिल्वपत्र, जलता दीपक और रुद्राक्ष की माला
जल, बिल्वपत्र और दीपक: स्तोत्र-पाठ से पहले की तैयारी

पाँचवें अध्याय में हमने सीखा कि मन्त्र का असर संख्या से नहीं, अनुशासन से आता है। पिछले अध्याय में वही अनुशासन पंचाक्षर और पाँच आवरणों के पूजन पर लगा। अब पाठ वाणी की ओर मुड़ता है: श्रीशिवपंचाक्षर स्तोत्र, शिवताण्डव स्तोत्र और द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र। इनके बाद बारह ज्योतिर्लिंगों का परिचय और कुछ शिव-लीलाएँ आती हैं।

स्तोत्र पूजा का दूसरा रूप है। विधि में हाथ और सामग्री चाहिए, स्तोत्र में सिर्फ़ मन और ज़ुबान। इसीलिए ये रोज़ के पाठ में सबसे पहले अपनाए जाते हैं।

इस अध्याय में क्या-क्या मिलेगा

  • शिवपंचाक्षर स्तोत्र: पाँच श्लोक, हर अक्षर के लिए एक।
  • शिवताण्डव स्तोत्र: भाव, लय और रावण से इसका नाता।
  • ज्योतिर्लिंग स्तोत्र: बारह स्थानों की स्तुति।
  • बारह परिचय: हर ज्योतिर्लिंग की जगह और पुरानी कथा।
  • शिव की लीलाएँ: प्रदोष-नृत्य, शिव-विवाह और बारात।

पिछले अध्यायों की याद

जप का अनुशासन, पंचाक्षर, पाँच आवरण, शिवज्ञान

स्तोत्र वहीं टिकता है जहाँ जप का नियम पहले से बना हो। पाँचवाँ अध्याय और ग्यारहवाँ अध्याय फिर से देखिए।

कुछ शब्द, जो इस अध्याय में आएँगे

  • स्तोत्र — स्तुति के श्लोकों की माला।
  • ताण्डव — शिव का प्रचण्ड नृत्य। लास्य — कोमल नृत्य।
  • ज्योतिर्लिंग — शिव का प्रकाश-स्वरूप लिंग, जहाँ उनकी उपस्थिति विशेष मानी गई है।
  • प्रदोष — सूर्यास्त के आसपास का समय।

पहली सीढ़ी: तीन रूपों का ध्यान और एक सर्वसुलभ मन्त्र

स्तोत्रों से पहले पाठ शिव के तीन रूपों का ध्यान देता है। नीलकण्ठ: दस हज़ार बाल-सूर्यों जैसा तेज, जटाजूट में अर्धचन्द्र, सिर पर साँपों का मुकुट, चार हाथों में जपमाला, शूल, नरकपाल और खट्वांग, तीन नेत्र और पाँच मुख, बाघम्बर और कमल का आसन। अर्धनारीश्वर: नीलमणि और प्रवाल जैसा शरीर, आधे अंग में अम्बिका, चारों हाथों में पाश, लाल कमल, कपाल और त्रिशूल। त्र्यम्बक: स्वच्छ कमल पर आठ हाथ, दो हाथों में अमृत के घड़े, दो में मृगमुद्रा और अक्षमाला, और दो हाथ घड़ों का अमृत अपने मस्तक की चन्द्र-कला पर उड़ेलते हुए।

पाठ कहता है कि इन रूपों के अपने बीज-मन्त्र हैं जिन्हें विधिपूर्वक ही अपनाना चाहिए, पर एक मन्त्र सब लोग सब अवस्थाओं में जप सकते हैं: नमः शिवाय। आगे का पहला स्तोत्र इसी मन्त्र के पाँच अक्षरों पर टिका है।

दूसरी सीढ़ी: श्रीशिवपंचाक्षर स्तोत्र

इस स्तोत्र में पाँच श्लोक हैं और हर श्लोक एक अक्षर को समर्पित है: न, म, शि, वा, य। हर श्लोक की अन्तिम पंक्ति में वही अक्षर आता है, फिर “नमः शिवाय”। इस तरह स्तोत्र पढ़ते हुए पंचाक्षर मन्त्र अपने-आप पाँच बार दोहरता है।

श्लोक 1 · “न” और “म” के श्लोक

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय॥

हिन्दी अर्थ

जिनके गले में नागराज का हार है, जो तीन नेत्र वाले हैं, भस्म लगाए हैं, महेश्वर, नित्य, शुद्ध और दिगम्बर हैं, उन “न” कार स्वरूप शिव को नमस्कार। जो गंगाजल और चन्दन से पूजित हैं, नन्दी और प्रमथों के स्वामी हैं और मन्दार तथा अनेक पुष्पों से पूजे जाते हैं, उन “म” कार स्वरूप शिव को नमस्कार।

