वास्तु चक्र के सबसे प्रमुख देवता ब्रह्मा हैं।

ये सबसे बड़े भूभागा के अधिपति हैं और एकाशोतिफ्ट (8 पद) वास्तु में की पदों के स्वामी हैं। इन्हें वास्तुचक्र में द्वादश आदित्यों में से एक घाता के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्ज है। समस्त देवताओं ने महाराक्षस पर आक्रमण से पूर्व ब्रह्मा से अनुमति ली और उनके साथ हो उसे परास्त किया। संभवत: व्यक्तिगत शक्ति स्रामर्ध्य के आधार पर देवता वास्तु: चक्र पर स्थित हैं। ब्रह्मा के बाद चार देवता छह पद के स्वामी हैं और बाकौ सभी देवता या तो दो पद या एक पद के स्वामी हैं। ब्रह्मा न केवल वास्तु चक्र में बल्कि सर्वतोभद्र चक्र में भो केन्द्र स्थान में हैं। यह अवश्य है कि बास्तु चक्र से भिन्‍न सर्वतोभद्र चक्र में कुल 324 कोष्टक होते हैं और उनमें मध्यस्थ स्थित ब्रह्मा पुत: सबसे शक्तिशाली माने जाते हैं।

कुल मिलाकर चार देव सभाएं मानी गई हैं उनमे ब्रह्मा को सभा परम वैधवशालो मानी गई है। ब्रह्मा को उत्पत्ति भगवान किष्णु को कि से उत्पन कमल जाल से मानी गई है और प्राचोन वाड़मय में उल्लेख मिलते हैं कि ब्रह्मा ने अपने जन्म के तुरन्त बाद अपने स्थयं के उद्भव को लेकर बहुत विचार विमर्श किया, अपने को सर्वप्रथम उत्पन और सर्वशक्तिसात सागा और भगवान विष्णु से बहस की। भगवान विष्णु के द्वात उन्हें ज्ञान कराया गया कि वे ही प्रथम नहीं हैं। इसके परचात्‌ ब्रह्मा को सृष्टि कौ उत्पत्ति का आदेश मिला और विष्णु, शिव और ब्रह्मा के एकात्म का परिचय मिला ।

अजमेर से 9-0 किलोमीटर दूर पुष्कर  में चतुर्भुज ब्रह्मा जी का मौदिर है जो कि एकमात्र माँदिर है और उनके दाहिने ओर सावित्री देवों तथा बाईं ओर गायत्री देवी का मोदिर है। उसके पास ही सनकादि मुनियों को मूर्तियां हैं। वज़नाध राक्षस को मारने पर उनके हाथ से कमल जहां पर गिरा था बहां एक सरोवर बन गया जिसे आज पुष्कर सरोवर कहते हैं।

ब्रह्मा के सर्वप्रथम मानसी सृष्टि कौ रचना की और उसके बाद मानस पुत्र और प्रजापतियों कौ उत्पत्ति की । ब्रह्मा की मानसौ सृष्टि को विश्वकर्मा ने लौकिक रूप दिया। वेदों में सृष्टिकर्ता देवता के लिए विश्वकर्मा ब्रह्मणस्पति, हिरण्यगर्ध, ब्रह्मा तथा प्रजापति ये नाम आए हैं।

सुष्ति विस्तार के लिए उन्होंने सनकादि चार मानस पुत्रों के बाद अंगिरस (ऋषि), अत्रि, पुलस्त्य, मरीचि, पुल्हा, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष नारद और चित्रगुप्त  मानस पुत्रों को उत्पन्न किया और आगे स्ववाम्भुवादि मनु आदि से सृष्टि को उत्पल करने का उपक्रम किया। प्रजा विस्तार में दक्ष की भूमिका अधिक थी इसलिए ब्रह्माजी ने उन्हों समस्त प्रजापतियों का अध्यक्ष बना दिया। धर्म की
भी कई पत्निय हुईं जो कि दशक प्रजापति कौ पूत्रियां थीं। मरीचि के पृत्र कश्यप हुए, कश्यप की दस पत्निय ये देवता, दैत्य, दानल, सर्प, लाग, विद्याधर, किनतर आदि को ठत्पति हुईं। स्वायसभुजादि मनु ओऔ डतके पुत्र है जो कि उतके दक्षिण भाग से उत्पनत हुए थे। उनके काम भाग से महातती रातकपा कौ उत्पत्ति हुई। इत दोनों ये मैथुनों सृष्टि का प्रारम्भ हुआ। मैथुनों सृष्टि से उत्पन हर जीव को मरणशौल माना जाला है। यद्यष्रि कुछ को मपफ्चाद स्वरूप अमितायु भो मिलो है।

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