आज के जीवन में

“न” में सादगी है: हार भी नाग का, लेप भी भस्म का। “म” में सेवा है: गंगाजल, चन्दन, फूल। दोनों साथ यही सिखाते हैं कि पूजा में सादगी और सुगन्ध साथ-साथ रहें।

श्लोक 2 · “शि” और “व” के श्लोक

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय॥
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय॥

हिन्दी अर्थ

जो कल्याणकारी हैं, गौरी के मुख-कमल के लिए सूर्य हैं, दक्ष के यज्ञ का अहंकार तोड़ने वाले, नीलकण्ठ और वृषभ-ध्वज वाले हैं, उन “शि” कार स्वरूप शिव को नमस्कार। जिनके मस्तक की पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य, गौतम जैसे मुनीन्द्र और देवता करते हैं, जिनकी तीन आँखें चन्द्र, सूर्य और अग्नि हैं, उन “व” कार स्वरूप शिव को नमस्कार।

आज के जीवन में

दूसरे श्लोक में तीन आँखों का अर्थ खुलता है: चन्द्र की शीतलता, सूर्य का प्रकाश और अग्नि की तपन। ज्ञान, शीतलता और ताप, तीनों का सन्तुलन ही शिव-दृष्टि है।

श्लोक 3 · “य” का श्लोक और फल

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय॥
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

हिन्दी अर्थ

जो यक्ष-स्वरूप, जटाधारी, पिनाक हाथ में लिए, सनातन, दिव्य और देव हैं, उन “य” कार स्वरूप शिव को नमस्कार। जो यह पुण्य पंचाक्षर शिव के समीप पढ़ता है, वह शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनन्द करता है।

पाठ के अनुसार

फल-श्लोक में शर्त है: “शिव के समीप”, यानी लिंग या प्रतिमा के सामने। पिछले अध्याय की तरह यहाँ भी पूजा के साथ पाठ का फल अधिक कहा गया है।

तीसरी सीढ़ी: शिवताण्डव स्तोत्र

यह स्तोत्र रावण-रचित माना जाता है, और पाठ के अन्तिम श्लोक में उसका संकेत भी है: “दशवक्त्रगीतम्”, यानी दस मुख वाले का गाया हुआ। इसकी पहचान इसका छन्द है, जिसमें शब्द डमरू की ताल पर चलते हैं और पढ़ने वाले की साँस अपने-आप लय में बँध जाती है। इस पाठ में चौदह श्लोक हैं: पहले में पार्वती के विलास से आनन्दित शिव, बीच में नृत्य, अग्नि और सर्प के चित्र, और अन्त में भक्त की समता और शिव-नाम में शान्ति की इच्छा।

श्लोक 4 · कृपा-कटाक्ष

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिच्चिदम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥

हिन्दी अर्थ

पर्वतराज की पुत्री के विलास से आनन्दित, दिशाओं के छोर तक की सन्तानों से प्रसन्न मन वाले, जिनकी कृपा-दृष्टि की धारा से कठिन आपत्ति रुक जाती है, उन चिदम्बर (चेतन आकाश) रूप शिव में मेरा मन रमे।

आज के जीवन में

माँग साफ़ है: आपदा में कृपा-दृष्टि और मन का एक ठिकाना। जो मन भीतर के आकाश में रम जाता है, उसे बाहर की आँधी कम हिलाती है।

श्लोक 5 · चन्द्रशेखर का ध्यान

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

हिन्दी अर्थ

जटा के कड़ाह में घूमती देव-नदी की चंचल लहरों से जिनका मस्तक सुशोभित है, जिनके ललाट पर धगद्-धगद् अग्नि जल रही है, उन बाल-चन्द्र को धारण करने वाले शिव में मेरी प्रीति पल-पल बनी रहे।

आज के जीवन में

एक ही मस्तक पर जल, अग्नि और चन्द्रमा तीनों हैं। विपरीत शक्तियाँ एक साथ टिकती हैं, यही शिव की पहचान है। प्रार्थना का अर्थ यह नहीं कि मन की आग बुझ जाए, बल्कि यह कि उसे शीतलता का साथ मिल जाए।

श्लोक 6 · ताल पर नृत्य

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमस्फुरद्धगद्धगद्विनिर्गमत्कराल भालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गलध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥

हिन्दी अर्थ

घूमते सर्पों और ललाट की फुफकारती अग्नि वाले शिव की जय हो, जो धिमिद्-धिमिद् की मंगल मृदंग-ध्वनि के क्रम पर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं।

पाठ के अनुसार

मृदंग की ताल, फुफकारते सर्प और ललाट की अग्नि, तीनों एक ही लय में हैं। नृत्य बेसुरा उत्पात नहीं, ताल से बँधा प्रचण्ड बल है।

श्लोक 7 · समभाव

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे॥

हिन्दी अर्थ

पत्थर और सुन्दर शय्या, साँप और मोतियों की माला, रत्न और मिट्टी का ढेला, मित्र और विरोधी, तिनका और कमल जैसी आँखें, प्रजा और महाराज, इन सबमें मन को समान रखते हुए मैं कब सदाशिव का भजन करूँगा।

आज के जीवन में

यह श्लोक पूरे स्तोत्र का हृदय है। भक्त शक्ति नहीं माँग रहा, समता माँग रहा है। जो पद, धन या अपमान में एक-सा रह सके, वही स्थिर है। ऊँचे पद के लिए इससे बड़ा सूत्र कम ही मिलेगा।

श्लोक 8 · भक्त की इच्छा

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥

हिन्दी अर्थ

कब मैं गंगा के निकुंज की गुफा में रहता हुआ, बुरी बुद्धि से मुक्त, सिर पर अंजलि जोड़े, चंचल दृष्टि छोड़कर, भाल पर शिव का भाव लिए “शिव” मन्त्र बोलता हुआ सुखी होऊँगा?

आज के जीवन में

सुख की परिभाषा यहाँ तीन बातों में है: दुर्बुद्धि से मुक्ति, हाथ जोड़ने की विनम्रता और नज़र की स्थिरता। आख़िर में “शिव” शब्द ही सहारा है, जो पाँचवें अध्याय की जप-साधना से सीधे जुड़ता है।

श्लोक 9 · अन्तिम श्लोक: रावण का नाम

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनमिदं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥

हिन्दी अर्थ

पूजा के अन्त में, प्रदोष के समय, जो दशमुख के गाए इस शम्भु-पूजन स्तोत्र को पढ़ता है, उसे शम्भु रथ, श्रेष्ठ हाथी और घोड़ों से युक्त स्थिर लक्ष्मी सदा प्रसन्न होकर देते हैं।

पाठ के अनुसार

दो बातें साफ़ हैं। पहली, समय: पूजा समाप्त होने पर, प्रदोष में पाठ। दूसरी, फल: स्थिर लक्ष्मी। यानी धन की कामना भी हो तो वह शुद्ध पूजा के अन्त में, शान्त वाणी से माँगी जाए। इससे पहले के श्लोक में है कि नित्य पढ़ने-स्मरण करने वाला शुद्धि पाता है और गुरु तथा हरि में शीघ्र भक्ति।

चौथी सीढ़ी: द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र

बारह श्लोकों के इस स्तोत्र में हर श्लोक एक ज्योतिर्लिंग का नाम और जगह बताता है। पाठ में इसे एक सरल क्रम में रखा है: सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नागनाथ, केदार, त्र्यम्बक, रामेश्वर, भीमा-शंकर, विश्वनाथ और घृष्णेश्वर।

श्लोक 10 · पहले तीन

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥
श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम्॥
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्॥

हिन्दी अर्थ

सौराष्ट्र में चन्द्रकला धारण किए, भक्ति देने के लिए कृपा से अवतरित सोमनाथ की शरण लेता हूँ। श्रीशैल के शिखर पर प्रसन्न विराजमान, संसार-सागर के सेतु मल्लिकार्जुन को नमस्कार। अवन्तिका में सज्जनों की मुक्ति और अकाल-मृत्यु से रक्षा के लिए प्रकट महाकाल को प्रणाम।

आज के जीवन में

तीनों में शिव का काम एक है: कृपा से उतरना। सोमनाथ भक्ति देते हैं, मल्लिकार्जुन पुल हैं, महाकाल अकाल-मृत्यु के भय से रक्षा करते हैं।

श्लोक 11 · अगले तीन

कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे॥
पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम्।
सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि॥
याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः।
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये॥

हिन्दी अर्थ

कावेरी और नर्मदा के पवित्र संगम पर, मान्धाता-पुर में सदा रहने वाले ओंकार-ईश की स्तुति करता हूँ। पूर्वोत्तर दिशा में गिरिजा सहित रहने वाले, देव-असुर दोनों से पूजित वैद्यनाथ को नमस्कार। दक्षिण दिशा के सुन्दर नगर में विराजमान, सद्भक्ति और मुक्ति देने वाले नागनाथ की शरण लेता हूँ।

पाठ के अनुसार

ओंकारेश्वर का श्लोक संगम और सज्जनों के उद्धार की बात करता है। वैद्यनाथ चिकित्सक-शिव हैं।

श्लोक 12 · फिर तीन

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे॥
सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरीतीरपवित्रदेशे।
यद्दर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे॥
सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसङ्ख्यैः।
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि॥

हिन्दी अर्थ

महान पर्वत के पास, तट पर रमने वाले, मुनियों और देव-असुर-यक्ष-नाग सबसे पूजित केदार-ईश की स्तुति करता हूँ। सह्याद्रि के शिखर पर, गोदावरी के किनारे, जिनके दर्शन से पाप तुरन्त नष्ट होते हैं, उन त्र्यम्बक की स्तुति करता हूँ। ताम्रपर्णी और सागर के संगम पर असंख्य बाणों से सेतु बाँधकर श्रीरामचन्द्र द्वारा समर्पित रामेश्वर को नित्य नमस्कार।

आज के जीवन में

तीनों में जल है: पर्वत का तट, गोदावरी का तीर और सागर-संगम। प्रकृति के पास जाना ही पूजा का आरम्भ है।

श्लोक 13 · अन्तिम तीन

यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि॥
सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥
इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम्।
वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये॥

हिन्दी अर्थ

जो भीम आदि नाम से प्रसिद्ध हैं और सबके सेवनीय हैं, भक्तों के हितकारी उन शंकर को नमस्कार। आनन्द-वन में सानन्द रहने वाले, पापों के समूह को नष्ट करने वाले, अनाथों के नाथ वाराणसी-नाथ विश्वनाथ की शरण लेता हूँ। इलापुर के सुन्दर विशाल स्थान में शोभित, जगत में श्रेष्ठ, उदार-स्वभाव घृष्णेश्वर की शरण लेता हूँ।

पाठ के अनुसार

तेरहवाँ श्लोक फल बताता है: जो इस स्तोत्र को अति भक्ति से पढ़ता है, वह फल पाकर अपना भजन आगे बढ़ाए। यानी पाठ का फल भी भजन की सीढ़ी है, मंज़िल नहीं।

सन्ध्या के समय नदी किनारे पत्थर का शिव-मन्दिर, सीढ़ियों पर कतार में जलते दीपक और आकाश में हल्की सुनहरी रोशनी
प्रदोष की सन्ध्या: दीपों की कतार

पाँचवीं सीढ़ी: बारह ज्योतिर्लिंगों का परिचय

पाठ की शुरुआत एक सुन्दर उपमा से है: परमात्मा कण-कण में है, पर विशेष स्थानों में उसका प्रभाव प्रकट होता है, जैसे आग हर जगह है पर चकमक पत्थर में ज़रा-सी रगड़ से प्रकट हो जाती है। इसीलिए इन स्थानों के दर्शन-मात्र को शिवलोक की प्राप्ति का साधन माना गया है। परिचय पाठ के अपने क्रम में दिया गया है।

  • सोमनाथ: गुजरात, काठियावाड़, समुद्र के किनारे; पुराना नाम प्रभास क्षेत्र, जहाँ श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समेटी। दक्ष की सत्ताईस कन्याओं के पति चन्द्र रोहिणी पर ही अनुरक्त रहे, तो क्षय का शाप मिला। ब्रह्मा के कहने पर चन्द्र ने यहाँ दस करोड़ मृत्युंजय मन्त्र जपे। वर: कृष्ण पक्ष में कलाएँ घटेंगी, शुक्ल पक्ष में बढ़ेंगी, हर पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्र। “सोम” चन्द्र का नाम है, इसलिए सोमनाथ।
  • मल्लिकार्जुन: आन्ध्र में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल, जिसे दक्षिण का कैलास कहा जाता है। गणेश और कार्तिकेय में पहले विवाह की होड़ हुई; शर्त थी पृथ्वी की परिक्रमा। गणेश ने माता-पिता की सात परिक्रमा कर ली, कार्तिकेय क्रौंच पर्वत चले गए, तब शिव वहाँ ज्योतिर्लिंग बने। मल्लिका के फूलों से पहली पूजा हुई, इसलिए यह नाम। शिवरात्रि पर बड़ा मेला।
  • महाकालेश्वर: मध्य प्रदेश, उज्जैन, शिप्रा के तट पर, सात पुरियों में एक। राजा चन्द्रसेन के समय पाँच वर्ष का गोप-बालक श्रीकर राह के पत्थर को शिव मानकर पूजने लगा; माँ ने पत्थर फेंक दिया तो बालक रोते-रोते बेहोश हुआ, और जागने पर सामने रत्नों का मन्दिर था। हनुमान ने कहा कि इसी बालक की आठवीं पीढ़ी में नन्दगोप होंगे। दूसरी कथा में वेदपाठी ब्राह्मण की तपस्या में बाधा बने दूषण असुर को शिव ने हुंकार से भस्म किया, इसलिए महाकाल।
  • ओंकारेश्वर, अमलेश्वर: मध्य प्रदेश, नर्मदा के बीच मान्धाता पर्वत (शिवपुरी) पर; दूसरा रूप अमलेश्वर नर्मदा के दक्षिण तट पर। विन्ध्य पर्वत ने छह मास पार्थिव पूजा की तो शिव ने लिंग के दो भाग किए। लिंग मनुष्य-निर्मित नहीं, चारों ओर जल भरा रहता है। कार्तिक पूर्णिमा पर मेला और चने की दाल का चढ़ावा।
  • केदारनाथ: हिमालय की केदार चोटी, पश्चिम में मन्दाकिनी का तट, पूर्व में बद्रीनाथ। मन्दाकिनी और अलकनन्दा रुद्रप्रयाग में, फिर देवप्रयाग में भागीरथी से मिलती हैं। नर-नारायण की कठिन तपस्या से प्रसन्न शिव ने यहाँ सदा रहना स्वीकार किया।
  • भीमेश्वर: पाठ के अनुसार गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुर पहाड़ी। कुम्भकर्ण के पुत्र भीम ने वर पाकर देवलोक पर अधिकार जमाया और राजा सुदक्षिण को बन्दी बनाया। बन्दीगृह में सुदक्षिण पार्थिव लिंग की पूजा कर रहे थे; भीम के प्रहार पर लिंग से शिव प्रकट हुए, और देवों की प्रार्थना पर वहीं ज्योतिर्लिंग बनकर रहे।
  • विश्वेश्वर: काशी। प्रलय में भी इसका लोप नहीं होता, शिव इसे त्रिशूल पर उठा लेते हैं। पार्वती को पिता के घर रहना न भाया तो शिव उन्हें काशी लाए। मान्यता है कि यहाँ मरने वाले के कान में शिव तारक मन्त्र देते हैं। पाँच प्रधान तीर्थ: दशाश्वमेध, लोलार्क, केशव, बिन्दुमाधव और मणिकर्णिका।
  • त्र्यम्बकेश्वर: महाराष्ट्र, नासिक से तीस किलोमीटर पश्चिम। महर्षि गौतम पर छल से गोहत्या का दोष लगा; प्रायश्चित में गंगा को लाकर करोड़ पार्थिव लिंगों से शिव की आराधना की। शिव ने कहा कि गौतम सदा निष्पाप हैं, और गौतम ने छल करने वालों पर क्रोध न करने की प्रार्थना की। गंगा वहीं गोदावरी बनकर बहीं।
  • वैद्यनाथ: पाठ के अनुसार बिहार का सन्थाल परगना। रावण ने हिमालय पर घोर तपस्या की और नौ सिर चढ़ा दिए; दसवाँ चढ़ाने पर शिव ने हाथ पकड़ लिया, सिर जोड़ दिए और वर दिया। रावण ने लिंग को लंका ले जाने का वर माँगा; शर्त थी कि बीच में कहीं रखा तो वहीं अचल हो जाएगा। लघुशंका के लिए रावण ने लिंग एक ग्वाले को थमाया, भार न सँभलने पर ग्वाले ने उसे भूमि पर रख दिया। रावण ने बहुत ज़ोर लगाया, फिर अँगूठे का निशान बनाकर लंका लौट गया। ग्यारह अंगुल ऊँचे इस लिंग पर वही अँगूठे-जैसा गड्ढा बताया जाता है, और दूर-दूर के तीर्थों का जल चढ़ाने का विधान है। रोग-मुक्ति के लिए इसकी महिमा प्रसिद्ध है।
  • नागेश्वर: गुजरात, द्वारका के पास। धर्मात्मा वैश्य सुप्रिय शिवभक्त था। दारुक नाम के राक्षस ने उसे नाव से पकड़कर कारागार में डाला; वहाँ भी सुप्रिय पूजा करता रहा और दूसरे बन्दियों को भी प्रेरणा देता रहा। उसकी पुकार पर शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और उसे अपना पाशुपत अस्त्र दिया।
  • रामेश्वर: सेतुबन्ध पर। श्रीराम ने समुद्रतट की बालू से लिंग बनाकर पूजा की। दूसरी कथा: लंका-विजय के बाद ब्रह्महत्या-दोष से मुक्ति के लिए ऋषियों ने लिंग-स्थापना बताई। हनुमान कैलास से लिंग लाने गए, देर हो गई तो सीता ने शुभ मुहूर्त में बालू का लिंग स्थापित कर दिया। हनुमान ने उसे अपनी पूँछ से उखाड़ना चाहा, पर वह नहीं हिला। श्रीराम ने उन्हें समझाया और हनुमान के लाए लिंग को भी पास में स्थापित कराया।
  • घृष्णेश्वर: महाराष्ट्र, दौलताबाद के पास वेरुल गाँव। सुधर्मा ब्राह्मण की पत्नी सुदेहा सन्तानहीन थी; उसने अपनी छोटी बहन घुश्मा से पति का विवाह कराया। घुश्मा रोज़ एक सौ एक पार्थिव लिंग बनाकर पूजती थी, और उसे पुत्र हुआ। सुदेहा की ईर्ष्या ने उस पुत्र को छीन लिया, पर घुश्मा पूजा में अडिग रही। शिव की कृपा से पुत्र लौट आया। घुश्मा ने शिव से बहन के लिए क्षमा माँगी और लोक-कल्याण के लिए यहाँ निवास का वर लिया।

छठी सीढ़ी: शिव की लीलाएँ

प्रदोष-नृत्य। कैलास पर नटराज के ताण्डव में सब देवता जुटे। सरस्वती ने वीणा बजाई, विष्णु ने मृदंग, इन्द्र ने बाँसुरी, ब्रह्मा ने ताल दी, लक्ष्मी ने गाया। प्रदोष-काल में शिव ने ऐसा नृत्य किया कि सबके मन और नेत्र स्थिर हो गए। महाकाली ने वर देना चाहा तो शिव ने कहा कि यह आनन्द पृथ्वी के प्राणियों तक भी पहुँचे, और वे स्वयं अब केवल कोमल लास्य करेंगे। पाठ के अनुसार तब देवताओं ने पृथ्वी पर अवतार लिए और वृन्दावन में रास-नृत्य हुआ, जिसमें “नटराज” की उपाधि श्रीकृष्ण को मिली।

शिव-विवाह। सती के विरह में शिव का दिन-रात ध्यान उन्हीं पर रहा। सती ने हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया; नारद ने उनके पिता से कहा कि इनका विवाह शंकर से ही होना चाहिए। पार्वती वर्षों तक उनकी सेवा करती रहीं: आसन झाड़ना, चरण धोकर चरणोदक लेना, षोडशोपचार से पूजा। सप्तर्षियों ने विवाह की तिथि तय की, और गणों, देवताओं, ऋषियों और गन्धर्वों की बारात वृषभ पर सवार दूल्हा-वेश शिव के साथ हिमालय की ओर चली। डमरू, भेरी और शंख के मंगल-नाद से तीनों लोक भर गए।

भोर के आकाश के सामने शान्त हिमालय, सामने शिवलिंग पर जल अर्पित करती अंजलि और बिल्वपत्रों का ढेर
शिव पर जल की धारा

ऊँचे पद से इसका सम्बन्ध

ताण्डव-स्तोत्र की सबसे बड़ी शिक्षा ऊँचे पद वालों के लिए है: समता। पत्थर और शय्या, मित्र और विरोधी, प्रजा और महाराज, सबमें मन को समान रखने की इच्छा। रावण की अपनी कथा में यही बात खटकती है, क्योंकि जिसके पास स्तोत्र की लय थी, उसे भी समता चाहिए थी। वैद्यनाथ की कथा बताती है कि शक्ति के साथ शर्त भी आती है: जो चीज़ मिली है, उसे बीच रास्ते में दूसरे के हाथ थमाकर चल देना भारी पड़ सकता है।

इस अध्याय के 5 सूत्र (याद रखने के लिए)

  1. एक मन्त्र सबके लिए: नमः शिवाय। पाँच अक्षर, पाँच श्लोक, पाँच तत्त्व।
  2. स्तोत्र पूजा के अन्त में और प्रदोष में पढ़ने की बात पाठ ने दो बार कही है।
  3. समता सबसे बड़ी माँग है, शक्ति या धन से भी पहले।
  4. जो मिला, उसे सँभालिए। वैद्यनाथ की कथा शर्त वाले वरदान की सीख है।
  5. प्रकृति के पास जाइए: नदी, पर्वत और समुद्र ज्योतिर्लिंगों के साथी हैं।

7 दिन का अभ्यास

  • दिन 1: आज शिवपंचाक्षर स्तोत्र का पहला श्लोक अर्थ के साथ पढ़िए।
  • दिन 2: पाँचों श्लोक पढ़िए और हर श्लोक के अन्त का अक्षर काग़ज़ पर लिखिए: न, म, शि, वा, य।
  • दिन 3: शाम को प्रदोष के समय शान्त बैठकर ताण्डव-स्तोत्र का समता वाला श्लोक पढ़िए।
  • दिन 4: आज किसी विरोधी के प्रति मन में समता रखने की कोशिश कीजिए। कुछ बोलना ज़रूरी न हो।
  • दिन 5: बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम एक बार ज़ोर से पढ़िए।
  • दिन 6: किसी एक ज्योतिर्लिंग की कथा परिवार को सुनाइए।
  • दिन 7: नदी, पेड़ या खुले आकाश के पास पाँच मिनट मौन बैठकर “शिव” शब्द दोहराइए।

यही बात और जगह कैसे समझाई गई है

घर में पूजा-स्थान और शिवलिंग की दिशा जँचवाना चाहें तो वास्तु परामर्श बुक कर सकते हैं।

और रहस्य: जो इस अध्याय में छिपे हैं

रहस्य 1: चकमक की आग

पाठ के अनुसार आग हर जगह है, पर चकमक पत्थर में ज़रा-सी रगड़ से प्रकट होती है। इसी उपमा से विशेष स्थानों की बात समझाई गई है। हमारा पाठ-निष्कर्ष: गुण सबमें हैं, पर रगड़, यानी रोज़ का अभ्यास, उन्हें जगाता है। जैसे गाने की आवाज़ तो घर के हर सदस्य में है, पर रोज़ दस मिनट गुनगुनाने वाले की ही खुलती है।

रहस्य 2: बराबर ध्यान

पाठ के अनुसार चन्द्र ने सत्ताईस पत्नियों में सिर्फ़ रोहिणी पर ध्यान रखा, तो क्षय का शाप मिला। फिर घटना और बढ़ना उसकी लय बन गई। हमारा पाठ-निष्कर्ष: एक ही पर झुकाव बाक़ी को सुखा देता है। जैसे परिवार में एक बच्चे पर सारा समय लगे, तो दूसरा चुपचाप दूर हो जाता है।

रहस्य 3: सबसे पास की परिक्रमा

पाठ में गणेश ने पृथ्वी की जगह माता-पिता की सात परिक्रमा कर ली और जीत गए। हमारा पाठ-निष्कर्ष: बड़ा काम कभी-कभी सबसे पास के लोगों के प्रति निभाया फ़र्ज़ होता है। जैसे नौकरी में तरक्की के पीछे भागते हुए घर के बुज़ुर्गों के पास बैठना भूल जाना।

रहस्य 4: जगह बदली, नियम नहीं

पाठ में सुप्रिय कारागार में भी पूजा करता रहा और दूसरे बन्दियों को भी प्रेरणा दी। हमारा पाठ-निष्कर्ष: हालात बिगड़ें तो भी छोटा नियम पकड़े रहना सबसे बड़ा सहारा है। जैसे नौकरी छूटने के दिनों में भी रोज़ सुबह तय समय पर उठना।

रहस्य 5: जो हाथ में है, उसी से शुभ क्षण पर

पाठ के अनुसार हनुमान को लिंग लाने में देर हुई तो सीता ने शुभ समय पर बालू का लिंग स्थापित कर दिया। फिर श्रीराम ने हनुमान के लाए लिंग को भी पास में जगह दिलाई। हमारा पाठ-निष्कर्ष: शुरू करने के लिए आदर्श सामान का इन्तज़ार न करें, और जिसने मेहनत की उसका मान भी बनाए रखें।

रहस्य 6: आनन्द आगे बढ़ाइए

पाठ के अनुसार शिव ने कहा कि यह आनन्द पृथ्वी के प्राणियों तक भी पहुँचे, और स्वयं कोमल लास्य अपनाया। हमारा पाठ-निष्कर्ष: जो सीखा है, उसे बाँटना ही उसे पूरा करना है। जैसे अनुभवी कारीगर किसी नए लड़के को दस मिनट रोज़ सिखा दे।

रहस्य 7: नुक़सान के बाद भी क्षमा

पाठ में घुश्मा ने ईर्ष्या से हुए अपने दुख के बाद भी बहन के लिए क्षमा माँगी, और गौतम ने छल करने वालों पर क्रोध न करने को कहा। हमारा पाठ-निष्कर्ष: क्षमा अपना बोझ उतारती है, सामने वाले को बदलने की शर्त नहीं बनती।

आसान रास्ता: कोई भी कैसे करे

  1. पाँच अक्षर पाँच बार बोलिए। न, म, शि, वा, य, और "नमः शिवाय"। तीन मिनट। साँस अक्सर धीमी होने लगती है।
  2. शाम को सूर्यास्त के आसपास पाँच मिनट मौन बैठिए। फोन दूर रखें। रोज़ एक ही जगह। एक हफ़्ते में यह समय अपना लगने लगता है।
  3. इस हफ़्ते दो लोगों को बराबर समय दीजिए। जिसे आप कम पूछते हैं, उसे दस मिनट की बात दीजिए। मुफ़्त है। रिश्ते में नरमी अक्सर दिखती है।
  4. माता-पिता या किसी बड़े के पास दस मिनट बैठिए। कुछ माँगे बिना। मुस्कान और बातचीत अक्सर अपने-आप चल पड़ती है।
  5. आज का एक अधूरा काम उठाइए। जो "सही सामान" की राह देख रहा है। जितना अभी हाथ में है, उतने से बीस मिनट शुरू कीजिए। आम तौर पर रुकावट सोच में निकलती है।
  6. जो आता है, दस मिनट किसी को सिखाइए। छोटे भाई-बहन को, पड़ोसी को। सिखाते हुए आपकी अपनी समझ पक्की होती दिखती है।
  7. रात को मन में एक बात छोड़िए। किसी की कोई चूक, अपनी ओर से माफ़ कीजिए। किसी को बताना ज़रूरी नहीं। नींद से पहले मन हल्का लगता है।

सबसे आम ग़लती

अन्तिम श्लोक के फल को सौदे की पर्ची बना लेना और बिना अर्थ समझे जल्दी-जल्दी पढ़ जाना। पाठ का स्तोत्र वाणी की शान्ति के लिए है। धीरे पढ़िए, अर्थ के साथ, और फल की चिन्ता छोड़ दीजिए।

आज की स्व-जाँच (2 मिनट)

  • क्या आज मैंने कोई स्तोत्र अर्थ के साथ पढ़ा?
  • क्या मैंने आज अपमान या प्रशंसा में एक-सा मन रखने की कोशिश की?
  • क्या मैंने कोई चीज़ बीच रास्ते में दूसरे को थमाकर छोड़ दी?
  • क्या मैंने आज प्रकृति के पास कुछ समय बिताया?
  • क्या मेरी वाणी में आज ताल और शान्ति थी?

जितने सवालों का उत्तर “हाँ” है, उतना अभ्यास आपने कमाया। बाक़ी अगले सप्ताह के लिए रख दीजिए।

आगे के अध्याय (शृंखला का नक़्शा)

  • अध्याय 1 से 5: सही गुरु, शान्ति, वश्य, स्तम्भन और मन्त्र का अनुशासन। (पढ़ चुके)
  • अध्याय 6 से 10: औषधि-ज्ञान और कुमार तंत्र। (पढ़ चुके)
  • अध्याय 11 और 12: शिव-उपासना, दोनों भाग। (आप अभी यहाँ हैं)
  • आगे: षडध्वशोधन और योग-विवेचन, फिर ज्योतिष के विशेष योग।

पूरी सूची और नए अध्याय शृंखला के मुख्य पन्ने पर मिलेंगे।

अगले अध्याय में: शिव-उपासना का बाक़ी हिस्सा। षडध्वशोधन की विधि, और उसमें गुरु और शिष्य की भूमिका।

यह अध्याय सीखने की दृष्टि से लिखा गया है। पूजा, स्तोत्र-पाठ और तीर्थ-यात्रा अपनी परम्परा और सामर्थ्य के अनुसार करें।

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राणा सिकंदर सिंह

वास्तु गुरुजी राणा सिकंदर सिंह के मार्गदर्शन में • VastuGuruji संस्थापक • 10+ वर्षों का अनुभव • रायपुर, छत्तीसगढ़ • विशेषज्ञता: 45 देवता वास्तु + ज्योतिष • रायपुर में वास्तु सलाहकार

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवपंचाक्षर स्तोत्र में कितने श्लोक हैं और उनका क्रम क्या है?
पाँच श्लोक, पंचाक्षर के पाँच अक्षरों के लिए: न, म, शि, वा और य। हर श्लोक की आख़िरी पंक्ति में वह अक्षर आता है और फिर नमः शिवाय। छठे श्लोक में फल है कि शिव के समीप इसका पाठ करने वाला शिवलोक पाता है।
शिवताण्डव स्तोत्र का रावण से क्या सम्बन्ध है?
पाठ के अन्तिम श्लोक में इसे “दशवक्त्रगीतम्”, यानी दशमुख का गाया हुआ, कहा गया है। परम्परा इसे रावण की रचना मानती है। इसका छन्द डमरू की ताल जैसा है, और उसी लय पर नृत्य, अग्नि और सर्प के चित्र चलते हैं।
शिवताण्डव स्तोत्र का मुख्य सन्देश क्या है?
समता। एक श्लोक में भक्त पत्थर और शय्या, साँप और मोतियों की माला, मित्र और विरोधी, प्रजा और महाराज में मन को समान रखकर सदाशिव का भजन करने की इच्छा करता है। अन्त के श्लोकों में भक्त शिव-नाम बोलते हुए सुखी होने की प्रार्थना करता है।
स्तोत्र पढ़ने का समय पाठ में क्या बताया है?
ताण्डव स्तोत्र के फल-श्लोक के अनुसार पूजा के समाप्त होने पर, प्रदोष के समय पाठ करना चाहिए। उसका फल स्थिर लक्ष्मी बताया गया है। पंचाक्षर स्तोत्र के लिए शर्त है कि पाठ शिव के समीप किया जाए।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कौन-से हैं?
पाठ के क्रम से: सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर-अमलेश्वर, केदारनाथ, भीमेश्वर, विश्वेश्वर, त्र्यम्बकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वर और घृष्णेश्वर। स्तोत्र का क्रम थोड़ा अलग है, पर बारह वही हैं।
वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की रावण से जुड़ी कथा क्या है?
रावण ने हिमालय पर तपस्या करके सिर चढ़ाए, तो शिव प्रसन्न हुए और लिंग को लंका ले जाने का वर दिया, इस शर्त के साथ कि बीच में रखा तो वहीं अचल हो जाएगा। रावण ने लघुशंका के लिए लिंग एक ग्वाले को थमाया, जिसने भार न सँभलने पर उसे भूमि पर रख दिया। रावण उसे उठा न सका और अँगूठे का निशान बनाकर लौट गया।
ज्योतिर्लिंग का अर्थ पाठ ने किस उपमा से समझाया है?
उपमा चकमक पत्थर की है। आग हर जगह है, पर वह प्रभाव नहीं दिखाती, जबकि चकमक में ज़रा-सी रगड़ से प्रकट हो जाती है। इसी तरह परमात्मा कण-कण में है, पर कुछ विशेष स्थानों में उसकी उपस्थिति विशेष मानी गई है।
🪔 Next festival: करवा चौथ · 08 Nov 2026 · आज View Tips →